मंगलवार, 16 मार्च 2010

धर्मयात्रा

जैन सिद्धोदय सिद्धक्षेत्र का मंदिर
धर्मयात्रा की इस बार की कड़ी में हम आपको लेकर चलते हैं नेमावर के जैन सिद्धोदय सिद्ध क्षेत्र में जहाँ भव्य मंदिर खड़ा है नर्मदा के तट पर। इस क्षेत्र का महत्व इसलिए है, क्योंकि यह स्थान प्राचीन काल में जैन संन्यासियों की तपोभूमि हुआ करता था तथा यहाँ कई भव्य मंदिर हुआ करते थे।

रावण के सुत आदि कुमार, मुक्ति गए रेवातट सार।
कोटि पंच अरू लाख पचास, ते बंदों धरि परम हुलास।।

उक्त निर्वाण कांड के श्लोक के अनुसार रावण के पुत्र सहित साढ़े पाँच करोड़ मुनिराज नेमावर के रेवातट से मोक्ष पधारे हैं। रेवा नदी जो कि नर्मदा के नाम से भी जानी जाती है। जैन शास्त्र के अनुसार नेमावर नगरी पर प्रचीन काल में कालसंवर और उनकी रानी कनकमला राज्य करते थे। आगे जाकर यह निमावती और बाद में नेमावर हुआ।

नेमावर नदी के तल से विक्रम संवत 1880 ई.पू. की तीन विशाल जैन प्रतिमाएँ निकली है। पहली 1008 भगवान आदिनाथ की मूर्ति जिन्हें नेमावर जिनालय में, दूसरी 1008 भगवान मुनिसुव्रतनाथ की मूर्ति, जिन्हें खातेगाँव के जिनालय में और 1008 भगवान शांतिनाथ की पद्‍मासनस्त मूर्ति, जिन्हें हरदा में रखा गया है। इसी कारण इस सिद्धक्षेत्र का महत्व और बढ़ गया है।

जैन-तीर्थ संग्रह में मदनकीर्ति ने लिखा है कि 26 जिन तीर्थों का उल्लेख है उनमें रेवा (नर्मदा) के तीर्थ क्षेत्र का महत्व अधिक है उनका कथन है कि रेवा के जल में शांति जिनेश्वर हैं जिनकी पूजा जल देव करते हैं। इसी कारण इस सिद्ध क्षेत्र को महान तीर्थ माना जाता है।

उक्त सिद्ध क्षेत्र पर भव्य निर्माण कार्य प्रगति पर है। यहाँ पर निर्माणाधीन है पंचबालवति एवं त्रिकाल चौबीस जिनालय। लगभग डेढ़ अरब की लागत से उक्त तीर्थ स्थल के निर्माण कार्य की योजना है। लगभग 60 प्रतिशत निर्मित हो चुके यहाँ के मंदिरों की भव्यता देखते ही बनती है।

श्रीदिगंबर जैन रेवातट सिद्धोदय ट्रस्ट नेमावर, सिद्धक्षेत्र द्वारा उक्त निर्माण किया जा रहा है। ट्रस्ट के पास 15 एकड़ जमीन हो गई है जिसमें विश्व के अनूठे 'पंचबालयति त्रिकाल चौबीसी' जिनालय का निर्माण अहमदाबाद के शिल्पज्ञ सत्यप्रकाशजी एवं सी.बी. सोमपुरा के निर्देशन में हो हो रहा है। संपूर्ण मंदिर वं‍शी पहाड़पुर के लाल पत्थर से निर्मित हो रहा है।

पूर्ण मंदिर की लम्बाई 410 फिट, चौड़ाई 325 फिट एवं शिखर की ऊँचाई 121 फिट प्रस्तावित है। जिसमें पंचबालयति जिनालय 55 गुणित 55 लम्बा-चौड़ा है। सभा मंडप 64 गुणित 65 लम्बा-चौड़ा एवं 75 फिट ऊँचा बनना है।

खातेगाँव, नेमावर और हरदा के जैन श्रद्वालुओं के अनुरोध पर श्री 108 विद्यासागरजी महाराज के इस क्षेत्र में आगमन के बाद से ही इस तीर्थ क्षेत्र के विकास कार्य को प्रगति और दिशा मिली। श्रीजी के सानिध्य में ही उक्त क्षेत्र पर निर्माण कार्य का शिलान्यास किया गया।

इंदौर से मात्र 130 कि.मी. दूर दक्षिण-पूर्व में हरदा रेलवे स्टेशन से 22 कि.मी. तथा उत्तर दिशा में खातेगाँव से 15 कि.मी. दूर पूर्व दिक्षा में स्थित है यह मंदिर। यहाँ नर्मदा नदी के जल स्तर की चौड़ाई करीब 700 मीटर है।

कैसे पहुँचे :-
वायु मार्ग : यहाँ से सबसे नजदीकी हवाई अड्डा देवी अहिल्या एयरपोर्ट, इंदौर 130 किमी की दूरी पर स्थित है।
रेल मार्ग : इंदौर से मात्र 130 किमी दूर दक्षिण-पूर्व में हरदा रेलवे स्टेशन से 22 किमी तथा उत्तर दिशा में भोपाल से 170 किमी दूर पूर्व दिशा में स्थित है नेमावर।
सड़क मार्ग : नेमावर पहुँचने के लिए इंदौर से बस या टैक्सी द्वारा भी जाया जा सकता है।
साँगली के पंचायतन गणपति
'सोने का गणपति है साँगली का, अच्छा लगता है उसे चोला जरी का'। ये कहावत कही जाती है महाराष्ट्र के साँगली के सुप्रसिद्ध गणपति के बारे में क्योंकि यहाँ के गणपति की सुंदरता और समृद्धि देखते ही बनती है। साँगली के आराध्य देव के रूप में प्रसिद्ध यह पंचायतन गणपति मंदिर श्रद्धालुओं की आस्‍था का केंद्र है। ऐसी मान्यता है कि भगवान गणेश यहाँ आने वाले भक्तों की झोली भरकर उन्हें भी सुख-समृद्ध करते हैं।
इस मंदिर में सन 1844 में गणपति की प्राण प्रतिष्ठा की गई थी। मंदिर में भगवान शिव, सूर्य, चिंतामणेश्वरी और ल‍क्ष्मीनारायणजी की भी आकर्षक प्रतिमाएँ विराजमान हैं। लाल पत्थर से निर्मित मंदिर के महाद्वार की बनावट देखते ही बनती है। मंदिर परिसर में की गई नक्काशी अत्यंत सुंदर है। गणपति की प्रतिमा को हीरे-जवाहरात और बहुमूल्य आभूषणों से सजाया गया है। गणपति के साथ स्थापित रिद्धि-सिद्धि की मूर्तियाँ भी आकर्षक एवं मनमोहक है।
इस मंदिर के पास से कृष्णा नदी बहती है। हर वर्ष बारिश के दिनों में कृष्णा नदी रौद्र रूप धारण कर लेती है अत: बाढ़ के पानी से बचाव के लिए मंदिर की विशेष बनावट की गई है। मंदिर के स्तर को ऊँचाई पर रखने के लिए निमार्ण कार्य में कोल्हापुर जिले के ज्योतिबा पहाड़ से लाए गए बड़े-बड़े पत्थरों का उपयोग किया गया है।

इस मंदिर की एक और पहचान है यहाँ का हाथी। मंदिर परिसर में हाथी रखने की परंपरा कई सालों से चली आ रही है। यहाँ आने वाले श्रद्धालु भगवान गणेश के साथ ही हाथी की भी आराधना करते थे। यहाँ का 'सुंदर गजराज' नामक हाथी मंदिर के पुजारियों और साँगली के निवासियों के बीच बहुत लोकप्रिय हो गया था। इसके बाद बबलू नामक हाथी भी श्रद्धालुओं के लिए एक आकर्षण बना रहा। बबलू के गुजर जाने पर लाखों लोग उसे श्रद्धा सुमन अर्पित करने के लिए साँगली आए थे।
इस मंदीर में प्रतिदिन काकड़ आरती, भूपाली इसके साथ ही गणेश अथर्वशीर्ष, प्रदक्षिणा, नवग्रह जप, वेदपरायण, ब्रह्मणस्पतीसूक्त आदि पूजा अनुष्ठान संपन्न होते हैं। भक्तों का विश्वास है कि यहाँ विराजे गणपति बप्पा उन्हें कभी निराश नहीं करते।

प्रतिवर्ष गणेशोत्सव के दरम्यान मंदिर से आकर्षक झाँकी निकलती है जिसे देखने के लिए भक्तों का हुजूम लग जाता है। इस समय 'गणपति बप्पा मोरया, मंगलमूर्ति मोरया' की गूँज के साथ लाखों श्रद्धालु झाँकी में शामिल होते हैं।

मंदिर में आने वाले भक्तों का पूरा विश्वास है कि गणपति बप्पा के सामने नतमस्तम होकर मन से की गई हर कामना पूर्ण होती है। इसलिए केवल हिंदू ही नहीं बल्कि सभी धर्मों के लोग यहाँ आकर अपना शीश नवाते हैं।

कैसे पहुँचे?
वायु मार्ग:- निकटतम कोल्हापुर विमानतल से 45 किमी दूरी पर स्थित है साँगली।
रेल मार्ग:- साँगली गाँव पुणे से 235 किमी और कोल्हापुर से 45 किमी दूरी पर स्थित। सभी मुख्य शहरों से साँगली रेल मार्ग जुड़ा हुआ है।
सड़क मार्ग:- मुंबई, पुणे और कोल्हापुर से बस सुविधा उपलब्ध है।

चार वटों में से एक सिद्धवट
धर्मयात्रा की इस बार की कड़ी में हम आपको लेकर चलते हैं उज्जैन के सिद्धवट स्थान पर। उज्जैन के भैरवगढ़ के पूर्व में शिप्रा के तट पर प्रचीन सिद्धवट का स्थान है। इसे शक्तिभेद तीर्थ के नाम से जाना जाता है। हिंदू पुराणों में इस स्थान की महिमा का वर्णन किया गया है। हिंदू मान्यता अनुसार चार वट वृक्षों का महत्व अधिक है। अक्षयवट, वंशीवट, बौधवट और सिद्धवट के बारे में कहा जाता है कि इनकी प्राचीनता के बारे में कोई नहीं जानता।

नासिक के पंचववटी क्षेत्र में सीता माता की गुफा के पास पाँच प्राचीन वृक्ष है जिन्हें पंचवट के नाम से जाना जाता है। वनवानस के दौरान राम, लक्ष्मण और सीता ने यहाँ कुछ समय बिताया था। इन वृक्षों का भी धार्मिक महत्व है। उक्त सारे वट वक्षों की रोचक कहानियाँ हैं। मुगल काल में इन वृक्षों को खतम करने के कई प्रयास हुए।

सिद्धवट के पुजारी ने कहा कि स्कंद पुराण अनुसार पार्वती माता द्वारा लगाए गए इस वट की शिव के रूप में पूजा होती है। पार्वती के पुत्र कार्तिक स्वामी को यहीं पर सेनापति नियुक्त किया गया था। यहीं उन्होंने तारकासुर का वध किया था। संसार में केवल चार ही पवित्र वट वृक्ष हैं। प्रयाग (इलाहाबाद) में अक्षयवट, मथुरा-वृंदावन में वंशीवट, गया में गयावट जिसे बौधवट भी कहा जाता है और यहाँ उज्जैन में पवित्र सिद्धवट हैं।
पंडित नागेश्वर कन्हैन्यालाल ने कहा कि यहाँ पर नागबलि, नारायण बलि-विधान का विशेष महत्व है। संपत्ति, संतित और सद्‍गति की सिद्धि के कार्य होते हैं। यहाँ पर कालसर्प शांति का विशेष महत्व है, इसीलिए कालसर्प दोष की भी पूजा होती है।

कालसर्प दोष का निदान कराने आईं पुना की श्वेता उपाध्याय ने कहा कि मेरी जन्मकुंडली में कालसर्प दोष था। हमें पता चला कि यहाँ कालसर्प दोष का निदान होता है तो मैं यहाँ पर दोष का निवारण कराने आई हूँ।

वर्तमान में इस सिद्धवट को कर्मकांड, मोक्षकर्म, पिंडदान, कालसर्प दोष पूजा एवं अंत्येष्टि के लिए प्रमुख स्थान माना जाता है। यह यात्रा आपकों कैसी लगी हमें जरूर बताएँ।
श्री लक्ष्मीनृसिंह चंदनोत्सव
अक्षय तृतीया के पवित्र दिन (वैशाख मास) सिंहाचल पर्वत की छटा ही निराली होती है। इस पवित्र दिन यहाँ विराजमान श्री लक्ष्मीनृसिंह भगवान का चंदन से श्रृंगार किया जाता है। माना जाता है कि भगवान की प्रतिमा का वास्तविक स्वरूप केवल इसी दिन देखा जा सकता है। सिंहाचल क्षेत्र ग्यारहवीं सदी में बने विश्व के गिने-चुने प्राचीन मंदिरों में से एक माना जाता है।

‘सिंहाचल’ शब्द का अर्थ है सिंह का पर्वत। यह पर्वत भगवान विष्णु के चौथे अवतार प्रभु नृसिंह का निवास स्थान माना जाता है। माना जाता है कि इस स्थान पर भगवान नृसिंह अपने भक्त प्रहलाद की रक्षा के लिए अवतरित हुए थे।

स्थल पुराण के अनुसार भक्त प्रहलाद ने ही इस स्थान पर नृसिंह भगवान का पहला मंदिर बनवाया था। भक्त प्रहलाद ने यह मंदिर नृसिंह भगवान द्वारा उनके पिता के संहार के पश्चात बनवाया था। परंतु कृतयुग के पश्चात इस मंदिर का रखरखाव नहीं हो सका और यह मंदिर गर्त में समा गया। कालांतर में लुनार वंश के पुरुरवा ने एक बार फिर इस मंदिर की खोज की और इसका पुनर्निर्माण करवाया।
माना जाता है ऋषि पुरुरवा एक बार अपनी पत्नी उर्वशी के साथ वायु मार्ग से भ्रमण कर रहे थे। यात्रा के दौरान उनका विमान किसी नैसर्गिक शक्ति से प्रभावित होकर दक्षिण के सिंहाचल क्षेत्र में जा पहुँचा। उन्होंने देखा कि प्रभु की प्रतिमा धरती के गर्भ में समाहित है। उन्होंने इस प्रतिमा को निकाला और उस पर जमी धूल साफ की। इस दौरान एक आकाशवाणी हुई कि इस प्रतिमा को साफ करने के बजाय इसे चंदन के लेप से ढाँककर रखा जाए।

इस आकाशवाणी में उन्हें यह भी आदेश मिला कि इस प्रतिमा के शरीर से साल में केवल एक बार, वैशाख माह के तीसरे दिन चंदन का यह लेप हटाया जाएगा और वास्तविक प्रतिमा के दर्शन प्राप्त हो सकेंगे। आकाशवाणी का अनुसरण करते हुए इस प्रतिमा पर चंदन का लेप किया गया और साल में केवल एक बार ही इस प्रतिमा से लेप हटाया जाता है। तब से श्री लक्ष्मीनृसिंह स्वामी भगवान की प्रतिमा को सिंहाचल में ही स्थापित कर दिया गया।

मंदिर का महत्व -
आंध्रप्रदेश के विशाखापट्‍टनम में स्थित यह मंदिर विश्व के प्राचीन मंदिरों में से एक माना जाता है जिसका निर्माण पूर्वी गंगायो में तेरहवीं सदी में करवाया गया था। यह समुद्री तट से 800 फुट ऊँचा है और उत्तरी विशाखापट्‍टनम से 16 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

मंदिर पहुँचने का मार्ग अनन्नास, आम आदि फलों के पेड़ों से सजा हुआ है। मार्ग में राहगीरों के विश्राम के लिए हजारों की संख्या में बड़े पत्थर इन पेड़ों की छाया में स्थापित हैं। मंदिर तक चढ़ने के लिए सीढ़ी का मार्ग है, जिसमें बीच-बीच में तोरण बने हुए हैं।

शनिवार और रविवार के दिन इस मंदिर में हजारों की तादाद में श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। साथ ही यहाँ दर्शन करने के लिए सबसे उपयुक्त समय अप्रैल से जून तक का होता है। यहाँ पर मनाए जाने वाले मुख्य पर्व हैं वार्षिक कल्याणम (चैत्र शुद्ध एकादशी) तथा चंदन यात्रा (वैशाख माह का तीसरा दिन)।

सोमवार, 15 मार्च 2010

गुड़ी पड़वा विशेष

सृजन का उत्सव गुड़ी पड़वा
फागुन के गुजरते-गुजरते आसमान साफ हो जाता है, दिन का आँचल सुनहरा हो जाता है और शाम लंबी, सुरमई हो जाती है, रात बहुत उदार... बहुत उदात्त होकर उतरती है तो सिर पर तारों का थाल झिलमिलाता है। होली आ धमकती है, चाहे तो इसे धर्म से जोड़े या अर्थ से... सारा मामला तो अंत में मौसम और मन पर आकर टिक जाता है।

इन्हीं दिनों वसंत जैसे आसमान और जमीन के बीच होली के रंगों की दुकान सजाए बैठा रहता है। मन को वसंत का आना भाता है तो पत्तों का गिरना और कोंपलों के फूटने से पुराने के अवसान और नए के आगमन का संदेश अपने गहरे अर्थों में हमें जीवन का दर्शन समझाता है।

एक साथ पतझड़ और बहार के आने से हम इसी वसंत के मौसम में जीवन का उत्सव मनाते हैं, कहीं रंग होता है तो कहीं उमंग होती है। बस, इसी मोड़ पर एक साल और गुजरता है। गुड़ी पड़वा या वर्ष प्रतिपदा के साथ एक नया साल वसंत के मौसम में नीम पर आईं भूरी-लाल-हरी कोंपलों की तरह बहुत सारी संभावनाओं की पिटारी लेकर हमारे घरों में आ धमकता है। जब वसंत अपने शबाब पर है तो फिर इतिहास और पुराण कैसे इस मधुमौसम से अलग हो सकते हैं।

श्रीखंड, पूरणपोळी और नीम के अजीबो-गरीब संयोग के साथ चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को हम विक्रम संवत के नए साल के रूप में मनाते हैं। इस तिथि से पौराणिक और ऐतिहासिक दोनों ही मान्यताएँ जुड़ी हुई हैं। ब्रह्मपुराण के अनुसार चैत्र प्रतिपदा से ही ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना प्रारंभ की थी। इसी तरह के उल्लेख अथर्ववेद और शतपथ ब्राह्मण में भी मिलते हैं। तो इस तरह तो हम सृष्टि के गर्भाधान का उत्सव मनाते हैं, गुड़ी पड़वा पर।

इसी दिन से चैत्र नवरात्रि भी प्रारंभ होती है। लोक मान्यता के अनुसार इसी दिन भगवान राम का और फिर युधिष्ठिर का भी राज्यारोहण किया गया था। इतिहास बताता है कि इस दिन मालवा के नरेश विक्रमादित्य ने शकों को पराजित कर विक्रम संवत का प्रवर्तन किया।

इस दिन से प्रारंभ चैत्र नवरात्रि का समापन रामनवमी पर भगवान राम का जन्मदिन मनाकर किया जाता है। मध्यप्रदेश में मालवा और निमाड़ में गुड़ी पड़वा पर गुड़ी बनाकर खिड़कियों में लगाई जाती है। नीम की पत्ती या तो सीधे ही या फिर पीसकर रस बनाकर ली जाती है।

मान्यता है कि इस दिन से वर्षभर नित्य नियम से पाँच नीम की पत्तियाँ खाने से व्यक्ति निरोग रहता है। दक्षिण भारत में इसे इगादि, आंध्रप्रदेश और कर्नाटक में उगादि, कश्मीर में नवरेह और सिन्धी में इसे चेटीचंड के रूप में मनाया जाता है। आखिर वसंत को नवजीवन के आरंभ के अतिरिक्त और किसी तरह से कैसे मनाया जा सकता है? वसंत के संदेश को गुड़ी पड़वा की मान्यता से बेहतर और कोई परिभाषित नहीं कर सकता।

