अब संरक्षण भी दीजिए जनाब!
खुश हो जाइए कि इतिहास रचा जा रहा है। 13 साल से एक जंग लड़ी जा रही है आबादी के आधे हिस्से द्वारा। महिला आरक्षण विधेयक के साथ ही एक किरण जन्म ले रही हैं कि आधी आबादी अपना हक पाने में सफल रहेगी। लेकिन एक बात जो अब तक समझ में नहीं आई कि इसका 13 सालों तक विरोध क्यों होता रहा? क्यों नहीं लागू हो सका ये अब तक? क्या महिला आरक्षण इतना भयावह है कि देश के कई नेता इसके लागू होने पर असुरक्षित हो जाएँगे? क्या महिलाएँ फिर इनके बस में नहीं रहेंगी?
या फिर हम इस तरह सोचें कि क्या इसके लागू होने भर से महिलाओं को सारी समस्याओं से मुक्ति मिल जाएगी? क्या सचमुच महिला आरक्षण बिल उन्हें इतना सशक्त कर देगा कि फिर कोई प्रतिभा दमन और हक मारने की गलत इबारत नहीं लिख सकेगा। सच थोड़ा सा अलग है। असल में इस बिल के बाद एक दूसरी जंग शुरू होगी।
कब हो सकेगा लागू?
यह बिल संविधान संशोधन विधेयक होने के कारण राज्यसभा और लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत से पारित होना जरूरी है। इसके बाद, आधी विधानसभाओं (15) से दो-तिहाई बहुमत से पास होने के बाद यह कानून का रूप धारण कर सकेगा।
अगर हो गया लागू
इस विधेयक के बाद हर 10 साल में चुनावी सीटों पर रोटेशन होगा।। इस पक्ष पर अभी पूरी तरह से ध्यान नहीं दिया गया है। इसका एक पक्ष यह है कि कोई भी सदस्य अब अपने निर्वाचन क्षेत्र को अपनी प्रॉपर्टी नहीं समझ सकता। क्योंकि नियमानुसार यह अब बदलता रहेगा। ऐसे में बरसों से एक ही सुरक्षित सीट पर चुनाव लड़ने का और कम मेहनत में जमी जमाई मलाई खाने का नेताओं का मजा किरकिरा हो जाएगा।
किन्तु जो नेता अपने निर्वाचन क्षेत्र को लेकर सचमुच गंभीर होते हैं उनकी दिलचस्पी अब अपने क्षेत्र से घटेगी। क्योंकि निर्वाचन क्षेत्र स्थायी न रहने से उन्हें बस तात्कालिक फायदे वाले मुद्दे ही नजर आएँगे। लंबे समय से अटके विकास कार्य या लंबे समय के लिए आरंभ होने वाली योजनाएँ हाथ में लेने से वे कतराएँगे।
किसके लिए है और कौन लाभान्वित
यहाँ थोड़ा सा संतुलित और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है। कहीं ऐसा तो नहीं कि वंचितों के लिए लागू यह विधेयक स्थापित नेताओं के घरों की महिलाओं को ही कृतार्थ करें? या फिर आरक्षण के नाम पर टिकट वितरण हो और ताबड़तोड़ पाने की लालसा में महिला शोषण का नया रास्ता खुल जाए? ऐसा नहीं है कि हम महिला आरक्षण बिल के विरुद्ध हैं लेकिन उसके हर पहलू को समझना भी जरूरी है। इसका लाभ हर उस महिला तक पहुँचे जो सदियों से इसकी अधिकारिणी है, यह जिम्मेदारी कौन लेगा?
विरोध के लिए विरोध
राजनीति की बिसात पर जिन्हें बस विरोध ही करना है, वे अपनी समझ के दरवाजे कभी नहीं खोलेंगे। आखिर क्यों महिला दिवस के शताब्दी वर्ष में भी महिलाओं को अपने लिए इस तरह के संघर्षों का सामना करना पड़ रहा है? इस बिल से नेता इतने अधिक आतंकित है कि उपराष्ट्रपति के हाथों से बिल की प्रतियाँ फाड़ देने पर मजबूर हो गए? शर्म आती है इन्हें अपना प्रतिनिधि कहते हुए। एक स्वस्थ और अनिवार्य बहस के लिए आज भी महिलाएँ इन्हीं की मुखापेक्षी हैं। ये कैसे नेता हैं, महिलाओं की प्रतिभा से डरते हैं या अपनी ही असलियत के सामने आ जाने से?
