मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

विविध

ही लव्‍ज मी, ही लव्‍ज मी नॉट...
सुजाता रोज ही बस से कोचिंग के लिए जाती थी और साहिल उसे इंतजार करता मिलता था। उसे लगता कि साहिल उससे बात करना चाहता है, लेकिन पहल नहीं कर पा रहा है। उधर सुजाता के मन में भी साहिल से बात करने की इच्‍छा होती थी, लेकिन साहिल के रिजर्व नेचर को देखकर सुजाता की हिम्‍मत नहीं होती।
साहिल और सुजाता बचपन में एक ही कॉलोनी में रहते थे। दोस्‍तों के बीच उनके प्‍यार के गुपचुप चर्चे भी थे। सुजाता साहिल को मन ही मन प्‍यार करती थी। वहीं साहिल के मन में भी हिलोरें उठती थीं। दोनों के साथ प्राब्‍लम यह थी कि उन्‍हें एक दूसरे की ओर से प्‍यार होने के ठोस संकेत नहीं मिल रहे थे।
अक्‍सर लड़के-लड़कियों को ऐसे प्राब्‍लम से दो-चार होना पड़ता है। जब उन्‍हें कोई अच्‍छा लगता है और यह भी लगता है कि जिसे वो प्‍यार करते हैं, उसके दिल का हाल उनके जैसा है, लेकिन उनके प्‍यार के लिए धड़कते दिल की आवाज सुनाई नहीं देती। आमतौर पर प्‍यार की अभिव्‍यक्ति व्‍यक्ति और उसे स्‍वभाव पर निर्भर करता है।
देखा गया है कि प्‍यार के मामले में लोग अक्‍सर शर्मीले होते हैं। इजहार से ज्‍यादा उसके एक्‍सेप्‍ट होने और नहीं होने की चिंता करते हैं। ऐसे में किसी के मन में आपके लिए प्‍यार है या नहीं इसे जानना थोड़ा मुश्‍किल होता है। ऐसी बेचैन दिल के लिए हमारे पास हैं कुछ टिप्‍स --

* अगर कोई लड़का/लड़की आपको दूर से देखे, लेकिन पास पहुँचते ही किसी और जगह देखने का बहाना करे
* अक्‍सर आपको ऐसा लगे कि वो आपकी हर एक्‍टिविटी को नोटिस कर रहा हो
* दोस्‍तों से आपके बारे में जानना चाहे।
* आपको ‘सिर्फ अच्‍छी दोस्‍त’ कहे।
* वह दूसरे सभी लोगों से बात करे, लेकिन आपके पास पहुँचते ही बात करना बंद कर दे।
* आपको देखते ही उसके आचरण और व्‍यवहार में बदलाव आने लगे। मसलम, बेवजह हाथ हिलाना, जोर से बात करना, इत्‍यादि।
* दूर से आपको मुस्‍कुराकर देखे, लेकिन पास होने पर नजर उठा नहीं देख पाए।
* आपको एकटक देखने से घबराए।
* अगर आपके साथ उसकी दोस्‍ती हो और वह अक्‍सर आपके छूने की कोशिश करे। मसलन, बालों पर हाथ रखे, हाथ पकड़े।
* आपसे जेंटिल टच करते हुए बात करे।
* आपको हँसाने की कोशिश करे, गुदगुदाए।
* बात करते समय आपका हाथ अपने हाथ में रखे।
अगर ऐसे संकेत आपको मिल रहे हों तो इसका मतलब है कि वो आपका ध्‍यान अपनी ओर खींचना चाहता है, लेकिन प्‍यार का इजहार करने से या तो डरता है, या फिर उसे इजहार-ए-इश्‍क का तरीका नहीं मालूम है। तो फिर देर मत कीजिए, ये संकेत प्‍यार परखने के लिए काफी हैं। तत्‍काल अपने चाहने वाले से इजहार कर दीजिए और एक-दूसरे के साथ का लुत्फ उठाइए।

नक्सलवाद

नक्सलवाद विचारहीन प्रतिक्रिया: ओशो
नहीं, मैं यह नहीं मानता। मैं इसलिए नहीं मानूँगा कि नक्सलाइड सिर्फ एक प्रतिक्रिया, रिएक्शन है- क्रांति, रिवोल्यूशन नहीं। रिवोल्यूशन और रिएक्शन में बड़ा फर्क है। नक्सलाइड पुराने ढाँचे के प्रति एक क्रोधपूर्ण प्रतिक्रिया है। वह क्रोध उस सीमा पर पहुँच गया है, जहाँ वह यह नहीं देखता है कि क्या करना है, क्या छोड़ देना है। वह अंधा हो गया है। अंधा क्रोध भी खतरनाक साबित हो सकता है।
जितना अंधा कन्फर्मिस्ट खतरनाक होता है, उतना ही अंधा रिवोल्यूशनरी भी। और नक्सलाइड की घटना जो है, वह कोई रिवोल्यूशन नहीं है और कोई फिलासफी, दर्शन नहीं है। वह एक तीव्र रिएक्शन है, जो बिलकुल जरूरी था। इसलिए जितने हम जिम्मेवार हैं, नक्सलाइड पैदा करने के लिए, उतने वे बेचारे जिम्मेवार नहीं हैं। वे तो बिलकुल निरीह हैं। उनको मैं जरा भी जिम्मा नहीं देता। मैं निंदा के लिए भी उनको पात्र नहीं मानता, क्योंकि निंदा उनकी करनी चाहिए जिनको जिम्मेवार मानूँ हम जिम्मेवार हैं।
हमने पाँच हजार वर्ष से जरा भी क्रांति नहीं की है, जरा भी नहीं बदले हैं, एकदम मर गए हैं। तो इस मरे हुए मुल्क के साथ कुछ ऐसा होना अनिवार्य है। लेकिन वह शुभ नहीं है। और उसको अगर हमने क्रांति समझा तो खतरा है। रिएक्शनरी हमेशा उलटा होता है और आप जो कर रहे हैं, उससे उलटा करता है।
रिएक्शनरी वही होता है, जहाँ हमारा समाज होता है। सिर्फ उलटा होता है। वह शीर्षासन करता है। हम जो यहाँ कर रहे हैं, वह उसका उलटा करने लगता है। जिस जगह आप हैं, उससे गहरा वह कभी नहीं जा सकता है, क्योंकि आपका वह रिएक्शन है।
अगर आपने मुझे गाली दी और मैं भी तुरंत गाली देता हूँ, तो आपकी और मेरी गाली एक ही तल पर होने वाली है, क्योंकि उसी तरह मैं भी गाली दे रहा हूँ तो मैं भी गहरा नहीं हो सकता, गहरा हुआ नहीं जा सकता। गहरे होने के लिए भारत में नक्सलाइड कुछ नहीं कर पाएगा।
नक्सलाइड सिर्फ सिम्पटमैटिक हैं- सिम्पटम, बीमारी के लक्षण हैं। बीमारी पूरी हो गई है और अब नहीं बदलते हो तो यह होगा। यानी यह भी बहुत है, यह भी बहुत है मेरी दृष्टि में। लेकिन अगर तुम नहीं बदलते हो और इसके सिवा तुम कोई रास्ता नहीं छोड़ते हो, अगर क्रांति नहीं आती तो यह प्रतिक्रिया ही आएगी।अब दो विकल्प खड़े होते हैं मुल्क के सामने- या तो क्रांति के लिए तुम एक फिलोसाफिक रूट, वैचारिक आयाम की बात करो और क्रांति को एक व्यवस्था दो और क्रांति को एक सिस्टम दो और क्रांति को एक क्रिएटेड पोस्ट बनाओ। अगर नहीं बनते हो तो अब यह होगा यानी नक्सलाइट जो हैं वे हमारी वर्तमान समाज-व्यवस्था के दूसरे हिस्से हैं। ये दोनों जाने चाहिए।
सोसायटी भी जानी चाहिए और उसका रिएक्शन भी जाना चाहिए, क्योंकि वह बेवकूफी ही थी सोसायटी का साथ देना। ये जो एक्टिविटीज, घटनाएँ हैं, ये इसी के 'पोर्ट एंड पार्टिल', सहज परिणाम है।
आमतौर पर ऐसा लगता है कि नक्सलाइड दुश्मन है। मैं नहीं मानता कि वे दुश्मन हैं। वे इसी सोसायटी के हिस्से हैं, इसी सोसायटी ने उसे पैदा कर दिया है। इसने गाली दी है तो उसने दोगुनी गाली दी है, बस इतना फर्क पड़ा है। मगर यह माइंड, चित्त इसी से जुड़ा हुआ है। यह सोसायटी गई तो वह भी गया। अगर यह नहीं गई, तो वह भी जाने वाला नहीं है। यह बढ़ता चला जाएगा।
अब मेरा कहना यह है कि क्रांतिकारी के सामने दो सवाल हैं। ठीक विचार करने वाले के सामने दो सवाल हैं। वह यह कि या तो सोसायटी में क्रांति आए- और सृजनात्मक रूप में- और नहीं आ पाती है तो नक्सलाइड विकल्प रह जाएगा। और वह कोई सुखद विकल्प नहीं है। वह सुखद भी नहीं है, गहरा भी नहीं है, जरा भी गहरा नहीं है। वह उसी तल पर है, जहाँ हमारा समाज है। वह सिर्फ रिएक्शन कर रहा है, वह जरूरी है। यह मैं नहीं कहता कि बुरा है तो गैर-जरूरी है। बुरा है, नहीं हो, ऐसी हमें व्यवस्था करनी चाहिए।
और वह व्यवस्था हम तभी कर पाएँगे जब हम पूरी सोसायटी को बदलेंगे। नक्सलाइड को हम रोक नहीं पाएँगे, उनको रोकने का सवाल ही नहीं है। पूरी सोसायटी उसे पैदा कर रही है। इसका जड़ होना उसको पैदा कर रहा है, इसके न बदलने की आकांक्षा उसको पैदा कर रही है, इसका पुराना ढाँचा उसको पैदा कर रहा है, यह ढाँचा पूरी तरह गया तो इसके साथ नक्सलाइड गया।
नक्सलाइड एक संकेत है, जो बता रहा है कि सोसायटी इस जगह पहुँच गई कि अगर क्रांति नहीं होती तो यह होगा। और अब सोसायटी को समझ लेना चाहिए। वह पुराना ढाँचा तो नहीं बचेगा। या तो क्रांति आएगी या यह ढाँचा जाएगा। ये दो चीजें आ सकती हैं और अगर आप मर्जी से लाएँ तो क्रांति आएगी, अगर आप सोचकर लाएँ तो क्रांति आएगी, विचार करके लाएँ तो क्रांति आएगी और अगर आप क्रांति न लाएँ, इसके लिए जिद में रहे कि नहीं आने देंगे तो यह विचारहीन प्रतिक्रिया आएगी। यानी मेरा कहना है कि नक्सलाइड एक थॉटलेस रिएक्शन विचारहीन प्रतिक्रिया है।
थॉटलेस रिएक्शन तो है। इसका परपज, लक्ष्य है कि वह प्रचलित मूल्यों को चैलेंज करता है...? परपज, लक्ष्य वैसा ही है जैसे कि आप बीमार हैं और जोर से बुखार हो गया है। सारा शरीर गर्म है और एक सौ चार डिग्री बुखार है। एक सौ चार डिग्री में जलना सिर्फ खबर है कि भीतर बीमारी है और यह चीज ऐसी है कि शरीर को अस्वस्थ किए दे रही है, बेचैन किए दे रही है, उत्तप्त किए दे रही है। यह बुखार का परपज है। यह त्वचा का, फीवर, बुखार का परपज है कि आपको खबर दे रहा है कि भीतर डिसीज, बीमारी है।
डिसीज मिटेगी तो यह बुखार जाएगा और किसी ने अगर ठंडा पानी डालकर इस बुखार को कम करने की कोशिश की तो डिसीज तो नहीं मिटेगी, आदमी मरेगा। नक्सलाइड को सिर्फ ठंडा करने की कोशिश की तो सोसायटी मरेगी। नक्सलाइड सिर्फ फीवर है। परपज है फीवर का, लेकिन फीवर बचाने योग्य नहीं होता है, मिटाने योग्य होता है।
परपज तो उसका है कि उसने खबर दी है आपको, आपके शरीर के ऊपर आकर कि आप बचेंगे नहीं, अगर बीमारी दूर नहीं होती तो। अभी बुखार बढ़ता है, एक सौ चार से एक सौ दस तक जाएगा। अब जल्दी बीमारी अलग करो। सिर्फ इतना परपज है उसका और बीमारी अलग हुई कि परपज इसका खत्म हुआ। मगर खतरा है कि कहीं हम बीमारी को इसका विकल्प न मान लें।
कहीं हम ऐसा न समझ लें कि बीमारी का दुश्मन है, यह फीवर जो है। यह दुश्मन नहीं है, बीमारी का ही हिस्सा है, बीमारी की ही खबर है, बीमारी से ही जुड़ा है। तो ऐसा नहीं है कि बीमारी को छोड़ें और बुखार को पकड़ लें। ऐसा परपज नहीं है नक्सलाइड का कि हम आज सोसायटी के पुराने ढाँचे को छोड़ दें और नक्सलाइड, जो बेवकूफी की बात कर रहा हो उसे पकड़ लें। यह विकल्प नहीं है।
जानना यह है कि नक्सलाइड आपकी पुरानी सोसायटी पैदा कर रही है। आप पुरानी सोसायटी को खत्म नहीं करेंगे तो नक्सलाइड पैदा होगी। यानी नक्सलाइड का एक ही परपज है और वह यह कि वह पूरी खबर कर दे कि पुरानी सोसायटी आखिरी क्षण में है, और अगर नहीं मरती है तो नक्सलाइड को पैदा कर जाएगी और इससे अगर बचना है तो पुरानी सोसायटी खत्म करो, उस बीमारी को जाने दो।
यह इसका रिएक्शन है। इसको बचाना नहीं है, जाने देना है- सोसायटी के साथ जाने देना है, बचाना नहीं है। इसलिए नक्सलाइड पुरानी सोसायटी का दुश्मन है और मैं मानता हूँ कि वह उसी का हिस्सा है जो घबरा गया है, क्रोध से भर गया है और जो वह सोसायटी करती थी उससे उलटा काम कर रहा है। ठीक उलटा कर रहा है। पुरानी सोसायटी जैसे आज अमेरिका में है, यूरोप में है, उसके विरोध में प्रतिक्रिया स्वरूप बीटल्स और बीटनिक पैदा हो गए हैं।
वे भी उसी पुरानी सोसायटी के हिस्से हैं। पुरानी सोसायटी कहती है कि सड़क पर कपड़े ढँककर चलो, तो वह सड़क पर नंगा खड़ा हो गया है। मेरा मानना यह है कि यह जो नंगा खड़ा होना है, यह जो कपड़े पहनने का अति आग्रह है, दबाने का, छिपाने का- उसका ही रिएक्शन है।
मानता कपड़े को यह भी है, क्योंकि कपड़े उतारकर बहादुरी दिखा रहा है। यह दिखा रहा है कपड़े उतारकर बहादुरी, हम दिखा रहे हैं...! लेकिन यह है हमारा ही दूसरा विपरीत हिस्सा, डायमेट्रिकली अपोजिट, द पार्ट एंड पार्सिल, बिलकुल उलटा रूप है, लेकिन हमसे जुड़ा हुआ है।
जब तक दुनिया में कपड़े पहनने का बहुत आग्रह जिद्दपूर्वक जारी रहेगा, गिन्सबर्ग पैदा होगा। अगर हमने मनुष्य के शरीर को इस भाँति इनकारा कि इसको देखने को मत देना, तो कुछ विद्रोही लड़के पैदा होंगे, जो कहेंगे कि हम नंगे खड़े होंगे।
हम सड़कों पर नंचे चलेंगे। और आज नहीं कल, यह पक्का ही मानना कि लड़के और लड़कियाँ सड़कों पर नंगे खड़े होकर कपड़ों के खिलाफ बगावत करेंगे, क्योंकि हमने अति आग्रह कर लिया है। कपड़ा पहनना एक सुविधा की बात है, वह एक मॉरेलिटी न बन जाए और कोई पैटर्न न बन जाए कि उघाड़ा होना एक पाप हो जाए।
नक्सलाइड जो है वह हमारी सोसायटी का हिस्सा है। वह ढाँचे से छूटकर उलटा खड़ा हो गया है। लेकिन उलटा खड़ा होना उतना ही पागलपन है। सोसायटी को, सोसायटी को उलटी नहीं करना है।

पशुपतिनाथ से तिरुपति तक नक्सली साम्राज्य!

रूसी क्रांति से प्रेरित नक्सलवादी विचारधारा के लोगों के लिए 'नक्सलवाद' मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओत्सेतुंगवाद के क्रांतिकारी पर्याय के रूप में जाना जाता रहा है। नक्सलवाद के समर्थक मानते हैं कि प्रजातंत्र के विफल होने के कारण नक्सली आंदोलन का जन्म हुआ और मजबूर होकर लोगों ने हथियार उठाए लेकिन वास्तविकता यह है कि नक्सली आंदोलन अपने रास्ते से भटक गया है।
इसका तात्कालिक कारण है कि न व्यवस्था सुधर रही है और न इसके सुधरने के संकेत हैं, इसलिए नक्सली आंदोलन बढ़ रहा है। इसमें होने वाली राजनीति को देखकर सोचना पड़ता है कि वर्ग संघर्ष बढ़ाने के पीछे राजनीति है या राजनीति के कारण वर्ग संघर्ष बढ़ा है।
कुछ समय पहले तक नक्सलवाद को सामाजिक-आर्थिक समस्या माना जाता रहा है, मगर अब इसने चरमपंथ की शक्ल अख्तियार कर ली है। नक्सलवाद का जन्म पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले में नेपाल की सीमा से लगे एक कस्बे नक्सलबाड़ी में गरीब किसानों की कुछ माँगों जैसे भूमि सुधार और बड़े खेतिहर किसानों के अत्याचार से मुक्त्ति को लेकर शुरू हुआ था।
वर्तमान में नक्सलियों के संगठन पीपुल्स वार ग्रुप और माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसी) दोनों मुख्यतः बिहार, झारखंड, उड़ीसा और छत्तीसगढ़ में सक्रिय हैं, जिनका शुमार पिछड़े व गरीब राज्यों में होता है। पीडब्लूजी का दक्षिणी राज्य आंध्र के पिछड़े क्षेत्रों में बहुत प्रभाव है।
नक्सलवादी नेताओं का हमेशा आरोप रहा है कि भारत में भूमि सुधार की रफ्तार बहुत सुस्त है। उन्होंने आँकड़े देकर बताया कि चीन में 45 प्रतिशत जमीनें छोटे किसानों में बाँटी गई हैं तो जापान में 33 प्रतिशत, लेकिन भारत में आजादी के बाद से तो केवल 2 प्रतिशत ही जमीन का आवंटन हुआ है।
एमसीसी और पीडब्लूजी संगठनों की हिंसक गतिविधियों के चलते इनसे प्रभावित कई राज्यों ने पहले ही प्रतिबंध लगा रखा है। इनमें बिहार और आंध्रप्रदेश प्रमुख हैं। इन राज्यों के खेतिहर मजदूरों के बीच इन चरम वामपंथी गुटों के लिए भारी समर्थन पाया जाता है। इस खेप में अब छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश भी आ चुके है। छत्तीसगढ़ का बस्तर जिला, जिसकी सीमाएँ आंध्रप्रदेश से लगी हुई हैं, में नक्सलवादी आंदोलन गहराई तक अपनी पैठ जमा चुका है।
प. बंगाल से शुरू हुआ नक्सलवाद अब उड़ीसा, महाराष्ट्र, झारखंड और कर्नाटक में भी पैर पसार चुका है। प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह भी इस पर अपनी चिंता जाहिर कर चुके हैं और इससे निपटने के लिए केन्द्र से हर सम्भव सहायता देने का वादा कर चुके हैं, पर अब तक सरकार की ढुलमुल नीतियों व केंद्र-राज्य में सामंजस्य न होने का फायदा उठाकर बीते सालों में नक्सलवादियों ने पुलिस और विशेष दल के जवानों पर घात लगाकर किए जाने वाले हमले एकाएक बढ़ा दिए हैं।