मार्च माह के त्योहार

दिऩांक प्रमुख त्योहार अन्य त्योहार हिंदी माह पक्ष तिथि
1 मार्च होली, धुलेंडी बसंतोत्सव चैत्र कृष्ण एकम (1)
2 मार्च भाई दौज संत तुकाराम ज. चैत्र कृष्ण द्वितीया (2)
3 मार्च संकष्टी गणेश चतुर्थी (चंद्रो.रा.9.07) चैत्र कृष्ण तृतीया (3)
4 मार्च चैत्र कृष्ण चतुर्थी (4)
5 मार्च रंग पंचमी चैत्र कृष्ण पंचमी (5)
6 मार्च चैत्र कृष्ण षष्ठी (6)
7 मार्च गोविंद वल्लभपंत दि. चैत्र कृष्ण सप्तमी (7)
8 मार्च शीतलाष्टमी, बसोरा अंतरराष्ट्रीय महिला दि. चैत्र कृष्ण अष्टमी (8)
9 मार्च भ. ऋषभनाथ ज. चैत्र कृष्ण नवमी (9)
10 मार्च चैत्र कृष्ण दशमी-एकादशी (10-11)
11 मार्च पापमोचनी एकादशी माँ कर्मा जयंती चैत्र कृष्ण द्वादशी (12)
12 मार्च चैत्र कृष्ण द्वादशी (12)
13 मार्च वारुणी पर्व, प्रदोष व्रत पंचक प्रारंभ (दिन 12.03 से) चैत्र कृष्ण त्रयोदशी (13)
14 मार्च शिव चतुर्दशी खरमास प्रारंभ चैत्र कृष्ण चतुर्दशी (14)
15 मार्च सोम. अमावस्या, सौर मास चैत्र प्रा. विश्व उपभोक्ता दि. चैत्र शुक्ल अमावस्या (15)
16 मार्च चैत्र नवरात्रारंभ, घटस्थापना गुड़ीपड़वा चैत्र शुक्ल एकम (1)
17 मार्च चेटीचंड, झूलेलाल जन्म. चंद्रदर्शन, सिंधारा दौज चैत्र शुक्ल द्वितीया (2)
18 मार्च गणगौर तीज, सौभाग्य सुंदरी व्रत पंचक समाप्त (दिन 09.27) चैत्र शुक्ल तृतीया (3)
19 मार्च विनायकी चतुर्थी (चंद्र अ.रा. 9.34) चैत्र शुक्ल चतुर्थी (4)
20 मार्च आर्य समाज स्थापना. दि. चैत्र शुक्ल पंचमी (5)
21 मार्च विश्व वानिकी दि. चैत्र शुक्ल षष्ठी (6)
22 मार्च विश्व जल संरक्षण दि. चैत्र शुक्ल सप्तमी (7)
23 मार्च दुर्गाष्टमी व्रत, अशोकाष्टमी भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव दि. चैत्र शुक्ल अष्टमी (8)
24 मार्च राम नवमी, जन्मोत्सव विश्व क्षयरोग दि. चैत्र शुक्ल नवमी (9)
25 मार्च पुष्य नक्षत्र गणेश शंकर विद्या‍र्थी दि. चैत्र शुक्ल दशमी (10)
26 मार्च कामदा एकादशी चैत्र शुक्ल एकादशी (11)
27 मार्च प्रदोष व्रत चैत्र शुक्ल द्वादशी (12)
28 मार्च भगवान महावीर ज. पाम संडे चैत्र शुक्ल त्रयोदशी (13)
29 मार्च पूर्णिमा व्रत हाटकेश्वर ज. चैत्र शुक्ल चतुर्दशी (14)
30 मार्च हनुमान जन्मोत्सव स्नानदान पूर्णिमा, वैशाख स्नानदान प्रा. चैत्र शुक्ल पूर्णिमा-एकम (15-1)
31 मार्च आशा द्वितीया वित्तीय वर्ष समाप्त प्रथम वैशाख कृष्ण द्वितीया (2)

नवरात्रि

भगवती आराधना परम कल्याणकारी
युग-युगांतरों में विश्व के अनेक हिस्सों में उत्पन्न होने वाली मानव सभ्यता ने सूर्य, चंद्र, ग्रह, नक्षत्र, जल, अग्नि, वायु, आकाश, पृथ्वी, पेड़-पौधे, पर्वत व सागर की क्रियाशीलता में परम शक्ति का कहीं न कहीं एहसास किया। उस शक्ति के आश्रय व कृपा से ही देव, दनुज, मनुज, नाग, किंनर, गधर्व, पित्तर, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी व कीट आदि चलायमान हैं।
ऐसी परम शक्ति की सत्ता का सतत्‌ अनुभव करने वाली सुसंस्कृत, पवित्र, वेदगर्भा भारतीय भूमि धन्य है। जिसके सद्गृहस्तियों ने धर्म, अर्थ, काम तथा जीवन के अन्तिम लक्ष्य मोक्ष को भी प्राप्त किया।
हमारे वेद, पुराण व शास्त्र गवाह हैं कि जब-जब किसी आसुरी शक्ति ने अत्याचार व प्राकृतिक आपदाओं द्वारा मानव जीवन को तबाह करने की कोशिश की तब-तब किसी न किसी दैवीय शक्ति का अवतरण हुआ। इसी प्रकार जब महिषासुरादि दैत्यों के अत्याचार से भू व देव लोक व्याकुल हो उठे तो परम पिता परमेश्वर की प्रेरणा से सभी देव गणों ने एक अद्भुत शक्ति का सृजन किया जो आदि शक्ति माँ जगदंबा के नाम से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त हुईं। जिन्होंने महिषासुरादि दैत्यों का वध कर भू व देव लोक में पुनः प्राण शक्ति व रक्षा शक्ति का संचार कर दिया।
देवी भागवत, सूर्य पुराण, शिव पुराण, भागवत पुराण, मारकण्डेय आदि पुराणों में शिव व शक्ति की कल्याणकारी कथाओं का अद्वितीय वर्णन है। शक्ति की परम कृपा प्राप्त करने हेतु सम्पूर्ण भारत में नवरात्रि का पर्व वर्ष में दो बार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तथा आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को बड़ी श्रद्धा, भक्ति व हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। जिसे वसंत व शारदीय नवरात्रि के नाम से जाना जाता है।
इस वर्ष नवरात्रि का पावन पवित्र पर्व 16 मार्च 2010 चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से प्रारंभ हो रहा है। अन्योआश्रित जीवन की रीढ़ कृषि व जीवन के आधार प्राणों की रक्षा हेतु इन दोनों ही ऋतुओं में लहलहाती हुई फसलें खेतों से खलिहान में आ जाती हैं।

इन फसलों के रख रखाव व कीट पंतगों से रक्षा हेतु, घर-परिवार को सुखी व समृद्ध बनाने तथा भयंकर कष्टों, दुःख-दरिद्रता से छुटकारा पाने हेतु सभी वर्ग के लोग नौ दिनों तक विशेष सफाई तथा पवित्रता को महत्व देते हुए नव देवियों की आराधना करते हुए हवनादि यज्ञ क्रियाएँ करते हैं। यज्ञ क्रियाओं द्वारा पुनः वर्षा होती है जो धन, धान्य से परिपूर्ण करती है तथा अनेक प्रकार की संक्रमित बीमारियों का अंत भी करती है।
नवरात्रि के कुछ सिद्ध मंत्र
श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ मनोरथ सिद्धि के लिए किया जाता हैं। कहा जाता है कि माता दुर्गा शौर्य गाथा, भक्ति व ज्ञान की त्रिवेणी हैं। यह श्री मार्कण्डेय पुराण का अंश है। सप्तशती में कुछ ऐसे सिद्ध मंत्र हैं, जिनके द्वारा हम अपनी मनोकामना की पूर्ति कर सकते हैं।
यह देवी महात्म्य हमारे धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष चारों पुरुषार्थों को प्रदान करने में सक्षम है।
- ऐश्वर्य प्राप्ति एवं भय मुक्ति मंत्र
ऐश्वर्य यत्प्रसादेन सौभाग्य-आरोग्य सम्पदः।
शत्रु हानि परो मोक्षः स्तुयते सान किं जनै॥
- सर्वकल्याण मंत्र
सर्व मंगलं मांगल्ये शिवे सर्वाथ साधिके ।
शरण्येत्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुऽते॥
- सर्वविघ्ननाशक मंत्र
सर्वबाधा प्रशमनं त्रेलोक्यसयाखिलेशवरी।
एवमेय त्याया कार्य मस्माद्वैरि विनाशनम्‌॥

- बाधा मुक्ति एवं धन-पुत्र प्राप्ति का मंत्र
सर्वाबाधा वि निर्मुक्तो धन धान्य सुतान्वितः।
मनुष्यों मत्प्रसादेन भवष्यति न संशय॥

- सौभाग्य प्राप्ति का चमत्कारिक मंत्र
देहि सौभाग्यं आरोग्यं देहि में परमं सुखम्‌।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषोजहि॥

- विपत्ति नाशक मंत्र
शरणागतर्दनार्त परित्राण पारायणे।
सर्व स्यार्ति हरे देवि नारायणि नमोऽतुते॥

कैसे करें जाप :- नवरात्रि के प्रतिपदा के दिन घटस्थापना के बाद संकल्प लेकर प्रातः स्नान करके दुर्गा की मूर्ति या चित्र की पंचोपचार या दक्षोपचार या षोड्षोपचार से गंध, पुष्प, धूप दीपक नैवेद्य निवेदित कर पूजा करें। मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखें।
शुद्ध-पवित्र आसन ग्रहण कर रुद्राक्ष, तुलसी या चंदन की माला से मंत्र का जाप एक माला से पाँच माला तक पूर्ण कर अपना मनोरथ कहें। पूरी नवरात्रि जाप करने से वांच्छित मनोकामना अवश्य पूरी होती है।
उपरोक्त सारे मंत्र विधिनुसार करने पर मनुष्‍य अपने सारे पापों और कष्‍टों को दूर करके माता का आशीर्वाद का पात्र बन जाता है। नवरात्रि में संयमपूर्वक की गई प्रार्थना और भक्ति माता स्वीकार करती है और साथ ही अपने भक्तों के कष्‍टों का निवारण करते हुए उन्हों मोक्ष प्राप्ति का मार्ग दिखाती है।
या देवी सर्वभूतेषू...

॥ या देवी सर्वभूतेषू शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥
कहते हैं कि शक्ति से सृजन होता है और शक्ति से ही विध्वंस। वेद कहते हैं शक्ति से ही यह ब्रह्मांड चलायमान है।...शरीर या मन में यदि शक्ति नहीं है तो शरीर और मन का क्या उपयोग। शक्ति के बल पर ही हम संसार में विद्यमान हैं। शक्ति ही ब्रह्मांड की ऊर्जा है।
माँ पार्वती को शक्ति भी कहते हैं। वेद, उपनिषद और गीता में शक्ति को प्रकृति कहा गया है। प्रकृति कहने से अर्थ वह प्रकृति नहीं हो जाती। हर माँ प्रकृति है। जहाँ भी सृजन की शक्ति है वहाँ प्रकृति ही मानी गई है इसीलिए माँ को प्रकृति कहा गया है। प्रकृति में ही जन्म देने की शक्ति है।
अनादिकाल की परम्परा ने माँ के रूप और उनके जीवन रहस्य को बहुत ही विरोधाभासिक बना दिया है। वेदों में ब्रह्मांड की शक्ति को चिद् या प्रकृति कहा गया है। वेदों में दुर्गा का कोई उल्लेख नहीं मिलता। गीता में इसे परा कहा गया है। इसी तरह प्रत्येक ग्रंथों में इस शक्ति को अलग-अलग नाम दिया गया है, लेकिन इसका शिव की अर्धांगिनी माता पार्वती से कोई संबंध नहीं। फिर भी पुराणकारों ने सभी का संबंध दुर्गा से जोड़ दिया।
माँ पार्वती का मूल नाम सती है। ये सती शब्द बिगड़कर शक्ति हो गया। शक्ति का अब अर्थ ताकत होता है। पुराणों अनुसार माँ पार्वती के पिता का नाम दक्ष प्रजा‍पति और माता का नाम मेनका है। पति का नाम शिव और पुत्र कार्तिकेय तथा गणेश हैं।
इन्हें हिमालय की पुत्री अर्थात उमा हैमवती भी कहा जाता है। राजा दक्ष प्रजापति को हिमालय इसीलिए कहा जाता है कि उनका राज्य हिमालय क्षेत्र में ही था। दुर्गा ने महिषासुर, शुम्भ, निशुम्भ आदि राक्षसों का वध करके जनता को कुतंत्र से मुक्त कराया था। उनकी यह पवित्र गाथा मर्केण्डेय पुराण में मिलती है।
इस समूचे ब्रह्मांड में व्याप्त हैं सिद्धियाँ और शक्तियाँ। स्वयं हमारे भीतर भी कई तरह की शक्तियाँ हैं। ज्ञानशक्ति, इच्छाशक्ति, मन:शक्ति और क्रियाशक्ति आदि। अनंत हैं शक्तियाँ। वेद में इसे चित्त शक्ति कहा गया है जिससे ब्रह्मांड का जन्म होता है।
॥ॐ एं ह्रीं क्लीं चामुण्डायैः विच्चे॥

धर्मयात्रा

उज्जैन का द्वारकाधीश गोपाल मंदिर
धर्मयात्रा की इस बार की कड़ी में हम आपको लेकर चलते हैं उज्जैन के प्रसिद्ध द्वारकाधीश गोपाल मंदिर। गोपाल मंदिर उज्जैन नगर का दूसरा सबसे बड़ा मंदिर है। शहर के मध्य व्यस्ततम क्षेत्र में स्थित इस मंदिर की भव्यता आस-पास बेतरतीब तरीके से बने मकान और दुकानों के कारण दब-सी गई है।
गोपाल मंदिर के पुजारी जगदिशचंद्र पुरोहित ने कहा कि इस मंदिर का निर्माण दौलत राव सिंधिया की धर्मपत्नी वायजा बाई ने संवत 1901 में कराया था जिसमें मूर्ति की स्थापना संवत 1909 में की गई। इस मान से ईस्वी सन 1844 में निर्माण 1852 में मूर्ति की स्थापना हुई। मंदिर के चाँदी के द्वार यहाँ का एक अन्य आकर्षण हैं।
मंदिर में दाखिल होते ही गहन शांति का अहससास होता है। इसके विशाल स्तंभ और सुंदर नक्काशी देखते ही बनती है। मंदिर के आसपास विशाल प्रांगण में सिंहस्त या अन्य पर्व के दौरान बाहर से आने वाले लोग विश्राम करते हैं। पर्वों के दौरान ट्रस्ट की तरफ से श्रद्धालुओं तथा तीर्थ यात्रियों के लिए कई तरह की सुविधाएँ प्रदान की जाती है।
कम से कम दो सौ वर्ष पूराना है यह मंदिर। मंदिर में भगवान द्वारकाधीश, शंकर, पार्वतीऔर गरुढ़ भगवान की मूर्तियाँ है ये मूर्तियाँ अचल है और एक कोने में वायजा बाई की भी ‍मूर्ति है। यहाँ जन्माष्टमी के अलावा हरिहर का पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। हरिहर के समय भगवान महाकाल की सवारी रात बारह बजे आती है तब यहाँ हरिहर मिलन अर्थात विष्णु और शिव का मिलन होता है। जहाँ पर उस वक्त डेढ़ दो घंटे पूजन चलता है।

कैसे पहुँचे:
सड़क मार्ग: मध्यप्रदेश के इंदौर से लगभग 60 किलोमिटर दूर उज्जैन हिंदुओं का विश्व प्रसिद्ध तीर्थ स्थल हैं। इंदौर बस स्टेंड से बस द्वारा उज्जैन पहुँचा जा सकता है।
रेल मार्ग: तीर्थ स्थल उज्जैन का रेलवे स्टेशन देश के सभी प्रमुख रेलवे स्टेशनों से जुड़ा हुआ है। यहाँ से छोटी और बड़ी लाइन की रेलगाड़ियाँ मुंबई, दिल्ली, चेन्नई और कोलकाता के लिए जाती है।
हवाई मार्ग: उज्जैन का सबसे नि‍कटतम हवाई अड्डा इंदौर है।
जैन सिद्धोदय सिद्धक्षेत्र का मंदिर

धर्मयात्रा की इस बार की कड़ी में हम आपको लेकर चलते हैं नेमावर के जैन सिद्धोदय सिद्ध क्षेत्र में जहाँ भव्य मंदिर खड़ा है नर्मदा के तट पर। इस क्षेत्र का महत्व इसलिए है, क्योंकि यह स्थान प्राचीन काल में जैन संन्यासियों की तपोभूमि हुआ करता था तथा यहाँ कई भव्य मंदिर हुआ करते थे।
रावण के सुत आदि कुमार, मुक्ति गए रेवातट सार।
कोटि पंच अरू लाख पचास, ते बंदों धरि परम हुलास।।
उक्त निर्वाण कांड के श्लोक के अनुसार रावण के पुत्र सहित साढ़े पाँच करोड़ मुनिराज नेमावर के रेवातट से मोक्ष पधारे हैं। रेवा नदी जो कि नर्मदा के नाम से भी जानी जाती है। जैन शास्त्र के अनुसार नेमावर नगरी पर प्रचीन काल में कालसंवर और उनकी रानी कनकमला राज्य करते थे। आगे जाकर यह निमावती और बाद में नेमावर हुआ।
नेमावर नदी के तल से विक्रम संवत 1880 ई.पू. की तीन विशाल जैन प्रतिमाएँ निकली है। पहली 1008 भगवान आदिनाथ की मूर्ति जिन्हें नेमावर जिनालय में, दूसरी 1008 भगवान मुनिसुव्रतनाथ की मूर्ति, जिन्हें खातेगाँव के जिनालय में और 1008 भगवान शांतिनाथ की पद्‍मासनस्त मूर्ति, जिन्हें हरदा में रखा गया है। इसी कारण इस सिद्धक्षेत्र का महत्व और बढ़ गया है।
जैन-तीर्थ संग्रह में मदनकीर्ति ने लिखा है कि 26 जिन तीर्थों का उल्लेख है उनमें रेवा (नर्मदा) के तीर्थ क्षेत्र का महत्व अधिक है उनका कथन है कि रेवा के जल में शांति जिनेश्वर हैं जिनकी पूजा जल देव करते हैं। इसी कारण इस सिद्ध क्षेत्र को महान तीर्थ माना जाता है।
उक्त सिद्ध क्षेत्र पर भव्य निर्माण कार्य प्रगति पर है। यहाँ पर निर्माणाधीन है पंचबालवति एवं त्रिकाल चौबीस जिनालय। लगभग डेढ़ अरब की लागत से उक्त तीर्थ स्थल के निर्माण कार्य की योजना है। लगभग 60 प्रतिशत निर्मित हो चुके यहाँ के मंदिरों की भव्यता देखते ही बनती है।
श्रीदिगंबर जैन रेवातट सिद्धोदय ट्रस्ट नेमावर, सिद्धक्षेत्र द्वारा उक्त निर्माण किया जा रहा है। ट्रस्ट के पास 15 एकड़ जमीन हो गई है जिसमें विश्व के अनूठे 'पंचबालयति त्रिकाल चौबीसी' जिनालय का निर्माण अहमदाबाद के शिल्पज्ञ सत्यप्रकाशजी एवं सी.बी. सोमपुरा के निर्देशन में हो हो रहा है। संपूर्ण मंदिर वं‍शी पहाड़पुर के लाल पत्थर से निर्मित हो रहा है।
पूर्ण मंदिर की लम्बाई 410 फिट, चौड़ाई 325 फिट एवं शिखर की ऊँचाई 121 फिट प्रस्तावित है। जिसमें पंचबालयति जिनालय 55 गुणित 55 लम्बा-चौड़ा है। सभा मंडप 64 गुणित 65 लम्बा-चौड़ा एवं 75 फिट ऊँचा बनना है।
खातेगाँव, नेमावर और हरदा के जैन श्रद्वालुओं के अनुरोध पर श्री 108 विद्यासागरजी महाराज के इस क्षेत्र में आगमन के बाद से ही इस तीर्थ क्षेत्र के विकास कार्य को प्रगति और दिशा मिली। श्रीजी के सानिध्य में ही उक्त क्षेत्र पर निर्माण कार्य का शिलान्यास किया गया।
इंदौर से मात्र 130 कि.मी. दूर दक्षिण-पूर्व में हरदा रेलवे स्टेशन से 22 कि.मी. तथा उत्तर दिशा में खातेगाँव से 15 कि.मी. दूर पूर्व दिक्षा में स्थित है यह मंदिर। यहाँ नर्मदा नदी के जल स्तर की चौड़ाई करीब 700 मीटर है।