आरक्षण के साथ संरक्षण भी
ये बात विरोध कर रहे नेता भी भली भाँति जानते हैं कि महिलाओं को अगर एक स्वस्थ, सुरक्षित और सहज वातावरण भर मिल जाए तो वे कभी इन पर निर्भर नहीं है। लेकिन चुँकि खुला संतुलित और संयमित माहौल देना उनके बस का नहीं है इसलिए आरक्षण की जरूरत आन पड़ी। अगर पहले ही महिलाओं को उनके सहज नैसर्गिक अधिकार मिल गए होते तो जरूरत किसे थी आरक्षण की?
महिलाएँ सक्षम हैं स्वयं को साबित करने के लिए मगर बात सिर्फ मौके की है जो कुछ लोग देना नहीं चाहते। अगर आज भी पुरुष थोड़ा सा उदार हो जाए तो सदियों का अत्याचार भी भुला देने को तैयार है औरतें। मगर असल मुश्किल तो यही है। पिछड़ने के डर से ये नेता बिल को पछाड़ने में लगे हैं।
आरक्षण से लगाम
यह सच है कि महिलाएँ अब बदल रही है। इतनी तेजी से कि पुरुष चौंक सा गया है। आरक्षण की छड़ी मिलने से उसकी मुखरता और प्रखरता बढ़ेंगी इसमें कोई शक नहीं। उसके सपने भी बदलेंगे और सपनों को पूरा करने का तरीका भी। एक लगाम उन बेलगामों पर भी कसेंगी जिनके लिए आज भी महिला इस्तेमाल की 'चीज' है।
उम्मीदें जिन्दा हैं
यह सदियों का स्वीकारा हुआ सच है कि महिलाओं को जो कुछ भी मिला है वह सहजता से नहीं मिला है। संघर्ष की एक लंबी दास्ताँ उसे लिखनी ही पड़ी है। आरक्षण भला कैसे आसानी से मिल जाएगा? लेकिन यह सच भी उतना ही चमकदार है कि लड़ाई हमेशा उसने जीती है, क्योंकि हारना उसे नहीं आता। उम्मीद कीजिए कि सौ साल के सफर में हम अढ़ाई कोस से आगे निकल आए। उम्मीदें अभी जिन्दा हैं।
सोमवार, 8 मार्च 2010
वन्य-जीवन
तस्करों के निशाने पर वन्य जीव
कोलकाता चिड़ियाघर से बहुमूल्य ब्राजीलियाई बंदरों की चोरी वन्य जीवों की चोरी की सबसे बड़ी घटना मानी जा रही है। संकेत हैं कि पश्चिम एशिया, दक्षिण एशिया और यूरोप के देशों में सक्रिय तस्कर नेटवर्क की निगाह अब भारत के चिड़ियाघरों पर आ टिकी है।
छोटे-छोटे ब्राजीलियाई बंदर और बड़े-बड़े विवाद। कोलकाता चिड़ियाघर से आठ ब्राजीलियाई बंदरों की चोरी की घटना ने वन्य जीवों की तस्करी के अंतरराष्ट्रीय रैकेट में कोलकाता को भी शामिल कर दिया। स्थानीय स्तर पर कछुआ, कई तरह के पक्षी और वन्य जीवों की हड्डियाँ व उनके अंगों की तस्करी की घटनाएँ सामने आती रही हैं लेकिन उनका दायरा लंदन, थाईलैंड से आगे नहीं जा पाया।
ब्राजीलियाई बंदरों की चोरी से साफ हो गया है कि वन्य जीव तस्करों के नेटवर्क जापान, मलेशिया आदि पूरब के देशों के साथ ही इंग्लैंड, जर्मनी, फ्रांस और अमेरिका तक भी फैल चुका है। अगस्त के मध्य में कोलकाता चिड़ियाघर से पिंजड़ा काटकर आठ ब्राजीलियाई बंदरों (मरमोसेट) को चुरा लिया गया। तीन वयस्क नर, तीन वयस्क मादा और दो शिशु।