दुनिया के एकमात्र हिन्दू राष्ट्र को खत्म कर इस समय माओवादी तत्व भारत और नेपाल में अपने चरम पर हैं और चीन की तथाकथित 'शह' से भूटान और भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में सक्रिय उग्र संगठनों से हाथ मिलाकर नेपाल के पशुपतिनाथ से लेकर आंध्रप्रदेश के तिरुपति तक 'लाल गलियारा' (रेड कॉरिडोर) बनाने की जुगत में लगे हैं।
इनकी मंशा है कि दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों को भारत से अलग किया जा सके तथा पूर्वोत्तर राज्यों को भी भारत से अलग किया जा सके, ताकि माओवादी अपना शिकंजा इन राज्यों पर जमा उन्हें भी नेपाल की भाँति हड़प लें।

सोमवार, 5 अप्रैल 2010

यूँ रहें स्वस्थ

सॉफ्ट मैट्रेस से रहें सावधान!
क्या कहा, आपको नर्म गद्दे के बिना नींद नहीं आती है! यदि ऐसा है तो जरा केयरफुल हो जाएँ। बेशक नर्म गद्दे पर सोना हर किसी को भाता है पर नर्म गद्दे पर सोने का आराम हड्डियों की बीमारी को जन्म देता है, इसलिए सावधानी बरतना जरूरी है। डॉक्टरों की मानें तो नर्म गद्दे पर सोने की आदत आपकी कमर व रीढ़ की हड्डियों में गंभीर दर्द शुरू कर सकती है। इसके बाद आपको मजबूरन नर्म गद्दे से दूरी बनानी ही पड़ेगी।
हड्डियों की बीमारी बदलते मौसम में ज्यादा ही बढ़ जाती है जो आमतौर पर बुजुर्गों को काफी ज्यादा सताती है। हवा में बदलाव और रात के वक्त चलने वाली ठंडी हवाओं की वजह से हड्डियाँ सिकुड़ती हैं और उनमें दर्द शुरू हो जाता है। ऐसे में लोगों को हमेशा यह खयाल रखना चाहिए कि वह एकदम से गर्म कपड़ों से दूरी न बनाएँ, साथ ही सुबह-शाम वॉक भी करनी चाहिए।
हड्डी रोग विशेषज्ञों की मानें तो लोगों को अपने उठने-बैठने के तरीकों से लेकर सोने तक की मुद्रा पर विशेष ध्यान देना चाहिए क्योंकि रोज की इन गलत आदतों की वजह से हड्डियों में दर्द शुरू हो सकता है।
नोएडा सेक्टर-24 स्थित कर्मचारी राज्य बीमा अस्पताल के हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. संदीप पवार ने बताया कि आमतौर पर लोग नर्म गद्दे पर सोते हैं जो हड्डियों के लिए घातक हो सकते हैं क्योंकि नर्म गद्दे पर सोने पर गद्दे बीच में दब जाते हैं और शरीर सीधे रहने के बजाय टेढ़ा हो जाता है।
ऐसे में धीरे-धीरे कमर व रीढ़ की हड्डियों में दर्द शुरू हो जाता है। उन्होंने बताया कि लोगों को अपने खान-पान पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए क्योंकि वजन बढ़ जाने से शरीर का भार घुटने पर ज्यादा पड़ता है और लोग घुटने के दर्द से बेहाल हो जाते हैं।
साथ ही गर्भवती महिलाओं को भी इस बात का विशेष ख्याल रखना चाहिए कि उठने-बैठने और सोने के वक्त वह अपनी हड्डियों का खयाल रखें। डॉ. संदीप पवार ने बताया कि यदि लोगों को हड्डियों में थोड़ा दर्द हो तो उसे गर्म पानी से सेकना चाहिए और तुरंत डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए।
डॉक्टर की ओर से बताए गए व्यायाम को अवश्य करना चाहिए और मुमकिन हो तो हमेशा ही व्यायाम करते रहें, ताकि हड्डियों के दर्द से दूरी बनी रहे।

रोमांस

लव इज लाइफ
प्यार का हकीकत बन जिंदगी में रस घोलना केवल किस्मतवालों के साथ ही होता है। बहुत कम लोग ऐसे होते हैं, जो सही समय पर सही फैसला लेकर अपने प्यार को अपना लेते हैं वरना कई लोग तो बदनामी के डर से उसे बीच राह में ही छोड़कर किनारा कर लेते हैं।
कहते हैं जब प्यार हो ही गया है तो उसे जमाने से छिपाने से क्या फायदा? जमाने के डर से अगर आपने अपने प्यार का इजहार नहीं किया तो कहीं ऐसा न हो जाए कि आपका प्यार आपका इंजार करते-करते मायूस होकर अपना इरादा न बदल दे।
मुझसे शादी करोगे
शारीरिक आकर्षण में आकर लड़के-लड़कियाँ एक-दूसरे के साथ अतिशीघ्र संबंध तो बना लेते हैं किंतु उस आकर्षण के खत्म होते ही उतनी ही जल्दी संबंध विच्छेद भी कर लेते हैं। इस पर उनका तर्क होता है कि अब तुममें वो बात नहीं रही, जो पहले थी।
यदि आप प्यार करते हो, तो आपमें उस रिश्ते को जीवनभर निभाने की हिम्मत भी होनी चाहिए। आजकल के युवाओं का प्यार तो उस बदलते मौसम की तरह होता है, जो शादी की कोंपलों के खिलने से पूर्व ही अपनी तपिश का अहसास कराते हुए उन्हें जलाकर नष्ट कर देता है और अपना रुख पलट लेता है।
प्यार करने के बाद शादी की बात तो बहुत कम युवा करते हैं बाकी तो मौज-मस्ती करके भूल जाते हैं। यदि आपका साथी आपको अपनाने को राजी है तथा वो इस रिश्ते को शादी के पवित्र बंधन में बाँधना चाहता है तो इसमें हर्ज ही क्या है?
निभाना नहीं आसान
नासमझी में व लोगों की वाहवाही लूटने के लिए ऐसे प्रेमी जल्दबाजी में शादी तो कर लेते हैं परंतु जब मधुर दांपत्य जीवन की शीतल बयार में दुख के थपेड़े लगते हैं तब वे अपने फैसले पर पछताते हैं और इस सुंदर रिश्ते को प्यार, मोहब्बत से जीने के बजाय बोझ समझकर बेमन से ढोने लगते हैं। आखिर यह क्या है? आपने तो प्यार किया है। अपनी मर्जी से अपना जीवनसाथी चुना है फिर जीवन में इतनी असंतुष्टि क्यों?
आपका साथी भला-बुरा कैसा भी हो, यदि आपके प्यार में ताकत है तो वो उसको पूरी तरह से बदल देगा। याद रखें जीवन में सभी को सबकुछ मिल जाए यह संभव नहीं है। समझौता तो हर इंसान को करना पड़ता है और यदि थोड़ा सा समझौता व नम्रता आपके संबंधों को मधुर बनाता है तो उस समझौते में हर्ज ही क्या है?
प्‍यार में जरूरी है डि‍वोशन
प्यार क्या है? एक खूबसूरत एहसास जिसे डि‍फाइन करने के लिए लेखकों और कवियों ने शब्दों की कई नदियाँ बहाई हैं। फिर भी प्यार ऐसी खुशबू है, जो शब्दों के दायरे में नहीं बँधती। डेडि‍केशन, सेल्‍फलेसनेस, म्‍युचुअल अंडरस्‍टेन्‍डिंग और मन के तारों के जुड़ाव से पैदा होता अफेक्‍शन और डि‍वोशन। यही भाव असल में सच्‍चे प्यार को स्‍वयं से गूँथे रखता है। इसकी कि‍सी से तुलना नहीं।
प्यार यानी एक ही डायरेक्‍शन सोचना
सुमन की शादी तय हो चुकी थी। एक दिन बातों ही बातों में उसके भावी पति बोले, 'प्यार का अर्थ एक-दूसरे की ओर देखते रहना नहीं, बल्कि एक ही दिशा में देखना व सोचना है।' उनकी इस समझदारीभरी बात ने सुमन को अभिभूत कर दिया। सच ही तो है कि किसी भी विवाहित जोड़े को जब कई महत्वपूर्ण निर्णय लेने पड़ते हैं, तब उनके सोच की तारतम्यता उस निर्णय को आसान बना देती है। यह आपसी समझ ही दोनों को स्नेह के अटूट बंधन में बाँधती है।
सब ढूँढते हैं सच्चा प्यार
प्यार, जीवन की नाव को चलाने के लिए पतवार का काम करता है। यह सिर्फ कोरी भावनाओं पर नहीं टिकता, बल्कि समझदारी, ट्रस्‍ट और रि‍स्‍पेक्‍ट आधारित होता है। हम सब इसी सच्चे प्यार को अपने जीवन में खोजते हैं। प्रेम सिर्फ कल्पना, किताबों, उपन्यासों और फिल्मी पात्रों में सिमटी भावुकता नहीं है। प्रेम, इंसान के दिल की शुभ तरंगों से भरी वह अवस्था है, जब वह आंतरिक खुशी और प्रसन्नता से लबरेज हो जाता है।
पारखी बनें
हमारा प्यार हमारे पास ही होता है, लेकिन वह होता है फिल्मी अंदाज से बिलकुल जुदा। जब कोई पति अपनी बीमार पत्नी की देखभाल करता है, तब उसमें पत्नी के प्रति उसका प्यार ही छुपा होता है। वेलेन्टाइन-डे पर कार्ड, तोहफे और गुलाब भेंट कर देना ही प्यार नहीं है। प्यार तो परवाह, देखभाल, सहेजने और साथी का ध्यान रखने का नाम है। इसलिए जब साथी से यह देखभाल सहज ही मिल जाए तो उसे 'फॉर ग्रांटेड' न लें, उसके स्रोत को पहचानें।
लुक मैटर नहीं करता
मीनाक्षी एक बेहद खूबसूरत और पढ़ी-लिखी लड़की है। जब उसके लिए परेश के परिवार की ओर से विवाह प्रस्ताव आया तब उसने परेश की साँवली रंगत और सामान्य कद की वजह से उसे ठुकरा दिया। परेश की छवि उसके सपनों के राजकुमार से मेल जो नहीं खाती थी। मीनाक्षी की माँ अनुभवी थीं, उन्होंने दुनिया देखी थी। उन्होंने मीनाक्षी को समझाया, 'बेटा! रंग-रूप तो किसी के हाथों में नहीं होता। परेश एक गुणी लड़का है, नेक है। तू उसके गुण और काबिलियत देख।' मीनाक्षी ने माँ की बात पर गौर किया और परेश के साथ विवाह बंधन में बँध गई। कहना न होगा कि आज वह अपने जीवन से बहुत खुश और संतुष्ट है। सच्चे प्यार का अर्थ समझ चुकी है।
प्यार सबसे मीठा एहसास
सच्चा प्यार करने वाला और पाने वाला दोनों ही खुशनसीब होते हैं और आज के आपाधापी के दौर में खुशी का ठौर पा लेते हैं। प्यार की सौंधी खुशबू से जीवन की माटी महकने लगती है। तो हम भी अपने आसपास के रिश्तों में प्यार को तलाश लें। इसकी खुशबू अपने जीवन में बसाकर खुद भी महकें और अपने परिवेश को भी महकाएँ।
सुखी दांपत्य के मूलाधार
अधिकांश दंपति इस बात से सहमत होंगे कि सुखी वैवाहिक जीवन के लिए समय और शक्ति दोनों लगाने पड़ते हैं। वैवाहिक जीवन टेढ़ी खीर है, लेकिन सर्वाधिक सुखी दंपति अपने संबंधों के प्रति अलग नजरिया रखते हैं। आइए जानें कैसे-
* वैवाहिक जीवन बस यूँ ही सुखी नहीं हो जाता। एक-दूसरे की इच्छाओं को समझने और जानने के बाद उस अनुसार आचरण भी करना चाहिए। संबंध का अच्छा या बुरा होना इस बात पर निर्भर करता है कि दो लोग एक-दूसरे के प्रति अच्छे या बुरे समय में व्यवहार आखिर कैसा करते हैं?
प्रेम मिटता नहीं : अधिकांश दंपति मन ही मन डरते हैं कि उनके संबंध कहीं जड़ न हो जाएँ। याद रखें कि प्रेम कभी नहीं मरता वह विलुप्त अवश्य लग सकता है और वह भी इसलिए क्योंकि हम इस पर दूसरी भावनाओं का ग्रहण लग जाने देते हैं। वैवाहिक जीवन में गड़बड़ी होने पर दोनों साथियों को बचाव करना चाहिए। जिनके बीच अच्छे संबंध होते हैं वे इस बात को बखूबी समझते हैं कि तूफान के बाद सौहार्द भी लौट आएगा।
* अपने प्रति प्रेम का होना भी रिश्तों में जरूरी है। सबसे सुखी दंपति वे हैं जो अपने वैवाहिक संबंधों को अटूट बनाने के लिए अपने आप से प्रेम करते हैं। आपके संबंध कितने भी घनिष्ठ क्यों न हों? ये मत भूलिए की पहले आप एक व्यक्ति भी हैं।
* प्रेम किसी को बदलने का अधिकार नहीं देता लेकिन फिर भी हम मूर्खतावश इसी बात पर विश्वास करते हैं। हम अपने साथी की कमियों को दूर करने का प्रयास करने लगते हैं। चाहे इस प्रक्रिया में हम उसकी उन खूबियों को ही क्यों न कम कर दें, जिसके कारण वह हमें प्यारा है? सचमुच सुखी दंपति जानते हैं किसी व्यक्ति की बदलने की इच्छा उसके इसी बोध से जाग्रत होती है कि वह जैसा भी है उसी रूप में स्वीकार भी किया जाता है।
अंतर्यामी नहीं होते सहचर : प्रेम से जुड़ा एक भ्रम यह भी है कि हमारा साथी हमारे अंतर को, विचारों को और स्वप्नों को बखूबी समझता है। हमारा साथी जब इस स्थिति को नहीं समझ पाता है तो हमें दुःख व निराशा का अनुभव होता है। जो लोग यह मानते हैं कि उनका साथी उन्हें समझता या समझती है, वे यह जानते हैं कि अपने आप को समझाने, बताने का दायित्व भी स्वयं उन्हीं पर ही है।
अच्छे संबंध समयानुसार परिवर्तनशील : हममें से अधिकांश यह मानते हैं कि ठोस संबंध-सालों साल यथावत रहते हैं। सच तो ये है कि दांपत्य संबंध अनिवार्य रूप से बदलते हैं। परिवर्तनों का सामना कर वे ही संबंध बचे रहते हैं जो पहले ही इन परिवर्तनों को समझ कर इनका सामना सकारात्मक ढंग से करते हैं।
प्रेम दोष नहीं मढ़ता - विवाह उपरांत हम अक्सर अपने साथी पर दोषारोपण करते हैं कि मैं यदि दुखी हूँ तो सिर्फ तुम्हारे कारण। हमारे दुःखों की जड़ क्या है? ये ढूँढने से उत्तम अपने साथी के कामों में दोष ढूँढना है। जबकि विवाह पूर्व हम दोष अपने कर्मों पर थोपते हैं। अपने अच्छे-बुरे के लिए अपने आप को जितना अधिक उत्तरदायी समझेंगे उतने ही अधिक सुखी आप और आपका जीवन साथी होंगे।
प्रेम निस्वार्थ होता है : सहज निःस्वार्थ भाव ही प्रेम का सार होता है। सच्चे प्रेम का आग्रह है कि हम अपनी आवश्यकताओं की अपेक्षा अपने साथी की अपेक्षाएँ पूरी करें बशर्ते उनकी उचित सीमा हो। सबसे उत्तम साथी जीवन में शत-प्रतिशत देते हैं और बदले में शत-प्रतिशत पाते हैं। अंततः प्रेम का सबसे महत्वपूर्ण सूत्र यह है कि अपने और अपने साथी के प्रति केवल ऐसा व्यवहार करें जिससे आपको अपनी सुपात्रता और ईमानदारी का बोध हो। शादी जैसे मजबूत बंधन को बाँधने के लिए सिर्फ सात फेरे काफी नहीं, बल्कि जीवनपर्यंत मजबूत और ठोस विचारधारा की भी जरूरत है।

सानिया मिर्जा

शादी तो होकर रहेगी
भारतीय टेनिस परी सानिया मिर्जा और पाकिस्तानी क्रिकेटर शोएब मलिक ने आयशा सिद्दीकी के मलिक के साथ निकाह के सभी आरोपों का पूरी तरह खंडन करते हुए कहा कि वे दोनों 15 अप्रैल को विवाह के पवित्र बंधन में बँधने जा रहे हैं।
सानिया और शोएब ने मीडिया के हुजूम के अनगिनत सवालों का कभी मुस्कुराते हुए, कभी थोड़ी चिंता के साथ और कभी पूरी ढृढ़ता के साथ जवाब देते हुए कहा कि वे सारी सच्चाई जानते हैं और आयशा के आरोपों में कहीं कोई हकीकत नहीं है।
सानिया ने शोएब का पुरजोर समर्थन करते हुए कहा उन्होंने मुझे या मेरे परिवार को कभी अंधेरे में नहीं रखा। हम सारी सच्चाई जानते हैं और इस मामले में कानून अपना काम कर रहा है। हालाँकि इन बातों से मैं और मेरा परिवार तथा रिश्तेदार जरूर हताश हुए हैं लेकिन मुझे खुशी है कि मैं शोएब के साथ निकाह करने जा रही हूँ।
भारतीय टेनिस स्टार के साथ खडे शोएब ने भी अपनी होने वाली बेगम का समर्थन करते हुए कहा ‍क‍ि मैं यहाँ अपनी शादी के लिए आया हूँ और अब मेरी नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि मुझ पर जो आरोप लगाए जा रहे हैं मैं पहले उन सभी आरोपों से दोषमुक्त हो जाऊँ। मैं सानिया के साथ 15 अप्रैल को शादी करने जा रहा हूँ।
शोएब ने पूरी ढृढ़ता के साथ कहा मैंने कुछ भी गलत नहीं किया है। मैं शादीशुदा नहीं हूँ। आयशा ने आरोप लगाए हैं तो वह छुपकर क्यों बैठी हैं। वह बाहर आकर सारी हकीकत क्यों नहीं बयाँ करती। सानिया ने भी कहा मेरा और मेरे परिवार का शोएब में पूरा विश्वास है। आयशा ने जो आरोप लगाए हैं वे अभी तक साबित नहीं हुए हैं। पहले उन्हें अपने आरोप साबित तो कर लेने दीजिए।
शोएब ने कहा कि आयशा मेरी जिंदगी को तबाह करने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन मेरा खुदा जानता है कि मैं कितना पाक साफ हूँ। जब तक कुछ साबित नहीं हो जाता है़, तब तक कोई मुझे हाथ नहीं लगा सकता है। पूर्व पाकिस्तानी कप्तान ने कहा कि शिकायत उन्होंने की है तो जो कुछ भी साबित करना है वह आयशा को ही करना है। उसके बाद ही मैं कुछ कर सकूँगा, लेकिन यदि मामले में कुछ है ही नहीं तो मैं भी क्या करूँगा। पुलिस मामले की जाँच कर रही है। पुलिस ने मुझसे पूछताछ भी की है लेकिन इस मामले में जब कोई सच्चाई भी नहीं है तो वे भी क्या ढूँढ पाएँगे।
हैदराबाद आने का अपना कारण पूछने पर शोएब ने मुस्कुराते हुए कहा कि मैं हैदराबाद अपनी शादी के लिए आया हूँ। यह मेरी जिंदगी का सबसे अहम दिन साबित होने वाला है लेकिन अब मुझे इस मामले में अपना नाम पाक साफ करना है।
शोएब ने कहा कि आयशा जिस समय मुझसे शादी की बात का दावा कर रही हैं उस समय तो मेरी उम्र सिर्फ 18 साल थी। मैं सिर्फ माहा आपा से मिला था और आपा का मतलब बड़ी बहन होता है तो क्या आप चाहते हैं कि मैं बड़ी बहन को तलाक दूँ।
उन्होंने कहा कि मैं तो आयशा नाम की लड़की से कभी मिला तक नहीं हूँ, जिसकी तस्वीर दिखाई जा रही है उससे मेरा कभी आमना-सामना नहीं हुआ। मेरे पास भी कई फोटो है, जिन्हें मैं दिखा सकता हूँ लेकिन मैं सभी का सम्मान करता हूँ, इसलिए मैं ऐसा काम कभी नहीं कर सकता।
पाकिस्तानी क्रिकेटर ने बताया कि उनका परिवार इस निकाह के लिए यहाँ आ रहा है और इंशाअल्लाह यह शादी अपने तय समय पर पूरी होगी। शोएब ने भावुकता के साथ कहा कि आप सभी लोग आयशा के आँसू देख रहे हैं, मैं भी रो सकता हूँ। मेरी माँ दिल की मरीज हैं उन्हें भी इन सब बातों से सदमा लग सकता है लेकिन इन सब बातों पर ध्यान देने और हमारी बात सुनने के लिए कोई तैयार नहीं है।
सानिया ने साथ ही कहा कि एक भारतीय होने के नाते यह मेरी जिम्मेदारी बनती है कि हम पुलिस को अपना काम करने दें। पुलिस को जो तहकीकात करनी है उसे वह करेगी। मैं मीडिया से भी अपील करती हूँ कि वह इस पूरे मामले को ज्यादा तूल न देकर इसे अदालत पर छोड़ दे।
भारतीय टेनिस स्टार ने कहा कि यह सब कुछ जो हो रहा है वह निश्चित ही हमें चोट पहुँचाने वाला है लेकिन मुझे खुशी है कि मैं यहां शोएब के साथ खड़ी हूँ और सभी सवालों का सामना कर रही हूँ। आप समझ सकते हैं कि 10 दिन बाद मेरी शादी है और आज मैं किन हालातों से गुजर रही हूँ।
सानिया के अनुसार आयशा सिद्दीकी से हमारे पारिवारिक संबंध रहे हैं। मैंने जब आयशा को पहली पार टीवी पर देखा तो मैं स्तब्ध रह गई। एक तरह से मुझे शॉक पहुँचा। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि एक टीवी चैनल पर मुझे और शोएब को बालकनी में मोबाइल पर बात करते हुए दिखाया गया है। क्या जरूरी है कि मैं हर वक्त खुश ही नजर आऊँ? मैं तब काफी टैंस थी और शोएब भी तनाव में थे। सानिया ने स्वीकार किया कि विवाद के कारण मुझे दु:ख होता है।
शोएब ने कहा ‍कि मैं पुलिस और सरकार के साथ पूरा सहयोग कर रहा हूँ। मैं यह देश छोड़कर कहीं नहीं जा रहा हूँ और सभी सवालों के जवाब मैं तसल्ली से दूँगा। शोएब ने साथ ही आयशा सिद्दीकी परिवार की माफी माँगने की माँग को भी ठुकरा दिया। उन्होंने कहा कि मैं कैमरे के सामने खड़ा होकर बात कर रहा हूँ और वह कैमरे से दूर छुपकर बैठी हैं। मेरा माफी माँगने का तो कोई मतलब ही नहीं बनता। बेहतर यही होगा कि वह सामने आएँ और अपनी बात को साबित करें।
इस मुद्दे को अदालत के बाहर सुलझाने के सवाल को सिरे से खारिज करते हुए सानिया ने कहा कि जब कोई शादी ही नहीं हुई है तो तलाक की बात कहाँ से आती है और अदालत के बाहर समझौते का तो कोई मतलब ही नहीं है। शोएब ‍ने कहा कि मैं भारत में शादी करने आया हूँ और शादी करके ही जाऊँगा। जहाँ तक विवादों का सवाल है तो मैं कहना चाहता हूँ कि मेरा पासपोर्ट पुलिस के पास है और मुझे जल्दी हीवापस मिलने की उम्मीद है। मैं स्पष्ट कर दूँ कि मैं तब तक अपने देश नहीं जाऊँगा, जब तक कि यह विवाद खत्म नहीं हो जाता।
आयशा के कथित गर्भपात के बारे में पूछने पर शोएब ने साफ शब्दों में कहा कि पहले उन्हें अपनी बात अदालत में साबित करने दीजिए। सानिया ने भी कहा कि इस्लामिक कानूनों के अनुसार टेलीफोन पर शादी होने की कोई गुंजाइश नहीं है।
जब शोएब से यह पूछा गया कि क्या आपने आयशा सिद्दीकी से पीछा छुड़ाने के लिए एक बिलियन डॉलर की पेशकश की है? जवाब में शोएब के साथ-साथ सानिया भी इतनी बड़ी रकम सुनकर भौचक रह गई और उन्होंने कहा कि ऐसी कोई पेशकश नहीं की गई है।