कैसे पहुँचे :-
वायु मार्ग : यहाँ से सबसे नजदीकी हवाई अड्डा देवी अहिल्या एयरपोर्ट, इंदौर 130 किमी की दूरी पर स्थित है।
रेल मार्ग : इंदौर से मात्र 130 किमी दूर दक्षिण-पूर्व में हरदा रेलवे स्टेशन से 22 किमी तथा उत्तर दिशा में भोपाल से 170 किमी दूर पूर्व दिशा में स्थित है नेमावर।
सड़क मार्ग : नेमावर पहुँचने के लिए इंदौर से बस या टैक्सी द्वारा भी जाया जा सकता है।
ॐ शनिदेवाय नमः
शनि का धाम श्रीशनि शिगनापुर मंदिर
धर्मयात्रा में इस बार वेबदुनिया के साथ यात्रा कीजिए सूर्य पुत्र शनिदेव के धाम शनि शिगनापुर मंदिर की। शनिदेव के बारे में माना जाता है कि यदि शनि महाराज प्रसन्न हों तो सब कुछ अच्छा, लेकिन यदि ये कुपित हो गए तो इनकी कोध्राग्नि से बचना बेहद मुश्किल है। इसलिए शनिदेव के भक्त अपने ईष्ट को मनाने के लिए उन्हें तेल चढ़ाते हैं।
शनि शिगनापुर मंदिर की महिमा अपरंपार है। महाराष्ट्र के नासिक शहर के पास स्थित शिगनापुर गाँव में शनिदेव का प्राचीन मंदिर है। इस मंदिर में शनिदेव की अत्यंत प्राचीन पाषाण प्रतिमा है। प्रतिमा को स्वयंभू माना जाता है। वास्तव में इस प्रतिमा का कोई आकार नहीं है। मूलतः एक पाषाण को शनि रूप माना जाता है।
शनिधाम शिगनापुर गाँव की भी एक रोचक लेकिन सत्य कथा है। माना जाता है इस गाँव के राजा शनिदेव हैं, इसलिए यहाँ कभी चोरी नहीं होती। इस गाँव के लोग अपने घर में ताला नहीं लगाते हैं, लेकिन उनके घर से कभी एक कील भी चोरी नहीं होती।
यहाँ के लोगों का मानना है कि शनि की इस नगरी की रक्षा खुद शनिदेव का पाश करता है। कोई भी चोर गाँव की सीमारेखा को जीवित अवस्था में पार नहीं कर सकता। गाँव के बड़े-बुजुर्गों को जोर देने पर भी याद नहीं आता कि उनके गाँव में चोरी की कोई छोटी-सी भी घटना हुई हो।
इसके साथ ही लोगों की आस्था है कि शिगनापुर गाँव के अंदर यदि किसी व्यक्ति को जहरीला साँप काट ले तो उसे शनिदेव की प्रतिमा के पास लाना चाहिए। शनिदेव की कृपा से जहरीले से जहरीले साँप का विष भी बेअसर हो जाता है।
शनि शिगनापुर मंदिर में शनिदेव के दर्शन करने, उनकी आराधना करने के कुछ नियम हैं। चूँकि शनिदेव बाल ब्रह्मचारी हैं, इसलिए महिलाएँ दूर से ही उनके दर्शन करती हैं। वहीं पुरुष श्रद्धालु स्नान करके, गीले वस्त्रों में ही शनि भगवान के दर्शन करते हैं।
तिल का तेल चढ़ाकर पाषाण प्रतिमा की प्रदक्षिणा करते हैं। दर्शन करने के बाद श्रद्धालु यहाँ स्थित दुकानों से घोड़े की नाल और काले कपड़ों से बनी शनि भगवान की गुड़िया जरूर खरीदते हैं। लोक मान्यता है कि घोड़े की नाल घर के बाहर लगाने से बुरी नजर से बचाव होता है और घर में सुख-समृद्धि आती है।
कैसे जाएँ-
हवाई यात्रा- यहाँ का सबसे निकटतम हवाई अड्डा पूना में है, जो यहाँ से 160 किमी दूर है।
रेल- यहाँ का निकटतम रेलवे स्टेशन श्रीरामपुर है।
रोड- नासिक से यहाँ के लिए बस, टैक्सी आदि सुविधाएँ उपलब्ध हैं। मुंबई, पूना अहमदाबाद से यहाँ सड़क मार्ग से आया जा सकता है।
लेटे हुए हनुमान का मंदिर
राजकोट के श्रीबड़े बालाजी हनुमान

धर्मयात्रा की इस बार की कड़ी में हम आपको ले चलते हैं, गुजरात के राजकोट शहर में स्थित रामभक्त हनुमान के मंदिर। राजकोट के कोठारिया रोड पर स्थित श्रीबड़े बालाजी के नाम से प्रसिद्ध इस मंदिर की खासियत यह है कि इसमें हनुमानजी की प्रतिमा लेटी हुई स्थिति में विद्यमान है। इस कारण यह मंदिर लेटे हुए हनुमान के नाम से भी पूरे सौराष्ट्र क्षेत्र में प्रसिद्ध है।
आज से तकरीबन चालीस साल पहले इस मंदिर की स्थापना की गई थी। मंदिर के पुजारी कमलदासजी महाराज और गुरु सर्वेश्वरदासजी महाराज कहते हैं कि चालीस साल पहले इसी जगह पर एक अनुष्ठान करते समय उनको हनुमानजी ने सर्पाकृति के रूप में दर्शन दिए, जिसे देखकर वे खड़े हो गए और उनका अनुष्ठान खंडित हो गया।
बाद में एक दिन स्वयं हनुमानजी ने उन्हें स्वप्न में दर्शन देकर मंदिर निर्माण के लिए प्रेरित किया। चूँकि प्रथम अनुष्ठान के दौरान उन्हें सर्पाकृति में हनुमानजी के दर्शन हुए थे, इसलिए उन्होंने कुछ भक्तजनों की आर्थिक मदद से यहाँ पर लेटे हुए हनुमान की प्रतिमा विराजमान की। पवित्र औषधी और मिश्रित धातु से बनी हुई इस प्रतिमा की उँचाई 21 फिट व चौड़ाई 11 फिट है।
शुरुआत में इस मंदिर के निर्माण में काफी दिक्कते आई, लेकिन धीरे-धीरे यह मंदिर पूरे गुजरात में प्रसिद्ध हो गया। आज यहाँ पर प्रतिदिन हजारों भक्तजन हनुमानजी के दर्शन के लिए आते हैं। रामनवमी और हनुमान जयंति पर तो यहाँ लोगों का यहाँ पर ताँता लगता है। इस दिन यहाँ पर एक विशाल भंडारा आयोजित होता है।
WDभक्तजनों को मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करते ही नंदी महाराज और एक बड़ी शिवलिंग के दर्शन होते हैं जिन्हें कमलेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है। मंदिर के अंदर बने झरोखे से भक्तजन नीचे लेटे हुए हनुमान जी के दर्शन करते हैं। लेटे हुए बालाजी हनुमान के पास उनकी रक्षा करते हुए बंदरों और सप्तऋषि की छोटी-छोटी मूर्तियाँ भी विराजमान है। मंदिर में हनुमानजी की एक छोटी-सी मूर्ति भी है, जो मंदिर की स्थापना के समय से विद्यमान है।
मंदिर की दीवारों पर कई देवी-देवताओं के चित्रों को किसी मंजे हुए चित्रकार ने जीवंत रूप दिया है। जिसमें गुरु सर्वेश्वरदासजी महाराज का भी एक चित्र है। मंदिर के भीतर राम और कृ‍ष्ण का छोटा-सा मंदिर है।
इस मंदिर के नाम पर एक ट्रस्ट का निर्माण भी किया गया है जो गौसेवा, अन्नसेवा और गरीब विद्यार्थियों को निशुल्क रहने की सुविधा भी प्रदान करता है। कहते हैं कि यहाँ पर कभी भी दान माँगा नहीं जाता बल्कि स्वयं दाता दान देने के लिए आगे आते हैं। मान्यता है कि यहाँ पर आने वाले प्रत्येक भक्त की माँग को बड़े बालाजी पूरी करते हैं।
कैसे पहुँचे : गुजरात के राजकोट रेलवे स्टेशन और बस स्टेशन से ऑटो या फिर बस के द्वारा यहाँ पहुँचा जा सकता है।
चार वटों में से एक सिद्धवट
धर्मयात्रा की इस बार की कड़ी में हम आपको लेकर चलते हैं उज्जैन के सिद्धवट स्थान पर। उज्जैन के भैरवगढ़ के पूर्व में शिप्रा के तट पर प्रचीन सिद्धवट का स्थान है। इसे शक्तिभेद तीर्थ के नाम से जाना जाता है। हिंदू पुराणों में इस स्थान की महिमा का वर्णन किया गया है। हिंदू मान्यता अनुसार चार वट वृक्षों का महत्व अधिक है। अक्षयवट, वंशीवट, बौधवट और सिद्धवट के बारे में कहा जाता है कि इनकी प्राचीनता के बारे में कोई नहीं जानता।
*नासिक के पंचववटी क्षेत्र में सीता माता की गुफा के पास पाँच प्राचीन वृक्ष है जिन्हें पंचवट के नाम से जाना जाता है। वनवानस के दौरान राम, लक्ष्मण और सीता ने यहाँ कुछ समय बिताया था। इन वृक्षों का भी धार्मिक महत्व है। उक्त सारे वट वक्षों की रोचक कहानियाँ हैं। मुगल काल में इन वृक्षों को खतम करने के कई प्रयास हुए।
सिद्धवट के पुजारी ने कहा कि स्कंद पुराण अनुसार पार्वती माता द्वारा लगाए गए इस वट की शिव के रूप में पूजा होती है। पार्वती के पुत्र कार्तिक स्वामी को यहीं पर सेनापति नियुक्त किया गया था। यहीं उन्होंने तारकासुर का वध किया था। संसार में केवल चार ही पवित्र वट वृक्ष हैं। प्रयाग (इलाहाबाद) में अक्षयवट, मथुरा-वृंदावन में वंशीवट, गया में गयावट जिसे बौधवट भी कहा जाता है और यहाँ उज्जैन में पवित्र सिद्धवट हैं।
WDयहाँ तीन तरह की सिद्धि होती है संतति, संपत्ति और सद्‍गति। तीनों की प्राप्ति के लिए यहाँ पूजन किया जाता है। सद्‍गति अर्थात पितरों के लिए अनुष्ठान किया जाता है। संपत्ति अर्थात लक्ष्मी कार्य के लिए वृक्ष पर रक्षा सूत्र बाँधा जाता है और संतति अर्थात पुत्र की प्राप्ति के लिए उल्टा सातिया (स्वस्विक) बनाया जाता है। यह वृक्ष तीनों प्रकार की सिद्धि देता है इसीलिए इसे सिद्धवट कहा जाता है।
पंडित नागेश्वर कन्हैन्यालाल ने कहा कि यहाँ पर नागबलि, नारायण बलि-विधान का विशेष महत्व है। संपत्ति, संतित और सद्‍गति की सिद्धि के कार्य होते हैं। यहाँ पर कालसर्प शांति का विशेष महत्व है, इसीलिए कालसर्प दोष की भी पूजा होती है।
कालसर्प दोष का निदान कराने आईं पुना की श्वेता उपाध्याय ने कहा कि मेरी जन्मकुंडली में कालसर्प दोष था। हमें पता चला कि यहाँ कालसर्प दोष का निदान होता है तो मैं यहाँ पर दोष का निवारण कराने आई हूँ।

वर्तमान में इस सिद्धवट को कर्मकांड, मोक्षकर्म, पिंडदान, कालसर्प दोष पूजा एवं अंत्येष्टि के लिए प्रमुख स्थान माना जाता है। यह यात्रा आपकों कैसी लगी हमें जरूर बताएँ।
गंगा किनारे विराजे काशी विश्वनाथ
ॐ नमः शिवाय...शिव-शंभु...
'वाराणसीतु भुवनत्रया सारभूत
रम्या नृनाम सुगतिदाखिल सेव्यामना
अत्रगाता विविधा दुष्कृतकारिणोपि
पापाक्ष्ये वृजासहा सुमनाप्रकाशशः'
- नारद पुराण
गंगा नदी के पश्चिमी तट पर स्थित वाराणसी नगर विश्व के प्राचीनतम शहरों में से एक माना जाता है तथा यह भारत की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में सुशोभित है। इस नगर के हृदय में बसा है भगवान काशी विश्वनाथ का मंदिर जो प्रभु शिव, विश्वेश्वर या विश्वनाथ के प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है। स्त्री हो या पुरुष, युवा हो या प्रौढ़, हर कोई यहाँ पर मोक्ष की प्राप्ति के लिए जीवन में एक बार अवश्य आता है। ऐसा मानते हैं कि यहाँ पर आने वाला हर श्रद्धालु भगवान विश्वनाथ को अपनी ईष्ट इच्छा समर्पित करता है।
धार्मिक महत्व-
ऐसा माना जाता है कि जब पृथ्वी का निर्माण हुआ था तब प्रकाश की पहली किरण काशी की धरती पर पड़ी थी। तभी से काशी ज्ञान तथा आध्यात्म का केंद्र माना जाता है।
यह भी माना जाता है कि निर्वासन में कई साल बिताने के पश्चात भगवान शिव इस स्थान पर आए थे और कुछ समय तक काशी में निवास किया था। ब्रह्माजी ने उनका स्वागत दस घोड़ों के रथ को दशाश्वमेघ घाट पर भेजकर किया था।
काशी विश्वनाथ मंदिर-
गंगा तट पर सँकरी विश्वनाथ गली में स्थित विश्वनाथ मंदिर कई मंदिरों और पीठों से घिरा हुआ है। यहाँ पर एक कुआँ भी है, जिसे 'ज्ञानवापी' की संज्ञा दी जाती है, जो मंदिर के उत्तर में स्थित है। विश्वनाथ मंदिर के अंदर एक मंडप व गर्भगृह विद्यमान है। गर्भगृह के भीतर चाँदी से मढ़ा भगवान विश्वनाथ का 60 सेंटीमीटर ऊँचा शिवलिंग विद्यमान है। यह शिवलिंग काले पत्थर से निर्मित है। हालाँकि मंदिर का भीतरी परिसर इतना व्यापक नहीं है, परंतु वातावरण पूरी तरह से शिवमय है।

ऐतिहासिक महत्व-
ऐसा माना जाता है कि यह मंदिर प्राक्-ऐतिहासिक काल में निर्मित हुआ था। सन् 1776 में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई ने इस मंदिर के पुनर्निमाण के लिए काफी धनराशि दान की थी। यह भी माना जाता है कि लाहौर के महाराजा रंजीतसिंह ने इस मंदिर के शिखर के पुनर्निमाण के लिए एक हजार किलो सोने का दान किया था। 1983 में उत्तरप्रदेश सरकार ने इसका प्रबंधन अपने हाथ में ले लिया और पूर्व काशी नरेश विभूति सिंह को इसके ट्रस्टी के रूप में नियुक्त किया।
पूजा-अर्चना -
यह मंदिर प्रतिदिन 2.30 बजे भोर में मंगल आरती के लिए खोला जाता है जो सुबह 3 से 4 बजे तक होती है। दर्शनार्थी टिकट लेकर इस आरती में भाग ले सकते हैं। तत्पश्चात 4 बजे से सुबह 11 बजे तक सभी के लिए मंदिर के द्वार खुले होते हैं। 11.30 बजे से दोपहर 12 बजे तक भोग आरती का आयोजन होता है। 12 बजे से शाम के 7 बजे तक पुनः इस मंदिर में सार्वजनिक दर्शन की व्यवस्था है।
शाम 7 से 8.30 बजे तक सप्तऋषि आरती के पश्चात रात के 9 बजे तक सभी दर्शनार्थी मंदिर के भीतर दर्शन कर सकते हैं। 9 बजे के पश्चात मंदिर परिसर के बाहर ही दर्शन संभव होते हैं। अंत में 10.30 बजे रात्रि से शयन आरती प्रारंभ होती है, जो 11 बजे तक संपन्न होती है। चढ़ावे में चढ़ा प्रसाद, दूध, कपड़े व अन्य वस्तुएँ गरीबों व जरूरतमंदों में बाँट दी जाती हैं।
कैसे पहुँचें?
सड़क परिवहन द्वारा- गंगा के मैदान में स्थित होने के कारण वाराणसी के लिए सड़क परिवहन की उत्तम व्यवस्था है। उत्तरप्रदेश के विभिन्न हिस्सों से इस स्थान के लिए निजी व सरकारी बसों की उत्तम व्यवस्था है।

शनिवार, 13 मार्च 2010

पर्यटन » मध्यप्रदेश

कम दिनों में 'दिल' की सैर
नए साल को सेलिब्रेट करने के लिए दिसंबर अंत में सबसे ज्यादा पर्यटक गोवा जाते हैं। लेकिन बुकिंग की परेशानी है फिर जेब का भी सवाल है। अगर आप किफायती बजट और एक सप्ताह से भी कम समय में नए साल का जश्न शहर से कहीं दूर मनाना चाहते हैं तो आप हिन्दुस्तान के दिल के किसी भी कोने में जा सकते हैं। यानी पूरे मध्यप्रदेश में ही ऐसे बीस से भी ज्यादा पर्यटन स्थल हैं जहाँ से आप चंद दिनों में ही अपने शहर लौट सकते हैं और आपकी जेब भी ज्यादा हल्की नहीं होगी। ऐसे करीब 12 पर्यटन स्थलों की जानकारी हम दे रहे हैं-
अमरकंटकविंध्य और सतपुड़ा पर्वतमाला के केंद्र में स्थित अमरकंटक एक तीर्थ स्थल है और नर्मदा नदी की उद्गम स्थली है। इस पर्यटन स्थल की खासियत यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता है। जबलपुर से अमरकंटक की दूरी 228 किलोमीटर है। सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन पेंड्रा रोड है जो 42 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। सड़क मार्ग से अमरकंटक जबलपुर, बिलासपुर और रीवा से जुड़ा है।
देखने के लिए खास
नर्मदा उद्गम - यहाँ नर्मदा नदी के उद्गम स्थल पर मंदिर बना है। जगह प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर है।
सोनमुडा - सोन नदी का उद्गम स्थल
भृगु कमंडल - यहाँ एक प्राकृतिक पुरातन कमंडल बना हुआ है जो हमेशा पानी से लबरेज रहता है।
धुनी पानी - यहाँ घने जंगल में आप जल प्रपात का मजा ले सकते हैं।
दुग्ध धारा - यहाँ पचास फुट की ऊँचाई से गिरने वाला प्रपात है।
कपिल धारा - वॉटरफॉल होने के कारण यह पिकनिक स्पॉट के रूप में प्रसिद्ध है।
माँ की बगिया - यह एक खूबसूरत बाग है जहाँ एक मंदिर भी है।
बाँधवगढ़ नेशनल पार्क
बाघों का गढ़ बाँधवगढ़ 448 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला है। शहडोल जिले में स्थित इस राष्ट्रीय उद्यान में एक मुख्य पहाड़ है जो बाँधवगढ़ कहलाता है। 811 मीटर ऊँचे इस पहाड़ के पास छोटी-छोटी पहाड़ियाँ हैं। पार्क में साल और बंबू के वृक्ष प्राकृतिक सुंदरता को बढ़ाते हैं। बाँधवगढ़ से सबसे नजदीक विमानतल जबलपुर में है जो 164 किलोमीटर की दूरी पर है। रेल मार्ग से भी बाँधवगढ़ जबलपुर, कटनी और सतना से जुड़ा है। खजुराहो से बाँधवगढ़ के बीच 237 किलोमीटर की दूरी है। दोनों स्थानों के बीच केन नदी के कुछ हिस्सों को क्रोकोडाइल रिजर्व घोषित किया गया है।
देखने के लिए खास
किला - बाँधवगढ़ की पहाड़ी पर 2 हजार वर्ष पुराना किला बना है।
जंगल - बाँधवगढ़ का वन क्षेत्र फ्लोरा और फना की प्रजातियों से भरा हुआ है। जंगल में नीलगाय और चिंकारा सहित हर तरह के वन्यप्राणी और पेड़ हैं।
वन्यप्राणी - इस राष्ट्रीय उद्यान में पशुओं की 22 और पक्षियों की 250 प्रजातियाँ पाई जाती हैं। हाथी पर सवार होकर या फिर वाहन में बैठकर इन वन्यप्राणियों को देखा जा सकता है।
भेड़ाघाट
नर्मदा नदी के दोनों तटों पर संगमरमर की सौ फुट तक ऊँची चट्टानें भेड़ाघाट की खासियत हैं। यह पर्यटन स्थल भी जबलपुर से महज 23 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। जबलपुर से भेड़ाघाट के लिए बस, टेम्पो और टैक्सी भी उपलब्ध रहती है।
देखने के लिए खास
संगरमर की चट्टानें - चाँद की रोशनी में भेड़ाघाट की सैर एक अलग तरह का अनुभव रहता है।
धुआँधार वॉटर फॉल - भेड़ाघाट के पास नर्मदा का पानी एक बड़े झरने के रूप में गिरता है। यह स्पॉट धुआँधार फॉल्स कहलाता है।
चौंसठ योगिनी मंदिर - भेड़ाघाट के पास ही यह मंदिर एक पहाड़ी पर स्थित है। दसवीं शताब्दी में स्थापित हुए दुर्गा के इस मंदिर से नर्मदा दिखाई देती है।

भीमबेटका
भोपाल से 46 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस पर्यटन स्थल की खासियत चट्टानों पर हजारों वर्ष पूर्व बनी चित्रकारी है। इस पर्यटन स्थल पर करीब 500 गुफाओं में चित्रकारी की गई है। यहाँ प्राकृतिक लाल और सफेद रंगों से वन्यप्राणियों के शिकार के दृश्यों के अलावा घोड़े, हाथी, बाघ आदि के चित्र उकेरे गए हैं। भोपाल नजदीक होने के कारण भीमबेटका में पर्यटकों के ठहरने की व्यवस्था नहीं है।

चित्रकूटचित्रकूट का पौराणिक महत्व इसलिए है, क्योंकि यहाँ भगवान राम ने अपने वनवास के 14 में से 11 वर्ष गुजारे थे। चित्रकूट से सबसे नजदीकी विमानतल खजुराहो में स्थित है। यह रेल और सड़क मार्ग से झाँसी से जुड़ा है।
देखने के लिए खास
रामघाट - मंदाकिनी नदी के किनारे स्थित इस घाट पर धार्मिक गतिविधियाँ ज्यादा होती हैं।
कामदगिरी - यहाँ भरत मिलाप मंदिर है, जिसका रामायण में उल्लेख होने के कारण पौराणिक महत्व है।
सती अनुसुया - हिन्दु धर्माववलंबियों के लिए इस स्थल का महत्व इसलिए है, क्योंकि यह माना जाता है कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश का यहाँ अत्री मुनी और उनकी पत्नि अनुसुया के तीन पुत्रों के रूप में पुनर्जन्म हुआ था।
स्फटिक शिला - यहाँ चट्टानों पर श्रीराम के चरणों के निशान देखे जा सकते हैं।
गुप्त गोदावरी - चित्रकूट से 18 किलोमीटर दूर स्थित इस स्थल में एक छोटी गुफा के बीच नदी के बहाव को देखा जा सकता है।
खजुराहो
मंदिरों की खूबसूरत स्थापत्य कला का एक नमूना खजुराहो के मंदिरों में देखा जा सकता है। यहाँ चंदेला राजपूतों के साम्राज्य में एक हजार वर्ष पूर्व 85 मंदिर बनाए गए थे। इनमें से वर्तमान में 22 मंदिर ही अच्छी स्थिति में हैं। हवाई मार्ग से खजुराहो दिल्ली और आगरा से जुड़ा है। रेल और सड़क मार्ग से यह महोबा, हरबालपुर, सतना और भोपाल से जुड़ा है।
देखने के लिए खास
चौंसठ योगिनी, देवी जगदंबे, चित्रगुप्त, विश्वनाथ, नंदी, लक्ष्मण, वराह, मतंगेश्वर, पार्श्वनाथ, आदिनाथ, ब्रह्म, चतुर्भुज आदि मंदिर खजुराहो के आसपास स्थित हैं। सभी मंदिर शताब्दियों पुराने हैं।