कीमत अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तीन हजार डॉलर प्रति जोड़ा। भारतीय बाजार में कम से कम सवा लाख रुपए जोड़ा। बंदरों की चोरी की घटना सामने आते ही पहले तो राजनीतिक तूफान उठा। बात-बात पर सत्ताधारी वाममोर्चा को घेरने वाली विपक्ष ने चिड़ियाघर में हुई इस चोरी को भी राजनीतिक मुद्दा बना लिया है।
मरमोसेट बंदरों के दिमाग से बने व्यंजन चीन और मलेशिया में बेहद लोकप्रिय हैं लेकिन इनका ज्यादा इस्तेमाल दक्षिण एशिया, पश्चिम एशिया और दक्षिण अमेरिका की दवा बनाने वाली कंपनियाँ शोध कार्य में कर रही हैं। पहले कांग्रेस, फिर तृणमल कांग्रेस का लगातार धरना-प्रदर्शन फिर सेंट्रल जू अथॉरिटी की विभागीय कार्रवाई लेकिन कोलकाता पुलिस की जाँच में बंदरों के बारे में कोई सुराग नहीं लग पाया है। इन सारे हड़बोंग के बीच वन्य जीवों की तस्करी के अंतर्राष्ट्रीय रैकेट की चर्चा बंगाल से ब्रिटेन तक तूल पकड़ गई है।
कोलकाता चिड़ियाघर से बंदरों की इस चोरी को वन्य जीवों की सबसे बड़ी चोरी माना जा रहा है। वन्य जीव प्रेमी संगठनों के कर्ता-धर्ताओं का दावा है कि बगैर प्रशासनिक अधिकारियों की मिलीभगत के मूल्यवान जीवों की इस कदर चोरी नहीं हो सकती। कोलकाता में बंदरों की चोरी की घटना के दो हफ्ते पहले मुंबईClick here to see more news from this city हवाई अड्डे पर एक थाई नागरिक को गिरफ्तार कर उसके कब्जे से पाँच ऐसे बंदर बरामद किए गए।
उसने बंदरों को बक्से में पैक कर रखा था। तीन मर चुके थे। थाई नागरिक कहीं बाहर से आया था। वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन सोसाइटी ऑफ इंडिया की संस्थापक बेलिंडा राइट के अनुसार, मुंबई की बरामदगी और कोलकाता की घटना में कोई लिंक हो सकता है। राइट के अनुसार, इस प्रजाति के बंदरों की यूरोप के तस्करों में काफी माँग है।
इंग्लैंड के चिड़ियाघरों से अक्सर दर्जनों की संख्या में ऐसे बंदरों की चोरी की खबरें आती हैं। इसी साल जुलाई में दक्षिण लंदन के चिड़ियाघर से चोरी की घटना हुई है। राइट के अनुसार, पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया में ऐसे बंदरों के खरीददार बहुत हैं।
पश्चिम बंगाल के प्रिंसीपल चीफ कंजरवेटर ऑफ फॉरेस्ट अतनु राहा के अनुसार, कोलकाता चिड़ियाघर से चोरी में अंतर्राष्ट्रीय स्तर के तस्करों का हाथ है। इसमें दो राय नहीं। यहाँ की चोरी विश्व भर में कुछ बड़ी चोरियों से मेल खाली है। अगस्त 2004 में स्कॉटलैंड के ओबान जूलॉजिकल वर्ल्ड से 15 बंदर चुराए गए।
जून 2006 में पूर्वी ससेक्स प्रांत से पाँच मरमोसेट, उसी दौरान इंग्लैंड के एक्सूमर चिडि़याघर से 11 मरमोसेट और जून 2007 में अमेरिका के सेवियरविले से दो मरमोसेट चुराए गए। तो क्या यह मान लेना चाहिए कि अंतर्राष्ट्रीय तस्करों के निशाने पर भारत के चिडि़याघर है? वन्य जीव विशेषज्ञ प्राणवेश सान्याल के अनुसार, अब शेर की खाल, पंजे और मगरमच्छ की खाल ही नहीं, भारत के चिडि़याघरों से अमूल्य प्राणी संपदा पर भी तस्करों की नजर है।