रविवार, 4 अप्रैल 2010

सानिया मिर्जा

ज्यादा दिन नहीं टिकेगी सानिया-शोएब की शादी
पाकिस्तान के अधिकतर लोग मानते हैं कि सीमा पार विवाह से उनके देश और भारत के बीच खाई पाटने में मदद मिल सकती है लेकिन उनका मानना है कि सानिया मिर्जा और शोएब मलिक की शादी ज्यादा दिन तक नहीं टिकी रहेगी। साथ ही किसी अन्य देश में बसने की योजना से भी समस्या का हल नहीं निकलेगा।
पाकिस्तान के एलीट स्कूल की सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापिका आयशा अंसारी [बदला हुआ नाम] ने कहा, 'मुझे लगता है कि शोएब मलिक और सानिया मिर्जा की जोड़ी बेमेल है जिसमें सानिया बहुत अच्छी है। यह बुरा सौदा है।' अंसारी ने दावा किया कि ऐसा मानने वाली वह अकेली नहीं हैं। उन्होंने कहा, 'बहुत से पाकिस्तानियों का मानना है कि यह शादी ज्यादा दिन तक नहीं चलेगी। यह बहुत मुश्किल है।' अंसारी हालांकि भारत और पाकिस्तानियों के बीच वैवाहिक संबंधों की पक्षधर हैं। उन्होंने कहा, 'इस तरह की शादियां होनी चाहिए। यह दोनों देशों के लिए अच्छा है। इससे मिथक टूटेंगे, डर दूर होगा और लोग एक दूसरे के करीब आएंगे।'
अधिकतर पाकिस्तानी शादी का मामला काफी जटिल होता है। आईटी सेक्टर से जुड़ी सादिया खान ने कहा, 'आपसी आकर्षण, शादी अच्छी बात है लेकिन यदि शादी नहीं चल पाई तो क्या होगा।' अंसारी ने कई साल पहले भारत से यहां आकर पाकिस्तानी से शादी की थी। दुर्भाग्य से उनका दांपत्य जीवन अधिक दिन तक नहीं चल पाया। उनकी लड़की ने इसके बाद पाकिस्तानी की बजाय भारतीय से शादी करना उचित समझा। अंसारी को हालांकि कई साल पहले खास वीजा पर भारत में रहने की अनुमति मिल गई थी लेकिन वह पाक लौट आई और अब अपनी सारी जिंदगी पाकिस्तानी के तौर पर बिताना चाहती हैं। उन्होंने कहा, 'इस तरह की शादियों में कुछ भी गलत नहीं है। राजनीतिक स्थिति भले ही अलग है। वे उन लोगों को दोहरी नागरिकता क्यों नहीं दे देते जो शादी के लिए सीमा पार जाकर शादी करते हैं।' उन्होंने कहा, 'पाकिस्तान के मेरे कई विद्यार्थियों की शादी भी लंबे समय तक नहीं चली। इसलिए केवल भारत और पाकिस्तान के जोड़ों के बीच होने वाली शादी ही समस्या नहीं है। यह हर जगह जटिल मामला है।'
अंसारी का मानना है कि तीसरे देश का विकल्प यानी सानिया और शोएब के मामले में शादी के बाद दुबई में बसने के फैसले भी समस्या हल नहीं होगी। उन्होंने कहा, 'आप अपने परिवार से दूर चले जाते हो। मुझे नहीं लगता कि इससे काम बनेगा।' वर्तमान परिस्थितियों में अधिकतर पाकिस्तानियों का मानना है कि सानिया और शोएब का दांपत्य जीवन लंबे समय तक चलने की संभावना कम है। अंसारी ने कहा कि शोएब की आयशा सिद्दीकी के साथ कथित निकाह ने स्थिति और जटिल कर दी है।

शनिवार, 3 अप्रैल 2010

रोमांस

ये इश्क नहीं आसाँ..
'मुझे तो अब भी यकीन नहीं हो रहा यार कि राजेश ने सोनम के अलावा किसी और से शादी कर ली। आदमी इतना बदल कैसे जाता है?' सचिन के मुँह से यह वाक्य सुनकर अब तक चुपचाप बैठे मनीष ने कहा, 'हाँ यार, राजेश और सोनम को हम लोग दो जिस्म एक जान समझा करते थे। कॉलेज के दिनों में कैसे दोनों के चेहरे हमेशा फूल की तरह खिले रहते थे।
कॉलेज के लड़के-लड़कियाँ उनके प्रेम को अपना आदर्श मानते थे। मैंने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि राजेश सोनम के अलावा किसी और से शादी करने के बारे में सोच तक सकता है। 'सोनम और राजेश की यह कहानी अकेले उनकी ही नहीं है। कॉलेज जाने वाला हर लड़का और लड़की प्रेम के इस दरिया में डुबकियाँ लगाना चाहते हैं। यह बात अलग है कि ज्यादातर की परिणति वही होती है, जो राजेश और सोनम के प्यार की हुई। कॉलेज के संबंध बेवफाई की एक अंतहीन दास्ताँ है। यह कोई नया ट्रेंड भी नहीं है। हमेशा से ऐसा होता रहा है।
यह बात अलग है कि कॉलेज जाने वाला हर लड़का और लड़की प्रेम करना चाहते हैं, लेकिन कुछ ही किस्मत वाले होते हैं जो तमाम बाधाओं के बावजूद कॉलेज के दिनों के कसमें-वादों को उम्र भर हमसफर बनकर निभाते हैं। एक शायर ने भी कहा है-
'ये इश्क नहीं आसाँ इतना तो समझ लीजै,
एक आग का दरिया है और डूब के जाना है।'
ये दो पंक्तियाँ प्यार की कठिन डगर को बयान करने के लिए काफी हैं। फिर भी सब कुछ जानते हुए भी लड़के-लड़कियाँ इस दरिया में कूद ही जाते हैं।
समाज में लैला-मजनू के किस्से बेशक ध्यान से सुने जाते हों, लेकिन समाज को यह कतई मंजूर नहीं कि इस तरह की प्रेम कहानी उसका हिस्सा भी बने। फिर भी गली-मोहल्लों से लेकर कॉलेजों तक प्यार में दिल लूटने-लुटाने वालों की कमी नहीं रहती। हर लड़के-लड़की का ख्वाब होता है कि उसके सपनों का हमसफर उसे कहीं जिंदगी की राहों पर टकरा जाए।
इसी कामना के वशीभूत वे एक-दूसरे में अपने प्यार का प्रतिबिंब तलाशते हैं। जहाँ भी इस प्रतिबिंब की झलक दिखाई देती है, वहीं नजदीकियाँ बढ़ने लगती हैं। ये नजदीकियाँ प्यार में बदलती हैं, जिसकी परिणति अक्सर बेवफाई के रूप में सामने आती है।
वास्तव में देखा जाए तो प्यार की अग्निपरीक्षा शादी ही है। पर देखा गया है कि प्रेम की गाड़ी में सवार होकर चलने वाले इस अग्निपरीक्षा में अक्सर असफल हो जाते हैं। कॉलेज के प्रेम संबंधों का अक्सर दुखांत होता है। ऐसा आखिर क्यों है? यह सवाल प्रेम संबंधों के समाजशास्त्र में एक फाँस की तरह अटका हुआ है?
कॉलेज में जो लड़का-लड़की एक पल भी एक-दूसरे के बगैर चैन से नहीं रह पाते, कॉलेज छोड़ते ही अक्सर एक-दूसरे को यूँ भूल जाते हैं जैसे ट्रेन में सफर के यात्री अपने स्टेशन के प्लेटफार्म पर उतरते ही अजनबी हो जाते हैं। अगर किसी का प्यार किसी तरह से शादी की मंजिल तक पहुँचता भी है, तो देखने में आता है कि वह अक्सर टूट जाता है। आखिर ऐसा क्यों होता है?
वास्तव में इसकी प्रमुख वजह यही है कि ये रिश्ते केवल दिल की भावनाओं पर टिके होते हैं। भावनाएँ भी ऐसी, जो एक हल्की सी ठोकर में ही चकनाचूर हो जाएँ। अक्सर कहा जाता है कि भावनात्मक आदमी अपने जीवन में कभी खुश नहीं रह सकता। यह बात सोलह आने सच है। भावनाएँ सपनों की आधारशिला पर टिकी होती हैं।
दूसरी तरफ सपनों का वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं होता। जब एक लड़का और एक लड़की प्रेम के मोहपाश में बँधते हैं, तो उनकी दुनिया सिर्फ और सिर्फ अपने तक ही सीमित होकर रह जाती है। वे सुबह सोकर उठने से लेकर रात को सोने तक केवल एक-दूसरे के बारे में ही सोचते हैं। इतना ही नहीं, सोने से पूर्व भगवान से यह प्रार्थना करना नहीं भूलते कि रात को सपने में उसका प्रिय दिखाई दे।
प्यार को अगर नशा कहा गया है तो यह सही ही कहा गया है। जिस तरीके से नशेड़ी को दुनियादारी से कोई लेना-देना नहीं होता ठीक उसी तरह प्रेमी युगल का समाज के बंधनों अथवा रीति-रिवाजों से कोई सरोकार नहीं होता। यह प्यार सिर्फ 'टाइमपास' के लिए होता है। कॉलेज के दिनों में प्रेमी-प्रेमिकाओं की मुहब्बत मंजिल नहीं पाती अगर कोई जोड़ा शादी कर भी लेता है, तो ज्यादातर की शादी टूट जाती है क्योंकि शादी के बाद वे एक-दूसरे का वास्तविक स्वरूप देखते हैं, जो अक्सर कल्पनाओं से भिन्न होता है।
यही वह चीज होती है जो दोनों को अलगाव की नींव तक ले जाती है। जो लोग वास्तविकता से समझौता कर लेते हैं, वे तो सफल हो जाते हैं। जो सिर्फ अपनी कल्पनाओं को ही साकार देखना चाहते हैं, उनके बीच दूरियाँ बढ़ने लगती हैं। यही दूरी आखिर में दोनों को अलगाव की दहलीज तक खींचकर ले जाती है। यह अलगाव कई बार सामान्य अलगाव से अलग और उलझन भरा होता है। कहते हैं कि प्यार जब नफरत में बदल जाए तो वह ज्यादा खतरनाक होता है। यही वजह है कि जब दो प्रेमियों के बीच शादी के बाद अलगाव होता है तो उसकी प्रक्रिया काफी कष्टदायी होती है।
इस तरह के सैकड़ों उदाहरण हमारे सामने हैं। ये उदाहरण इस बात की पुष्टि करते हैं कि सपनों का टूटना आदमी को पागलपन की हद तक पहुँचा देता है। कॉलेज के ऐसे प्रेम-संबंध जो शादी की परिणति तक पहुँचते हैं, उनमे से नब्बे फीसदी अलगाव की भेंट चढ़ जाते हैं। यह सारा खेल सपनों के बनने एवं उनके टूटने पर टिका है। सच कहा जाए तो प्यार की दुनिया स्वप्निल दुनिया है। जब तक जमीनी सच्चाई से इसका मेल-मिलाप नहीं होता, तब तक इस दुनिया पर खतरे के बादल मँडराते रहते हैं।
शादी से पूर्व लड़की ख्वाब देखती है कि मेरा प्रेमी मुझे राजकुमारी की तरह रखेगा। लड़का सोचता है कि प्रेमिका मेरे सारे दुःखों को एक ही झटके में समाप्त कर देगी। लेकिन शादी के बाद ठीक इसके विपरीत होता है। इस विपरीत परिस्थिति से वे सामंजस्य नहीं बिठा पाते और गंभीर परिणाम भुगतते हैं। अतः कितना अच्छा हो कि यदि कल्पनाओं पर आधारित प्रेम को हकीकत की तराजू पर पहले ही तौलकर देख लिया जाए।

अनाम रिश्ता बेनाम उलझनें
हेलो दोस्तो! आपसे जुड़े ज्यादातर रिश्ते ऐसे होते हैं जिनको आप किसी न किसी नाम से पुकारते हैं। उन रिश्तों के बारे में सोचने की आपको जरूरत ही नहीं पड़ती है। उनके प्रति आपका फर्ज एवं अधिकार मानो जन्म से ही समझा दिया गया होता है इसीलिए बिना किसी विचार-विमर्श के सहजता से आप उसे निभाते चले जाते हैं। करीबी रिश्तेदार, दूर के रिश्तेदार इन सबकी भी एक श्रेणी बन जाती है। आप अपनी सुविधा और पसंद के अनुसार उनके साथ भी तालमेल बिठा लेते हैं।
इसी प्रकार दोस्तों की भी कई श्रेणियाँ होती हैं, वर्ग होते हैं। कुछ ऐसे होते हैं जिनसे आप हमेशा मिलते हैं पर उनसे आपका अपनापन नहीं होता है। कुछ ऐसे होते हैं जो आपका दुख-दर्द सुन तो लेते हैं पर उससे ज्यादा वे और कुछ नहीं करते। एक या दो दोस्त ऐसे होते हैं जिनसे आपकी महीनों बात नहीं होती पर मुसीबत में आप उन्हें फोन करते हैं और आपकी बातों और आवाज से उन्हें लगता है कि आपको उनकी हमदर्दी की जरूरत है। वह आपसे परेशानी पूछते हैं, आपको दिलासा देते हैं और उनसे कुछ बन पड़ता है तो वे आपके लिए करते भी हैं।पर, कई बार आप एक विचित्र से रिश्ते में पड़ जाते हैं। न तो उसका कोई नाम होता है और न ही आपको यह पता होता है कि आपका उस व्यक्ति पर कितना अधिकार है। इतना ही नहीं, आपका उस व्यक्ति के प्रति क्या कर्तव्य होना चाहिए यह भी आप नहीं समझ पाते हैं। कभी आप उससे हफ्तों नहीं मिलते और जब मिलते हैं तो खूब अधिकार से झगड़ा करते हैं। आपकी यही ख्वाहिश होती है कि आपको वह मनाए, आपकी सारी शिकायतों पर माफी माँगे, कान पकड़े और सारी गलतियों को सर आँखों पर ले।
उनसे फूलों का उपहार लेना और घंटों बैठकर गप्पें लगाना आदि आपको दिल व जान से प्यारा होता है। इन सबके बावजूद आप उस रिश्ते को वहीं तक ठहरा देते हैं, उसे कोई नाम नहीं देते और उसके स्थायित्व पर भी प्रश्नचिह्न लगा रहता है पर ऐसे रिश्ते में मुश्किल यह होती है कि दूसरा पक्ष अपने बारे में कोई निर्णय नहीं कर पाता है और वह अपने भविष्य के बारे में कोई फैसला नहीं ले पाता है। यह दुविधा उसकी परेशानी का सबब बनती है।
इसी कशमकश में आज घिर गए हैं अरुण आहूजा (बदला हुआ नाम)। अरुण की एक दोस्त हैं। दोनों बातचीत में बेहद करीबी महसूस करते हैं पर अरुण की दोस्त अपनी ओर से पहल नहीं करतीं। यदि अरुण एक या दो सप्ताह तक बात न करें तो वह खोज-खबर नहीं लेतीं लेकिन अरुण द्वारा संपर्क करने पर उनसे खूब लड़ती-झगड़ती हैं, शिकायतों की झड़ी लगा देती हैं।
यह कहते हुए कि तोहफों पर पैसे क्यों खर्च करते हो, फूल और अन्य उपहार से खुश भी हो जाती हैं। पर यह पूछने पर कि इस रिश्ते का भविष्य क्या है ? क्या हमेशा साथ रहने के बारे में सोचा जा सकता है? तो अरुण की दोस्त का जवाब होता है, 'अभी इस रिश्ते में प्यार शामिल नहीं हुआ है। हम केवल दोस्त हैं।' अरुण की परेशानी यह है कि वह इस रिश्ते को समझ नहीं पा रहे हैं। इस रिश्ते पर अपना कितना समय लगाएँ या समय देना उचित है या नहीं यह उन्हें समझ में नहीं आ रहा है।अरुण जी, आपकी दोस्त ने यूँ तो साफ लफ्जों में आपको कह दिया है कि वह केवल दोस्त हैं। प्यार उन्हें नहीं है इसलिए भविष्य के बारे में उनकी कोई योजना नहीं दिखती है फिर भी आप रिश्ते में जटिलता महसूस करते हैं। आप इसलिए परेशान हैं कि आप जो उनसे सुनना चाहते थे वह आप नहीं सुन पा रहे हैं। शायद आप अपनी दोस्त को प्यार करते हैं इसलिए उसको खुश करने का जतन करते हैं। यह बात तो साफ है कि आप दोस्त से ज्यादा उन्हें अपने जीवन में जगह देते हैं तभी उनका व्यवहार आपको विचलित किए रहता है।
आपकी दोस्त आपको प्यार नहीं करती बल्कि केवल दोस्त समझती है। यदि कहीं उनके भीतर प्यार की भावना है भी तो वह उसे अभी महसूस नहीं कर पा रही हैं। सच्चाई यह है कि उनकी नजर में आपके प्यार की कोई अहमियत नहीं है। आपको इस रिश्ते को केवल दोस्ती की श्रेणी में रखकर आगे बढ़ जाना चाहिए। साथ समय बिताना अच्छा लगता है तो समय बिताएँ पर उससे ज्यादा अपेक्षा न करें।
आप कुछ कदम ऐसा उठा सकते हैं जिससे आपकी दोस्त को इस रिश्ते को समझने में सहायता मिल सकती है। आपके प्रति उनके मन के भीतर क्या है वह समझ सकती है। आप उसे साफ तौर पर कह दें कि आप अपनी जीवनसाथी तलाश कर रहे हैं। यह बात आपकी ओर से गंभीरता से सामने आनी चाहिए। आप कोई तोहफा उन्हें अब नहीं दें। उन्हें संपर्क करने दें। एक माह तक संपर्क न करें।
यदि वह संपर्क नहीं करती हैं तो आप एक माह बाद यह बताएँ कि आप लंबे रिश्ते की तलाश में हैं इसीलिए समय नहीं मिला। जब उन्हें आपको खो देने का डर होगा तब वह गंभीरता से आपके बारे में विचार कर पाएँगी। रिश्ते को लेकर यह चिंतन व मंथन बेजा नहीं जाएगा। आप दोनों बेहतर तौर पर अपने भविष्य की योजना बना पाएँगे। इन सारी प्रक्रिया से गुजर कर आपकी दोस्ती भी अच्छी मजबूत हो जाएगी और भावनाओं के पैमाने का भी पता चल जाएगा।

खुशियों पर लगता ग्रहण...