कान्हा किसली
कान्हा टाइगर रिजर्व 940 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला राष्ट्रीय उद्यान है। इसे देखने के लिए पर्यटक जीप किराए पर ले सकते हैं। टाइगर ट्रेकिंग के लिए हाथी पर सवार होकर भी उद्यान की सैर की जा सकती है। राष्ट्रीय उद्यान के भीतर दो स्थानों खतिया और मुक्की से जाया जा सकता है। कान्हा जबलपुर, बिलासपुर और बालाघाट से सड़क मार्ग के जरिए जुड़ा है। नजदीकी विमानतल और रेलवे स्टेशन जबलपुर है।
देखने के लिए खास
कान्हा राष्ट्रीय उद्यान में वन्यप्राणियों की 22 प्रजातियाँ पाई जाती हैं। पक्षियों की यहाँ 200 प्रजातियाँ हैं।
बामनी दादर - यह एक सनसेट प्वाइंट है। यहाँ से सांभर और हिरण जैसे वन्यप्राणियों को भी देखा जा सकता है। यहाँ लोमड़ी और चिंकारा जैसे वन्यप्राणी काफी कम देखे जाते हैं।
महेश्वरनगर महिष्मती के रूप में महेश्वर का रामायण और महाभारत में भी उल्लेख है। देवी अहिल्याबाई होलकर के कालखंड में बनाए गए यहाँ के घाट सुंदर हैं और इनका प्रतिबिंब नदी में और खूबसूरत दिखाई देता है। महेश्वर इंदौर से ही सबसे नजदीक है। इंदौर विमानतल महेश्वर से 91 किलोमीटर की दूरी पर है।
देखने के लिए खास
राजगद्दी और रजवाड़ा - महेश्वर किले के अंदर रानी अहिल्याबाई की राजगद्दी पर बैठी पर एक प्रतिमा रखी गई है।
मंदिर - महेश्वर में घाट के आसपास कालेश्वर, राजराजेश्वर, विठ्ठलेश्वर और अहिलेश्वर मंदिर हैं।

ओंकारेश्वरओंकारेश्वर भी नर्मदा नदी के तट पर स्थित एक कस्बा है। ज्योतिर्लिंग होने के कारण इस स्थल का धार्मिक महत्व है। इंदौर या महेश्वर से ओंकारेश्वर सड़क मार्ग से जुड़ा है। इंदौर से ओंकारेश्वर के बीच की दूरी 77 किलोमीटर है।
देखने के लिए खास
ओंकारेश्वर के ज्योतिर्लिंग मंदिर के अलावा सिद्धनाथ मंदिर और 24 अवतार मंदिर भी देखने लायक हैं।

पचमढ़ी-
प्राकृतिक सुंदरता के कारण हिलस्टेशन पचम़ढ़ी एक मशहूर पर्यटन स्थल के रूप में जाना जाता है। पचमड़ी भोपाल और पिपरिया से सड़क मार्ग से जुड़ा है। नजदीकी रेलवे स्टेशन पिपरिया है।
देखने के लिए खास
प्रियदर्शिनी - यह वह स्थल है जहाँ से वर्ष 1857 में पचमढ़ी की खोज की गई थी।
जमुना प्रपात - यह वह वॉटर फॉल जो पचमड़ी की जलापूर्ति करता है।
अप्सरा विहार - यह एक सुरक्षित पिकनिक स्पॉट है जहाँ जलप्रपात भी है।
रजत प्रपात, आयरेन पूल, जलावतरण, सुंदर कुंड, जटाशंकर मंदिर, धूपगढ़, पांडव गुफाएँ भी पर्यटन स्थल हैं।
पेंचटाइगर रिजर्व और मोगली सेंचुरी के कारण पेंच राष्ट्रीय उद्यान जाना जाता है। यह 757 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है। यहाँ 1200 तरह के पेड़-पौधों की प्रजातियाँ पाई जाती हैं। 285 किस्म के पक्षी यहाँ चहचहाते हैं, इसलिए यह उद्यान बर्ड वॉचिंग के लिए एक उपयुक्त स्थान है। पेंच जबलपुर से सड़क मार्ग के जरिए जुड़ा है।

मांडू
परमार शासकों द्वारा बनाए गए इस नगर में जहाज और हिंडोला महल खास हैं। यहाँ के महलों की स्थापत्य कला देखने लायक है। मांडू इंदौर से 100 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। सड़क मार्ग से यह धार से भी जुड़ा हुआ है।
देखने के लिए खास
दरवाजे - मांडू में दाखिल होने के लिए 12 दरवाजे हैं। मुख्य रास्ता दिल्ली दरवाजा कहलाता है। दूसरे दरवाजे रामगोपाल दरवाजा, जहांगीर दरवाजा और तारापुर दरवाजा कहलाते हैं।
जहाज महल - जहाजनुमा आकार में इस महल को दो मानवनिर्मित तालाबों के बीच बनाया गया था।
हिंडोला महल - टेड़ी दीवारों के कारण इस महल को हिंडोला महल कहा जाता है।
होशंग शाह की मस्जिद, जामी मस्जिद, नहर झरोखा, बाज बहादुर महल, रानी रूपमति महल और नीलकंठ महल भी पर्यटकों को आकर्षित करते हैं।

बॉलीवुड

नील और प्रियंका में हुआ ब्रेकअप
एक्टर नील नितिन मुकेश और उनकी गर्लफ्रेंड डिजाइनर प्रियंका भाटिया में ब्रेकअप हो गया। दोनों ने आपसी सहमति से अलग होने का निर्णय लिया और वे फ्रेंड्‍स बने रहेंगे। अलग होने का फैसला क्यों लिया गया, इसको लेकर उन्होंने कोई ठोस कारण नहीं बताया है।
नील और प्रियंका का रोमांस दो वर्ष से चल रहा था। इस दौरान नील ने हमेशा प्रियंका की तारीफ की। दोनों का एक-दूसरे के घर में आना-जाना था और उनके घरवाले भी खुश थे। यह माना जा रहा था कि बॉलीवुड में अपने पैर जमाने के बाद नील, प्रियंका से ही विवाह करेंगे। लेकिन अचानक ब्रेकअप हो गया।
सूत्रों का कहना है कि नील की लाइफ स्टाइल से प्रियंका तालमेल नहीं बैठा पाई। एक एक्टर की लाइफ बेहद व्यस्त होती है। शूटिंग, प्रमोशन, विज्ञापन ‍जैसे कई काम उन्हें करना पड़ता है। अपने शहर से एक्टर्स लंबे समय तक बाहर रहते हैं।
नील अभी उस स्थिति में नहीं आए हैं कि ऑफर्स को ठुकरा सके। उन्हें जहाँ और जैसा मौका मिल रहा है वे काम कर रहे हैं। इसी वजह से प्रियंका और उन्होंने ब्रेकअप का डिसीजन लिया है।

करीना कपूर सबसे खराब अभिनेत्री!
हॉलीवुड की तर्ज पर बॉलीवुड में भी वर्ष की खराब‍ फिल्म, खराब एक्टर्स/एक्ट्रेस के अवॉर्ड शुरू हो गए हैं। दूसरे गोल्डन केला अवॉर्ड्‍स की घोषणा हाल ही में की गई है।
करीना कपूर को फिल्म ‘कम्बख्‍त इश्क’ के लिए सबसे खराब अभिनेत्री घोषित किया गया। खराब अभिनेता के लिए हरमन बावेजा (व्हाट्स योअर राशि) के नाम की घोषणा हुई। वर्ष की सबसे घटिया फिल्म का पुरस्कार ‘कम्बख्त इश्क’ को मिला।
गौरतलब है कि जिन्हें भी यह अवॉर्ड देने की घोषणा की गई उनमें से कोई भी कलाकार इस कार्यक्रम में उपस्थित नहीं था। नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में इन पुरस्कारों की घोषणा की गई।
रणवीर शौरी और दीपिका पादुकोण ‘चाँदनी चौक टू चाइना’ के लिए वर्स्ट सपोर्टिंग एक्टर घोषित किए गए। मधुर भंडारकर ने ‘बस कीजिए बहुत हो गया’ पुरस्कार जीता। उनसे विनती की गई की अब फिल्म बनाना बंद कीजिए।
जैकी भगनानी (कल किसने देखा) और श्रुति हासन (लक) वर्स्ट न्यूकमर घोषित किए गए। हॉलीवुड की फिल्म ‘शी इज द मैन’ से कॉपी कर बनाई गई ‘दिल बोले हडिप्पा’ को बेस्ट ओरिजनल स्टोरी का अवॉर्ड मिला।
पुरस्कारों के लिए एक समिति बनाई गई थी और आम लोगों की राय भी ली गई।
सुष्मिता की लाइफ में मानव की वापसी!
मानव मेनन बॉयफ्रेंड रह चुके हैं सुष्मिता के। उनका और सुष का रोमांस कुछ दिनों चला और फिर वे वर्ष 2007 में अलग हो गए। क्यों? इसका खुलासा दोनों ने नहीं किया। इसके बाद सुष की लाइफ में दूसरे पुरुष आ गए।
इन दिनों सुष और मानव फिर साथ देखे जा रहे हैं। लंबा समय वे साथ बिता रहे हैं। ऐसा लगता है कि सुष की लाइफ में मानव की वापसी हो गई है। जबकि इस समय सुष का रोमांस ‘दूल्हा मिल गया’ के डायरेक्टर मुदस्सर अजीज के साथ चल रहा है। क्या मुदस्सर की जगह मानव ने ले ली है, इसका जवाब आने वाले दिनों में पता चलेगा।
सुष का जीवन खुली किताब की तरह रहा है। उन्होंने कभी भी अपने संबंधों को छिपाया नहीं है। साथ ही उन्होंने अपने बॉयफ्रेंड्स के साथ ब्रेकअप होने के बावजूद दोस्ती बनाए रखी। संजय नारंग, रणदीप हुड्डा, विक्रम भट्ट आज भी सुष्मिता के दोस्त हैं।

सच्चाई

सुख-दुख दोनों है खास
बादशाह अकबर के दरबार के नवरत्नों में बीरबल का अलग स्थान था। बादशाह कैसा भी प्रश्न पूछते, बीरबल सही व सटीक उत्तर देकर उनकी जिज्ञासा शांत कर देते। एक बार उन्होंने कहा, कुछ ऐसा लिखो जिससे खुशी के वक्त पढ़ें तो गम याद आ जाए और गम के वक्त पढ़ें तो खुशी के पल याद आएँ। बीरबल ने कुछ देर सोचा, फिर कागज पर यह वाक्य लिखकर बादशाह को दिया- यह वक्त गुजर जाएगा। सच! इन चार शब्दों के वाक्य में जीवन की कितनी बड़ी सच्चाई छुपी है।
सभी जानते हैं कि सुख-दुख जीवन के दो पहलू हैं जिनका क्रमानुसार आना-जाना लगा ही रहता है। किंतु हम सब कुछ जानते-समझते हुए भी दोनों ही वक्त अपनी भावनाओं-संवेदनाओं पर नियंत्रण नहीं रख पाते। जब खुशियों के पल हमारी झोली में होते हैं तो उस समय हम स्वयं में ही इतने मग्न हो जाते हैं कि क्या अच्छा क्या बुरा, इस पर कभी विचार नहीं करते हैं।
अपनी किस्मत व भाग्य पर इठलाते हुए अन्य की तुलना में श्रेष्ठ समझते हैं और अहंकारवश कुछ ऐसे कार्य तक कर देते हैं जिनसे स्वयं का हित और दूसरे का अहित हो सकता है। इस क्षणिक सुख को स्थायी मानते हुए ही जीने लगते हैं और वास्तव में यही सोच अपना लेते हैं कि अब हमें क्या चाहिए, सब कुछ तो मिल गया। बस! एक इसी भ्रांति के कारण स्वयं को उतने योग्य व सफल साबित नहीं कर पाते जितना कि कर सकते थे।
इसी तरह दुःखद घड़ी में भी अपना आपा खो बेसुध होकर सब भूल जाते हैं। छोटे-से छोटे दुःख तक में धैर्य-संयम नहीं रख पाते। बुद्धि-विवेक व आत्मबल होने के बावजूद स्वयं को इतना दयनीय, असहाय व बेचारा महसूस करते हैं कि आत्मसम्मान, स्वाभिमान तक से समझौता कर लेते हैं। यही कारण है कि सब कुछ होते हुए भी उम्रभर अयोग्य-असफल होने लगते हैं।
कहने का सार यह है कि जो भी छोटी-सी जिंदगी हमें मिली है उसमें सुख व दुख दोनों ही से हमारा वास्ता होगा, यही शाश्वत सत्य है। इस सच को हम जितनी जल्दी स्वीकार कर लेंगे उतना ही हमारे लिए अच्छा रहेगा, क्योंकि फिर ऐसा समय आने पर हम अपने संवेगों पर काबू कर उन्हें स्थिर रख सकेंगे।

स्वास्थ्य-सौन्दर्य

यूँ रखें चेहरे को साफ
चेहरे की चमक को बरकरार रखने के लि‍ए उसे साफ रखना बेहद जरूरी है। जिस प्रकार मौसम के अनुसार खानपान और पहनावे में बदलाव आता है, उसी तरह मेकअप के अंदाज और साधनों में भी बदलाव आवश्यक है। गर्मी के दि‍नों में चेहरे की सफाई की ओर खास ध्‍यान देने की जरूरत होती है।
क्लीनिंग : फेस क्लीनिंग के लिए गर्मियों में क्लीजिंग मिल्क की जगह एस्ट्रिजेंट का प्रयोग करें जिससे चेहरे पर ऑइल न रहे। मलमल के कपड़े में बर्फ का टुकड़ा रखकर इसे पूरे चेहरे पर फिराएँ और प्राकृतिक हवा में 5 मिनट सूखने दें।
यह कूलिंग पैड गर्दन के पीछे भी लगाएँ, क्योंकि गर्मी गर्दन के पीछे से चढ़ती है। स्किन टोनर पूरे चेहरे पर लगाएँ। इससे रोम छिद्र बंद हो जाएँगे और पसीना भी ज्यादा नहीं आएगा।
कंसीलर : अगर चेहरे में कोई निशान या दाग है तो चेहरे के रंगों से मेल खाते हुए रंग का कंसीलर लगाकर उन्हें कंसील कर लें।

बरकत होगी

धन क्यूँ नहीं टिकता है ? जानिये !
बरकत क्यूँ नहीं होती ये प्रश्न आम है जो लोगो द्वारा अकसर पूछा जाता है. आइए जाने कि ज्योतिष द्वारा कैसे जाना जाए कि बरकत होगी या नहीं.
कुंडली में चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम और बारवे भाव से जाना जाता है कि बरकत होगा या नहीं. इसको देखने के लिए ये देखा जाता है कि इन भावों में कौन से ग्रह बैठे हैं, इन पर दृष्टि कि किसकी है, किस राशि के साथ बैठे हैं, कितने अंश पर बैठे हैं आदि.
कई बार ये भी देखने को आता है कि शुभ ग्रह के बैठने पर भी पैएसए नहीं टिकता है इसका कारण हो सकता है कि ग्रह कमजोर होकर बैठे हो या शत्रु राशि में बैठे हो आदि.
ये सभी किसी योगा विद्वान से दिखा लेना चाहिये.

उपाय: अगर ग्रह शुभ होकर कमजोर होकर बैठे हो तो उसको नग/gems द्वारा ठीक किया जा सकता है,
विशेष ग्रह के मंत्र जाप भी कारगर उपाय है,
नवरात्र में किए गए विशेष तंत्रोक्त प्रयोग भी काफी कारगर सिद्ध होते हैं.

अत: लाभ उठाइये इन दुर्लभ विद्याओं का और दीजिये अपनी सफलता को गति>>>>>>>>

'कुंभ'

मोक्ष से पहले मन से 'जय गंगे'
विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक मेला 'कुंभ' हरिद्वार में धूमधाम से जारी है। लाखों लोग, हजारों साधु-संत, विदेशी पर्यटक 'जय गंगे' कहते हुए गंगा में डुबकी लगा रहे हैं। हिमालय से निकली गंगा 2510 किलोमीटर का रास्ता बनाती बंगाल की खाड़ी में समाहित हो जाती है।
गंगोत्री से गंगा सागर तक लोग गंगाजल के स्पर्श तक से धन्य हो जाते हैं। गंगाजल भारत के घरों में ही नहीं, विदेशों में बैठे प्रवासी भारतीयों के लिए भी हर पुनीत अवसरों और मृत्यु की घड़ी में पवित्रतम माना जाता है। फिर भी गंगा की पवित्रता की व्यावहारिक चिंता कितनों को है?
गंगा किनारे 29 शहर, 70 कस्बे और हजारों गाँव बसे हैं और उनके गंदे नालों-नालियों की लगभग 1 अरब 30 करोड़ लीटर जहरीली गंदगी प्रतिदिन पावन गंगा में मिल जाती है। यही नहीं, गंगा किनारे बसी और फली-फूली औद्योगिक बस्तियों का सड़ा-गला 26 करोड़ लीटर खतरनाक कचरा भी समाहित हो जाता है। यही कारण है कि गंगोत्री, ऋषिकेश हरिद्वार से वाराणसी तक पहुँचते-पहुँचते गंगाजल में जहरीले बैक्टीरिया हजारों गुना बढ़ जाते हैं।
एक वैज्ञानिक जाँच-पड़ताल का निष्कर्ष है कि वहाँ 100 मिली लीटर गंगाजल में 50 हजार बैक्टीरिया मिलते हैं, जो स्नान योग्य सुरक्षित जल के सामान्य स्तर से 10 हजार प्रतिशत खराब है। परिणामस्वरूप जिस गंगाजल से पुण्य और मोक्ष की कामना रहती है, वही जलजनित बीमारियों के साथ जीते जी नरक के सारे कष्ट देने लगता है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का आकलन है कि भारत भूमि में 80 प्रतिशत स्वास्थ्य समस्याएँ और एक तिहाई मौतें जलजनित बीमारियों से होती हैं। गंगा में इन्सानों और पशुओं के शव तथा अवशेष प्रवाहित किए जाने से भी गंभीर प्रदूषण होता है।
पौराणिक धारणाओं के अनुसार समुद्र मंथन के बाद देवराज इन्द्र के सुपुत्र जयंत ने गंगा तट पर मायापुरी (हरिद्वार), प्रयाग (इलाहाबाद), गोदावरी तट पर नासिक और क्षिप्रा नदी तट पर अवंतिका-उज्जैन में अमृत कुंभ रखा था जिससे गिरी अमृत बूँदों से इन नदियों का जल अमृतमय हो गया, लेकिन आज इसी देवभूमि के लाखों भारतीय प्रतिदिन इस जल को अपवित्र बनाकर अट्टहास करते रहते हैं।
सत्ताधारियों की बनाई योजनाएँ भ्रष्टाचार के नाले में बह रही हैं। उदारवादी अर्थव्यवस्था में उद्योगों को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार और बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ अरबों रुपए लगा रही हैं। जल और बिजली के अभाव में कोई उद्योग-धंधा नहीं चल सकता। बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ तो सरकार की मेहरबानी से ऐसे रसायन, दवाइयाँ भी बनाती रहती हैं जो अमेरिका में प्रतिबंधित हैं।
उनकी जहरीली रासायनिक गंदगी उद्योगों के नालों से गंगा-यमुना में मिलती रहती है। गंगा में डुबकी लगाकर मोटे-मोटे तिलक लगाने वाले हिन्दुत्व के ठेकेदार नेताओं अथवा मोटी तिजोरी वाले सेठों ने सत्ता और धन-शक्ति के बल पर गंगा को प्रदूषित होने से रोकने के लिए कोई कठोर कदम नहीं उठाए। कागजी नियम-कानून हैं।
वर्षों से गंगा सफाई योजना के नाम पर नेताओं, अफसरों, ठेकेदारों और दलालों ने करोड़ों रुपए हजम कर लिए और गंगा के साथ भावनात्मक रूप से जुड़े करोड़ों लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ किया।
बिहार और उत्तरप्रदेश की निकम्मी और भ्रष्टतम सरकारों ने गंगा एक्शन प्लान को ढीले-ढाले ढंग से चलाया। लगभग 24 हजार करोड़ रुपए भारतीय करदाता (जनता) की जेब से निकालकर खर्च करने के बावजूद पतितपावन गंगा पहले से भी बदतर स्थिति में है। सबसे मजेदार बात यह है कि इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी द्वारा प्रारंभ की गई अच्छी योजना को केंद्र सरकार की नाक के नीचे बैठी दिल्ली सरकार, नगर-निगम और नगर पालिका ने ठीक से क्रियान्वित नहीं किया जिससे गंगा के साथ बहने वाली यमुना भी अपवित्र और प्रदूषित होती गई।
नदियों में जहरीले पदार्थ प्रवाहित करने वाली कंपनियों को आज तक कड़ा दंड नहीं मिला। इसके विपरीत उन्हें मुनाफा दिलाने और सम्मानित करने में राष्ट्रीय नेता गौरवान्वित महसूस करते रहे।
बहरहाल, गंगोत्री-यमुनोत्री और कुंभ मेले से सर्वाधिक लाभ पा सकने वाले उत्तराखंड में अब नए संकल्प लिए जा रहे हैं । उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने गंगा को बचाने का संकल्प लिया है। राजनीति से ऊपर उठकर केंद्र की मनमोहनसिंह सरकार ने उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल को 'मिशन क्लीन गंगा' के लिए इसी महीने लगभग 1394 करोड़ रुपए की धनराशि स्वीकृत कर दी है।
विश्व बैंक भी गंगा को स्वच्छ रखने के अभियान के लिए 1 अरब डॉलर (लगभग 45 अरब रुपए) ऋण के रूप में देने को तैयार हो गया है।
गंगा को धार्मिक भावनाओं से अधिक 'राष्ट्रीय नदी' के रूप में स्वीकार कर संपूर्ण समाज के लिए लाभदायी बनाने पर जोर दिया जा रहा है। सन्‌ 2020 तक गंगोत्री से बंगाल की खाड़ी पहुँचने वाले मार्ग पर गंगा को प्रदूषणमुक्त, सही अर्थों में जीवनदायी बनाने के लिए लगभग 200 अरब रुपए खर्च होने वाले हैं। आवश्यकता इस बात की है कि सरकार के साथ राजनीतिक दल, सामाजिक संस्थाएँ, ढोंग-पाखंड से दूर आस्थावान लोगों के संगठन, केवल चंदों और कागजी रिपोर्ट पर निर्भर नहीं रहने वाले ईमानदार स्वयंसेवी संगठन गंगा को बचाने के लिए सक्रिय हों।
जागरुकता लाए बिना भारत के करोड़ों भोले-भाले लोगों को गंगा-यमुना से लाभान्वित नहीं करवाया जा सकता।
कुंभ मेला अच्छा अवसर है। सैकड़ों संत-महात्मा गंगा में डुबकी और तिलक लगा ज्ञान बाँट रहे हैं। झंडे-डंडे, तंबू लगे हैं। लाखों लोग उमड़ रहे हैं। इस अवसर पर हरिद्वार-ऋषिकेश ही नहीं, संपूर्ण उत्तराखंड और उत्तरप्रदेश, दिल्ली तथा बिहार तक गंगा को गंदगी से बचाने के उपाय सुझाए जाने चाहिए।
यह अभियान एक सप्ताह और महीनेभर नहीं, पूरे साल मनाया जाना चाहिए। गंगा स्नान के साथ गंगाजल को आचमन योग्य बनाने की जिम्मेदारी संपूर्ण समाज की है। जब आप गंगा का ध्यान रखेंगे तो यमुना, नर्मदा, क्षिप्रा, कावेरी, गोदावरी जैसी नदियों के कल्याण की राह भी निकल आएगी। यही नहीं, आधुनिक भारत में असली समुद्र मंथन से पीने योग्य अमृतमय जल के साथ संपन्न महानगरों से जीर्ण-शीर्ण गाँवों तक को जगमगाने वाली बिजली भी मिल सकेगी।