कोलकाता आसान ट्रांजिट प्वाइंट बनता जा रहा है। कोलकाता से मुंबई और बंगलौर, फिर वहाँ से विदेशों को। साथ ही, उत्तर बंगाल के सिलीगुड़ी होकर नेपाल के रास्ते और सुंदरवन होकर बांग्लादेश के रास्ते आसान रास्ते हैं। ये बंदर आकार में छोटे होते हैं और इन्हे छुपाकर कहीं भी ले जाया जा सकता है।
मरमोसेट बंदरों के दिमाग से बने व्यंजन चीन और मलेशिया में बेहद लोकप्रिय हैं लेकिन इनका ज्यादा इस्तेमाल दक्षिण एशिया, पश्चिम एशिया और दक्षिण अमेरिका की दवा बनाने वाली कंपनियाँ शोध कार्य में कर रही हैं। शोध के अनुसार कॉमन मरमोसेट (जिस प्रजाति के बंदर कोलकाता में चुराए गए है) और मानव में 88 से 97 फीसदी जेनेटिक समानता होती है।
1960 के बाद से टॉक्सिकोलॉजी, इम्यूनोलॉजी, फर्टिलिटी, के लिए बॉयोमेडिकल-रिसर्च में मरमोसेट का इस्तेमाल शुरू हो गया। मरमोसेट बंदरों पर प्रयोग से ही पर्किसंस डिसीज की एक दवा विकसित करने में कामयाबी मिली है। बहरहाल, देश के चिडि़याघरों से हुई वन्य जीवों की चोरी देश की अब तक की सबसे बड़ी चोरी मानी जा रही है कोलकाता चिडि़याघर से आठ मरमोसेट की चोरी।
सेंट्रल जू अथॉरिटी अपने तरीके से सक्रिय हो चुका है। उसने चिडि़याघर के निदेशक को बर्खारत करते हुए राज्य सकरकार से कैफियत तलब की है। सेंट्रल जू अथॉरिटी ने इस मामले में भितरघात का शक जताते हुए राज्य सरकार को पत्र भेजा है और राज्य सरकार द्वारा चिडि़याघर चलाने के अधिकार पर भी सवाल उठाया है।
ऐसे में बंगाल सरकार की ओर से राज्य का वन विभाग, पुलिस और अन्य संबंधित विभागों की जाँच की कवायद लाजिमी है। फिलहाल तो इस घटना से यह संकेत साफ है कि कोलकाता भी अब वन्य जीवों की तस्करी में शामिल बड़े अंतर्राष्ट्रीय गिरोहों के रडार पर आ गया है।
कोलकाता चिड़ियाघर से बहुमूल्य ब्राजीलियाई बंदरों की चोरी वन्य जीवों की चोरी की सबसे बड़ी घटना मानी जा रही है। संकेत हैं कि पश्चिम एशिया, दक्षिण एशिया और यूरोप के देशों में सक्रिय तस्कर नेटवर्क की निगाह अब भारत के चिड़ियाघरों पर आ टिकी है।
छोटे-छोटे ब्राजीलियाई बंदर और बड़े-बड़े विवाद। कोलकाता चिड़ियाघर से आठ ब्राजीलियाई बंदरों की चोरी की घटना ने वन्य जीवों की तस्करी के अंतरराष्ट्रीय रैकेट में कोलकाता को भी शामिल कर दिया। स्थानीय स्तर पर कछुआ, कई तरह के पक्षी और वन्य जीवों की हड्डियाँ व उनके अंगों की तस्करी की घटनाएँ सामने आती रही हैं लेकिन उनका दायरा लंदन, थाईलैंड से आगे नहीं जा पाया।