पाकिस्तानी क्रिकेटर शोएब मलिक से निकाह के ऐलान के बाद उनके लगातार विवादों में घिरने से भारतीय टेनिस परी सानिया मिर्जा की रातों की नींद उड़ गई है। सानिया ने आज तड़के ट्विटर के जरिए कहा कि वे पूरी रात सो नहीं पाई हैं। शोएब का इस महीने सानिया मिर्जा के साथ विवाह होने जा रहा है।
नींद गायब हो गई-सानिया
पाकिस्तानी क्रिकेटर शोएब मलिक से निकाह के ऐलान के बाद उनके लगातार विवादों में घिरने से भारतीय टेनिस परी सानिया मिर्जा की रातों की नींद उड़ गई है।
सानिया ने आज तड़के ट्विटर के जरिए कहा कि वे पूरी रात सो नहीं पाई हैं। शोएब का इस महीने सानिया मिर्जा के साथ विवाह होने जा रहा है।
गौरतलब है कि सानिया के गृहनगर हैदराबाद की ही रहने वाली आयशा सिद्दिकी नाम की लड़की ने शोएब के साथ अपने निकाह का दावा किया है। उनके परिवार ने कल ही इस सिलसिले में निकाहनामे को मीडिया में जारी भी किया। इस बीच एक पाकिस्तानी चैनल ने शोएब की एक और गर्लफ्रेंड होने का खुलासा किया है।
30 मार्च के बाद आज पहली बार ट्विटर पर लौटीं सानिया ने कहा कि ऐसा केवल शादी के पहले की खुशी और उनके रिश्तदारों द्वारा की जा रही चर्चाओं के कारण नहीं है। उन्होंने कहा अभी उन्हें काफी कुछ करना है और अगले दिन फिर नए हालात का सामना करना है।
सानिया ने इससे घंटे भर पहले की ट्वीट में कहा यह कुछ ज्यादा ही हो रहा है। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मेरी मेंहदी के अलावा अपनी जिंदगी में मुझे किसी बात के लिए इतनी चिंता भी करना पड़ेगी। इन हालात पर हँसने के सिवाय मेरे पास कोई चारा नहीं है।
पाक व्यापारियों का डर : पाकिस्तानी व्यापारियों ने क्रिकेटर शोएब मलिक और भारतीय टेनिस स्टार सानिया मिर्जा की तस्वीरों वाली टीम शर्ट के पाँच लाख की राशि के ऑर्डर को इस डर से रद्द कर दिया कि कहीं विवादों के चलते उनकी शादी में देरी न हो जाए।
कराची ट्रेडर्स एक्शन कमेटी के अध्यक्ष सिद्दिकी मेमन ने चीन और थाईलैंड में इस तरह की टी-शर्ट का ऑर्डर दिया था, लेकिन उन्हें इस डर से यह रद्द करना पड़ा कहीं मलिक और आयशा सिद्दिकी के बीच कानूनी कार्रवाई से इस निकाह में देरी न हो जाए।

स्वास्थ्य-सौन्दर्य

पूरी होगी जवाँ दिखने की हसरत
महिलाओं को अगर ताउम्र जवान रहना है और अपनी खूबसूरती को बरकरार रखना है तो रोजाना कसरत करने में अपना वक्त गुजारें। एक ताजा अध्ययन के मुताबिक यदि महिलाएँ खुद को ग्लैमरस, जवाँ और सेहतमंद बनाए रखना चाहती हैं तो सुबह-शाम महज कुत्ते टहलाना या मॉल की सैर करना काफी नहीं।
अध्ययन के नतीजे के मुताबिक ताउम्र जवाँ दिखने की चाहत रखने वाली महिलाओं को हर रोज एक घंटे की कसरत जरूर करनी चाहिए। यह सलाह खासतौर पर वैसी महिलाओं के लिए है जिनका वजन तो ज्यादा है लेकिन बावजूद इसके वह डायटिंग नहीं कर रहीं।
अधेड़ उम्र में कदम रख चुकी ओवरवेट महिलाओं को अपनी पूरी डाइट तो लेने की सलाह दी गई है लेकिन इसके साथ-साथ उन्हें ज्यादा कसरत करने की भी नसीहत इस अध्ययन के नतीजे से मिली है। ताजा अध्ययन की समीक्षा करने वाले जॉन फोरिट ने कहा कि हम सब को इस पर काम करना होगा।
अध्ययन में कसरत के जिन तरीकों के सुझाव दिए गए हैं उनमें हलका वॉक करना, साइकिल चलाना और गोल्फ खेलना शामिल है।

मिर्च-मसाला

जल्दी ही सामने आएँगी ऐश्वर्या राय
सिल्वर स्क्रीन से इन दिनों ऐश्वर्या रायAishwarya Rai sensational picture gallery गायब हैं। लगभग दो वर्ष से उनकी कोई फिल्म रिलीज नहीं हुई हैं। अपनी पसंदीदा हीरोइन की फिल्मों का इंतजार करते-करते उनके फैंस थक गए हैं।
अपने फैंस की भावनाओं से ऐश्वर्या भी अनजान नहीं हैं। उनका कहना है फिल्म का रिलीज होना या न होना उनके हाथ में नहीं होता। कई बार ऐसा हो जाता है जब किसी कलाकार की लंबे समय तक कोई फिल्म रिलीज नहीं होती है और कई बार एक ही वर्ष में वह ढेर सारी फिल्मों में वह नजर आता है।
फिल्म ‘रावण’ ने ऐश का लंबा समय लिया। कई दुर्गम स्थानों पर इसे शू‍ट किया गया जिससे काम की रफ्तार धीमी हो गई, लेकिन ऐश को इससे शिकायत नहीं हैं। मणिरत्नम के साथ फिल्म करना उन्हें आनंददायी लगता है।
वैसे ऐश के प्रशंसकों को उनकी फिल्मों का ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ेगा। हो सकता है कि इसी वर्ष उनकी तीन फिल्में रिलीज हो जाए। सबसे पहले ‘रावण’ जुलाई में प्रदर्शित होगी। जिसमें उनके नायक हैं अभिषेक बच्चन।
अक्षय कुमार के साथ की गई फिल्म ‘एक्शन रिप्ले’ भी इसी वर्ष रिलीज होगी, जिसमें ऐश कॉमेडी करते हुए नजर आएँगी। संजय लीला भंसाली की ‘गुजारिश’ में ऐश्वर्या नर्स बनी हैं जो मरीज बने रितिक रोशन की देखभाल करती हैं।
ऐश का कहना है कि उनकी आने वाली फिल्मों में कोई समानताएँ नहीं हैं। न कहानी में और न ही रोल में। निश्चित रूप से यह बात उनके प्रशंसकों को अच्छी लगेगी।

आमिर पेश करेंगे ‘केबीसी’!
कौन बनेगा करोड़पति भारतीय टीवी ‍इतिहास के सफलतम कार्यक्रमों में से एक रहा है। अमिताभ बच्चन और शाहरुख जैसे सुपरस्टार्स ने इसे पेश किया है। लोगों ने लाखों रुपए इस कार्यक्रम के जरिये जीते।
अमिताभ केबीसी प्रथम और द्वितीय तथा शाहरुख खान ने इस कार्यक्रम का तीसरा भाग प्रस्तुत किया। अब केबीसी के चौथे भाग की बारी है। इसे कौन पेश करेगा? अमिताभ अपने स्वास्थ्‍य को देखते हुए पहले ही इस शो के लिए मना कर चुके हैं। इस कार्यक्रम की लगातार शूटिंग की जाती है, जो अमिताभ के लिए अब संभव नहीं है। शाहरुख खान अपना शौक पूरा कर चुके हैं।
इस शो को होस्ट करने के लिए अमिताभ और शाहरुख जैसी हस्ती के नाम पर विचार किया गया और आमिर खान का नाम सबसे पहले सामने आया। आमिर खान ठहरे परफेक्शनिस्ट। बहुत सोच-विचारकर ही वे हाँ बोलते हैं और हाँ बोलने के बाद डूबकर काम करते हैं।
सूत्रों का कहना है कि आमिर से बात चल रही है और आमिर ने अब तक कोई जवाब नहीं दिया है। वैसे ज्यादातर लोग चाहते हैं कि आमिर ही इस कार्यक्रम को पेश करें।

गिटार बजाना सीख रहे हैं रणबीर
रणबीर कपूर मानते हैं कि सफलता ने प्रशंसकों के प्रति उनकी जिम्मेदारी को और बढ़ा दिया है। फैंस की अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए रणबीर अब और मेहनत करने लगे हैं।
इम्तियाज अली की फिल्म ‘रॉकस्टार’ की शूटिंग अभी तो शुरू नहीं हुई है, लेकिन रणबीर ने अभी से मेहनत शुरू कर दी है। वे गिटार बजाना सीख रहे हैं ताकि सचमुच में रॉकस्टार नजर आएँ। अपने लुक पर भी उन्होंने ध्यान देना शुरू कर दिया है।
रणबीर का कहना है अब जमाना बदल गया है। दर्शक ज्यादा बारीकी से फिल्म देखने लगे हैं। विश्वसनीयता पैदा करने के लिए अब बहुत सारी चीजें सीखना पड़ती हैं।

क्रिकेट की आत्मा

खेल के दिल-दिमाग पर मुनाफे का भूत
आत्मा ही परमात्मा है और आत्मा के बिना शरीर का कोई महत्व नहीं हो सकता लेकिन धंधे, मुनाफे और मनोरंजन के चक्कर में क्रिकेट की आत्मा को पीट-पीट कर खत्म किया जा रहा है।
वास्तव में भूत का कोई अस्तित्व नहीं होता। बस, दिल-दिमाग को भ्रमित कर भटकाने की प्रक्रिया को भूत समझा-कहा जा सकता है। भटकाने वाला ऐसा ही भूत भारत में क्रिकेट के मठाधीशों के दिल-दिमाग पर चढ़ गया है और वे खेल को ही नहीं, पूरे देश को मायावी जाल में भटका रहे हैं।
भारत के खेल मंत्री मनोहरसिंह गिल कोई गँवार राजनेता नहीं हैं। वे जिंदगी भर प्रशासनिक अनुभव पाने के साथ निष्पक्ष निर्वाचन आयोग के कर्ता-धर्ता रहे हैं। केंद्र सरकार में उद्योग सचिव रहने के कारण वे धंधे का खेल भी अच्छी तरह समझते हैं।
सबसे बड़ी बात यह है कि वे स्वयं क्रिकेट के अच्छे खिलाड़ी रहे हैं और इस खेल के प्रति उनका कोई दुराग्रह नहीं हो सकता। इसलिए इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के संबंध में खुलकर की गई उनकी टिप्पणियों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए।
गिल साहब ने हाल ही में देश को समझाने की कोशिश की है कि आईपीएल तो बस धंधा है और भारत के लिए गौरवशाली खेल माने जाने वाले क्रिकेट की असली गरिमा और परंपरा से इसका कोई लेना-देना नहीं है। यह तमाशा क्रिकेट की आत्मा को नुकसान पहुँचा रहा है।
क्रिकेट को केवल मनोरंजन और धंधे की तरह इस्तेमाल किए जाने ने गेंदबाजों और बल्लेबाजों का संतुलन ही बिगाड़ दिया है। धंधा करने वाले डेढ़ घंटे के 20 ओवरों को कभी 5 या कभी 1 ओवर तक सीमित कर क्रिकेट का सत्यानाश ही कर देंगे।
निश्चित रूप से भारत में क्रिकेट का गौरवशाली इतिहास रहा है। श्रेष्ठतम खिलाड़ियों के बल पर भारत ने दुनिया के दिग्गज ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, दक्षिण अफ्रीका के छक्के छुड़ा दिए हैं। महानगरों से सुदूर गाँवों तक क्रिकेट खेल के रूप में बेहद लोकप्रिय हुआ है।
पिछले 40 वर्षों की प्रिंट पत्रकारिता के इतिहास में भी क्रिकेट विशेषांक सबसे अधिक बिके और पढ़े गए। पत्र-पत्रिकाओं ने क्रिकेट को प्रतिष्ठित किया। इलेक्ट्रॉनिक संचार माध्यमों की क्रांति के बाद पिछले वर्षों के दौरान टीवी के समाचार चैनलों ने इसकी लोकप्रियता बढ़ाई।
फिर टीवी के खेल चैनलों की चमक में बढ़ोतरी हुई। उदार अर्थव्यवस्था ने विदेशी कंपनियों को भी क्रिकेट से लाभ कमाने के अच्छे अवसर दे दिए। दूसरी तरफ भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड का कारोबार बढ़ने के साथ चालाक राजनीतिज्ञों और धंधेबाजों ने क्रिकेट में जमकर घोटाले किए। घोटाले करने वालों के बीच घमासान जारी रहा और कुछ चतुर धंधेबाजों ने आईपीएल का नया जाल बिछा दिया। उन्हें खेल से नहीं, मनोरंजन के धंधे से अरबों रुपयों के मुनाफे की चिंता है।
देश के भोले-भाले लोगों को संभवतः पता ही नहीं होगा कि आईपीएल उद्योग का कारोबार लगभग 1800 अरब रुपयों का है। अकेले सोनी टीवी ने एक सीजन में आईपीएल मैचों के साथ विज्ञापन के जरिए करीब 700 करोड़ रुपए कमाए।
मैदान में गेंद उछलने या बल्ला उठाने के 10 सेकंड के दृश्य पर 5 लाख रुपए की कमाई। दुनिया का कोई उद्योगपति किसी भी उद्योग-धंधे से कुछ सेकंड और मिनटों में इस गति से कमाई नहीं कर सकता है।
मैदान में आईपीएल का एक मैच देखने आने वाले दर्शकों से आयोजक अभी 15 से 20 करोड़ रुपए कमा लेते हैं और उम्मीद है कि यह राशि जल्द ही 40 करोड़ रुपए हो जाएगी। मैच के प्रायोजक 17 से 20 करोड़ रुपए लगा देते हैं। सिनेमा हॉल में मैच दिखाने से आईपीएल का आयोजक 330 करोड़ रुपए कमाएगा। इंटरनेट पर खेल की प्रस्तुति पर लगभग 315 करोड़ रुपए की आमदनी करेगा।
सिने अवॉर्ड की तरह आईपीएल अवॉर्ड, रॉक स्टार जैसे प्रदर्शनों से 100 करोड़ रुपए की कमाई होगी। यही कारण है कि उद्योगपति, व्यापारी, फिल्मी सितारे आईपीएल के कारोबार में अग्रणी हो गए हैं।
यह ग्लैमर का बड़ा तड़का है। फिल्मी अभिनेता-अभिनेत्री महीनों अभिनय करके एक फिल्म से पूरे साल में 10 से 15 करोड़ रुपए कमा सकते हैं, लेकिन आईपीएल मैच से तो साल में दो-तीन सौ करोड़ रुपए कमाने की गुंजाइश बन गई है।
खुद को न नाचना है, न गाना है और न ही पसीना बहाना है। किराए पर लिए गए क्रिकेट खिलाड़ियों से मैदान में बस शो करवाते हुए तालियाँ बजाकर पार्टियाँ करना है।
क्रिकेट के अंतरराष्ट्रीय नियम-कानून और खेल के अपने मानदंड रहे हैं। लेकिन भारतीय ठेकेदारों ने सबको ताक पर रखकर तोड़े-मरोड़े अपने नियम तय कर दिए हैं। मैदान की बाउंड्री लाइन तक छोटी कर दी है। मंगूस बल्ले का प्रचलन चला दिया है।

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

गीत-गंगा

न जाने कौन ये आवाज देता है...
देखा जाए तो सी. अर्जुन मात्र इस एक गीत के कारण कालजयी माने जा सकते हैं, जिसका मुखड़ा हमने इस आलेख के शीर्षक के रूप में दिया है। ऐसा बहुत कम होता है कि किसी गीत में काव्यात्मक गुणवत्ता, धुन की मिठास और विलक्षणता, संगीत की उदात्त योजना और गायन की खपसूरती सभी कुछ अव्वल दर्जे का हो। इस गीत में इंदीवर की कलम जो चमत्कार करती है। वैसा ही चमत्कार अर्जुन की धुन और आशा का गायन भी करते हैं। सब तरफ से पुष्ट, परिपूर्ण और अनोखेपन की हद को छूता गीत है यह!

नैनों में प्यार डोले दिल का करार डोले.....
पानी से बहते कोमल फ्लो में जब लता 'पिया' शब्द को उठाती हैं तो मन एक साथ बीजगुप्त और देवदास हो जाता है। समझ नहीं आता, लता को प्यार किया जाए या उस पात्र को जिसे लता गढ़ती हैं। इस गीत ने परदे पर नलिनी जयवंत के सौंदर्य को भी सात्विक बना दिया था और हमारी कामुकता पर गंगाजल से गीली दस्ती फेर दी थी। लता की यही देन है देश को, कि उन्होंने अपने गायन द्वारा पावनता का माहौल गढ़ा। यह दिव्य शुचिता न आशा में आई, न गीता में और न लता की सीनियर नूरजहाँ में! लता के गीत नारीदेह बन जाते!