गुरुवार, 11 मार्च 2010

नारी

शक्ति का अवतार है नारी
प्राचीन कथाओं-पुराणों की बात करें तो भारत देश में नारी को देवी के रूप में पूजा जाता रहा । उसे शक्ति का अवतार माना जाता है। मंदिरों में संगमरमर की प्रतिमाओं (देवियों की) के समक्ष सारे लोग झुकते हैं। पर वास्तविकता बिलकुल अलग है। स्त्री आज भी निःशक्त है। अपने अधिकारों के प्रति सजग है भी तो, उन अधिकारों का उपयोग करने के लिए स्वतंत्र नहीं।
आज समाज की कुछ प्रतिशत महिलाओं के बारे में जरूर ये कहा जा सकता है कि वे वैचारिक तथा आर्थिक रूप से सुदृढ़ हैं, लेकिन आबादी का एक बड़ा प्रतिशत जो मध्यमवर्गीय है या उससे भी निचले स्तर पर जीता है, वहाँ की स्त्रियाँ आज भी काठ की पुतलियाँ भर हैं। पुरुषों का दंभ स्त्री को वो सम्मान नहीं दे पाया है जिसकी वो हकदार हैं। इस सृष्टि की धुरी स्त्री भयमुक्त नहीं है।
एक परिचिता की बेटी का ब्याह तय हुआ है, मंगेतर आए दिन बेटी से मिलता है। फोन पर बातें करता है। हर बार यही बताने की कोशिश करता है कि उसे ये रंग पसंद है, उसे वो डिश पसंद नहीं तुम शादी के बाद हाईहिल मत पहनना ऊँची दिखोगी। वगैरह। वगैरह। उनकी बेटी हर मुलाकात के बाद उदास हो जाती है। कहने का तात्पर्य यह है कि आज भी पुरुष अपना वर्चस्व कायम रखना चाहता है।
हमारे समाज में यह तो आम बात है कि यदि पत्नी पति से ज्यादा क्वालीफाइड है या दुनिया देखने का उसका नजरिया अधिक व्यापक है, तो पति स्वयं को असुरक्षित महसूस करने लगता है। तब पत्नी के गुणों को बड़े दिल से स्वीकारने की बजाय वह उसे दबाकर रखने का हरसंभव प्रयास करता है। आखिर ऐसा क्यों? नारी को पृथ्वी की तरह सहनशक्ति वाली और क्षमाशील कहा गया है, वो स्वयं बंधन में सुखी रहती है।
नारी उन्नति के बारे में कसीदे काढ़ते विभिन्न सामाजिक संगठन क्या कहते हैं, अथवा नारी सशक्तीकरण को लेकर सरकारी बाशिंदे क्या कहते हैं, उसका विश्लेषण करने की बजाय हम अपने आसपास नजरें दौड़ाएँगे, तो पाएँगे कि स्त्री की मजबूरी, लाचारी या अत्याचार सहने के बाद के साथी सिर्फ उसके आँसू रह जाते हैं। आज भी कई स्त्रियाँ अपने पति की स्वीकृति के बगैर एक छोटा-सा निर्णय भी नहीं ले पाती हैं।
सिक्के का दूसरा पहलू सुकून देता है। जहाँ पुरुषों के एक छत्र साम्राज्य के बीच अपने वजूद को स्थापित करती नारी या इतिहास के पन्नों में अपनी जगह दर्ज करती जा रही नारियों की एक लंबी फेहरिस्त है, जो निरंतर बढ़ रही है। अपने दायित्व एवं कर्तव्यों को निर्वाह करती स्त्री आत्मनिर्भर भी हो रही है। लेकिन आज भी उसे अपना 'स्पेस' नहीं मिल पा रहा है।
अधिकारों के लिए हर पल लड़ाइयाँ हैं, चुनौतियाँ हैं। जब पुरुषों के लिए अवसरों की उपलब्धता आसान है, तो नारी की राह भी मुश्किल नहीं होनी चाहिए। आवश्यकता है कि हम स्त्री समाज के लिए सकारात्मक, सहयोगात्मक दृष्टिकोण रखते हुए नए सिरे से उनके लिए सोचें। स्त्री के रूप में हर रिश्ते को सम्मान दें क्योंकि वो उसका हक है।

सेहत

हर्बल बाथ से खिल-खिल जाए
सीजन में हेल्थ का खास ख्याल रखें। तीखी धूप में झुलसी स्कीन और बॉडी राहत पाती है नहाने से। बार-बार बहता पसीना सबको मजबूर कर देता है दो या तीन बार नहाने के लिए। साधारण बाथ से भरपूर ताजगी नहीं मिल पाती है। गर्मियों के चिपचिपाते दिनों में फ्रेशनेस और स्फूर्त‍ि पाने के लिए हर्बल बाथ का मजा लीजिए।
मिंट बाथ :
2 चम्मच पुदीना की सूखी पत्तियाँ लें। इन्हें 1 घंटे तक पानी में उबालकर छान लें। ताजी पत्तियाँ भी ले सकते हैं। नहाने के बाद इस पानी को शरीर पर डालें या लगाएँ। ज्यादा पसीने वाले भागों पर इसे 2 से 3 बार लगाएँ। अब आप घंटों ताजा महसूस करेंगे।
समर मसाज ऑइल :
6-8 चम्मच ग्रेपसीड ऑइल, 6 बूँद लेवेंडर एसेंस, 6 बूँद गुलाब का एसेंस और 6 बूँद मोगरे का एसेंस अच्छी तरह मिलाकर एक बॉटल में भर लें। नहाने से पहले इस तेल से मसाज करें और खुशबू से महकते रहें।
रोज बाथ :
गुलाब के फूल की पत्तियों को रातभर के लिए पानी में भिगो दें। सुबह इस पानी में रोज एसेंस की चंद बूँदें डालें। नहाने के बाद इसे शरीर पर लगाएँ। घंटों ताजगी व खुशबू का साथ रहेगा।
ऑरेंज बाथ :
संतरे के छिल्कों को दो चम्मच मलाई के साथ महीन पीस लें। नहाने से पहले 30 मिनट के लिए इस मिश्रण को शरीर पर लगाएँ। गुनगुने पानी में कपड़ा भिगोकर चिकनाई पोंछ दें, फिर नहाएँ। शाम तक महकते रहेंगे। बेहद रुखी त्वचा पर यह नुस्खा कारगर है। अगर त्वचा ऑइली है तो 2 चम्मच संतरे के छिल्के के चूर्ण में 1 /2 नीबू, 1 चम्मच शहद, बेसन, नीम की पत्ती का पावडर व पानी मिलाकर उबटन बनाएँ और आधे घंटे के लिए लगाएँ, फिर नहा लें।
लेमनबाथ :
नीबू के छिल्कों को नहाने के पानी में 1 घंटे पहले से डाल दें। इसकी जगह चाहें तो आधे नीबू का रस भी निचोड़ सकते हैं। इस पानी से नहाएँ। वैसे बाजार में लेमन एसेंशियल ऑइल भी उपलब्ध है। इसकी भी कुछ बूँदें डाल सकते हैं। हल्की-सी खुशबू पूरे दिन साथ निभाएगी।
नीम बाथ :
नीम की पत्तियाँ कीटाणुओं से भी मुक्ति दिलाती हैं। नीम की पत्तियों को पानी में उबाल लें। छानकर ठंडा करके नहाएँ। घमोरियों से भी छुटकारा मिलेगा। चाहें तो नीम का पावडर या एसेंस मिला सकते हैं।
हर्बल बाथ :
शरीर ठंडा कर लें। अब नहाने के पानी में 2 बूँद पिपरमेंट ऑइल, 4 बूँद रोजमैरी ऑइल और 2 बूँद लैवेंडर ऑइल मिलाएँ। इस पानी से नहाएँ। ऐसी शांति आपने पहले कभी महसूस नहीं की होगी।
इवनिंग बाथ :
दिनभर की थकान उतारनी हो तो 10 बूँद चंदन का तेल, 4 बूँद लैवेंडर ऑइल, 4 बूँद संतरे का तेल नहाने के पानी में मिलाकर नहाएँ।
लेमन लाइम ट्विस्ट बॉडी स्क्रब :
1/2 कप ब्राउन शुगर, 1/2 कप सी साल्ट, 1/4 कप ग्लीसरीन, 1 चम्मच शहद, 1 बड़ा चम्मच बादाम का तेल, 1 छोटा चम्मच विटामिन ई, 1 छोटा चम्मच लेमन एसेंशियल ऑइल और 1 छोटा चम्मच लाइम एसेंशियल ऑइल मिलाकर एक एयरटाइट जार में भरें। नहाने से पहले इस उबटन को पूरे शरीर पर मलें। मृत कोशिकाओं(डेड सेल्स) और सूरज से झुलसी त्वचा से छुटकारा मिलेगा और ताजगी तबीयत खुश कर देगी।

एक्जाम और फिटनेस
नियमित खेल खेलें और व्यायाम करें।
शांत भाव से लंबी और गहरी साँस लेना और छोड़ना (यानी प्राणायाम) करें। इससे मेमोरी बढ़ती है।
अंकुरित अन्न, फल, सलाद, ज्यूस व हरे पत्ते वाली सब्जी खाएँ।
2 बादाम, 2 छोटी इलायची, 5 कालीमिर्च बारीक पीसकर थोड़े से शहद के साथ मिलाकर खाने से भी बहुत लाभ होता है।
खुलकर हँसें, इससे बॉडी और माइंड दोनों स्वस्थ होते हैं।
पैर के तलवों की मालिश किसी भी तेल से प्रतिदिन 5 मिनट करने से आँखों की रोशनी तेज होती है और मेमोरी बढ़ती है।

मुलाकात

रिस्क तो लेना पड़ती है : आदित्य नारायण
आदित्य नारायण को हम काफी लंबे समय से देखते आ रहे हैं। फिल्म ‘परदेस’ में वे बाल कलाकार के रूप में नजर आए थे। फिर वह काफी समय तक कई स्टेज शो में अपने माता-पिता दीपा नारायण व उदित नारायण के साथ स्टेज पर गाना गाते और कई पुरस्कार समारोहों में अपने पिता उदित नारायण के नाम की ट्रॉफी स्वीकार करते नजर आए। अब आदित्य नारायण की स्वयं की एक पहचान बन चुकी है। आदित्य ने रियलिटी शो सारेगामापा की एंकरिग की और सर्वश्रेष्ठ एंकर के कई पुरस्कार हासिल किए। फिल्मों में अभिनय करने की बात भी उन्होंने कई बार कही और अब उनकी पहली फिल्म ‘शापित’ प्रदर्शन के लिए तैयार है। पेश है आदित्य से बातचीत :

विक्रम भट्ट की ‘शापित’ में काम करने का अवसर कैसे मिला?
जब मैं जीटीवी पर सारेगामापा के तीसरे सीजन की एंकरिग कर रहा था, तभी इस शो में मुझे विक्रम भट्ट जी ने देखा और फोन करके मिलने के लिए बुलाया। उन्होंने कहा कि मैं उनकी फिल्म ‘शापित’ में अभिनय करूँ। उन्होंने स्क्रिप्ट पढ़ने को दी, जो मुझे अच्छी लगी। मैंने इस फिल्म को लेकर अपने माता पिता से राय ली। सभी को लगा कि मौका अच्छा है और मैंने फिल्म साइन कर ली।
ज्यादातर कलाकार अपना करियर लव स्टोरी से शुरू करते हैं। आपने हॉरर फिल्म को क्यों चुना?
सच कहूँ तो जब मैने अभिनय के क्षेत्र में उतरने का मन बनाया था, तभी सोच लिया था कि मुझे अपने करियर की शुरुआत टीनएज लव स्टोरी वाली फिल्म से नहीं करना है। इन फिल्मों की कहानी घिसी-पिटी होती है। मैं कुछ ऐसा करना चाह रहा था, जिससे मेरे अंदर की प्रतिभा को निखरने का अवसर मिल सके। मैंने यह नहीं सोचा था कि हॉरर फिल्म से ही शुरुआत करूँगा। ‘शापित’ की स्क्रिप्ट मुझे पसंद आई इसलिए मैंने इसमें काम करना स्वीकार किया।
क्या हॉरर फिल्म से अपना अभिनय का सफर शुरू कर आप रिस्क तो नहीं ले रहे हैं?कुछ अच्छा पाने के लिए रिस्क तो उठानी ही पड़ेगी। तैरना सीखने के लिए पानी में कूदना ही पड़ेगा। अब दर्शकों की सोच भी बदल चुकी है। मुझे पूरा भरोसा हैं कि दर्शक ‘शापित’ को पसंद करेंगे।
आपके रोल के बारे में बताएँगे।
इस फिल्म में मैंने एक आम लड़के अमन का किरदार निभाया है, जिसके लिए अपना प्यार ही सर्वोपरि है। वह काया से शादी करने के साथ ही आजीवन उसी के साथ रहना चाहता है। जब काया से वह सगाई करता है, तो पता चलता है कि एक श्राप के कारण एक भूत उसे खत्म कर देना चाहता है। इसके बाद क्या होता है इसके लिए आपको फिल्म देखना पड़ेगी। मैं इतना जरूर कहूँगा कि यह बेहद डरावनी फिल्म है।
विक्रम भट्ट के बारे में क्या कहेंगे?विक्रम कमाल के निर्देशक हैं। उन्होनें कई बडे़-बडे़ कलाकारों के अलावा नए कलाकारों के साथ भी काम किया है। वे सीन को खुद अभिनीत करके बताते हैं। उनसे मुझे बहुत सीखने को मिला।
कहा जा रहा है कि फिल्म की नायिका श्वेता अग्रवाल के साथ आपका रोमांस चल रहा है?
ये सब बकवास है।
किस तरह की फिल्में और किस तरह के रोल करना चाहते हैं?मैं तो अच्छी फिल्में करना चाहता हूँ।

तीस मार खाँ में सब कुछ है : फरहा खान
पिछले दो दशक से 80 से अधिक फिल्मों में अपने डांस का जलवा बिखेरने के बाद कोरियोग्राफर फरहा खान कुछ वर्षों से फिल्मों का निर्देशन भी कर रही हैं। कोरियोग्राफर के रूप में सभी की पहली चाहत बन चुकी फरहा ने जब फिल्म का निर्देशन करना चाहा तो वहाँ भी सुपरहिट रहीं। मैं हूँ ना और ओम शांति ओम की सफलता के बाद फरहा अब फिल्म तीस मार खाँ का निर्देशन कर रही हैं।
उल्लेखनीय है कि इस फिल्म की कहानी फरहा के पति शिरीष कुंदर ने लिखी है। इसके अलावा इस फिल्म की खास बात यह है कि पहली बार फरहा ने अपनी होम प्रोडक्शन की फिल्म में शाहरुख खान की जगह अभिनेता अक्षय कुमार को बतौर अभिनेता लिया है। हाल ही में इस फिल्म और उनकी निजी जिंदगी को लेकर फरहा से बातचीत की साक्षी त्रिपाठी ने, पेश है उसके मुख्य अंश-

प्यार आपके लिए क्या मायने रखता है?
प्यार से जुड़ा हर पल और हर दिन मेरे लिए बहुत ही खास होता है। दरअसल मैं एक ऐसी इंडस्ट्री से ताल्लुक रखती हूँ जहाँ केवल प्यार ही है। हम दूसरों को भी अपनी फिल्मों के माध्यम से प्यार करना ही सिखाते हैं। हमारी फिल्मों में प्यार का हर रूप मौजूद रहता है। इसलिए यह शब्द मेरे लिए बहुत ही खास है क्योंकि मैं तो इसे मानती हूँ और चाहती हूँ कि दुनिया में सभी लोग एक-दूसरे से प्यार करें।
आपकी आने वाली फिल्म तीस मार खाँ के बारे में कुछ बताइए?
यह फिल्म मेरी तरह की है। आप इसे मैं हूँ ना से जोड़ कर देख सकते हैं। जिसमें कॉमेडी, एक्शन, रोमांच वो सब कुछ है जो दर्शक मेरी फिल्म से चाहते हैं। दरअसल मैं इस फिल्म से एक ऐसे किरदार को गढ़ रही हूं जो विदेशी फिल्मों की तरह होगा और इसके कई पार्ट बनेंगे। जिस प्रकार पेंथर, जेम्स बॉन्ड आदि के सीरीज बने हुए हैं वैसे ही इस फिल्म के किरदार के भी सीरीज बनेंगे।
तो क्या यह जेम्स बॉन्ड की तरह होगा?
नहीं। जेम्स बॉन्ड तो जासूस था। मेरा किरदार उससे अलग है आप उसे कॉमिक जेम्स बॉन्ड कह सकते। हमने इसे रोल मॉडल नहीं बनाया है। यह अमीरों से तो पैसे लूटता है लेकिन गरीबों में बाँटता नहीं है।

आपकी इस फिल्म में शाहरुख नहीं हैं। इसकी क्या वजह है और इससे आप दोनों के रिश्ते पर क्या फर्क पड़ेगा?
शिरीष ने कहानी अक्षय को ही ध्यान में रखकर लिखी थी और फिल्म भी उसी की है इसलिए कलाकार भी उसी की पसंद के हैं। जहाँ तक शाहरुख से मेरे रिश्ते की बात है तो हम दोनों आज भी बहुत अच्छे दोस्त हैं और इस बात से हमारी दोस्ती में कोई फर्क नहीं आने वाला है। बतौर प्रोडक्शन मुझे या उसे जब भी एक-दूसरे की मदद की जरूरत होती है हम हमेशा एक साथ होते हैं। हम अपनी फिल्मों से संबंधित बातें भी एक-दूसरे से शेयर करते रहते हैं।

कैटरीना को फिल्म में लेने की क्या वजह थी, उनका किरदार कैसा है ?
कैटरीना का फिल्म में इंडियन सेक्सी लुक है। दरअसल कैट ने कहीं पढ़ा था कि मैं अपनी फिल्म के लिए कैट जैसी कोई नई लड़की की तलाश कर रही हूँ। तो एक पार्टी में कैट ने मुझसे कहा कि मेरी जैसी क्यों, मैं क्यों नहीं और फिर कैट मेरी फिल्म का हिस्सा बन गई। कैट का भी कॉमिक किरदार है जो आइटमगर्ल बनना चाहती है।