ब्राजीलियाई बंदरों की चोरी से साफ हो गया है कि वन्य जीव तस्करों के नेटवर्क जापान, मलेशिया आदि पूरब के देशों के साथ ही इंग्लैंड, जर्मनी, फ्रांस और अमेरिका तक भी फैल चुका है। अगस्त के मध्य में कोलकाता चिड़ियाघर से पिंजड़ा काटकर आठ ब्राजीलियाई बंदरों (मरमोसेट) को चुरा लिया गया। तीन वयस्क नर, तीन वयस्क मादा और दो शिशु।
कीमत अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तीन हजार डॉलर प्रति जोड़ा। भारतीय बाजार में कम से कम सवा लाख रुपए जोड़ा। बंदरों की चोरी की घटना सामने आते ही पहले तो राजनीतिक तूफान उठा। बात-बात पर सत्ताधारी वाममोर्चा को घेरने वाली विपक्ष ने चिड़ियाघर में हुई इस चोरी को भी राजनीतिक मुद्दा बना लिया है।
मरमोसेट बंदरों के दिमाग से बने व्यंजन चीन और मलेशिया में बेहद लोकप्रिय हैं लेकिन इनका ज्यादा इस्तेमाल दक्षिण एशिया, पश्चिम एशिया और दक्षिण अमेरिका की दवा बनाने वाली कंपनियाँ शोध कार्य में कर रही हैं। पहले कांग्रेस, फिर तृणमल कांग्रेस का लगातार धरना-प्रदर्शन फिर सेंट्रल जू अथॉरिटी की विभागीय कार्रवाई लेकिन कोलकाता पुलिस की जाँच में बंदरों के बारे में कोई सुराग नहीं लग पाया है। इन सारे हड़बोंग के बीच वन्य जीवों की तस्करी के अंतर्राष्ट्रीय रैकेट की चर्चा बंगाल से ब्रिटेन तक तूल पकड़ गई है।
कोलकाता चिड़ियाघर से बंदरों की इस चोरी को वन्य जीवों की सबसे बड़ी चोरी माना जा रहा है। वन्य जीव प्रेमी संगठनों के कर्ता-धर्ताओं का दावा है कि बगैर प्रशासनिक अधिकारियों की मिलीभगत के मूल्यवान जीवों की इस कदर चोरी नहीं हो सकती। कोलकाता में बंदरों की चोरी की घटना के दो हफ्ते पहले मुंबईClick here to see more news from this city हवाई अड्डे पर एक थाई नागरिक को गिरफ्तार कर उसके कब्जे से पाँच ऐसे बंदर बरामद किए गए।
उसने बंदरों को बक्से में पैक कर रखा था। तीन मर चुके थे। थाई नागरिक कहीं बाहर से आया था। वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन सोसाइटी ऑफ इंडिया की संस्थापक बेलिंडा राइट के अनुसार, मुंबई की बरामदगी और कोलकाता की घटना में कोई लिंक हो सकता है। राइट के अनुसार, इस प्रजाति के बंदरों की यूरोप के तस्करों में काफी माँग है।
इंग्लैंड के चिड़ियाघरों से अक्सर दर्जनों की संख्या में ऐसे बंदरों की चोरी की खबरें आती हैं। इसी साल जुलाई में दक्षिण लंदन के चिड़ियाघर से चोरी की घटना हुई है। राइट के अनुसार, पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया में ऐसे बंदरों के खरीददार बहुत हैं।
पश्चिम बंगाल के प्रिंसीपल चीफ कंजरवेटर ऑफ फॉरेस्ट अतनु राहा के अनुसार, कोलकाता चिड़ियाघर से चोरी में अंतर्राष्ट्रीय स्तर के तस्करों का हाथ है। इसमें दो राय नहीं। यहाँ की चोरी विश्व भर में कुछ बड़ी चोरियों से मेल खाली है। अगस्त 2004 में स्कॉटलैंड के ओबान जूलॉजिकल वर्ल्ड से 15 बंदर चुराए गए।