चाँद आहें भरेगा फूल दिल थाम लेंगे...
मुकेश की गंभीर, दानेदार और निर्मल आवाज वीराने में, झुलसे फूलों की लड़ी, खड़ी करती जाती है, जबकि गीत का अर्थ और धुन हर्ष की माँग करते हैं। यानी इस 'अदरवाइज रोमांटिक' गीत में मुकेश की टीसभरी गायिकी प्रफुल्लता के बजाय उदासी का माहौल गढ़ती है। ...और ऐसा इसलिए कि अलभ्य और अनुपम सौंदर्य (किसी नारी का) तटस्थीभूत प्रेमी में खुशी के बजाय सहर्ष स्वीकारी हुई वेदना को ही सघन करता है।

होऽऽऽ धन्नो की आँखों में, हाँ, रात का सुरमा...
'धन्नो की आँखों में' गीत फिल्म 'किताब' का है। 'किताब' सन्‌ 78 की फिल्म है। इस गीत की धुन और वाद्य संगीत इतना अनोखा, कल्पनाप्रधान और दिल को छू जाने वाला है कि... आप इस अहसास से गुजरते हैं... कि न ऐसी धुन पहले कभी सुनी और न ऐसा विचित्र गीत पहले कभी पढ़ा। 'विलक्षण'- बस एक यही शब्द कहा जा सकता है इस गीत के सभी पहलुओं के बारे में। ...गीत को स्वयं इसके संगीतकार आर.डी. बर्मन ने गाया है। धुन और गायन दोनों में फेंटसी का टच है। एक अजीब ढंग से गाया गया यह गीत... किसी अन्य लोक में खड़े ऐसे बूढ़े का अहसास कराता है... जो, पहाड़ की चोटी पर खड़ा होकर, चर्खी (मेले वगैरह में खिलौने वालों के पास मिलने वाला बच्चों का एक खिलौना, जिसे गोल-गोल घुमाने पर मिट्ठू के चीखने जैसी आवाज आती है) घुमाते हुए, रहस्य पुरुष की तरह, यह गीत गा रहा है और अदृश्य बालक उसकी गोद में है।

मिर्च-मसाला

राखी-इश्क ने सेंसर के खिलाफ लड़ाई जीती
आखिरकार राखी सावंत और इश्क बैक्टर सेंसर के खिलाफ लड़ाई जीतने में सफल रहे। यह झगड़ा उस समय खत्म हुआ जब सेंसर की रिवाइजिंग कमेटी ने उनके म्यूजिक वीडियो ‘भूत’ में आए ‘कमीने’ शब्द पर से बैन हटा लिया। यह ‘झगड़े’ नामक एलबम का गाना है।
गौरतलब है कि बोर्ड ने ‘कमीने’ शब्द को इस म्यूजिक वीडियो में से हटाने के लिए कहा था और इसके खिलाफ इश्क और राखी ने लड़ाई लड़ी।
बैन हटने के बावजूद इश्क का गुस्सा ठंडा नहीं हुआ। उबलते हुए वे कहते हैं ‘सेंसर बोर्ड में सनकी और पुरानी सोच वाले लोग बैठे हुए हैं। वे ‘कमीने’ नामक पूरी फिल्म पास कर सकते हैं। ऐसे लाखों संवाद पास कर देते हैं जिनमें ‘कमीने’ शब्द आया है, लेकिन मेरे गीत में आए 'कमीने' शब्द पर उन्होंने पाबंदी लगा दी थी।
शाहिद से लंबी सोनम
कई नामों पर विचार करने के बाद पंकज कपूर ने अपनी फिल्म ‘मौसम’ के लिए सोनम कपूर को चुना। वे उनके बेटे शाहिद की हीरोइन बनेंगी। लेकिन पिछले दिनों एक ऐसी बात सामने आई, जिसके बारे में किसी ने सोचा भी नहीं था।
‘मौसम’ की यूनिट इस बात पर हैरान रह गई कि सोनम कपूर की ऊँचाई शाहिद कपूर से ज्यादा है। लेकिन इससे फिल्म पर कोई असर नहीं पड़ेगा। शूटिंग इस तरह से की जाएगी कि फिल्म में यह बात दर्शक पकड़ नहीं पाएँगे। लेकिन यूनिट के लोगों को शाहिद को चिढ़ाने का एक कारण मिल गया है।
‘मौसम’ एक रोमांटिक फिल्म है और इसमें सोनम कश्मीरी लड़की का रोल निभाएँगी। इस फिल्म की शूटिंग जल्दी ही आरंभ होने वाली है।

जब चौंक पड़ी नीतू
’अपार्टमेंट’ के एक सीन में नीतू को बेडरुम की लाइट चालू कर चौंकना था। निर्देशक जगमोहन मूँदड़ा ने नीतू को सच में चौंकाने का फैसला किया। नीतू ने स्विच दबाया और सचमुच में चौंक पड़ीं क्योंकि सामने उनकी माँ खड़ी थीं। नीतू की माँ मुंबई में नहीं रहती हैं और उन्हें पता भी नहीं था कि कब वे हाँ आ गईं। यह मूँदड़ा का प्लान था और उन्हें नीतू का स्वाभाविक शॉट मिल गया।
ट्रैफिक सिग्नल, 13 बी और रण जैसी फिल्म कर चुकीं नीतू फिल्म ‘अपार्टमेंट’ को लेकर काफी आशान्वित हैं। इस फिल्म में वे ऐसी लड़की की भूमिका निभा रही हैं जो मानसिक रूप से परेशान है। वह मुंबई जैसे बड़े शहर से तालमेल बैठाने की कोशिश करती है।
नीतू का कहना है कि उन्होंने इस रोल के लिए काफी मेहनत की है और आवश्यक तैयारी कैमरे के सामने आने के पहले की। उन्हें यह कैरेक्टर अपने जैसे लगता है क्योंकि वे भी पटना से मुंबई आईं और इस शहर को उन्होंने नजदीक से जाना।

अप्रैल माह के त्योहार

1 अप्रैल मूर्ख दि. प्रथम वैशाख कृष्ण तृतीया (3)
2 अप्रैल संकष्टी गणेश चतुर्थी (चंद्रो.रा. 9.53) गुड फ्रायडे प्रथम वैशाख कृष्ण चतुर्थी (4)
3 अप्रैल प्रथम वैशाख कृष्ण पंचमी (5)
4 अप्रैल ईस्टर संडे प्रथम वैशाख कृष्ण षष्ठी (6)
5 अप्रैल प्रथम वैशाख कृष्ण सप्तमी (7)
6 अप्रैल प्रथम वैशाख कृष्ण अष्टमी (8)
7 अप्रैल विश्‍व स्वास्थ्य दि. प्रथम वैशाख कृष्ण नवमी (9)
8 अप्रैल प्रथम वैशाख कृष्ण नवमी (9)
9 अप्रैल पंचक प्रारंभ (शाम 07.09) प्रथम वैशाख कृष्ण दशमी (10)
10 अप्रैल वरुथिनी एकादशी वल्लभाचार्य ज. प्रथम वैशाख कृष्ण एकादशी (11)
11 अप्रैल प्रदोष व्रत संत सेन ज. प्रथम वैशाख कृष्ण द्वादशी (12)
12 अप्रैल शिव चतुर्दशी प्रथम वैशाख कृष्ण त्रयोदशी (13)
13 अप्रैल जलियाँवाला बाग दि. प्रथम वैशाख कृष्ण चतुर्दशी (14)
14 अप्रैल वैशाखी पर्व, अमावस्या, पंचक, खरमास समाप्त (दिन 4.53) आम्बेडकर ज., अग्नि शामक दि. प्रथम वैशाख कृष्ण अमावस्या (15)
15 अप्रैल चंद्रदर्शन, सौर मास वैशाख प्रा. पुरुषोत्तम मास प्रा. प्रथम वैशाख शुक्ल एकम (1)
16 अप्रैल प्रथम वैशाख शुक्ल द्वितीया (2)
17 अप्रैल डॉ. राधाकृष्णन दि. प्रथम वैशाख शुक्ल तृतीया (3)
18 अप्रैल विनायकी चतुर्थी (चं.अ.रा.11.22) तात्या टोपे दि. प्रथम वैशाख शुक्ल चतुर्थी (4)
19 अप्रैल प्रथम वैशाख शुक्ल पंचमी (5)
20 अप्रैल प्रथम वैशाख शुक्ल षष्ठी (6)
21 अप्रैल प्रथम वैशाख शुक्ल सप्तमी (7)
22 अप्रैल पुष्य नक्षत्र प्रथम वैशाख शुक्ल अष्टमी (8)
23 अप्रैल प्रथम वैशाख शुक्ल नवमी-दशमी (9-10)
24 अप्रैल पुरुषोत्तमी एकादशी प्रथम वैशाख शुक्ल एकादशी (11)
25 अप्रैल पुरुषोत्तमी एकादशी प्रथम वैशाख शुक्ल द्वादशी (12)
26 अप्रैल प्रदोष व्रत प्रथम वैशाख शुक्ल त्रयोदशी (13)
27 अप्रैल प्रथम वैशाख शुक्ल चतुर्दशी (14)
28 अप्रैल पूर्णिमा व्रत प्रथम वैशाख शुक्ल पूर्णिमा (15)
29 अप्रैल द्वितीय वैशाख कृष्ण एकम (1)
30 अप्रैल द्वितीय वैशाख कृष्ण द्वितीया (2)

लता मंगेशकर

भारत को दुनिया ने देर से पहचाना-लता
‘भारत रत्न’ स्वर सम्राज्ञी लता मंगेशकर मानती हैं कि अच्छे काम की तुलना पुरस्कारों से नहीं की जा सकती, लेकिन उनका कहना है कि एआर रहमान ने ऑस्कर के बाद ग्रैमी पुरस्कार हासिल कर भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफलता दिलाई है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय संगीत को मिल रही सफलता के बारे में लता ने मुंबई से कहा रहमान ने निश्चित तौर पर भारत को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुँचाया है। बहुत खुशी होती है, जब कोई भारतीय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाता है। वे मानती हैं कि देश में प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय संगीत को सफलता काफी देर से मिली।
रहमान को 52वें ग्रेमी अवॉर्ड में ‘स्लमडॉग’ के संगीत से ‘बेस्ट कंपाइलेशन साउंड ट्रैक फॉर मोशन पिक्चर’ और ‘बेस्ट मोशन पिक्चर सॉन्ग’..‘जय हो’ के लिए दो ट्रॉफियों से नवाजा गया है। पिछले साल रहमान ने बाफ्टा में ‘गोल्डन ग्लोब’ और ऑस्कर में दो पुरस्कार हासिल किए थे।
पुरस्कार से ज्यादा मन की संतुष्टि जरूरी : लता ने कहा भारतीय संगीत को पहले ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा जाना चाहिए था। भारतीय संगीत की व्यापकता को देखते हुए इसे काफी देर से पुरस्कार से नवाजा गया। हालाँकि वे पुरस्कारों के बजाय काम के प्रति संतुष्टि और अच्छा काम करने को तवज्जो देती हैं।
यह पूछे जाने पर कि भारत की स्वर सम्राज्ञी के तौर पर अंतरराष्ट्रीय अवॉर्ड ‘आस्कर’ और ‘ग्रैमी’ को वे कितनी अहमियत देती हैं, उन्होंने कहा मैं बढ़िया काम करने और अपनी खुशी के लिए काम करने में विश्वास रखती हूँ। अगर खुद को काम में मजा आ रहा है और संतुष्टि हो रही है तो इससे बढ़िया उपलब्धि या अवॉर्ड कुछ नहीं हो सकता। इससे आत्मा को शांति मिलती है।
वे मानती हैं कि भारत में कई बेहतरीन पुरस्कार हैं, जो काफी प्रतिष्ठित हैं इसलिए अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय पुरस्कार की अहमियत में कोई फर्क नहीं है।
उन्होंने कहा अगर अच्छा काम करते रहोगे तो पुरस्कार भी अपने आप मिलेंगे। लेकिन पुरस्कार से अच्छे काम की काबिलियत को नहीं तोला जा सकता। भारत में भी काफी प्रतिष्ठित पुरस्कार मौजूद हैं।
गानों में आया पीढ़ियों का फर्क : आधुनिक और पुराने दौर के गानों में लता हालाँकि काफी अंतर मानती हैं, लेकिन उन्हें लगता है कि पीढ़ियों के फर्क को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने हँसते हुए कहा हमारे जमाने में गाने का अर्थ हुआ करता था, लेकिन आजकल के गानों में यह बात आना जरूरी नहीं है।
मुझे हालाँकि आजकल का संगीत भी पसंद आता है, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि पुराने या फिर आप कहें हमारे जमाने का संगीत अब भी इतने समय बाद भी वैसी ही मिठास लिए हुए है।
लता ने 20 से ज्यादा भाषाओं में फिल्मी और गैरफिल्मी गीत गाए हैं। वे 30,000 से ज्यादा गाने गा चुकी हैं और अब भी उनके अंदर गाने को लेकर वैसा ही उत्साह भरा हुआ है लेकिन अब उन्होंने गाना पहले की बजाय कम कर दिया है।
संगीत ही जीवन है : उन्होंने कहा मैं मानती हूँ कि काम ही जीवन है, लेकिन मेरे लिए संगीत ही जीवन है। मैंने हालाँकि गाने गाना कम कर दिया है, पहले की तरह व्यस्त नहीं रहती, लेकिन मैं कभी भी संगीत से दूर नहीं रह सकती और मैं काम को ही जीवन मानती हूँ।

वामा

सुख-दुख दोनों है खास
बादशाह अकबर के दरबार के नवरत्नों में बीरबल का अलग स्थान था। बादशाह कैसा भी प्रश्न पूछते, बीरबल सही व सटीक उत्तर देकर उनकी जिज्ञासा शांत कर देते। एक बार उन्होंने कहा, कुछ ऐसा लिखो जिससे खुशी के वक्त पढ़ें तो गम याद आ जाए और गम के वक्त पढ़ें तो खुशी के पल याद आएँ। बीरबल ने कुछ देर सोचा, फिर कागज पर यह वाक्य लिखकर बादशाह को दिया- यह वक्त गुजर जाएगा। सच! इन चार शब्दों के वाक्य में जीवन की कितनी बड़ी सच्चाई छुपी है।
सभी जानते हैं कि सुख-दुख जीवन के दो पहलू हैं जिनका क्रमानुसार आना-जाना लगा ही रहता है। किंतु हम सब कुछ जानते-समझते हुए भी दोनों ही वक्त अपनी भावनाओं-संवेदनाओं पर नियंत्रण नहीं रख पाते। जब खुशियों के पल हमारी झोली में होते हैं तो उस समय हम स्वयं में ही इतने मग्न हो जाते हैं कि क्या अच्छा क्या बुरा, इस पर कभी विचार नहीं करते हैं।
अपनी किस्मत व भाग्य पर इठलाते हुए अन्य की तुलना में श्रेष्ठ समझते हैं और अहंकारवश कुछ ऐसे कार्य तक कर देते हैं जिनसे स्वयं का हित और दूसरे का अहित हो सकता है। इस क्षणिक सुख को स्थायी मानते हुए ही जीने लगते हैं और वास्तव में यही सोच अपना लेते हैं कि अब हमें क्या चाहिए, सब कुछ तो मिल गया। बस! एक इसी भ्रांति के कारण स्वयं को उतने योग्य व सफल साबित नहीं कर पाते जितना कि कर सकते थे।
इसी तरह दुःखद घड़ी में भी अपना आपा खो बेसुध होकर सब भूल जाते हैं। छोटे-से छोटे दुःख तक में धैर्य-संयम नहीं रख पाते। बुद्धि-विवेक व आत्मबल होने के बावजूद स्वयं को इतना दयनीय, असहाय व बेचारा महसूस करते हैं कि आत्मसम्मान, स्वाभिमान तक से समझौता कर लेते हैं। यही कारण है कि सब कुछ होते हुए भी उम्रभर अयोग्य-असफल होने लगते हैं।
कहने का सार यह है कि जो भी छोटी-सी जिंदगी हमें मिली है उसमें सुख व दुख दोनों ही से हमारा वास्ता होगा, यही शाश्वत सत्य है। इस सच को हम जितनी जल्दी स्वीकार कर लेंगे उतना ही हमारे लिए अच्छा रहेगा, क्योंकि फिर ऐसा समय आने पर हम अपने संवेगों पर काबू कर उन्हें स्थिर रख सकेंगे।
ये हैं ...अघोषित सेलिब्रिटीज
यह आलेख समर्पित हैं उन महिलाओं को जो कोई सेलेब्रिटी या सार्वजनिक क्षेत्रों की नामी महिला नहीं हैं। न ही अपने क्षेत्र-विशेष से बाहर उन्हें कोई जानता है। किंतु अपने जैसे परिवेश में रहने वाली महिलाओं के लिए वे किसी रोल मॉडल से कम भी नहीं, जिन सितारा महिलाओं के फोटो और उपलब्धियों से सामान्यतः अखबार के पन्नो भरे रहते हैं, टीवी चैनल पर जो जगमगाती हैं उनसे उन्नीस नहीं हैं ये ग्रामीण 'रोल मॉडल'।
गरीबी और पुरातनवादी, मानसिकता में गले-गले तक धँसी महिलाओं के लिए ये 'रोल मॉडल' यथार्थ के अधिक निकट हैं, क्योंकि इनका निजी जीवन भी संघर्षों, काँटों से भरा हुआ रहा है। बड़े आश्चर्य की बात है कि अभावों एवं विपरीत परिस्थितियों से जूझकर आगे बढ़ने वाली इन महिलाओं की व्यक्तिगत उपलब्धियाँ, जो समाज के लिए अनुकरणीय हैं व क्रांतिकारी हैं, किसी महिला संगठन, मंच या स्त्री-जगत के पैरोकारों को नजर नहीं आती?
महिला दिवस पर इस बार भी जगह-जगह सम्मान समारोह हुए, कार्यशालाएँ आयोजित हुईं। इन कार्यक्रमों में लगभग वे ही महिलाएँ सहभागिता करतीं व सम्मानित होती नजर आईं जो उच्च शिक्षित तबके से होने के साथ ही ठोस आर्थिक पृष्ठभूमि से संबंधित थीं। किसी एक-आध कार्यक्रम में ही ऐसी महिलाएँ दिखाई दीं, जो कठोर परिस्थितियों, आर्थिक अभावों व कुरीतियों की जंजीरें तोड़कर आगे बढ़ी हों।
बाकी तो सम्मान देने वाली व सम्मानित होने वाली ज्यादातर महिलाएँ या तो क्षेत्रीय नेताओं की पत्नियाँ या रिश्तेदार थीं या किसी उच्चाधिकारी की या फिर प्रतिष्ठित व्यापारी की पत्नी या रिश्तेदार। आश्चर्य की बात तो यह है कि सम्मान देने या लेने वाली उक्त कई महिलाएँ स्वयं भी अनेक कुरीतियों, रूढ़ियों व अंधविश्वासों से घिरी होने व घरेलू हिंसा की कम जानकारी रखने के बावजूद महिला-संगठनों की अग्रणी मानी जाती हैं। तो क्या ये सब ही आम महिलाओं के उत्थान व सशक्तीकरण के प्रयोजन हेतु वास्तविक प्रयास हैं?
यदि उक्त संगठन, मंच वाकई महिला हितैषी हैं तो वे महिलाएँ अभी तक उपेक्षा की शिकार क्यों हैं जिन्होंने व्यक्तिगत स्तर पर आधारभूत समस्याओं से जूझते हुए अपने परिवार, जाति-समाज की ठेठ परंपराओं की बेड़ियों को लाँघकर सफलता प्राप्त की और समाज की दबी-कुचली महिलाओं के लिए उदाहरण बनीं?
एक और नजारा हमारे देश में आम है। पंचायतीराज व्यवस्था में आरक्षण के कारण पंचायतों व स्थानीय निकायों में महिलाओं की संख्या में भले ही वृद्धि हो गई हो लेकिन अपने अधिकारों की न तो उन्हें जानकारी होती है और न स्वरुचि से वे कुछ कर पाती हैं। अधिकांश मामलों में वे स्वयं निर्णय नहीं ले पातीं और अपने पति के हाथों रबर-स्टैम्प बनी रहती हैं।
कद्दावर पुरुष नेताओं को स्थानीय व क्षेत्रीय राजनीति में जब अपने लिए कोई स्थान नजर नहीं आता तो वे अपनी पत्नी को ढाल बनाकर अपना हित साधते रहते हैं।
आर्थिक रूप से सुदृढ़ कई महिलाएँ जिन्हें पारिवारिक व सामाजिक मामलों की भले ही अधिक समझ-बूझ न हो, उन्हें महिला परामर्श केंद्रों में सलाहकार बना दिया जाता है। इन परिस्थितियों में जो महिलाएँ ग्रामीण व अर्द्धशहरी क्षेत्रों से बहुत निम्न स्तर से उठकर अपने संघर्ष व साहस के दम पर चुनौतियों का मुकाबला करते हुए आगे बढ़ती हैं उनका हौसला अक्सर दरकिनार कर दिया जाता है।
खेती-बाड़ी और मजदूरी कर अपने बच्चों को पढ़ाने वाली महिलाएँ, दूसरों के घरों में कामकाज कर स्वयं को शिक्षित करने वाली, अपने शराबी-जुआरी पति से मार खाने की बजाय स्वयं के दम पर आगे बढ़ने वाली, अस्वस्थ परंपराओं, कुरीतियों और सड़े-गले रीति-रिवाजों से विद्रोह कर स्वयं की एक अलग पहचान स्थापित करने वाली और अभावग्रस्तता के बावजूद अपने कदमों को पीछे नहीं हटाने वाली, सामान्य ग्रामीण या निचले वर्ग की महिला समाचार-पत्रों की सुर्खी कम क्यों बनती है?
आम महिलाओं को अपनी लड़ाई खुद लड़नी होती है अभावों से, स्वयं के परिवार से यहाँ तक कि स्वयं के पति से भी। उनकी छोटी-मोटी उपलब्धियाँ क्या सिर्फ इसलिए मूल्यांकन या सम्मान के योग्य नहीं क्योंकि वे 'सेलिब्रिटी' नहीं हैं और एक क्षेत्र विशेष तक सीमित हैं? ऐसी महिलाओं के साहस व हौसलों को नमन है जो जूझकर आगे बढ़ी हों। क्या वे सम्मान की हकदार नहीं हैं?

गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

बच्चा अशिक्षित नहीं रहेगा

सरकारी वादे और व्यावहारिक सच्चाई
प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में गुरुवार को कहा है कि अब से देश में कोई भी बच्चा अशिक्षित नहीं रहेगा। उनका कहना है कि इस कानून के तहत 6 वर्ष से 14 वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा बच्चों का बुनियादी अधिकार बन जाएगा। राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करना होगा कि समूचे देश में उन 1 करोड़ बच्चों को भी शिक्षा मिले, जिन्हें अभी तक ऐसी कोई सुविधा नसीब नहीं हुई है।
सरकार राइट टू इन्फॉरमेशन और मनरेगा की तरह शिक्षा के मौलिक अधिकार को अपने एजेंडे के तौर पर पेश कर रही है और अगले पाँच वर्ष के लिए केन्द्र सरकार ने इस मिशन को पूरा करने के लिए करीब डेढ़ लाख करोड़ रुपए का प्रावधान किया है।
सरकार का कहना है कि गरीब बच्चों को बेहतर स्कूलों में शिक्षा दिलाने के लिए 2011 से निजी स्कूलों में भी पहली कक्षा से 25 फीसदी कोटा लागू होगा और अगले 12 वर्षों में इसे पूरी तरह से लागू करा लिया जाएगा। इस पहल से सरकार यह भी साबित करना चाहती है कि उसकी प्राथमिकता और सरोकारों में आम आदमी का वर्तमान और भविष्य भी है।
बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार कानून, 2009 को पारित कर सरकार ने बहुत ही अहम और दूरगामी पहल की है लेकिन इस कानून के साथ कुछ खूबियाँ जुड़ी होंगी तो कुछ खामियाँ भी समय-समय पर आम जनता और सरकार के सामने आएँगी, जिनका निराकरण करना होगा। सरकार ने अपने वादों और मंशा को तो स्पष्ट कर दिया है लेकिन यह मंशा कैसे यथार्थ में बदलेगी, इसे देखना होगा।
इस कानून के तहत सरकार के लिए उन सभी बच्चों को शिक्षित करना जरूरी हो जाएगा, जो 6 से 14 आयु वर्ग में आते हैं। लेकिन सरकार उन बच्चों को कैसे अनिवार्य शिक्षा दिला पाएगी, जो अपने परिवार का भरण पोषण करने के लिए दिनभर काम करते हैं।
छोटे-छोटे बच्चे प्लास्टिक की पन्नियाँ बीनने का काम करते हैं और ऐसे ही बहुत सारे कामों में लगे होते हैं जिनसे उनके परिवारों को बहुत थोड़ी आर्थिक मदद मिलती है। ऐसे बच्चों को स्कूलों में दाखिला दिलाना और उन्हें पढ़ाने के काम में लगाना सबसे मुश्किल काम होगा।
नए कानून के तहत शिक्षा की गुणवत्ता में भी सुधार की बात कही जा रही है। यह स्कूलों में शिक्षक और छात्रों के बीच अनुपात को कम करने का दावा करता है। कानून कहता है कि एक शिक्षक पर 40 बच्चों से अधिक नहीं होंगे, लेकिन इसके लिए बड़ी संख्या में शिक्षक, स्कूल तथा अन्य बुनियादी जरूरतों की व्यवस्था कैसे होगी? सरकार को यह व्यवस्था सुचारु रूप से चलाने में कितना समय लग जाएगा?
नए कानून के मुताबिक राज्य सरकारों को बच्चों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए पुस्तकालय, कक्षाएँ, खेल का मैदान और अन्य जरूरी चीजें उपलब्ध कराना होंगी, पर क्या राज्य सरकारें और उनके अधिकारी पूरी ईमानदारी से यह सब काम करेंगे?
सरकार को 15 लाख नए अध्यापकों की भी भर्ती करना होगी और इन्हें अक्टूबर तक प्रशिक्षित भी करना होगा, पर क्या यह आसानी से संभव हो पाएगा?
यह कानून कहता है कि स्कूल के प्रबंधन, जन्म प्रमाण-पत्र और स्थानान्तरण प्रमाण पत्र के आधार पर प्रवेश देने से मना नहीं कर सकेंगे और सत्र के दौरान किसी भी समय पर बच्चे का प्रवेश संभव होगा। पर क्या यह सब व्यवहारिकता में संभव हो पाएगा?
निजी स्कूलों में भी 25 फीसदी सीटें गरीब बच्चों के लिए आरक्षित होंगी, लेकिन इस बात को सुनिश्चित कराना आसान नहीं होगा।
देश के अन्य कानूनों की तरह से यह नया कानून भी खामियों से अछूता नहीं है। इसमें 6 वर्ष से 14 वर्ष तक के बच्चों की बात कही गई है, लेकिन प्रारंभ से 6 वर्ष तक के बच्चों के लिए क्या व्यवस्था होगी? जो बच्चे 14 वर्ष से अधिक आयु के और 18 वर्ष तक के होंगे, उनके लिए क्या प्रावधान होंगे?
हमारे देश के संविधान के अनुच्छेद 45 में यह बात कही गई है कि संविधान के लागू होने के दस वर्ष के अंदर सरकार 0 से 14 वर्ष आयु तक के बच्चों को अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा देगी, लेकिन क्या यह अब तक संभव हो पाया है?
अंतरराष्ट्रीय बाल अधिकार समझौते के अनुसार देश में 18 वर्ष तक की आयु के किशोरों को बच्चा ही माना जाता है। भारत ने दुनिया के उन 142 देशों के साथ यह समझौता किया है, लेकिन इस कानून में 14 से 18 वर्ष के बच्चों के लिए अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा की कोई बात नहीं की गई है।

जहाँ तक उच्च शिक्षा की बात है तो सरकार हर साल इसके बजट में कमी करती जा रही है। यह दिनोंदिन महँगी होती जा रही है और उच्च शिक्षा संस्थान होशियार छात्रों के लिए अच्छी नौकरियाँ पाने का ‍जरिया भर बनकर रह गए हैं।
मौलिक काम करके दुनिया में नाम कमाने के लिए ऐसे संस्थानों के छात्रों को विदेश ही जाना पड़ता है और वहीं रहकर ही वे कुछ ऐसा काम करपाते हैं जिसके बल पर उनका दुनिया में नाम होता है।
प्राथमिक शिक्षा में भी उच्च शिक्षा की तरह निजीकरण के चलते यह हालत हो गई है कि शहरी क्षेत्रों में केवल वे पालक ही अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ने को भेजते हैं, जिनके पास पैसा नहीं होता है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो प्राथम‍िक और उच्च शिक्षा की हालत में फर्क करना ही मुश्किल है।
शिक्षा के साथ मुश्किल यह है कि सरकार ने निजीकरण के नाम पर शिक्षा को व्यवसायियों के हवाले कर दिया है और सरकार यह सुनिश्चित नहीं कर पाई है कि शिक्षा देना उसका काम है भी या नहीं?
सरकार की तरफ से कह दिया जाता है कि तेल बेचना, बिजली बनाना या कल कारखाने चलाना उसका काम नहीं है, लेकिन शिक्षा के मामले में सरकार ऐसा नहीं कह सकती है कि यह उसका काम नहीं है। वरना एक लोकताँत्रिक समाजवादी देश में (जो ना तो पूरी तरह से ही लोकताँत्रिक है और न ही पूरी तरह से समाजवादी ही) शिक्षा को सड़क पर पड़े जानवर की तरह नहीं समझा जाता कि जिसे जब जिसकी इच्छा हो, इसे लतियाता चला जाता है।
सरकार यह नहीं कह सकती है कि शिक्षा घाटे का सौदा है अगर ऐसा होता तो देश में पूर्व प्राथमिक से लेकर विश्वविद्यालयीन स्तर पर शिक्षा की इतनी बड़ी-बड़ी दुकानें नहीं होतीं और ज्यादातर राजनेताओं को अपने नाम पर ये दुकानें चलाने की जरूरत ही नहीं होती।
...इसलिए कहा जा सकता है कि शिक्षा जैसे मामले पर अगर सरकार कुछ सार्थक और अहम पहल करना चाहती है तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि इस बात की गारंटी नहीं ली जा सकती है कि दिल्ली के नर्सरी स्कूलों में भी सरकार इस कानून का पालन करवा पाने में सफल होगी?
इस कानून के साथ भी सबसे बड़ा प्रश्न भी यही है कि केन्द्र और राज्य सरकारें अपने ही बनाए कानून को इतनी पारदर्शी ईमानदारी और सक्षमता के साथ लागू करा सकती हैं। इसी तथ्‍य से इस कानून की उपयोगिता और औचित्य का निर्धारण किया जा सकेगा।

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चलें महेश्वर : माँ नर्मदा के तीर
इतिहास प्रसिद्ध सम्राट कार्तवीर्य अर्जुन की प्राचीन राजधानी महिष्मति ही आधुनिक महेश्वर है। इसका उल्लेख रामायण तथा महाभारत में भी मिलता है। इंदौर की रानी अहिल्याबाई होलकर ने यहाँ की महिमा को चार चाँद लगाए। महेश्वर के मंदिर तथा दुर्ग परिसर के सौंदर्य में अपार आकर्षण विद्यमान है। महेश्वर की महेश्वरी साड़ियाँ अति प्रसिद्ध हैं।

यहाँ के पेशवा घाट, फणसे घाट और अहिल्या घाट प्रसिद्ध हैं जहाँ तीर्थयात्री शांति से बैठकर ध्यान में डूब सकते हैं। नर्मदा नदी के बालुई किनारे पर बैठकर आप यहाँ ठेठ ग्राम्य जीवन के दर्शन कर सकते हैं। पीतल के बर्तनों में पानी ले जाती महिलाएँ, एक किनारे से दूसरे किनारे तक सामान ले जाते पुरुष और किल्लोल करता बचपन..!

राजगद्दी और राजवाड़ा-
नर्मदा के तीर पर बने किले में स्थित राजगद्दी पर देवी अहिल्याबाई की प्रतिमा रखी गई है। आज भी यह स्थान सजीव दरबार की तरह लगता है। किले के ऊपर से शांत नीली नर्मदा के जल को निहारने का अपना ही सुख है। किले के अन्य कमरों में करघे लगे हैं जिन पर साड़ी बनते हुए कोई भी देख सकता है। किले में स्थित छोटे से मंदिर से आज भी दशहरे के उत्सव की शुरुआत की जाती है जैसे राजा-महाराजा के समय में की जाती थी। किले से ढलवाँ रास्ते से नीचे जाते ही शहर बसा हुआ है।

मंदिर
महेश्वर के मंदिर दर्शनीय हैं। हर मंदिर के छज्जे, अहाते में खूबसूरत नक्काशी की गई है। कालेश्वर, राजराजेश्वर, विट्ठलेश्वर और अहिल्येश्वर मंदिर विशेष रूप से दर्शनीय हैं।

कैसे पहुँचें
वायु सेवा- महेश्वर के लिए निकटतम हवाई अड्डा इंदौर क्रमशः 77 तथा 91 किमी है जो मुंबई, दिल्ली, भोपाल तथा ग्वालियर से सीधी विमान सेवा से जुड़ा है।

रेल सेवा- महेश्वर के लिए बड़वाह (39 किमी) निकटतम रेलवे स्टेशन हैं। पश्चिमी रेलवे के बड़वाह, खंडवा, इंदौर से भी यहाँ पहुँच सकते हैं।

सड़क मार्ग- बड़वाह, खंडवा, इंदौर, धार और धामनोद से महेश्वर के लिए बस सेवा उपलब्ध है।

कब जाएँ-
जुलाई से लेकर मार्च तक का समय यहाँ जाने के लिए उपयुक्त है।
ठहरने के लिए- गेस्ट हाउस, रेस्ट हाउस, तथा धर्मशालाएँ उपलब्ध हैं।
धुँआ-धुँआ सारा समां - भेड़ाघाट
चमकती संगमरमर की लगभग सौ फीट ऊँची दीवारें... बीच में कल-कल बहती नर्मदा नदी पूरा माहौल बेहद पवित्र, बेहद शांत..पानी में चमकती सूर्य की किरणें... यह दिलकश नजारा है भेड़ाघाट का। पूर्णिमा की चाँदनी रात में यहाँ के सौंदर्य का वर्णन करना शब्दों में संभव नहीं है। ऐसे में आप नर्मदा में नौका-विहार करें तो रहस्यमय सौंदर्य का अनुभव करेंगे।
कई हिंदी फिल्मकारों ने यहाँ शूटिंग की है। जिसका रोचक वर्णन गाइड अनोखे अंदाज में सुनाते हैं। ये नाव चालक कम गाइड लगातार बोलते रहते हैं। यदि आप खामोशी से इस जगह की खूबसूरती निहारना चाहें तो बस इन्हें एक बार चुप होने का इशारा करना होगा।

दो ऊँचे-ऊँचे संगमरमरी आईनों के बीच बहती नीली शांत नर्मदा आगे चलकर बेहद खूबसूरत धुआँधार जलप्रपात के रूप में गिरती है। चाँदनी रात में इस जैसा खूबसूरत स्थान शायद ही विश्व में कहीं हो। चाँदनी रात में सरकार की ओर से हर साल यहाँ उत्सव का आयोजन करवाया जाता है। जिसके तहत नौकाओँ की राजसी सज्जा की जाती है। साथ ही सारंगी, तबला जैसे पारंपरिक वाद्य-यंत्रों को कुछ नावों में खास तौर पर बजवाया जाता है।
मुख्य आकर्षणः-
संगमरमरी चट्टानें- इस जलप्रपात क दोनों ओर खूबसूरत संगमरमर की चट्टाने हैं। इन उज्जवल-धवल चट्टानों के बीच नौका विहार की सुविधा नवंबर से मई तक उपलब्ध रहती है। चाँदनी रात में इसकी खूबसूरती और नौकाविहार का आनंद दुगना हो जाता है।
धुआँधार जलप्रपात-
शांत नर्मदा चट्टानों के बीच से बहती है और धुँआधार जलप्रपात के रूप में गरजकर गिरती है। इसकी आवाज दूर से ही सुनाई देती है। पानी की तेजी गहरे धुएँ के रूप में दिखाई देती है। प्रकृति की खूबसूरती का एक और रूप!

सेलखड़ी की कलाकृतियाँ-
यहाँ नर्मदा में पाए जाने वाले सेलखड़ी पत्थरों (संगमरमर) पर उकेरी गई कलाकृतियाँ बनाने और बेचने का व्यवसाय यहाँ होता है। यहाँ आपको बच्चे हो, बूढ़े हो या जवान सभी इसी काम में लगे दिखाई देंगे। आप यहाँ से संगमरमर के खूबसूरत सामान ही नहीं खरीद सकते, बल्कि इन्हें कितनी खूबसूरती से बनाया जाता है यह भी निहार सकते हैं।

चौंसठ योगिनी मंदिर-
ऊँची पहाड़ी पर स्थित मंदिर में कई सीढ़ियाँ चढ़कर आप जब ऊपर पहुँचते हैं तो नीचे संगमरमर की चट्टानों के बीच बहती नर्मदा की लहरों का सौंदर्य आपकी सारी थकान हर लेता है। दुर्गा माँ का यह मंदिर दसवीं शताब्दी का है यहाँ कलचुरी काल की अन्य प्रतिमाएँ भी मौजूद हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार यह मंदिर भूमिगत सुरंग के माध्यम से दुर्गावती महल से जुड़ा हुआ है।

कैसे जाएँ-
हवाई मार्ग से- जबलपुर सबसे निकट का हवाई अड्डा है जो यहाँ से 23 किमी. दूर है। भोपाल और दिल्ली के लिए यहाँ से नियमित हवाई सेवा है।
रेल मार्ग से- मुंबई-हावड़ा मुख्य लाइन इलाहबाद से होते हुए जबलपुर रेल मुख्यालय है। सभी एक्सप्रेस और पैसेंजर ट्रेन यहाँ रुकती हैं।
सड़क मार्ग से जबलपुर से बस, टैम्पो और टैक्सियाँ भेड़ाघाट के लिए चलती हैं।
कब जाएँ- अक्टूबर से जून तक का समय यहाँ जाने के लिए श्रेष्ठ है। मानसून सीजन में आप धुँआधार जलप्रपात का धुँआ-धुँआ रूप नहीं देख पाएँगे।

बजट- यहाँ जाने के लिए किसी प्रकार का कोई शुल्क नहीं लगता है। आप यूँ ही बिना टिकट लिए यहाँ की खूबसूरती निहार सकते हैं। हाँ, नौकायान के लिए आपको शुल्क चुकाना होगा...कितना यह आपकी पसंद पर निर्भर करता है। यदि आप दूसरे लोगों के साथ मिलकर नाव किराए पर लेते हैं तो यह आपको 100 से 150 रूपए के बीच मिल जाएगी।

यदि अपने परिवार के लिए पूरी नाव बुक करना चाहते हैं तो नाव के आकार और रूप-रंग के अनुसार कीमत 350 से लेकर 500 रूपए हो सकती है। चाँदनी रात में विहार करने पर टिकिट शुल्क कुछ बढ़ा दिया जाता है। इसके अलावा जबलपुर में ठहरने के लिए सस्ते और मँहगें दोनो ही होटल आराम से मिल जाते हैं।

टिप्सः-
धुँआधार जलप्रपात देखते समय काफी सावधानी रखें। जोश में आकर रेलिंग पर चढ़ना और रेलिंग क्रास करना काफी खतरनाक साबित हो सकता है।

यहाँ नौकाविहार करते समय नाव का संतुलन न बिगाड़े। यहाँ कई जगह पानी काफी गहरा है।

अपने साथ सनक्रीम लोशन, कैप और चश्मा जरूर रखें। बात यदि चाँदनी रात की हो तो इनकी क्या जरूरत।

यहाँ कुछ सालों पहले मगरमच्छ पाए जाते थे। इसलिए अभी भी सावधानी रखना जरूरी है बच्चों को नौका विहार करते समय पानी में बार-बार हाथ डालने से रोकें।

पहाड़ियों पर नाम कुरेदकर इनकी प्राकृतिक सुंदरता खराब न करें। न ही यहाँ वहाँ कूड़ा खासकर पॉलिथिन फेंके।

चित्रकूट
प्राचीन काल में तपस्या और शांति का स्थल चित्रकूट ब्रह्मा, विष्णु, महेश के बाल अवतार का स्थान माना जाता है। वनवास के समय भगवान राम, सीता, लक्ष्मण, यहीं के घने जंगलों में रहे थे और ब्रह्मा, विष्णु और महेश महर्षि अत्रि तथा सती अनुसूया के अतिथि बनकर यहाँ रहे थे। इस स्थल का वरदान माना जाता है। भगवान प्राकृतिक सुषमा के बीच चित्रकूट में पर्यटक मानसिक शांति प्राप्त करते हैं।

रामघाट
रामघाट में मंदाकिनी नदी के तट पर स्थित घाट पर विभिन्न धार्मिक क्रियाएँ चलती रहती हैं। कहते हैं यहाँ घाटों पर भीड़ कभी भी कम नहीं होती। पवित्र मंत्रोच्चार और खुशबू के बीच साधुओं को यहाँ तपस्या में लीन बैठे देखा जा सकता है या तीर्थयात्री उनसे उपदेश प्राप्त करते रहते हैं। मंदाकिनी के नीले-हरे पानी में नौकायन का मजा ही कुछ और है।

कामदगिरी
कामदगिरी चित्रकूट का मुख्य धार्मिक स्थल है। यह एक खड़ी पहाड़ी पर स्थित है जिसके आधार पर मंदिरों और पूजा स्थलों की कतारें हैं। यहीं पर भरत मिलाप मंदिर है। यहीं पर भरत ने राम से वापिस लौटने की विनती की थी। लोग यहाँ मनोकामना पूर्ति के लिए पहाड़ी की परिक्रमा भी करते हैं।

सती अनुसूया
यह स्थल कुछ ऊपर जाकर है घने जंगलों के बीच शांत वातावरण में पक्षियों की चहचहाहट गूँजती रहती है। कहते हैं कि यहीं पर अत्रि ऋषि, उनकी पत्नी अनुसूया और तीनों पुत्रों ने तपस्या की थी जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश के अवतार रूप में थे। मंदाकिनी की धारा को अनुसूया द्वारा अपनी ध्यान-साधना के लिए लाया गया था ऐसा माना जाता है। यह स्थल शहर से 16 किमी. दूर है और घने जंगलों से होकर सड़क मार्ग से यहाँ पहुँचा जा सकता है।
स्फटिक शिला
मंदाकिनी के किनारे पर जानकी कुंड के कुछ किलोमीटर पीछे यह घने वनों से आच्छादित क्षेत्र है। यहाँ पर भगवान राम के पैरों के निशान हैं और यहीं पर सीता माता को जयंत नामक कौवे ने चोंच मारी थी। यहाँ नदी के स्वच्छ पानी में मछलियाँ आसानी से देखी जा सकती हैं।