शिरीष आपके पति हैं और इस फिल्म के लेखक भी। ऐसे में उनका कितना हस्तक्षेप होगा?
मेरे और शिरीष के बीच पहले ही तय हो गया है कि वो मेरे काम में हस्तक्षेप नहीं करेंगे। मैंने पहले ही कह दिया था कि अच्छे तरह से सोच लो क्योंकि मुझे मेरे काम में किसी का हस्तक्षेप नहीं चाहिए। उन्होंने मुझसे कहा कि तुम ही करो। अब फिल्म के दौरान हमारे बीच झगड़े होते हैं या फिल्म कैसे बनती है यह तो बनने के बाद ही पता चलेगा लेकिन शिरीष का कहना था कि निर्देशन मैं ही करूँ।

धार्मिक स्थल

चार धाम
भारत के प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक चार धाम। नर एवं नारायण पहाड़ों के मध्य में चार तीर्थस्थान हैं जिसका नाम है बद्रीनाथ। यह पवित्र स्थान अलकनंदा (गंगा) नदी के दक्षिण तट पर स्थित है। पृष्ठ भाग में प्राकृतिक सौंदर्य से लुप्त नीलकांत पहाड़ एक सुंदर चित्रकला की तरह नजर आता है। जनश्रुति के अनुसार वैदिक काल में इस मंदिर का निर्माण किया गया था। 3133 मीटर की ऊँचाई पर भव्य मंदिर का निर्माण किया गया था। वर्तमान में गुरु अदि शंकरयाचार्य ने यहाँ पर मठ निर्मित किए थे। इसे विशाल बद्रीनाथ भी कहते हैं। बद्रीनाथ पंच बदरी में से एक हैं। केदरनाथ पर्वतों की श्रृंखला में भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंग स्थित हैं। 3584 फीट पर स्थित है केदारनाथ तीर्थस्थल। हिंदुओं का यह धार्मिक स्थल हैं। महाभारत कथा में इस भव्य मंदिर का विशलेषण किया गया है। मंदाकिनी नदी के तट पर यह भव्यस्थल
स्थित है।
पौराणिक कथा के अनुसार महाभारत में युद्ध के बाद पाडवों ने भगवान शिव से आशीर्वाद माँगा था कि वे अपने पापों का प्राश्चित कर सकें। परंतु भगवान शिव उनके सम्मुख नहीं आते थे तथा केदारनाथ में वे एक वृषभ के रूप में रहे थे। जब पाडंवों ने उनका पीछा करना बंद नहीं किया तब वे पृथ्वी में समा गए और अपना कूबड़ पीछे छोड़कर चले गए। मंदिर में त्रिकोण भाग निकला हुआ है। भक्त उसी की पूजा करते हैं।
6315 मी की ऊँचाई बंदरपूँछ पहाड़ में यमुनोत्री मंदिर स्थित है। घरवाल हिमालय में चार धाम का धार्मिक स्थल स्थित है। पौराणिक कथा के अनुसार असित मूनी एकांत में यहाँ निवास करते थे। धार्मिक स्थल के मुख्य आकर्षण का केंद्र हैं। यमुनौत्री मंदिर जहाँ पर देवी यमुना की प्रतिमा विराजमान है एवं पवित्र तापीय झरना बहता है जनकीचट्टी सात किमी की दूरी पर स्थित है।
मंदिर से एक किमी की दूरी पर यमुना नदी का स्रोत स्थित है। वह 4421 मी कि ऊँचाई पर स्थित है। श्रद्धालु इस स्थान पर पहुँचने के लिए अनेक समस्याओं का सामना करते हैं।
मंदिर से एक किमी की दूरी पर यमुना नदी का स्रोत स्थित है। वह 4421 मी कि ऊँचाई पर स्थित है। श्रद्धालु इस स्थान पर पहुँचने के लिए अनेक समस्याओं का सामना करते हैं। फलस्वरूप अनेक श्रद्धालु इस मंदिर में ही देवी यमुना की पूजा अर्चना करते हैं। ऐसा माना जाता है कि जयपुर की महारानी गुलारिया ने उन्नीसवीं शताब्दी में इस मंदिर को बनवाया था।
हिंदुओं की मान्यता हैं कि गंगोत्री की भव्य समाधि सबसे पवित्र स्थल है। 3,200 मी पर यह भव्य मंदिर स्थित है। अठारहवीं सदी में गोरखा सेना के उच्च पदाधिकारी अमर सिंह थापा ने इस भव्य मंदिर को निर्मित किया था। यही वह स्थान है जहाँ राजा भागीरथ के प्रार्थना करने पर पवित्र गंगा नदी स्वर्ग से धरती उतरी थीं।
भगवान शिव ने गंगा को अपने जटाओं में रोक लिया था ताकि वे स्वर्ग से उतरने के बाद सीधे पाताल में नहीं चली जाएँ। भगवान शिव की जटाओं से कई नदियाँ पानी के प्रवाह में बहने लगीं। जो नदी गंगोत्री से बहने लगी उसे भागीरथी कहते हैं। पांडवों ने इस पवित्र स्थल पर देवा यज्ञ का कार्यक्रम का आयोजन किया था।
यदि आप अन्य धार्मिक स्थलों की यात्रा करना चाहते हैं तो भागीरथी नदी के स्रोत गौमुख बर्फीले स्थान के बर्फीले पानी में डुबकी लगा सकते हैं एवं भैरोंघाटी में स्थित भैरवनाथ मंदिर के दर्शन भी कर सकते हैं। श्रृद्धालुजन गंगौत्री से नंदनवन एवं केडरटल के तीर्थस्थल में भ्रमण कर सकते हैं।
रेल, वायुयान एवं सड़क मार्ग के माध्यम से गंगोत्री पहुँच सकते हैंस ऋषिकेश से 249 किमी की दूरी पर जौली ग्रांट का हवाईअड्डा स्थित है।
कड़ी ठंड़ और बर्फबारी की वजह से नवंबर से लेकर अप्रैल तक मंदिर के पट बंद रहते हैं। इसलिए मई से लेकर अक्टूबर तक इस स्थान के दर्शन आप कर सकते हैं।

बुधवार, 10 मार्च 2010

संकट

सिंह पर गहराता संकट
हाल ही में जारी हुई वन्य प्राणियों की गणना के अनुसार बाघों की घटती संख्या के साथ ही एक और डराने वाला तथ्य सामने आया है और वह है एशियाई सिंहों की लगातार घटती संख्या। भारत में एशियाई सिंह (पेंथरा लियो पर्सिका) के अंतिम और एकमात्र शरणस्थल गुजरात के विश्व प्रसिद्ध गीर नेशनल पार्क में पिछले दो साल में 72 शेरों की मौत हो चुकी है और अब वहाँ केवल 291 शेर ही शेष हैं। गौरतलब है कि अप्रैल 2005 की गणना के मुताबिक गीर में 359 सिंह बताए गए थे जो 2001 की गणना से 32 ज्यादा थे।
गुजरात विधानसभा में एक सवाल के जवाब में सरकार ने बताया कि पिछले दो सालों में प्राकृतिक कारणों से 71 शेरों की मौत हो गई जबकि एक शेर को शिकारियों ने मार गिराया। वर्तमान में सरकारी आँकड़ों के मुताबिक जूनागढ़, अमरेली और भावनगर जिलों में फैले गीर के पूरे जंगल में 68 शेर, 100 शेरनियाँ और 123 सिंह शावक ही शेष हैं।
पूरी दुनिया में सासन गीर नेशनल पार्क ही एक मात्र ऐसा स्‍थान है जहाँ प्रसिद्ध एशियाई शेर पाए जाते हैं। गीर नेशनल पार्क एक ऐसी जगह है जहाँ शेरों को उनके प्राकृतिक अधिवास में देखा जा सकता है। इसे 1965 में आरक्षित वन घोषित किया गया था, जिसका प्राथमिक उद्देश्‍य 2450 हेक्‍टेयर भूमि पर एशियाई शेरों का संरक्षण करना था।
गीर नेशनल पार्क सौराष्ट्र के दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र में स्थित है। यह पार्क 1412.13 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैला हुआ है। इस क्षेत्र के पथरीले एवं पहाड़ी क्षेत्र जो कि शेरों का प्राकृतिक आवास है, में हाल ही हुई गणना के मुताबिक 291 सिंह रहते हैं। किसी जमाने में उत्तरी अफ्रीका, दक्षिण-पश्चिम एशिया तथा उत्तरी ग्रीस में भी सिंह पाए जाते थे।
कभी बहुतायत में पाया जाने वाला सिंह आज भारत में विलुप्ति के कगार पर है। भारत के अलावा सिंह सिर्फ दक्षिण अफ्रीका के घास के मैदान और पथरीले इलाकों में ही मिलते हैं। गीर नेशनल पार्क में इनके अलावा चिंकारा, नीलगाय, चीतल इत्यादि भी पाए जाते हैं।
नर शेर को शक्ति और साहस की साक्षात मूर्ति माना जाता है। संकट के समय सिंह अत्यधिक खूँखार हो जाते हैं। समूह में रहने और शिकार करने वाले शेरों के समूह को 'प्राइड' कहा जाता है। शेरों में शिकार का काम मादा का होता है, नर प्राइड की रक्षा करते हैं और बड़े शिकारों को घेर लिए जाने पर उन्हें मार गिराते हैं।
1873 तक अमीरों, शिकारियों व अंग्रेजों द्वारा 'ट्रॉफी हंटिंग' के लालच में अंधाधुंध शिकार किए जाने पर शेरों की संख्या नगण्य रह गई थी, जिससे इनके लुप्त होने का खतरा बढ़ गया था। तेजी से कम होते शेरों की संख्या 1900 की शुरुआत में केवल 15 रह गई थी तब जूनागढ़ के तत्कालीन नवाब द्वारा गीर वन क्षेत्र को शेरों के लिए आरक्षित कर उनके शिकार पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। शिकार किए जाने के अलावा शेरों के खत्म होने के कई प्राकृतिक कारण हैं जैसे- बाढ़, सूखा, जंगल की आग, नर शेरों में प्रतिद्वंद्विता और प्रभुत्व की लड़ाई।
सासन गीर नेशनल पार्क मिले-जुले पतझड़ वनों से ढँके पर्वत हैं। यहाँ की जलवायु और प्राकृतिक आहार सिंहों के आवास के लिए अत्यधिक उपयुक्त हैं। हालाँकि इसके अलावा भी भारतीय वन्यजीव संस्थान ने मध्यप्रदेश के पालपुर कूनो अभयारण्य को एशियाटिक लॉयन री-इंट्रोडक्शन प्रोजेक्ट के लिए अनुकूल पाया गया है।
इसके अलावा जूनागढ़ के सक्करबाग प्राणी संग्रहालय में चलाए जा रहे 'लॉयन ब्रीडिंग प्रोग्राम' के अंतर्गत अब तक 180 से ज्यादा शेरों का प्रजनन कराया जा चुका है। इनमें से अधिकांश को भारत के विभिन्न शहरों के चिड़ियाघरों और रक्षित अभयारण्यों में भेजा गया है। करोड़ों की लागत से आधुनिक जैनेटिक मैपिंग लैब तथा जीन बैंक बनाकर शेरों के डीएनए जमा करने की एक योजना भी बनाई गई है।
सरकारी संरक्षण, स्वयंसेवी संगठनों तथा वन्यजीव प्रेमियों के अथक प्रयासों से भारत में सिंह बचा तो लिए गए हैं पर सिर्फ एक ही जगह तक सीमित होने की वजह से किसी बीमारी या आपदा से इनके खत्म होने का खतरा लगातार बना हुआ है। साथ ही आम जनता को इनके बारे में अधिक जानकारी नहीं है।
फिलहाल जरूरत है इनके संरक्षण के लिए बनी योजनाओं के सही तरह से अमल में लाने की वरना वह दिन दूर नहीं जब आने वाली पीढ़ी सिंह को सिर्फ सारनाथ की प्रतिमा में ही देख सकेगी।

सामंजस्य

सामंजस्य से बने टिकाऊ रिश्ते
धैर्य के अभाव के इस दौर में टिकाऊ रिश्ते पा लेना अपनेआप में एक बड़ी सफलता है। फिर शादी जैसे मामले में तो यह और भी ज्यादा मुश्किल टास्क है। हाल ही में टेनिस खिलाड़ी सानियाFresh Photo Collection of Sania Mirza मिर्जा की सगाई टूट जाने पर इन दिनों एक नई बहस शुरू हुई है। क्या शादी से पहले सामंजस्य का अभाव होने को कारण मानते हुए रिश्ता तोड़ दिया जाना चाहिए या फिर रिश्तों को पकने के लिए समय का इंतजार किया जाना चाहिए?
यूँ तो टिकाऊ और खुशनुमा रिश्तों का कोई फार्मूला नहीं होता है, फिर भी दोनों के बीच सामंजस्य होना जरूरी है। 'सामंजस्य' एक ऐसा शब्द है, जो अपने आप में बहुत व्यापक है और इसके कई सारे आयाम होते हैं, फिर भी शादी के मामले में यह बहुत जरूरी फैक्टर पाया गया है। कई युवा यह मानते हैं कि जब आप शादी करने जा रहे हैं तो सामंजस्य या संगति से कोई समझौता नहीं किया जा सकता है। अलग-अलग व्यक्ति अपने रिश्तों को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण रखते हैं।
कुछ बहिर्मुखी होते हैं और एकांत पसंद करते हैं तो कुछ लोग आसपास हमेशा मेला लगाए रहते हैं, कुछ साथी के परिवार और दोस्तों के बीच ज्यादा मजे से रहते हैं, तो कुछ लोग इसे तनाव की तरह लेते हैं। पैसा भी रिश्तों में एक बड़ी भूमिका निर्वाह करता है।
हकीकत में रिश्तों का रहस्य इस बात में है कि इन सारे मामलों को एक युगल किस तरह से लेता है। कई कहते हैं कि विपरीत आकर्षित करता है, लेकिन सामंजस्य लंबे समय के खासतौर पर शादी जैसे रिश्तों के लिए बहुत जरूर है। तो यह एक संकेत है कि सगाई या शादी से पहले रिश्तों का टूट जाना अच्छी बात है, बजाय भविष्य में रिश्ता टूटने के या फिर दोनों के बीच में तनाव आने के।
ह जरूरी है कि आप शादी से पहले अपने साथी की पसंदगी और आमतौर पर उसके हावभाव पर भी ध्यान दें। 26 साल की शबाना जो कि एक इंटीरियर डेकोरेटर है, कहती हैं- 'मैंने अपने ब्वॉयफ्रेंड से अपनी सगाई तोड़ दी, क्योंकि जब हम दोनों साथ भी होते थे, तब भी मैं उससे जुड़ नहीं पाती थी, कई लोगों में मुझे दोष दिया लेकिन मैंने वह किया जो मुझे करना था।'
सानिया एक स्मार्ट लड़की है और वह जानती है कि वह क्या चाहती है। हो सकता है दोनों अच्छे दोस्त हो लेकिन यह महसूस किया हो कि दोनों के बीच वह ऊष्मा नहीं है, जो होना चाहिए। इंजीनियर सोनिया विज जिसने एक फर्म मैनेजर से शादी की, कहती हैं कि उसकी शादी आपसी समझ, विश्वास और सम्मान पर टिकी हुई है। सोशियोलॉजिस्ट डॉ. शालिनी अय्यर कहती है कि लगभग 'लगभग 85 प्रतिशत कपल मानसिक रूप से तलाकशुदा है। वे साथ रह रहे हैं, लेकिन सही कारण कारण से नहीं।'
पैसा-केंद्रित तेजी से दौड़ती दुनिया में जहाँ हर कोई किसी-न-किसी चूहादौड़ का हिस्सा है, समय और धैर्य की कमी हो, लक्ष्य, डेडलाइन, पैसा और प्रसिद्धि लगातार प्यार की अवहेलना कर रहा हो और लोगों के पास एक-दूसरे के लिए समय नहीं हो ऐसे में अपने लिए परफेक्ट साथी ढूँढना असंभव है। लेकिन यहाँ कुछ निश्चित चीजें हैं, जो पहले से ही समझ ली जानी चाहिए। यदि चीजें हाथ से निकल रही हो, तो बेहतर है कि पहले से ही रास्ते अलग-अलग कर लिए जाएँ, बजाय समय का इंतजार करने के। क्यों दिल या शादी टूटने की तकलीफ सही जाए?

रिश्ते

रिश्ते महकाती है भावनाएँ
कई बार मन में ख्याल आता है कि प्रेम का मधुर जीवन जीने वाले दंपति क्या उन दंपतियों से अलग होते हैं, जो प्रेम का सुख नहीं भोग पाते हैं? फिर दिल से आवाज आती है हाँ, बरसों तक वैवाहिक जीवन जीने के बाद भी जो पति पत्नी एक-दूसरे से प्यार करते हैं, वे वस्तुतः कभी भी यह नहीं सोचकर चलते कि उनके संबंध तो बने रहने के लिए ही हैं। इसके बारे में अब क्या सोचना! बल्कि वे अलग-अलग रूपों में एक-दूसरे के प्रति हर दिन अपना स्नेह और प्यार जताते रहते हैं।
कहते हैं, मुझे तुमसे प्यार है
वे अपने प्रेम को शब्दों से भी जाहिर करते रहते हैं। इस बहस में नहीं पड़ते और यह नहीं कहते यदि मुझे तुम से प्यार नहीं होता तो मैं तुमसे विवाह क्यों करता? ये बच्चे, बच्चे भी तो हमारे है ना! फिर! बल्कि वे इस चीज को समझते हैं कि प्यार के दो बोल बोलना अपने आप में सुख जैसा है। बोलने वाले और सुनने वाले दोनों के लिए...।
देह भी होती है माध्यमप्रेम पगे दंपति प्रायः एक-दूसरे से स्पर्श के लिए सचेष्ट रहते हैं। वे कभी हाथ पकड़ लेंगे, कभी आलिंगन कर लेंगे। वे स्पर्श की भाषा को कभी नहीं भूलते। नवजात शिशु को प्रेम का प्रथम अनुभव स्पर्श से ही होता है और इस मामले में हम अभी तक उस वय से अलग नहीं हो पाए हैं। वे यह जानते और मानते हैं कि प्रगाढ़ आलिंगन भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना बातें करना अथवा समागम।
तारीफ व धन्यवाद
सुखी दंपति एक-दूसरे के गुणों व खूबियों की परख बखूबी करते हैं और उनकी सराहना करने से नहीं चूकते। मेरी तो सबसे अच्छी श्रोता अथवा दर्शक मेरी पत्नी है। मैंने चाहे जैसे भी कपड़ों का चयन किया हो, किसी पार्टी में कोई मीठी-सी चुटकी ली हो या कोई मजेदार जोक सुनाया हो उसकी नजरों से कुछ भी तो नहीं चूकता।
यह कहना है एक पति का तो उनकी पत्नी भी तुरंत बोल पड़ी, मैं घर में जैसा भी खाना बनाती हूँ, वे चाव से खाते हैं व तारीफ करते हैं। फिर मैं भी अपनी चाहत और सराहना को शब्द देने से नहीं चूकती। एक बात बताऊँ, प्यार पाना संसार की बड़ी चीज तो है, पर दूसरे नंबर की! उससे बड़ी बात है किसी को प्यार करना।
दुराव-छुपाव नहीं
सुखी दंपति एक-दूसरे के साझीदार होते हैं। एक-दूसरे से वे कुछ भी नहीं छिपाते। वे भावों, विचारों, आशाओं और आकांक्षाओं के भी उतने ही भागीदार होते हैं जितना हानि, क्रोध, तड़प तथा लज्जाजनक एवं दर्दभरी यादों और अनुभूतियों के। हाँ, ऐसा भी होता है कि कभी-कभी पति-पत्नी में से कोई एक अपने अंतरंग विचारों और गूढ़ अनुभूतियों की अभिव्यक्ति नहीं कर पाता, पर कम बोल पाने वाला व्यक्ति भी अपने जीवनसाथी की परेशानी किसी और की अपेक्षा ज्यादा अच्छे से समझता है।

युवा

दुल्हन 25, दूल्हा 21 भी कबूल है
करियर ओरिएंटेड युवाओं के विवाह में उम्र का अंतर धीरे-धीरे घट रहा है। कई बार तो यूँ भी होता है कि उम्र के मामले में हमारी पारंपरिक मान्यताएँ आड़े आ जाती हैं और मामला बनते-बनते बिगड़ जाता है।
लड़कियों के भी करियर को लेकर गंभीर होने से कई बार मनपंसद रिश्तों में लड़के-लड़की की उम्र का अंतर न के बराबर होता है, तो कई बार ऐसा भी होता है कि लड़की की उम्र लड़के से ज्यादा होती है। ऐसे में उम्र के थोड़े-बहुत अंतर को ज्यादा तूल नहीं दिया जाए तो बेहतर है।
वैशाली एमसीए कर पूना की एक कंपनी में काम कर रही है। परिजनों ने उसकी शादी के लिए अखबार में वैवाहिक विज्ञापन प्रकाशित कराया। कई प्रस्ताव आए। उन्हें एक लड़के का बायोडाटा पसंद आया, जो एमसीए, एमबीए था व पूना की ही एक कंपनी में ऊँचे पद पर कार्यरत है।
हर दृष्टि से वह लड़का वैशाली के लिए उपयुक्त है। लेकिन जब जन्म तारीख देखी तो वह उम्र में उससे तीन महीने छोटा था। परिजन मन मसोसने लगे कि मात्र तीन महीने के अंतर से इतना अच्छा संबंध हाथ से निकल रहा है।
इसी बीच किसी काम से वैशाली के पिता हमारे घर आए। बातों ही बातों में मैंने जब पूछा, 'आपने वैशाली के रिश्ते के लिए अखबार में इश्तेहार दिया था, कोई रिस्पांस मिला या नहीं?' इस पर उन्होंने अपनी दुविधा बताई। हमने उनसे कहा, 'आज के युग में उम्र का बंधन कोई मायने नहीं रखता। यदि सब कुछ ठीक है तो छोटी उम्र के लड़के से शादी करने में भी क्या बुराई है?'
इस पर वे बोले- 'क्या सामने वाला अपने से बड़ी उम्र की लड़की से शादी करने को तैयार होगा?'
हमने कहा, 'बात करके देखते हैं।'
बात की तो वे और उसके परिजन तैयार हो गए। अब बारी वैशाली को समझाने की थी। वह भी इसके लिए तैयार हो गई। पिछले दिनों दोनों का धूमधाम से विवाह हुआ और वे अब हनीमून पर हैं।
वैशाली के पति और उनके परिजनों की भाँति कितने लोग सोचते हैं? अधिकांश प्रकरणों में बायोडाटा में यदि लड़के से लड़की बड़ी होती है तो न लड़की वाला आगे पहल करता है और न लड़के वाले। और बात वहीं समाप्त हो जाती है। पर इस अच्छे रिश्ते के छूट जाने का अफसोस दोनों पक्षों को होता है। काश! यदि दोनों पक्ष खुले दिमाग से सोचें तो उन्हें पछताना नहीं पड़ेगा।