जून 2006 में पूर्वी ससेक्स प्रांत से पाँच मरमोसेट, उसी दौरान इंग्लैंड के एक्सूमर चिडि़याघर से 11 मरमोसेट और जून 2007 में अमेरिका के सेवियरविले से दो मरमोसेट चुराए गए। तो क्या यह मान लेना चाहिए कि अंतर्राष्ट्रीय तस्करों के निशाने पर भारत के चिडि़याघर है? वन्य जीव विशेषज्ञ प्राणवेश सान्याल के अनुसार, अब शेर की खाल, पंजे और मगरमच्छ की खाल ही नहीं, भारत के चिडि़याघरों से अमूल्य प्राणी संपदा पर भी तस्करों की नजर है।
कोलकाता आसान ट्रांजिट प्वाइंट बनता जा रहा है। कोलकाता से मुंबई और बंगलौर, फिर वहाँ से विदेशों को। साथ ही, उत्तर बंगाल के सिलीगुड़ी होकर नेपाल के रास्ते और सुंदरवन होकर बांग्लादेश के रास्ते आसान रास्ते हैं। ये बंदर आकार में छोटे होते हैं और इन्हे छुपाकर कहीं भी ले जाया जा सकता है।
मरमोसेट बंदरों के दिमाग से बने व्यंजन चीन और मलेशिया में बेहद लोकप्रिय हैं लेकिन इनका ज्यादा इस्तेमाल दक्षिण एशिया, पश्चिम एशिया और दक्षिण अमेरिका की दवा बनाने वाली कंपनियाँ शोध कार्य में कर रही हैं। शोध के अनुसार कॉमन मरमोसेट (जिस प्रजाति के बंदर कोलकाता में चुराए गए है) और मानव में 88 से 97 फीसदी जेनेटिक समानता होती है।
1960 के बाद से टॉक्सिकोलॉजी, इम्यूनोलॉजी, फर्टिलिटी, के लिए बॉयोमेडिकल-रिसर्च में मरमोसेट का इस्तेमाल शुरू हो गया। मरमोसेट बंदरों पर प्रयोग से ही पर्किसंस डिसीज की एक दवा विकसित करने में कामयाबी मिली है। बहरहाल, देश के चिडि़याघरों से हुई वन्य जीवों की चोरी देश की अब तक की सबसे बड़ी चोरी मानी जा रही है कोलकाता चिडि़याघर से आठ मरमोसेट की चोरी।
सेंट्रल जू अथॉरिटी अपने तरीके से सक्रिय हो चुका है। उसने चिडि़याघर के निदेशक को बर्खारत करते हुए राज्य सकरकार से कैफियत तलब की है। सेंट्रल जू अथॉरिटी ने इस मामले में भितरघात का शक जताते हुए राज्य सरकार को पत्र भेजा है और राज्य सरकार द्वारा चिडि़याघर चलाने के अधिकार पर भी सवाल उठाया है।
ऐसे में बंगाल सरकार की ओर से राज्य का वन विभाग, पुलिस और अन्य संबंधित विभागों की जाँच की कवायद लाजिमी है। फिलहाल तो इस घटना से यह संकेत साफ है कि कोलकाता भी अब वन्य जीवों की तस्करी में शामिल बड़े अंतर्राष्ट्रीय गिरोहों के रडार पर आ गया है।
तारे-सितारे
मार्च 2010 : क्या कहती हैं आपकी राशि
मेष : मेष राशि वाले जातकों के लिए यह मंथ फैमिली में खुशी वाला रहेगा। परंतु आलस्य के कारण भाग्य में रुकावट हो सकती है। हर कदम सोच-समझकर उठाएँ। बिजनेसमैन को लाभ मिलेगा। शारीरिक सुख मिलेगा। शत्रुओं से सतर्क रहें, परेशानी में डाल सकते हैं। दि. 1, 10, 18 और 29 शुभ नहीं हैं।