जानकी कुंड
रामघाट से ऊपर जाने पर मंदाकिनी का मनमोहक नजारा दिखाई देता है। नदी के नीले पानी और हरे-भरे पेड़ों से यह स्थान बहुत ही सुरम्य लगता है। जानकी कुंड तक जाने के दो रास्ते हैं एक तो आप यहाँ नाव के जरिए पहुँच सकते हैं और दूसरे आप हरियाली देखते हुए सड़क मार्ग से भी जा सकते हैं।
हनुमान धारा
यह सैंकड़ों फीट ऊँची जगह पर स्थित धारा है, जिसे राम ने हनुमान के लंका दहन के बाद लौटने पर हनुमान के लिए बनाया था। यहाँ कई मंदिर हैं और साथ ही यहाँ से चित्रकूट का विहगम दृश्य भी देखा जा सकता है। ऊपर पहुँचने पर खुला सा क्षेत्र है जहाँ पीपल के वृक्ष लगे हैं। ऊपर चढ़ने की सारी थकान यहाँ आते ही मिट जाती है।

भरत कूप
यहाँ भरत ने पूरे भारत के तीर्थों से जल एकत्र करके डाला था। यह कस्बे से दूर छोटा सी अलग-थलग जगह है।

गुप्त गोदावरी
कस्बे से 18 किमी. दूर पहाड़ी पर यह प्राकृतिक चमत्कार के रूप में है। यहाँ एक जोड़ा गुफाएँ हैं जिनमें बड़ी मुश्किल से ही प्रवेश किया जा सकता है। दूसरी गुफा और भी सँकरी है जिसमें पतली सी नदी बहती है। कहा जाता है कि यहाँ राम-लक्ष्मण अपना दरबार लगाते थे, यहाँ दो प्राकृतिक सिंहासन बने हुए हैं।

कैसे पहुँचे :-
वायु सेवा- सबसे नजदीकी हवाई अड्डा खजुराहो (175 किमी) है। दिल्ली, आगरा और वाराणसी से यहाँ के लिए विमान सेवा उपलब्ध है।

रेल सेवा- सबसे निकटवर्ती रेलवे स्टेशन चित्रकूट धाम या कर्वी (11 किमी) है। यह झाँसी-माणिकपुर मुख्य रेल लाइन पर स्थित है।

सड़क मार्ग- झाँसी, महोबा, चित्रकूट धाम, हरपारपुर, सतना और छतरपुर से चित्रकूट के लिए नियमित बस सेवा उपलब्ध हैं।

कैसे जाएँ
अक्टूबर से मार्च तक का समय यहाँ जाने के लिए उपयुक्त है।
ठहरने के लिए- मध्यप्रदेश निगम का बंगला तथा उत्तरप्रदेश पर्यटन निगम का बंगला, साडा के होटल तथा लॉज उपलब्ध हैं।

पर्यटन मध्यप्रदेश

नर्मदा किनारे बसा ओंकारेश्वर
शिवशंभू का अनूठा धाम

ओंकारेश्वर हिंदू धर्म के पवित्र प्रतीक 'ओम' को प्रतिध्वनित करता है। यह हर उम्र के तीर्थ यात्रियों को अपनी ओर आकर्षित करता है। यहाँ नर्मदा और कावेरी का संगम है जिसमें श्रद्धालु डुबकी लगाने के बाद पवित्र ज्यो‍तिर्लिंग के दर्शन को जाते हैं। ओंकारेश्वर का शिवलिंग देश के बारह पवित्र ज्योतिर्लिंगों में से एक है। मंदिर को ओंकार मांधाता मंदिर के नाम से जाना जाता है।

मध्यप्रदेश के अन्य मंदिरों की तरह ही यह मंदिर भी प्रकृति से मनुष्य के जुड़ाव को प्रदर्शित करता है। यहाँ प्रकृति ने स्वयं दो पर्वतों के बीच एक खाई को जोड़कर ओम का आकार ग्रहण किया है।
मंदिर के उत्तर में विंध्य पर्वत और दक्षिण में सतपुड़ा के बीच नर्मदा नदी मूक वाहक की तरह है। पहले नदी में बहुतायत में घड़ियाल थे। अब भी यहाँ बड़ी संख्या में मछलियाँ हैं जिन्हें हाथों से दाना खिलाने का सुख प्राप्त किया जा सकता है। नदी पर स्थित पुल यहाँ की सुंदरता को द्विगुणित करता है।
ओंकार मांधाता मंदिर
यह मंदिर नर्मदा द्वारा काटे गए एक मील लंबे और आधा मील चौड़े द्वीप पर स्थित है। इसके नर्म पत्थरों को काटकर बारीक नक्काशी उकेरी गई है और विशेष रूप से इसका ऊपर का भाग देखने लायक है। मंदिर की छत भी बहुत सुंदरता से उकेरी गई है। मंदिर को घेरे हुए बरामदे में बने स्तंभों पर वृत्त, बहुकोणीय आकृतियाँ और वर्ग बने हुए हैं।

सिद्धनाथ मंदिर
यह मध्यकाल की ब्राह्मण कला का बेहतरीन नमूना है। इसकी विशेषता बाहरी दीवारों पर हाथियों की खूबसूरत नक्काशी है।
चौबीस अवतार
यहाँ हिंदुओं और जैन मंदिरों का समूह है। हरेक मंदिर स्थापत्य के लिहाज से बेहतरीन कला का नमूना पेश करता है।
सातमातृका मंदिर
ओंकारेश्वर से छ: किलोमीटर दूर यहाँ दसवीं शताब्दी के मंदिरों का समूह है।
काजल रानी की गुफा
ओंकारेश्वर से नौ किलोमीटर दूर यह प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर स्थल है। क्षितिज तक फैले चौड़े हरियाले मैदान धरती से अंबर का मेल खाते से लगते हैं। यहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य अवर्णनीय है।

कैसे जाएँ
हवाई मार्ग
सबसे निकट का हवाई अड्डा इंदौर 77 किमी. दूर है जो मुंबई, भोपाल और दिल्ली से जुड़ा है।
सड़क मार्ग
यह इंदौर, उज्जैन और खंडवा से सड़क मार्ग से जुड़ा है।
रेल मार्ग
सबसे निकट का रेल मुख्यालय ओंकारेश्वर रोड 12 किमी. दूर है। यह पश्चिम रेलवे के रतलाम-खंडवा सेक्शन से जुड़ा है।
कब जाएँ
अक्टूबर से मार्च तक आप कभी भी यहाँ जा सकते हैं। अक्टूबर-नवंबर का महीना आदर्श कहा जा सकता है।

बेजोड़ नमूना : साँची
भारतीय इतिहास की बौद्ध परंपरा के स्वर्ण युग का अमिट दस्तावेज है साँची। प्रदेश की राजधानी भोपाल से 46 किमी पर स्थित साँची के स्मारक भारत में स्थित बौद्ध स्मारकों में सर्वाधिक आकर्षक और अतुलनीय है।
एक खूबसूरत छोटी पहाड़ी पर स्थित इन स्मारकों में वि‍भिन्न स्तूपों के अलावा गुप्तकालीन मंदिर और विहार आदि शामिल है। विश्व धरोहर की सूची में शामिल इन स्मारकों का निर्माण तीसरी सदी ई.पू. से लेकर बारहवीं सदी ई. तक किया गया है।

प्रमुख आकर्षण-

स्तूप -: साँची स्थित इन स्तूपों का निर्माण प्राय: धार्मिक उद्देश्यों को लेकर किया गया था। कहा जाता है कि इन स्तूपों में बुद्ध और उनके शिष्यों के अवशेष रखे गए हैं। सर्वाधिक प्रसिद्ध स्तूप क्रमांक एक का निर्माण महान मौर्य शासक अशोक ने करवाया था। यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि अशोक की पत्नी ‘देवी’ बेसनगर (वर्तमान विदिशा) के एक व्यापारी की बेटी थी। विदिशा साँची से 12 किमी दूर है।

स्तूप क्रमांक एक के चारो और स्थित चार द्वारों पर गौतम बुद्ध के जीवन की प्रमुख घटनाओं को चित्रों के द्वारा प्रदर्शित किया गया है। खास बात यह है कि इन चित्रों में बुद्ध को प्रतीकों के रूप में दिखाया गया है। ये प्रतीक घोड़े-हाथी, तोरण, स्तूप आदि के रूप में है।

स्तूप क्रमांक दो पहाड़ी के शिखर पर स्थित है और यह पत्थर की सुंदर चारदीवारी से घिरा हुआ है। स्तूप क्रमांक तीन, पहले स्तूप के पास स्थित हैं। इस स्तूप के अंदरूनी भाग में बुद्ध के दो शिष्यों सारिपुत्र और महामोगल्लेना के अवशेष पाए गए हैं।

अशोक स्तम्भ - यह स्तम्भ, मुख्य स्तूप के दक्षिणी द्वार के पास स्थित है। वर्तमान में इसका स्तंभ ही वहाँ है। चार सिंहों वाला इसका प्रमुख शीर्ष नीचे संग्रहालय में देखा जा सकता है। एक दूसरे की ओर पीठ किए हुए ये चार सिंह भारत के राष्ट्रीय प्रतीक हैं। यह स्तम्भ वास्तुकला की ग्रीक बौद्ध शैली का उत्कृषट नमूना है।

गुप्तकालीन मंदिर - अब लगभग खंडहर हो चुका यह मंदिर 5वीं शताब्दी में बना था। यह मंदिर भारतीय मंदिरों की प्राचीन शैली की झलक देता है।

बौद्ध विहार - साँची में प्राचीन बौद्ध विहारो के भग्नावशेष देखे जा सकते हैं। जहाँ तत्कालीन बौद्ध भिक्षु निवास करते थे।

बड़ा कटोरा - साँची में एक ही चट्टान को काटकर बनाया गया एक बड़ा कटोरा है। कहा जाता है कि सभी बौद्ध भिक्षु भिक्षा में मिला अन्न इसमें डाल देते थे, जिसे बाद में सभी को बाँट दिया जाता था।

संग्रहालय - पहाड़ी के ठीक नीचे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा संग्रहालय की स्थापना की गई है। इस संग्रहालय में साँची के क्षेत्रों में मिली विभिन्न वस्तुएँ संग्रहित है। संग्रहालय का प्रमुख आकर्षण है, अशोक स्तम्भ का शीर्ष, बुद्द की विभिन्न मूर्तियाँ तथा विहारों में रहने वाले भिक्षुओं के बरतन आदि।
साँची के नजदीक अन्य आकर्षण-
हेलियोडोरस स्तंभ - साँची से 12 किमी दूरी पर प्राचीन नगरी बेसनगर (विदिशा) स्थित है। यहाँ पाँचवी शताब्दी में ग्रीक राजदूत हेलियोडोरस द्वारा बनवाया गया स्तंभ दर्शनीय है।
उदयगिरी - विदिशा से चार किमी और साँची से सोलह किमी की दूरी पर स्थित हैं उदयगिरी की गु्‍फाएँ। इन गुफाओं में प्राचीन काल में हिंदू एवं जैन साधु-संत रहते थे। ऐतिहासिक महत्व की इन गुफाओं वाले पर्वत के शिखर पर छठी शताब्दी का गुप्तकालीन मंदिर है।

कब जाएँ - यूँ तो वर्षभर में किसी भी समय साँची की यात्रा की जा सकती है। लेकिन फिर भी अक्टूबर से मार्च तक का समय साँची जाने के लिए बेहतर होता है। नवंबर में साँची में चैत्यगिरी विहार का उत्सव मनाया जाता है। उस समय बुद्ध के शिष्यों के अवशेष भी लोगों के दर्श‍‍न के लिए रखे जाते हैं।

कैसे जाएँ - साँची, झाँसी- इटारसी रेलमार्ग पर स्थित है। यहाँ एक छोटा सा रेलवे स्टेशन भी है, परंतु नजदीकी बड़ा स्टेशन विदिशा 12 किमी दूर है। भोपाल से साँची की दूरी मात्र 46 किमी है। सड़क मार्ग द्वारा एक से डेढ़ घंटे में आसानी से पहुँचा जा सकता है। भोपाल से टैक्सियाँ और बसें उपलब्ध है। भोपाल हवाई मार्ग से भी देश के सभी बड़े शहरों से जुड़ा़ हुआ है।

कहाँ ठहरें - साँची में ठहरने के लिए अनेक सुविधाएँ हैं। मप्र पर्यटन की ओर से लॉज एवं टूरिस्ट कैफेटेरिया में रूकने और भोजन की व्यवस्था है। इसके अतिरिक्त अनेक रेस्ट हाउस और लॉज हैं, जहाँ आराम से रूका जा सकता है।

बजट - छोटी जगह होने के कारण साँची बहुत महंगी जगह नहीं है। यहाँ आराम से ठहर कर घूमने के लिए लगभग 5000 रूपए पर्याप्त है।

टिप्स - 1. एक ऐतिहासिक स्थल होने के कारण साँची में पर्यटन का पूरा आनंद लेने के लिए गाइड अवश्य कर लें।
2. नकली गाइडों और दलालों से सावधान रहें।
3. साँची का धार्मिक महत्व होने के कारण वहाँ मर्यादित आचरण करें।

सौंदर्य से परिपूर्ण हैं नर्मदा की संगमरमरी चट्टानें

नर्मदा के घाटों का अलौकिक सौंदर्य
-उद्गम से लेकर सागर समागम तक नर्मदा का जो तेज, जो सौंदर्य, जो अठखेलियाँ और जो अदाएँ दिखाई देती हैं वे जबलपुर के अलावा अन्यत्र दुर्लभ हैं। प्रकृति ने तो इस क्षेत्र में नर्मदा को अतुलित सौंदर्य प्रदान किया ही, स्वयं नर्मदा ने भी अपने हठ और तप से अपने सौंदर्य में वृद्धि इसी क्षेत्र में की है।

यहाँ नर्मदा ने हठ और तप से रास्ता भी बदला है। पहले कभी वह धुआँधार से उत्तर की ओर मुड़कर सपाट चौड़े मैदान की ओर बहती थी। उसकी धार के ठीक सामने का सौंदर्य संभवतः नर्मदा को भी आकर्षित करता होगा।

तभी तो लगातार जोर मारती लहरों से चट्टानों का सीना चीरकर हजारों वर्ष के कठोर संघर्ष के बाद नर्मदा ने यह सौंदर्य पाया है जिसे निहारने देश ही नहीं, विदेशी पर्यावरण प्रेमी भी खिंचे चले आते हैं। संगमरमरी चट्टानों के बीच बिखरा नर्मदा का अनूठा सौंदर्य देखते न तो मन अघाता है और न आँखें ही थकती हैं। भेड़ाघाट, तिलवाराघाट के आस-पास के क्षेत्र का इतिहास 150 से 180 करोड़ वर्ष पहले प्रारंभ होता है। कुछ वैज्ञानिक इसे 180 से 250 करोड़ वर्ष पुरानी भी मानते हैं।
भेड़ाघाट के नाम को लेकर अनेक किंवदंतियाँ प्रचलित हैं। प्राचीन काल में भृगु ऋषि का आश्रम इसी क्षेत्र में था। इस कारण भी इस स्थान को भेड़ाघाट कहा जाता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार इसी स्थल पर नर्मदा का बावनगंगा के साथ संगम होता है।
लोक भाषा में भेड़ा का अर्थ भिड़ना या मिलना है। इस मत को मानने वालों के अनुसार इसी संगम के कारण इस स्थान का नाम भेड़ाघाट हुआ।
एक अन्य मत के अनुसार यह स्थान 1,700 वर्ष पूर्व शक्ति का केंद्र था। शैव मत वालों के अलावा शक्ति के उपासक भी यहाँ आते थे इसलिए निश्चय ही यह स्थान कभी भैरवीघाट रहा होगा और बाद में अपभ्रंश होकर भेड़ाघाट हो गया। गुप्तोत्तर काल में संभवतः इस मंदिर का विस्तार किया गया और इसमें सप्त मातृकाओं की प्रतिमाएँ स्थापित की गईं थीं।
748 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला यह क्षेत्र आज शैव, वैष्णव, जैन तथा अन्य मत-मतांतर मानने वालों के लिए आस्था का केंद्र है। पर्यटन और सौंदर्य की दृष्टि से तो यह महत्वपूर्ण है ही। इस क्षेत्र में नौका विहार द्वारा भ्रमण करते समय नर्मदा के अलौकिक सौंदर्य के दर्शन होते हैं। बंदरकूदनी तक पहुँचते-पहुँचते पर्यटक संगमरमरी आभा से अभिभूत होता है और रंग-बिरंगे पत्थर उसे मुग्ध कर देते हैं।
जबलपुर के भेड़ाघाट में जहाँ से नौका विहार शुरू होता है वहाँ स्थित है पचमढ़ा का प्रसिद्ध मंदिर। यहाँ एक ही प्रांगण में चार मंदिर हैं। दो सौ साल पुराने इन मंदिरों का सौंदर्य अद्वितीय है। ये सभी मंदिर शिव को समर्पित हैं। जबलपुर में इसके अलावा भी अनेक ऐसे स्थान हैं जो नर्मदा क्षेत्र के पर्यटन में चार चाँद लगाते हैं। इनमें ग्वारीघाट, तिलवाराघाट, लम्हेटाघाट, गोपालपुर, घुघुआ फॉल, चौंसठ योगिनी मंदिर और पंचवटीघाट जैसे सौंदर्य से परिपूर्ण स्थल हैं।

इन क्षेत्रों में भी सौंदर्य की अपनी छटा है पर भेड़ाघाट के सौंदर्य के आगे सब फीके नजर आते हैं। जबलपुर में नर्मदा की आस्था का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र है ग्वारीघाट। शाम होते ही यहाँ का सौंदर्य अद्भुत होता है। घाट पर खड़े होकर नर्मदा की जलराशि में तैरते असंख्य दीप ऐसे लगते हैं मानो पूरा आकाश ही धरती पर उतर आया हो। नर्मदा की मद्धिम लहरों में झिलमिलाते दीपों का प्रकाश मन को प्रसन्न कर देता है।
रोज शाम को दीपदान करने वालों का रेला यहाँ पहुँचता है। नदी के बीच में देवी नर्मदा का मंदिर श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण है। नाव से वहाँ तक पहुँचकर पूजा करना रोमांचक अनुभव है। इसके अलावा घाट पर अनेक मंदिर हैं, जिनमें कुछ प्राचीन हैं तो कुछ हाल के वर्षों में बने हैं। घाट से दूर जाने पर माँ काली का प्राचीन और सिद्ध मंदिर है।

विभिन्न संतों के आश्रम भी आस-पास होने के कारण यहाँ श्रद्धालुओं का ताँता लगा रहता है। कहते हैं नर्मदा के दर्शन से ही सारे पाप नष्ट होते हैं। इसलिए यहाँ दर्शनार्थियों का भी ताँता लगता है। ग्वारीघाट में नौका विहार की भी सुविधा है।

नर्मदा का दूसरा महत्वपूर्ण घाट है तिलवाराघाट। यहाँ लगने वाला मकर संक्रांति का मेला बड़ा प्रसिद्ध है। इस मेले का इतिहास भी प्राचीन है। यहाँ स्थित मंदिर भी बहुत प्राचीन है। पुराने समय से गोपालपुर स्थित मंदिर की बाहरी छटा अत्यंत सुंदर है।

अपने में इतिहास समेटे बाग की गुफाएँ
प्राकृतिक सौन्दर्य के साथ इतिहासबोध
'शब-ए-मालवा' से 150 किलोमीटर दूर एक ऐसी एतेहासिक और प्राकृतिक धरोहर स्थित है जिसका ज्यादातर लोगों ने नाम तो सुना है लेकिन देखा कम ही है। दुर्गम स्थल पर स्थित होने के कारण सैर-सपाटा पसंद करने वाले लोग उस तरफ आसानी से रुख नहीं करते लेकिन दूर देश से आने वाले विदेशी पर्यटकों के लिए यह धरोहर एक जिज्ञासा का विषय हमेशा से बनी रहती है।
खासतौर से बौद्ध धर्म से जुड़े लोगों के लिए यह किसी तीर्थ से कम नहीं है। यह धार जिले में स्थित विश्व प्रसिद्ध बाग की गुफाएँ हैं जो अपने भित्ति चित्रों की वजह से अजंता के समकक्ष मानी जाती हैं। इन्हें भारत सरकार ने राष्ट्रीय महत्व का सुरक्षित पुरा स्मारक घोषित कर रखा है।