एक समय था जब परिजन अपनी लड़की की शादी के लिए ऐसे वर की तलाश करते थे, जो उम्र में उससे पाँच-सात साल तक बड़ा हो। फिर यह अंतर दो से चार साल के बीच रह गया। समय के साथ लोगों की सोच बदली और बराबर की उम्र के लड़के-लड़कियों के बीच वैवाहिक संबंध होने लगे। लेकिन आज ऐसे लड़के-लड़कियों की भी शादी होने लगी है जिसमें लड़की, लड़के से उम्र में बड़ी है। यह अंतर कुछ महीनों से लेकर कुछ वर्षों तक का हो सकता है।

आज जब कोई अभिभावक अपने बेटे या बेटी के लिए वर-वधू तलाशता है तो उसका ध्यान उम्र की बजाए उनकी पढ़ाई-लिखाई, पारिवारिक हैसियत, रंग-रूप और आचार-विचार पर अधिक होता है। अब शादी में उम्र आड़े नहीं आती। यदि लड़की, लड़के से थोड़ी बड़ी है, पर बाकी सब बातें पसंदीदा या अनुकूल हैं तो संबंध तय होने लगे हैं। ये संबंध अपवादस्वरूप नहीं, आमतौर पर होने लगे हैं और इसमें कोई बुराई भी नहीं है।
दुनिया में ऐसे एक नहीं अनेक उदाहरण हैं, जहाँ आयोजित विवाह हुआ है। पत्नी अपने पति से उम्र में बड़ी और उनका दांपत्य जीवन खुशियों से भरपूर है।
आज लड़का व लड़की दोनों पहले अपना करियर बनाते हैं फिर शादी की सोचते हैं। ऐसी परिस्थिति में यह जरूरी नहीं कि लड़की को उससे बड़ी उम्र का लड़का ही मिले और यदि मिले तो वह अन्य सभी दृष्टि से उपयुक्त हो। इसी प्रकार यदि लड़के वाले भी अपने लड़के के लिए उससे छोटी उम्र की लड़की ढूँढने निकलें तो मिलेगी किंतु मनमाफिक नहीं यानी समझौता दोनों पक्षों को करना होगा। जब समझौता ही करना है तो उम्र पर करना बुद्धिमानी है, क्योंकि बाकी सारी बातें तो मेल खाती ही हैं।
जब लड़के के बड़ा होने में कोई हर्ज नहीं तो लड़की के बड़ा होने पर क्यों फर्क होना चाहिए? कई बार अच्छे रिश्ते इसलिए छूट जाते हैं कि लड़की उम्र में लड़के से दो माह बड़ी है। अब आप ही सोचिए, क्या इस वजह से रिश्ता नकार देना बुद्धिमानी होगी?
पति-पत्नी के बीच जब तक उम्र में बहुत अधिक अंतर न हो, तब तक उनके दांपत्य में कोई बाधा या परेशानी नहीं होती। यदि परेशानी होती भी है तो वह मनोवैज्ञानिक होती है। लड़का सोचता है कि लड़की मुझसे बड़ी है और लड़की सोचती है लड़का उम्र में मुझसे छोटा है। पर यदि इस सचाई को स्वीकार करते हुए दोनों वैवाहिक बंधन में बँधते हैं तो उन्हें यह परेशानी नहीं होगी।

आपकी राय

ज्यादा स्वस्थ पुरुष को चाहिए ज्यादा सेक्स
हट्टे-कट्टे मर्दों की तरफ हसीनाएँ ऐसे ही नहीं खिंची जातीं। वैज्ञानिकों का कहना है कि ज्यादा स्वस्थ मर्दों को ज्यादा काल तक ज्यादा सेक्स की जरूरत होती है। यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो के अनुसंधानकर्ताओं के एक अध्ययन में यह बात सामने आई।
अध्ययन में कहा गया है कि बहुत अच्छी या शानदार सेहत वाले मर्द और औरत औसत या खराब सेहत वाले मर्द और औरतों के मुकाबले यौनिक रूप से ज्यादा सक्रिय हो सकते हैं।
अध्ययन में कहा गया है कि अच्छी सेहत वाले नर-नारी खराब सेहत वाले नर-नारी के मुकाबले सेक्स में 5 से 8 गुणा ज्यादा रुचि दिखा सकते हैं।
ऐसोसिएट प्रोफेसर स्टेसी टेस्लर लिंडाउ और रिसर्च असिस्टेंट नतालिया गावरीलोवा ने 25 से 85 साल के छह हजार से ज्यादा डेटा का अध्ययन कर यह निष्कर्ष निकाला।
अध्ययन में कहा गया है कि अधेड़ उम्र में और बाद के जीवन में यौनिक रूप से सक्रिय, यौन जीवन की गुणवत्ता और सेक्स में रुचि स्वास्थ्य से सकारात्मक रूप से जुड़े हैं।
पूज्यंते नारी, नई क्रांति
विश्व के लोकतांत्रिक इतिहास में मंगलवार को एक नया अध्याय जुड़ गया। हमारे गणतंत्र के 60 वर्ष पूरे होने के बाद देर से ही सही भारतीय संसद के उच्च सदन राज्यसभा ने भारी बहुमत से लोकसभा व विधान-सभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करने संबंधी संविधान संशोधन विधेयक को पारित कर दिया।

इस ऐतिहासिक पुनीत अवसर पर कुछ सांसदों द्वारा किए गए शर्मनाक अशोभनीय व्यवहार, नारेबाजी तथा राज्यसभा के सुरक्षा गार्ड के साथ भी हाथापाई की घटना से संसदीय घाव के निशान अवश्य बने। फिर भी देवी, माँ, बहन, भार्या, बेटी को सम्मान देने वाली भारतीय संस्कृति के पोषक भारतीयों के लिए आधुनिक लोकतंत्र का यह एक बड़ा उपहार है।

देश की पंचायतों और स्थानीय स्वायत्त संस्थाओं में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने से कई राज्यों में महिला सशक्तीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई थी।

राजीव गाँधी ने सबसे पहले लोकतंत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की पहल की। इस तरह 1986 से 2009 तक विभिन्न सरकारों ने महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए संसद में प्रस्ताव-विधेयक लाने की कोशिश की।

इंद्रकुमार गुजराल और अटल बिहारी वाजपेयी के सफल सुदृढ़ नेतृत्व के बावजूद राजनीतिक असहमतियों तथा दबाव के कारण विधेयक कभी पारित नहीं हुए। अब चौथी बार समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल, बहुजन समाज पार्टी के कड़े विरोध का एक बड़ा कारण क्षेत्रीय जातिगत समीकरण तथा राज्य विधानसभा के आगामी चुनाव रहे हैं।

यही नहीं इन दलों के प्रमुख नेताओं पर लगे भ्रष्टाचार के गंभीर मामलों को दबाने की वैयक्तिक राजनीति भी रही। इसी तरह ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने केंद्र में सत्ता की भागीदारी करते हुए पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यक समुदाय को भ्रमजाल में रखने के लिए अपनी असहमति बनाए रखी।

भारतीय जनता पार्टी, जनता दल (यूनाइटेड) तथा कांग्रेस में भी कुछ नेता महिला आरक्षण विधेयक पर थोड़ी मतभिन्नता रखते थे। लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने सरकार के बहुमत को दाँव पर लगाने का खतरा उठाते हुए अपनी सरकार और प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह को इस बार आगे बढ़ते रहने का फैसला-सा सुना दिया।

इस दृष्टि से यह इंदिरा गाँधी शैली की निर्णायक लड़ाई रही है। इस विधेयक को लोकसभा में भी पारित करवाने में थोड़ी कठिनाई आएगी, लेकिन आसार स्पष्ट हैं कि इस नई महिला क्रांति को रोका नहीं जा सकेगा।

एक तरह से सोनिया गाँधी ने राजीव गाँधी के बड़े सपने को साकार करने के लिए बड़ी चुनौती स्वीकार की। यदि इस राजनीतिक संघर्ष में उनकी सरकार अल्पमत में आकर गिर जाए अथवा मध्यावधि चुनाव की नौबत आ जाए, तो वे नया इतिहास ही बनाएँगी।

आने वाले 15 वर्षों में पंचायत से राष्ट्रीय स्तर तक जितनी महिलाएँ सत्ता व्यवस्था में भागीदार होंगी, उतनी दुनिया के किसी हिस्से में नहीं होंगी और एक तरह से उनकी संख्या योरप तथा अमेरिका की चुनिंदा प्रतिनिधियों से भी अधिक होगी। 'नारी पूज्यंते' के मंत्र की सार्थकता भारतीय समाज और लोकतंत्र के लिए वरदान साबित होगी।

मंगलवार, 9 मार्च 2010

पर्यटन

सतपुड़ा की रानी : पचमढ़ी

म.प्र. के होशंगाबाद जिले में स्थित पचमढ़ी 1067 मीटर ऊँचाई पर स्थित है। यहाँ का तापमान सर्दियों में 4.5 डिग्री से. तथा गर्मियों में अधिकतम 35 डिग्री से. होता है। यह मध्यप्रदेश का एकमात्र हिल स्टेशन है। यहाँ की विशेषता है कि आप यहाँ वर्ष भर किसी भी मौसम में जा सकते हैं।
सतपुड़ा श्रेणियों के बीच स्थित होने के कारण और अपने सुंदर स्थलों के कारण इसे सतपुडा की रानी भी कहा जाता है। यहाँ घने जंगल, मदमाते जलप्रपात और पवित्र निर्मल तालाब हैं।
यहाँ की गुफाएँ पुरातात्विक महत्व की हैं क्योंकि यहाँ गुफाओं में शैलचित्र भी मिले हैं। यहाँ की प्राकृतिक संपदा को पचमढ़ी राष्ट्रीय उद्यान के रूप में संजोया गया है। यहाँ गौर, तेंदुआ, भालू, भैंसा तथा अन्य जंगली जानवर सहज ही देखने को मिल जाते हैं। इस क्षेत्र में घूमने के लिए आप पचमढ़ी से जीप या स्कूटर ले सकते हैं।

जटाशंकर
यह एक पवित्र गुफा है जो पचमढ़ी कस्बे से 1.5 किमी. दूरी पर है। यहाँ तक पहुँचने के लिए आपको कुछ दूर तक पैदल चलने का आनंद उठाना पड़ेगा। मंदिर में शिवलिंग प्राकृतिक रूप से बना हुआ है। यहाँ एक ही चट्टान पर बनी हनुमानजी की मूर्ति भी एक मंदिर में स्थित है। पास ही में हार्पर की गुफा भी है।

पांडव गुफा
महाभारत काल की मानी जाने वाली पाँच गुफाएँ यहाँ हैं जिनमें 'द्रौपदी कोठरी' और 'भीम कोठरी' प्रमुख हैं। पुरातत्वविद मानते हैं कि ये गुफाएँ गुप्तकाल की हैं जिन्हें बौद्ध भिक्षुओं ने बनवाया था।

अप्सरा विहार
पांडव गुफाओं से आगे चलने पर 30 फीट गहरा एक ताल है जिसमें नहाने और तैरने का आनंद लिया जा सकता है। इसमें एक झरना आकर गिरता है।

रजत प्रपात
यह अप्सरा विहार से आधा किमी. की दूरी पर स्थित है। 350 फुट की ऊँचाई से गिरता इसका जल इसका जल एकदम दूधिया चाँदी की तरह दिखाई पड़ता है।

राजेंद्र गिरि
इस पहाड़ी का नाम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के नाम पर रखा गया है। डॉ. राजेंद्र प्रसाद यहाँ आकर रुके थे। उनके लिए यहाँ रविशंकर भवन बनवाया गया था। इस भवन के चारों ओर प्रकृति की असीम सुंदरता बिखरी पड़ी है।

हांडी खोह
यह खाई पचमढ़ी की सबसे गहरी खाई है जो 300 फीट गहरी है। यह घने जंगलों से ढँकी है और यहाँ कल-कल बहते पानी की आवाज सुनना बहुत ही सुकूनदायक लगता है। वनों के घनेपन के कारण जल दिखाई नहीं देता। पौराणिक संदर्भ कहते हैं कि भगवान शिव ने यहाँ एक बड़े राक्षस रूपी सर्प को चट्टान के नीचे दबाकर रखा था। स्थानीय लोग इसे अंधी खोह भी कहते हैं जो अपने नाम को सार्थक करती है। यहाँ बने रेलिंग प्लेटफार्म पर से आप घाटी का नजारा ले सकते हैं।

प्रियदर्शिनी प्‍वाइंट
इस बिंदु पर से सूर्यास्त का दृश्य बहुत ही लुभावना लगता है। तीन पहाड़ी शिखर बायीं तरफ चौरादेव, बीच में महादेव तथा दायीं ओर धूपगढ़ दिखाई देते हैं। धूपगढ़ यहाँ की सबसे ऊँची चोटी है।

बी फॉल
यह जमुना प्रपात के नाम से भी जाना जाता है। यह नगर से 3 किमी. की दूरी पर स्थित है। मित्रों व रिश्तेदारों के साथ पिकनिक मनाने के लिए यह एक आदर्श जगह है।
अन्‍य आकर्षण
यहाँ महादेव, चौरागढ़ का मंदिर, रीछागढ़, डोरोथी डीप रॉक शेल्टर, जलावतरण, सुंदर कुंड, इरन ताल, धूपगढ़, सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान है। सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान 1981 में बनाया गया जिसका क्षेत्रफल 524 वर्ग किमी. है। यह प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर है। यहाँ दिन या रात में रुकने के लिए आपको उद्यान के निदेशक से अनुमति लेना पड़ती है। इसके अलावा यहाँ कैथोलिक चर्च और क्राइस्ट चर्च भी हैं।

कहाँ ठहरें
पचमढ़ी में बहुत से वातानुकूलित सर्वसुविधायुक्त होटल्स हैं। जहाँ आप आराम से शाही ठाठ के साथ रुक सकते हैं।
कैसे जाएँ

हवाई मार्ग
भोपाल सबसे निकट का हवाई अड्डा है। जो दिल्ली, ग्वालियर, इंदौर, मुंबई, रायपुर और जबलपुर से जुड़ा है।
रेलमार्ग
मुंबई-हावड़ा रेलमार्ग पर इटारसी होते हुए पिपरिया स्टेशन सबसे करीब है।
सड़क मार्ग
नियमित बस सेवा से पचमढ़ी भोपाल, इंदौर, नागपुर, होशंगाबाद, छिंदवाड़ा तथा पिपरिया से सीधा जुड़ा है। पिपरिया से टैक्सी उपलब्ध हैं।

फ़न तड़का

बहानेबाज कर्मचारी
एक बहानेबाज कर्मचारी का दादा उसके ऑफिस जाकर उसके बॉस से बोला- इस दफ्तर में सुनील नाम का व्यक्ति काम करता है, मुझे उससे मिलना है, वह मेरा पोता है।
बॉस ने मुस्कुरा कर कहा- मुझे अफसोस है आप देर से आए हैं, वह आपकी अर्थी को कंधा देने के लिए छुट्टी लेकर जा चुका है।
ड्राइवर और बीवी

रमन की बीवी उसके ड्राइवर के साथ भाग गई...।
लोगों ने पूछा- रमन, अब तुम क्या करोगे..?
रमन बोला- अब करना क्या है, गड्डी मैं खुद ही चलाऊँगा।
मालकिन और नौकरानी

मालकिन (नौकरानी से)- क्यों महारानी! आज आने में इतनी देर क्यों लगा दी?
नौकरानी- जी वो...! मैं सीढ़ियों से गिर गई थी।
मालकिन- तो क्या उठने में इतनी देर लगती है।

हॉट हॉलीवुड

डॉल्फिन का दर्द बयाँ करती 'द कोव'
अरुण बंछोर
कभी परंपरा, कभी जरूरत तो कभी मनोरंजन के नाम पर इंसान ने हमेशा ही प्रकृति से मनमाना व्यवहार किया है। दूसरी प्रजातियों को हमेशा अपने से कमतर मानते हुए इंसान ने उनके साथ क्रूरतम बरताव किया है। 'द कोव' नामक डॉक्युमेंट्री हमें एक ऐसे ही जघन्य और क्रूर बरताव के बारे में बताती है।
दुनिया के एक धनी और विकसित देश जापान के होनशू द्वीप के ताइजी, वाकायामा में होने वाली एक सालाना रस्म 'ड्राइव हंटिंग' जिसमें उस इलाके की समुद्री खाड़ी में बनी कई गहरी खोह (कोव) में शरण लेने आई डॉल्फिनों व व्हेलों के अवैध शिकार के बारे में बताया गया है।
सर्वश्रेष्ठ वृत्तचित्र (फीचर) की श्रेणी में ऑस्कर पुरस्कार जीतने वाली फिल्म ‘द कोव’ में जापान में होने वाले डॉल्फिन के अवैध शिकार को दर्शाया गया है। सनडांस फेस्टिवल 2009 का अवार्ड जीत चुकी 'द कोव' को निर्देशित किया है नेशनल ज्योग्राफिक के फोटोग्राफर लुई सिहोयोस ने। प्रोड्यूसर हैं मार्क मोनेरो और म्यूजिक है जे. रॉल्फ का। लायंसगेट द्वारा डिस्ट्रीब्यूट की गई इस डॉक्युमेंटरी ने विश्व भर में लगभग 25 प्रतिष्ठित अवॉर्ड्स जीते हैं।
दरअसल इस डॉक्युमेंट्री का विचार दुनिया भर में डॉल्फिन संरक्षण के लिए मशहूर रिक ओ'बेरी से मिलने के बाद आया। 1960 में एक अमेरीकी डॉल्फिन ट्रेनर ओ'बेरी ने कुछ डॉल्फिनों को पकड़कर 'फ्लिपर' नामक हिट टीवी शो में करतब दिखाने के लिए प्रशिक्षित किया था। पॉप कल्चर से भरे इस शो ने जल्दी ही जोरदार शोहरत हासिल कर ली, लोग डॉल्फिन को बेहद पसंद करने लगे और मानो ओ'बेरी के लिए यह शो वरदान साबित हुआ।
पर यह वरदान ओ'बेरी के लिए तब एक अत्यंत पीड़ादायक लम्हा साबित हुआ जब उनकी एक डॉल्फिन ने उनकी बाँहों में दम तोड़ दिया। ओ'बेरी बताते है उन्हे ऐसा लगा कि इस डॉल्फिन ने मुक्त होने की उम्मीद में अपनी जान दे दी। इस घटना के बाद ओ'बेरी ने सभी डॉल्फिन को समुद्र में छोड़ दिया था और तब से वे डॉल्फिन संरक्षण के लिए काम कर रहे हैं।
ताइजी का यह छोटा-सा शहर ऊपर से तो देखने में डॉल्फिन और व्हेल मछलियों के लिए स्वर्ग था, परंतु समुद्री खाड़ी में चेतावनी बोर्ड और जालियों से घिरे प्रतिबंधित क्षेत्र में बनी 'सीक्रेट केव्स' में एक भयानक राज छिपा हुआ था। ऐसा लगता था कि ताइजी के लोग डॉल्फिन पर आधारित इंटरटेनमेंट इंडस्ट्री की आड़ में डॉल्फिन के माँस का करोड़ों डॉलर का अवैध व्यापार कर रहे थे।
इस डॉक्युमेंट्री को फिल्माने में लुई और उनकी टीम के फोटोग्राफ, डाईवर्स को बहुत मश्किलों का सामना करना पड़ा। उन्हें शहर के मेयर ने अप्रत्यक्ष धमकी दी, स्थानीय लोगों ने जरा भी सहयोग नहीं किया और अकसर उन पर स्थानीय पुलिस द्वारा कड़ी निगरानी रखी गई। यहाँ तक कि इसमें दिखाए गए अधिकतर दृश्य चोरी-छिपे फिल्माए गए हैं। इस काम में उनकी टीम को बहुत धैर्य और विशेष तकनीक इस्तेमाल में लाना पड़ी। अन्तत: लुई और उनकी टीम इस दुखद और खूनी सच को दुनिया के सामने ले ही आई।
इस फिल्म में जापान द्वारा कथित रूप से अवैधानिक तरीके से अंतरराष्ट्रीय व्हेलिंग कमीशन के वोट खरीदने की बात भी उठाई गई है। गौरतलब है कि अंटार्कटिक में मारी जाने वाली व्हेलों से भी ज्यादा संख्या में हर साल यहाँ डॉल्फिन का अवैध शिकार होता है। एक आँकड़े के अनुसार हर साल जापान में 27 हजार से ज्यादा डॉल्फिन और सूँस मारी जाती हैं।
जापान की एग्रीकल्चर, फॉरेस्ट और फिशरी मिनिस्टरी की हाल की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2007 में ताइजी में 1569 छोटी व्हेल तथा पूरे जापान में 13080 व्हेल ड्राइव हंटिंग के जरिए मारी गई हैं। इस रिपोर्ट को प्रोग्रेसिव (!) बताया गया है।
वैसे देखा जाए तो व्हेलिंग इंडस्ट्री 1979 में ही बंद हो चुकी है पर समुद्र में मछलियाँ पकड़ने वाले देशों को मोटे तौर पर दो भागों में बाँटा जा सकता है - व्हेलिंग कंट्रीज और नॉन व्हेलिंग कंट्रीज और दोनों ही श्रेणी के देशों में इस मामले पर मतभेद बने रहते हैं।
पर्यावरण की नजर से देखा जाए तो व्हेल प्रजाति की मछलियाँ जिस प्लांकटन को खाती हैं उनमें प्रचुर मात्रा में प्रोटीन होता है और व्हेल के अपशिष्ट पर सैकड़ों प्रकार की मछलियाँ निर्भर रहती हैं। व्हेलों के खत्म होने से इनमें से अधिकतर प्रजातियाँ भी बच नहीं पाएँगी जिसमें से बहुत सी इंसान की भोजन श्रृंखला का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इसी तरह डॉल्फिन समुद्र की बहुत ही संवेदनशील प्राणी है। हाल की रिपोर्टों से पता चला है कि समुद्र में बढ़ते प्रदूषण से डॉल्फिन के माँस में पारे की अत्यधिक मात्रा पाई गई है।
इस डाक्युमेंट्री का सबसे उजला पक्ष है, वह यह है कि इसके प्रदर्शन के बाद ताइजी के स्कूलों में बच्चों दिए जाने वाले दोपहर के भोजन से डॉल्फिन का माँस गायब हो गया है। साथ ही दुनिया भर में डॉल्फिन को बचाने के लिए मुहिम और तेज हो गई। नि:संदेह लुई सिहोयोस इस फिल्म के लिए बधाई के पात्र हैं।
जिंदगी का मजा ले रही हैं कोल
रोहित बंछोर
पॉप स्टार चेरिल कोल अपने पति से अलग होने के बाद मुख्यधारा में लौट रही हैं और वे पूरी तरह जीवन का मजा उठाना चाहती हैं।
‘गर्ल्स अलॉउड’ की गायिका कोल अपने धोखेबाज फुटबालर पति एश्ले से अलग होने के बाद पहली बार एक कार्यक्रम पेश करने के लिए कोपनहेगन पहुँची।
कोल काफी खुश दिखाई दे रही थीं और ऐसा लग रहा था ‍जैसे वे किसी बंधन से मुक्त हो गई हो। अब उन पर किसी के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं है और वे जिंदगी को एक बार फिर नए सिरे से शुरू करना चाहती हैं।
26 वर्षीय कोल ने कहा, ‘‘सब कुछ बेहतर है। मैं मजा ले रही हूँ।’’