क्या है बाग में :
बाग नदी और बाग कस्बे के नाम की वजह से इन गुफाओं को 'बाग की गुफाओं' के नाम से जाना जाता है। गुफाओं के बनाने के लिए खूबसूरत जगह का चुनना यह बताता है कि बाग गुफा मंडप के निर्माता प्राकृतिक सौन्दर्य के उपासक थे। वर्ष 1953 में भारत सरकार द्वारा बाग गुफाओं को 'राष्ट्रीय स्मारक' घोषित किया गया। इसके संरक्षण का जिम्मा पुरातत्व विभाग को सौंपा गया। विंध्याचल पर्वत श्रृंखला के एक रेतीले पत्थर के पर्वत पर निर्मित इन गुफाओं की संख्या 9 है।
पहली गुफा 'गृह गुफा' कहलाती है। दूसरी गुफा 'पांडव गुफा' के नाम से प्रख्यात है। यह बाकी सब गुफाओं से अधिक बड़ी और अधिक सुरक्षित प्रतीत होती है। तीसरी गुफा का नाम 'हाथीखाना' है। इसमें बौद्ध भिक्षुओं के रहने के लिए कोठरियाँ बनी हुई हैं। चौथी गुफा को 'रंगमहल' कहा जाता है। पाँचवी गुफा बौद्ध भिक्षुओं के एक स्थान पर बैठकर प्रवचन सुनने के लिए बनाई गई थी। पाँचवी और छठी गुफा आपस में मिली हुई हैं तथा इनके बीच का सभा मंडप 46 फुट वर्गाकार है।

सातवीं, आठवीं और नौवीं गुफाओं की हालत ठीक नहीं है और वे अवशेष मात्र ही नजर आती हैं। इन गुफाओं की एक विशेषता यह भी है कि इनके अंदर जाकर इतनी ठंडक का अहसास होता है जैसे आप किसी एयरकंडीशन कक्ष में आ गए हों। गुफाओं के अंदर कई जगह से पहाड़ों से प्राकृतिक तरीके से पानी भी रिसकर आता रहता है। ये गुफाएँ कई शताब्दी पुरानी हैं।
लेकिन इनका काल निर्धारण आज भी नहीं हो पाया है। इतिहासविद इन्हें अजंता से पुराना तो नहीं मानते लेकिन यह जरूर मानते हैं कि यहाँ के भित्ति चित्रों में अंकित मनुष्यों की वेश-भूषा व अलंकार आदि से इनका समय वही निश्चित होता है जो अजंता की पहली और दूसरी गुफाओं का है। विख्यात इतिहासविद और पुराविद श्री कुमार स्वामी ने इन्हें पाँचवी शताब्दी का माना है।

भित्ति चित्र अब संग्रहालय में :
बाग की गुफाओं के भित्ति चित्र कई शताब्दियों तक प्रकृति ने सहेजकर रखे थे। बाद में जंगलों की कटाई और गुफाओं में बाबाओं-महात्माओं द्वारा आग जलाने और धुँआ करने के बाद इन भित्ति चित्रों पर संकट मंडराने लगा। गुफाओं के अंदर चमगादड़ों ने भी अपने डेरे बना लिए थे। नमी और आर्द्रता की वजह से भी भित्ति चित्र प्रभावित हो रहे थे। तब इन्हें गुफा से हटाने का निर्णय लिया गया।
1982 से इन चित्रों को दीवारों व छतों से निकालने का कार्य शुरू हुआ। नमी से प्रभावित इन चित्रों को तेज धार वाले औजारों से काटकर दीवारों से अलग किया गया। निकाले गए चित्रों को मजबूती देने के उद्देश्य से फाइबर ग्लास एवं अन्य पदार्थों से माउंटिंग की गई। चित्रों को वापस मूल स्वरूप में लाने के लिए उनकी रासायनिक पदार्थों से फैंसिंग की गई।

बाद में इन चित्रों को गुफाओं के सामने निर्मित संग्रहालय में रखा गया। इन चित्रों को अब संग्रहालय में ही देखा जा सकता है। गुफाओं के भीतर अब सिर्फ मूर्तियाँ ही बची हैं जिनमें से अधिकांश बुद्ध की हैं या फिर बुद्ध के जीवनकाल से जुड़ी घटनाओं को बयान करती हैं।

कैसे जाएँ, कब जाएँ :
बाग की गुफाएँ बहुत सुंदर स्थान पर स्थित हैं। सामने बाग नदी बहती है और चारों ओर हरियाली तथा जंगल हैं। धार जिले में विंध्य श्रेणी के दक्षिणी ढाल पर, नर्मदा नदी की एक सहायक नदी बागवती के किनारे उसकी सतह से 150 फुट की ऊँचाई पर यह विश्व प्रसिद्ध गुफाएँ हैं। अगर आप स्वंय के वाहन से बाग जाना चाहते हैं तो उसमें काफी सहूलियत रहेगी। इंदौर से 65 किलोमीटर दूर है धार।

धार से 71 किलोमीटर की दूरी पर आदिवासी क्षेत्र टांडा है। यहाँ पहुँचने के बाद बाग कस्बा सिर्फ 20 किमी दूर रह जाता है। बाग पहुँचने के बाद 7 किमी का रास्ता तय करके इन गुफाओं तक पहुँचा जा सकता है। यहाँ जाने का सबसे अच्छा मौसम बारिश का है क्योंकि गुफाओं के सामने बहने वाली बाग नदी उस समय बहती है। यह मौसमी नदी है और गर्मियाँ आने तक सूख जाती है। नदी के सूखने से वहाँ का दृश्य थोड़ा अधूरा-अधूरा सा लगने लगता है।
इन्दौर का प्राणी संग्रहालय
केंद्रीय संग्रहालय, इंदौर एक राज्य स्तरीय संग्रहालय है, जहाँ मालवा से प्राप्त पुरावशेषों को एकत्रित कर शोधाथिर्यों एवं पर्यटकों एवं जनसामान्य को जानकारी उपलब्ध कराई जाती है। केंद्रीय संग्रहालय भवन में मूर्तियाँ, जो अधिकांश परमार कालीन विशेषता लिए हुए हैं, के अतिरिक्त अभिलेख, मुद्राएँ, इटैलियन कलाकृतियाँ प्रदर्शित की गई हैं।
केंद्रीय संग्रहालय इंदौर की स्थापना 29 नवंबर, 1923 में हुई थी। यह तत्कालीन आयुक्त डॉ. अरुण्डले के निर्देशन में नररत्न मंदिर से प्रारम्भ हुआ। इसमें सबसे पहले 60 छायाचित्र तथा इस्लामी पुस्तक तथा 100 ग्रंथ रखे गए। एक अक्टूबर 1929 को इस संस्था को संग्रहालय में परिवर्तित कर दिया गया और कृष्णपुरा स्थित भवन, जहाँ वर्तमान में देवलालीकर कला वीथिका है, में दर्शकों के लिए प्रारंभ किया गया।

सन् 1930 में दसवीं शती की प्रतिमाएँ और प्रस्तर अभिलेख, उनके छापे, कुछ ताम्रपत्र संग्रहीत किए गए। सन् 1931 में यह संग्रहालय, जो शिक्षा विभाग के अधीन था, पुरातत्व विभाग को सौंप दिया गया। स्थानीय लोगों के रुझान को देखते हुए आगरा-बाम्बे मार्ग पर नवीन संग्रहालय भवन की स्थापना कर यहाँ पर संग्रहालय विधा के अनुरूप पुरावशेषों को प्रदर्शित किया गया। इस संग्रहालय का कुल क्षेत्रफल 10804 वर्गफुट है तथा यह दोमंजिला है।

इस संग्रहालय में पुरावशेषों के प्रदर्शन के लिए छः वीथिकाएँ बनाई गई हैं। स्थानीय संग्रहों के साथ-साथ मध्यप्रदेश में हुए उत्खननों से प्राप्त पुरावशेष, सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेषों के प्रदर्शन के साथ-साथ हिंगलाजगढ़ की परमारकालीन विशिष्ट प्रतिमाओं का संग्रह इस संग्रहालय के लिए महत्वपू्र्ण माना जाता है। प्रस्तर अभिलेखों व उनके छापों के साथ-साथ ताम्र पत्रों को भी प्रदर्शित किया गया है। प्राचीन मुद्रा प्रणाली को जानने के लिए मुद्रा प्रचलन से लेकर मुगलकालीन सिक्कों तक को प्रदर्शित किया गया है।

पुरावस्तु वीथी
यहाँ से संग्रहालय का वास्तविक प्रदर्शन प्रारंभ होता है। सबसे पहले पुरावस्तु वीथिका है, जिसमें मानव का विकास तथा उसकी संस्कृतियों के विस्तार को क्रमबद्ध रूप में प्रदर्शित किया गया है। इनमें प्रदेश के विभिन्न स्थानों से प्राप्त मानव एवं पशुओं के जीवाश्म तथा पाषाण कालीन उपकरण प्रदर्शित हैं। बताया गया है कि इसी दीर्घा में सिंधु-घाटी की सभ्यता से संबंधित मोहन-जोदड़ो के उत्खनन में प्राप्त अश्मोपकरण, ताम्र उपकरण आदि प्रदर्शित हैं। इनकी तिथि 2350 ईसा पूर्व के लगभग मानी जाती है।

मध्य प्रदेश के संग्रहालय
जीवन में एक बहुत ही अहम भूमिका है इतिहास की। ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़ा हुआ है मनुष्य। आइए मध्यप्रदेश के कुछ संग्रहालयों में हम इतिहास को करीब से देखें।
भोपाल के प्रसिद्ध बिड़ला संग्रहालय में विभिन्न प्रकार की सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक प्रतिमाएँ रखी गई हैं। आदिकाल में जब मनुष्य पत्थर इस्तेमाल करते थे उनके भी अंग यहाँ पर देखे जा सकते हैं।
सातवीं सदी से लेकर तेरहवीं सदी तक की ऐतिहासिक जगहों के चित्र प्रदर्शित किए गए हैं। पुराने सिक्के, पत्तों पर लिखे गए शब्द चित्र भी प्रदर्शित किए गए हैं। टेराकोटा से बनाई गई प्रतिमाएँ यहाँ पर प्रयोग की जाती हैं।
भोपाल में राष्ट्रीय (सेंट्रल) संग्रहालय 1949 में स्थापित किया गया था। चित्रकला, पौराणिक सिक्के जिन पर राजा महाराजाओं एवं अँग्रेज शासकों के चित्र बनाए गए। ऐसे सिक्के यहाँ पर पाए जाते हैं। ताँबे या पीतल से बनाई गई वस्तुएँ मिलती हैं। लकड़ी से बनाई गई वस्तुएँ प्रदर्शित की जाती हैं। हाथ से बनाए गए भिन्न प्रकार की प्रतिमाएँ, कढ़ाई की गई वस्तुएँ देखी जा सकती हैं।
भोपाल में भारत भवन एक अलग प्रकार का संग्रहालय है। रंग महल, अन्हद, शास्त्रीय संगीत के भवन वागर्थ पुस्कालय जहाँ पर कविताओं की पुस्तकें रखी गई हैं। बहारि रंगमंच जहाँ पर नाटक, खेल, हास्य रंग आयोजित किए जाते हैं। मुख्य रूप से रूपांकर चित्रालय में असंख्य प्रकार के चित्र प्रदर्शित करते हैं। रूपांकर में दो प्रकार की चित्रकला देखी जा सकती है।
एक स्थान है जहाँ पर वर्तमान के चित्र एवं नक्काशी की प्रतिमाएँ प्रदर्शित की गई हैं। परंतु कुछ विभागों में लोक गीत प्रस्तुत किए जाते हैं। 4000 के करीब वस्तुएँ मध्यप्रदेश से संग्रहित की गई हैं। विभिन्न जाति की संस्कृति एवं कला से चित्र के माध्यम से परिचित किए गए हैं। इस राज्य में विभिन्न प्रकार के चित्र नजर आते हैं। भिन्न क्षेत्रों से वस्तुएँ संग्रहालय में सुरक्षित रूप से प्रदर्शित कर दिए गए हैं। जीव, पक्षी एवं खिलौने के रूप में वस्तुएँ प्रदर्शित किए गए हैं।

ग्वालियर के पुरात्तात्त्विक संग्रहालय
वर्ष 1922 में इस संग्रहालय को स्थापित किया गया था। ताँबे की वस्तुओं पर सुंदर चित्र अंकित किए गए हैं। पत्थरों के स्तम्भ स्थापित किए गए हैं। टैराकौटा की प्रतिमाएँ वहाँ पर सजाई गई थीं। पद्‍मावती, बेसावनगर, उज्जयिनी एवं महेश्वर से पौराणिक वस्तुएँ मिली हैं।


साँची के पुरात्तात्त्विक संग्रहालय

राजा अशोक ने यहाँ पर स्तम्भ स्थापित किया था जिस पर शेर की मूर्ति लगाई गई थी। भगवान बुद्ध की प्रतिमाएँ श्रद्धापूवर्क स्थापित की गई थीं। भगवान गणेश की मूर्ति भी वहाँ पर है। साँची में सबसे प्रसिद्ध हैं सम्राट अशोक के बनाए गए स्तूप। मंदिर, मठ एवं स्तूप यहाँ पर स्थापित किए गए हैं।
केंद्रीय संग्रहालय
सन् 1929 में स्थापित संग्रहालय सबसे पुराना संग्रहालय है। मध्यप्रदेश के मालवा जिले में इस केंद्रीय संग्रहालय को स्थापित किया गया था। वहाँ पर विभिन्न प्रकार के चित्र, प्रतिमाएँ भी देखी जा सकती हैं।
ऐतिहासिक स्थलों की नगरी शिवपुरी
हल्की-हल्की बूँदों की वर्षा हो रही थी। प्रभात ने घने काले बादल की चुनरी ओढ़ रखी थी। सखियों के साथ मैं टाटा सफारी में सवार होकर आगरा-मुंबई राष्ट्रीय राजमार्ग पर जा रही थी कि हमें एक ढाबा खुला दिखाई दिया। प्रातः पाँच बजे थे, मन कर रहा था कि हमें गरमागरम चाय मिल जाए तो सफर तय करना और भी आसान हो जाएगा।

गाड़ी ढाबे के पास रुकी, हमारी नज़र कोयले की आँच पर बन रही चाय से निकलते धुएँ पर पड़ी एवं उसके साथ-साथ नाश्ते के लिए बाजरे की रोटी तथा सब्जी मिली। ढाबे के चारों ओर हरियाली नज़र आ रही थी, रंग-बिरंगे महुए एवं पलास के फूल खिले हुए थे जिन पर वर्षा की बूँदें मोती की तरह चमक रही थीं।

इंदौर से शिवपुरी तक का सफर हम लगभग तय कर चुके थे। गुना क्षेत्र से हम गुजरते हुए शिवपुरी ज़िले में पहुँचे। हमारी नज़र यहाँ के पहा़डों पर पड़ी, जिन पर हरियाली थी एवं घने जंगल स्थित थे। वादियों के मध्य प्रकृति की गोद से झरने बह रहे थे एवं उठती सूर्य की किरणों के प्रकाश में वे झिलमिलाते, बलखाते हुए नदियों की ओर बह रहे थे।

गुना जिले से हम जब शिवपुरी नगर की ओर गाड़ी में सफर कर रहे थे तब हमने देखा कि सिंध नदी गुना से उत्तर दिशा से बहती हुई भिड़ से चंबल नदी से जा मिलती है। शिवपुरी की चार मुख्य नदियाँ हैं सिंध, कूनो, बेतवा एवं पार्वती।

कहते हैं कि शिवपुरी का माधव नेशनल पार्क, विभिन्न प्रकार के वन्यजीवों के लिए बहुत ही प्रसिद्ध है। मुख्य रूप से नहार बाघ, तेंदुआ, लक्कड़ बग्घा, तरक्षु, भालू, सांभर आदि जानवर यहाँ पर पाए जाते हैं। वर्षा के आने से मोर अपने रंग-बिरंगे पंख को फैला देते हैं। उपस्थित जनता खूबसूरत दृश्य की प्रशंसा करने लगी तथा कैमरे से छायाचित्र लेने लगी।
नेशनल पार्क में पक्षी एवं जानवरों का हमने जीवंत रूप देखा। माधव विलास महल में सिंधिया राजवंश ग्रीष्म काल के समय निवास करते थे। वन वाटिका के मध्य स्थित यह महल गुलाब के फूल के समान प्रतीत हो रहा था। महल के भीतर कला की सुंदर मूर्तियाँ प्रदर्शित थीं। सुंदर आकृतियों वाले महल की छत से शिवपुरी नगर एवं माधव नेशनल पार्क नजर आते हैं। खूबसूरत चित्रकला से महल के विभिन्न कक्षों को सजाया गया था। अब यह महल भारत सरकार के अधीन है।
शिवपुरी में पर्यटक महाराजा एवं राजकुमारों द्वारा बनाई गई छतरियों को देखने आते हैं। इस ऐतिहासिक स्थल पर विभिन्न गाथाएँ एवं प्राचीन कहानियाँ सुन सकते हैं। ये छतरियाँ संगमरमर की हैं एवं इन पर सुंदर आकृतियाँ उकेरी गई हैं। सिंधिया राजकुमारों ने इन्हें मुगल वाटिका में स्थापित किया था। इस स्थान पर माधवराव सिंधिया की छतरी स्थित है उसी तरह महारानी सँख्याराजे सिंधिया की सुंदर छतरी भी है। हिंदू एवं इस्लामी के वास्तुशिल्पीय मिश्रित रूप नजर आते हैं। राजपूत एवं मुगल परम्पराओं के वास्तुशिल्पीय को रूपांतर करती कला दर्शकों को अपनी ओर आकृष्ट करती है।
ऐतिहासिक स्थलों के दर्शन करने में काफी देर हो गई थी। सूरज ढलने वाला था कि हमारी दृष्टि जॉर्ज किले की ओर आकर्षित हुई। सँख्या सागर के तट पर स्थित इस किले को जीवाजीराव सिंधिया ने निर्मित किया था। परंतु इस किले की एक विशेषता है जो अक्सर आम किलों के स्थान पर देखी नहीं जाती, वह यह है कि यह महल माधव नेशनल पार्क के अंदर स्थित है। इसलिए महल की सुंदरता और निखर उठती है जब किले के चारों ओर घने जंगल स्थित हैं।

प्राचीन महलों एवं प्रसिद्ध पर्यटक स्थलों के दर्शन कर जब हम वापस लौट रहे थे तब हमने वहाँ के स्थानीय रंगमंच एवं लोकगीत सुने जो आदिवासी लोगों ने पात्रों के माध्यम से दर्शाए थे। कार्यक्रम के अंत में हम होटल वापस लौट आए।

मिर्च-मसाला

कैटरीना ने छोड़ी अनुराग की फिल्म!
खबर है कि कैटरीना कैफ ने अनुराग बसु की फिल्म से अपने आपको अलग कर लिया हैं। इस फिल्म के नायक रणबीर कपूर हैं। गौरतलब है कि इस फिल्म को लेकर कैटरीना कैफ बेहद उत्साहित थी। फिल्म में उनका रोल भी चैलेंजिंग बताया जा रहा था। अचानक वे अलग क्यों हो गईं?
सूत्रों के मुताबिक कैटरीना के फिल्म से अलग होने का कारण हैं प्रियंका चोपड़ा। प्रियंका को अचानक फिल्म में शामिल कर लिया गया। हालाँकि उनका रोल छोटा है और वे इंटरवल के बाद नजर आएँगी, लेकिन कैटरीना चाहती हैं कि फिल्म में उनके अलावा और कोई नामी एक्ट्रेस ना हो।
साथ ही वे अनुराग से इस बात से भी नाराज हैं कि उन्होंने पहले नहीं बताया कि फिल्म में प्रियंका को भी शामिल किया जा सकता है। प्रियंका और कैटरीना में किसी तरह का विवाद नहीं है, लेकिन दोनों में प्रतिद्वंद्विता है।
उधर फिल्म से अलग होने के बारे में कैटरीना से जुड़े लोगों का कहना है कि कैटरीना अपने बैनर तले फिल्म शुरू करना चाहती हैं, इसलिए वे फिल्म से अलग हो गईं।