सोमवार, 8 मार्च 2010

राजनीति

मंत्रियों पर अफसरी नकेल
सचमुच गंगा उल्टी बहने लगे तो कितनी तबाही होगी? युद्ध के मैदान में सेनापति घोड़े की पीठ के बजाय पूँछ से बँधा हो तो कौन-सी लड़ाई जीती जा सकेगी? यदि मेहनतकश धोबी किसी तरह कपड़े धोकर सुखाए और गधा दुलत्तियों से धूल-कीचड़ उड़ाकर कपड़ों तथा धोबी का चेहरा खराब कर दे।
तुलना कड़वी हो सकती है, लेकिन लोकतंत्र पर गौरव करने वाली भारत सरकार का ऐसा ही एक फार्मूला मंत्रियों तथा जनतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास रखने वालों को बेचैन किए हुए है। एक सरकारी फरमान में व्यवस्था की गई है कि अब उच्च अधिकार प्राप्त अफसर केंद्रीय मंत्रियों के कामकाज की समीक्षा कर पास या फेल की रिपोर्ट बनाएँगे।
पं. जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गाँधी के विचारों, आदर्शों से प्रेरणा लेने वाले चार केंद्रीय मंत्रियों अंबिका सोनी, कमलनाथ, गुलाम नबी आजाद और जयराम रमेश ने अफसरों को सिर पर लादने से साफ इनकार कर दिया है। आखिरकार आजादी की लड़ाई और लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना चुने गए जनप्रतिनिधियों के मार्गदर्शन से स्वच्छ और कुशल प्रशासन देने के लिए हुई थी।
पं. नेहरू ने 1957 में भारतीय लोक प्रशासन संस्थान की बैठक में स्पष्ट शब्दों में कहा था-''प्रशासन को केवल अच्छा ही नहीं होना चाहिए, बल्कि यह भी जरूरी है कि वे लोग भी उसे अच्छा समझें जिन पर इसका प्रभाव पड़ सकता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह और भी जरूरी है।''
केंद्र सरकार में इस समय सुशासन के नाम पर कुछ सेवानिवृत्त या उच्च पदों पर बैठे अफसरों की सलाह सर्वाधिक उपयोगी और महत्वपूर्ण समझी जाने लगी है। असल में अफसरों को जनता की असली समस्याओं के समाधान और कल्याण से अधिक चिंता 'रिपोर्ट कार्ड', विश्व बैंक को दिए जा सकने वाले जादुई आँकड़ों की रहती है। इसलिए वे मंत्रियों की नकेल भी खुद संभालना चाहते हैं।
वैसे मंत्रियों की कमजोरियों और गड़बड़ियों पर अंकुश रखने का दायित्व प्रधानमंत्री और सत्तारूढ़ राजनीतिक दल के नेतृत्व का ही होता है। अंबिका सोनी, कमलनाथ और गुलाम नबी आजाद राजनीति में 40 वर्षों से सक्रिय हैं और इंदिरा गाँधी, राजीव गाँधी, नरसिंहराव जैसे प्रधानमंत्रियों के साथ उन्होंने काम किया है।
फिर वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह के साथ भी कम से कम 20 वर्षों से उनका सीधा तालमेल रहा है। श्रीमती सोनिया गाँधी ने उन्हें अपनी पार्टी की सरकार को सफल बनाने के लिए ही मंत्री पद संभालने की जिम्मेदारी दी है।
वे ही क्यों, प्रणब मुखर्जी और पी. चिदंबरम सहित कई अनुभवी नेता हैं। यदि उन्हें प्रधानमंत्री, पार्टी अध्यक्ष और सबसे महत्वपूर्ण आम जनता की बजाय कुछ खजांचीनुमा अफसरों के प्रति जवाबदेह रहना होगा तो लोकतांत्रिक व्यवस्था सचमुच कलंकित होगी और भविष्य के लिए भी गलत परंपरा बन जाएगी।
लोकतंत्र में आवश्यकता इस बात की होती है कि प्रशासक की छाप जनअपेक्षाओं को पूरी करने वाली बने। निश्चित रूप से कोई भी प्रशासक हर व्यक्ति की इच्छा को पूरा नहीं कर सकता, लेकिन उसके काम का तरीका ऐसा होना चाहिए, जिससे जनता को विश्वास हो कि उसकी इच्छानुसार सत्ता-व्यवस्था चल रही हो। इसी दृष्टि से चुनाव और जनप्रतिनिधियों-संसद-विधानसभा का महत्व रखा गया।
केवल अफसरशाही की मनमानी होने पर ही नक्सली माओवादी संगठनों तथा राष्ट्र विरोधी बाहरी ताकतों को बल मिलता है। वे गरीब लोगों को उग्र हिंसा का तरीका अपनाने के लिए भड़काने में सफल होते हैं। लोकतंत्र में अब दलित, पिछड़े, आदिवासी और अल्पसंख्यकों को यह विश्वास हो गया है कि वे चुनाव के समय पंच, सरपंच, विधायक, सांसद, मंत्री, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री तक को बदल सकते हैं।
यदि उन्हें यह भरोसा होने लगे कि सब कुछ करने के बाद भी भ्रष्ट और सिरफिरे अफसरों की मनमानी से मुक्ति नहीं मिल सकती तो वे हिंसा का रास्ता अपनाने पर मजबूर होने लगेंगे।पिछले वर्षों के दौरान राष्ट्रीय अथवा अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों द्वारा गठित किए गए व्यापक सर्वेक्षणों में सिद्ध हुआ है कि भारत की प्रशासनिक व्यवस्था में भ्रष्टाचार नासूर की तरह फैल गया है। प्रशासनिक भ्रष्टाचार ही गरीबी और पिछड़ेपन का मूल कारण है।
हर साल करीब 25 हजार करोड़ रुपए अफसरी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाते हैं। सतर्कता आयोग, सीबीआई और प्रदेशों की जाँच एजेंसियों के पास भ्रष्ट अधिकारियों के हजारों मामले हैं और लाखों प्रकरण अदालतों में विचाराधीन हैं।
लालफीताशाही ने कुछ ऐसा जाल फैलाया हुआ है कि भ्रष्टाचार के प्रकरण वर्षों तक उलझे रहें और वे कड़े दंड से बचते रहें। प्रशासनिक भ्रष्टाचार का ही नतीजा है कि लगभग 20 हजार अरब रुपए से अधिक काली पूँजी अवैध तरीकों से विदेशी बैंकों में जमा है।
विडंबना यह है कि व्यवस्था गड़बड़ाने से ईमानदार और सक्षम अधिकारी उपेक्षित तथा असहाय हो जाते हैं। उनके साथ काम करने वाले ईमानदार और परिश्रमी सहयोगी भी विचलित होते हैं। इसका असर पूरे समाज पर पड़ता है। पिछले 20 वर्षों के दौरान लाइसेंस-परमिट राज बहुत हद तक खत्म हुआ है।
नेताओं, अफसरों और अपराधियों के बीच गठजोड़ की प्रवृत्ति से बहुत नुकसान हुआ है। इस बात को कम से कम चार प्रधानमंत्री मान चुके हैं। फिर भी राजनीति और प्रशासन में एक नया वर्ग सामने आया है, जो सड़ांध दूर कर व्यवस्था को सँवारना चाहता है लेकिन अफसर ही मंत्रियों के कामकाज की रिपोर्ट बनाने लगेंगे तो उनके गठजोड़ से गलत काम की गुंजाइश बढ़ जाएगी।
वर्तमान सत्ता-व्यवस्था में अमेरिकी शासन तंत्र को बहुत हद तक सफल मॉडल के रूप में देखा जाता है लेकिन वहाँ संसद, मंत्री और राष्ट्रपति ही सर्वोपरि हैं।
बराक ओबामा या हिलेरी क्लिंटन के कामकाज की समीक्षा कोई अफसर नहीं करता। शीर्ष पदों पर बैठने वाले अधिकारियों, सीआईए-एफबीआई के प्रमुख और न्यायाधीश तक का चयन जनता द्वारा चुने गए सांसदों की समिति बहुत ठोक-बजाकर करती है।
ब्रिटेन, जर्मनी, जापान, इटली जैसे संपन्न योरपीय देशों में भी अफसरों की लगाम मंत्रियों और सांसदों के हाथों में होती है। रूस या चीन की कम्युनिस्ट शासन व्यवस्था में भी पार्टियों के पदाधिकारियों का वर्चस्व हता है।
एक तरफ केंद्र सरकार अफसरी वर्चस्व बढ़ा रही है तो दूसरी तरफ केरल की राज्य सरकार ने सरकारी अधिकारियों को सांसदों तथा विधायकों के साथ सम्मानजनक व्यवहार करने का आदेश जारी किया है। केरल की कम्युनिस्ट सरकार कुछ अरसे से भ्रष्टाचार के आरोपों से बहुत बदनाम हुई तथा पार्टी में भी गहरा असंतोष देखने को मिला। संभवतः इसी कारण सरकार को लिखित आदेश जारी करना पड़ा।
यों सम्मानजक व्यवहार की अपेक्षा दोनों पक्षों से की जाती है। बिहार, उत्तरप्रदेश, झारखंड और तमिलनाडु जैसे राज्यों में कुछ नेताओं ने तानाशाह की तरह अधिकारियों को प्रताड़ित भी किया, जिसकी सर्वत्र भर्त्सना ही हुई है।
निर्माण और विकास कार्यों में जनप्रतिनिधियों, राजनीतिक दलों, स्वयंसेवी संगठनों की भूमिका महत्वपूर्ण रहना चाहिए। इसी दृष्टि से संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के सत्तारूढ़ होने के बाद 2004 में एक राष्ट्रीय सलाहकार परिषद का गठन किया गया, लेकिन कुछ समय बाद राजनीतिक खींचातानी के कारण इसकी भूमिका शिथिल हो गई। अब फिर इस परिषद के पुनर्गठन और महत्ता बढ़ाने की आवाज उठने लगी है। उम्मीद करना चाहिए कि बदलते युग में लोकतांत्रिक परंपराएँ मजबूत होंगी और लालफीताशाही को जड़ से नष्ट किया आएगा।

सामयिक

समझौतों से नक्सली ही जीतेंगे
इस बात में कोई दो राय नहीं कि नरम मिजाज देश होने का खामियाजा हिन्दुस्तान को भुगतना पड़ रहा है। नक्सलवादी कहिए, माओवादी कहिए या आतंकवादी, इन हिंसा करने वाले संगठनों को किसी भी नाम से पुकारिए, वे बेखौफ होकर कभी भी, कहीं भी आक्रमण कर देते हैं। जैसा कि पश्चिम बंगाल के शिल्दा में हुआ, जहाँ माओवादियों ने निर्दयी तरीके से पुलिसवालों की नृशंस हत्याएँ कीं। यह हमला उनके योजनाबद्ध आतंकी अभियान का हिस्सा है।
नक्सलियों ने साल 2009 में 6 अप्रैल से 12 जून तक पश्चिम बंगाल के तथा अन्य क्षेत्रों में अपने ऑपरेशन चलाए थे, जिनमें उन्होंने 112 पुलिस वालों की जानें ले लीं।
माओवादियों व नक्सलियों की समस्या से पार पाना कोई असंभव कार्य नहीं है। मुश्किल यह है कि इनसे निपटने की कोई दीर्घकालिक नीति नहीं बनाई गई है। पश्चिम बंगाल में 25 लोगों को मारने के बाद माओवादियों ने फरवरी 2010 के तीसरे हफ्ते में बिहार के कोसारी गाँव में 11 लोगों की हत्या कर दी। इस नरसंहार में 100 से ज्यादा माओवादी शामिल थे, जिन्होंने डायनामाइट से घरों को उड़ा दिया। मारे गए लोगों के अलावा 25 लोग भी शिकार हुए जो जलने से या गोली से घायल हुए।
वास्तव में राज्यों के नेता इस मुद्दे पर जो दृष्टिकोण रखते हैं, वह केंद्र में बैठे नेताओं तथा देश के बाकी लोगों के मतों से भिन्न है। बिहार के मुख्यमंत्री का कहना था कि मैं माओवादियों के खिलाफ बल प्रयोग के खिलाफ हूँ। जमीनी स्तर पर विकास एवं प्रजातंत्र माओवाद को हल करने का एकमात्र तरीका है। कितना अच्छा होता यदि मुख्यमंत्रीजी का यह बयान सच हो पाता।
लेकिन सच यह है कि शांति का कोई विकल्प नहीं है, चाहे वह बंदूक से आए या बातचीत से या फिर आत्मसमर्पण से। दुर्भाग्य से बंदूक के सामने झुकना हमारे देश में एक मान्य परंपरा बन गई है। इसकी शुरुआत 1989 में हुई थी जब स्थानीय लोगों की मदद से पाकिस्तानी आतंकियों ने अपने साथियों को छुड़वाने के लिए तत्कालीन गृहमंत्री की बेटी को अगवा कर लिया था।
इस घटना के बाद से आतंकियों ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। इसके बाद उन्होंने अपने साथियों या शुभचिंतकों को छुड़वाने के लिए लोगों को बंधक बनाना आरंभ कर दिया।
वर्ष 2008 में एक पुलिस अधिकारी को कैद से छुड़ाने के लिए पश्चिम बंगाल सरकार को कुछ माओवादी कमांडरों को रिहा करना पड़ा। 2009 में माओवादियों ने झारखंड में एक पुलिस इंस्पेक्टर का अपहरण करके उसका सिर कलम कर दिया।
हाल ही में उन्होंने झारखंड के एक प्रखंड विकास अधिकारी को अगवा कर लिया जिसे छुड़ाने के लिए मुख्यमंत्री 14 माओवादियों को रिहा करने के लिए तैयार हो गए।
यदि गुप्तचर और अन्य स्रोतों की रपटों पर यकीन किया जाए तो पता लगता है कि समस्या कितनी गंभीर हो चुकी है। जून 2009 के अंत तक 455 लोग (255 नागरिक व 200 सुरक्षाकर्मी) नक्सलियों ने मार डाले थे और ये कत्लेआम जारी है।
ये आँकड़े केंद्रीय गृह मंत्रालय के हैं। इस अवधि में सबसे अधिक यानी 60 प्रतिशत हत्याएँ छत्तीसगढ़ व झारखंड में हुईं, जो कि सबसे ज्यादा नक्सल प्रभावित राज्य हैं। आँकड़े बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में सबसे ज्यादा नक्सली हिंसा होती है। पिछले तीन वर्षों के आँकड़े इस बात के गवाह हैं।
समस्या की भयावहता को स्वीकारते हुए केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने फरवरी 2010 में कहा कि नक्सलवाद का खतरा सरकार की उम्मीद से कहीं अधिक भयंकर है। जब तक हम उन्हें छेड़ेंगे नहीं वे आराम से अपना विस्तार करते रहेंगे। वे तब तक फैलते रहेंगे जब तक हम उन्हें चुनौती नहीं देंगे।
लोगों का सहयोग हासिल करने के लिए माओवादी हरसंभव तरीके अपनाएँगे। वे मीडिया को फुसलाएँगे, गलत आरोप लगाएँगे और अपने प्रभाव का दायरा बढ़ाएँगे। अधिकतर लोग सोचेंगे कि समझौता किया जाए या कोई अन्य बीच का रास्ता अपनाया जाए लेकिन यह बहुत बेवकूफी होगी।
सबसे मुश्किल चुनौती जो हमारे सामने है, वह है अच्छी तरह प्रशिक्षित तथा बेहतरीन साजो-सामान से लैस पुलिस बल। नक्सलवाद व माओवाद की समस्या से निपटने के लिए मजबूत दिमाग, उससे भी ज्यादा मजबूत दिल तथा इरादों पर टिके रहने की आवश्यकता है। अल्पकालिक समाधानों से कुछ नहीं होगा।
एक मासूम व निहत्थे अफसर का अपहरण कर लिया जाता है और उसे छुड़ाने के लिए 14 पके हुए अपराधियों को छोड़ दिया जाता है, इन सब घटनाओं से माओवादियों के हौसले और बुलंद होंगे।
मुँह में खून लगने के बाद नक्सली अब और आगे बढ़ेंगे। राज्य सरकारें आतंकियों, नक्सलियों व माओवादियों के हाथों खिलौना बन रही हैं। वे जैसे चाहे सरकारों को नचाते हैं और अपनी माँगें मनवाते हैं।
नक्सली दलों से नरमाई से बातचीत करके राज्य सरकारों ने कमजोरी दिखाई है और उन्हें बढ़ावा दिया है। यही वजह है कि आज उन्होंने अपहरण को अपनी माँगें मनवाने का औजार बना लिया है।
जिन किन्हीं भी राज्य सरकारों ने ऐसा किया है, उन्होंने कारगर प्रशासन देने के अपने उत्तरदायित्व का उल्लंघन किया है। खराब हालात झेल रहे क्षेत्रों को विकसित करने के बजाय ये सरकारें अपने अधिकारियों को संदेश दे रही हैं कि कि जो जगह असुरक्षित हैं वहाँ न जाएँ।
कोई भी आतंकी समूह तब तक कोई समझौता नहीं करेगा, जब तक कि वह यह जानता है कि वह जीत रहा है। ऐसा पंजाब, असम व अन्य राज्यों में हो चुका है। दुनिया का कोई भी कोना हो, ऐसे तत्वों से निपटने के लिए गोली का जवाब गोली ही एक तरीका होता है। एक संदेश स्पष्ट तौर पर सख्ती से जाना चाहिए कि प्रदेश में अमन व सुरक्षा बहाल करने का अधिकार सरकार पर है, जिस पर वह अमल करेगी, वह उसने छोड़ा नहीं है।
केवल समर्पण के लिए माओवादियों से बात करना एक कदम पीछे हटना है और यह उस नीति के खिलाफ जाता है जो भारत सरकार ने नक्सलवाद से लड़ने के लिए बनाई थी और फिर समझौते तो तभी होते हैं जब किसी एक पक्ष की रीढ़ टूट चुकी हो। इस किस्म के समझौतों से तो सुरक्षा और पुलिस बलों का मनोबल ही टूटेगा, जो अपनी जान की बाजी लगाकर ऐसे तत्वों के खिलाफ लड़ रहे हैं।