वृषभ : वृषभ राशि वाले जातकों के लिए यह मंथ लाँग जर्नी वाला रहेगा। परंतु सम्मान को लेकर हानि हो सकती है। लंबी बीमारी से छुटकारा मिलेगा। समय की बर्बादी ज्यादा होगी, कार्य कम होंगे। हाई एंबिशन पूरी नहीं होगी। समझदारी से काम लें। व्यापार मध्यम रहेगा। पुराना प्यार लौटकर आएगा। दि. 9, 13, 22, 30 आपके लिए शुभ नहीं है।
मिथुन : मिथुन राशि वाले जातकों के लिए यह मंथ प्रमोशन वाला रहेगा। इस मंथ में अचानक यात्रा (धार्मिक) का योग बनेगा। इस मंथ में आप सोचकर कार्य करें, कोई मीठा बनकर आपको लूट सकता है। बिजनेस में पिछले माह की तुलना में अधिक लाभ मिलेगा।
कर्क : कर्क राशि वालों के लिए यह मंथ मिलाजुला रहेगा। बेवजह उलझनें आएँगी। डेली रूटीन के कामों में अधिक मेहनत से सक्सेस मिलेगी। बिजनेस में प्रॉफिट मिलेगा। हेल्थ के प्रति अवेयर रहें। फाइनेंशियली प्रॉब्लम आ सकती है। गणेश की आराधना करें, राहत मिलेगी। दिनांक 9, 14, 28 शुभ नहीं है। भाई से कष्ट के योग।
सिंह : सिंह राशि वाले जातकों के लिए यह मंथ प्रमोशन वाला रहेगा। फैमिली में कलह का माहौल रहेगा। भाई-बहन को कष्ट के योग बनते हैं। युवाओं के लिए मौज-मस्ती से यह माह गुजरेगा। आपको कहीं से आकस्मिक लाभ मिल सकता है। जरूरत का कोई बड़ा सामान घर में आएगा।
कन्या : कन्या राशि वालों के लिए इस माह धार्मिक यात्रा का योग बनता है, भवन निर्माण पूर्ण होगा। समाज में प्रतिष्ठा बनेगी, नौकरी वालों को प्रमोशन मिलेगा। सामाजिक एवं राजनैतिक हलचल बढ़ेगी। आर्थिक विकास होगा, माता से सहयोग मिलेगा। किसी के कहने में आकर ऐसे कदम न उठाएँ जिससे आप तकलीफ में आ जाएँ। 9, 13, 25 शुभ नहीं है।
तुला : तुला राशि वालों के लिए यह मंथ इकॉनॉमिक डेवलपमेंट वाला रहेगा। मनोकामनाएँ पूर्ण होगी। पुराने फ्रेंड्स से सहयोग प्राप्त होगा। घर में कोई मांगलिक कार्य के योग हैं। नौकरी में प्रमोशन के योग बनते हैं। घर का ध्यान रखें। दि. 4, 8, 26, 30 शुभ नहीं हैं। मंडे को शिव की आराधना करें। लाभ मिलेगा।
वृश्चिक : वृश्चिक राशि के लिए यह मंथ बौद्धिक कार्यों में सफलता वाला रहेगा। आर्थिक व्यवस्था सामान्य रहेगी। मानसिकता का ध्यान रखें, अच्छी सोच उन्नति देगी। जर्नी के योग बनते हैं। पुराने प्रेमी से मिलन के योग बनते हैं। नए फ्रेंड्स के बहकावे में आकर गलत कार्य न करें। दिनांक 21, 28 शुभ नहीं हैं।
धनु : धनु राशि वाले जातकों के लिए यह मंथ मिश्रित फल वाला रहेगा। सर्विस में बड़े अधिकारी से परेशानी आ सकती है, उनके अनुसार चलने पर ठीक रहेगा। किसी मिलने वाले से झगड़े के योग बनते हैं। सतर्कता बनाए रखें। अपने वाले से धोखा हो सकता है। राजनैतिक सफलता होगी। दिनांक 10, 16 और 23 अशुभ है।
मकर : मकर राशि वालों के लिए यह मंथ मान-सम्मान वाला रहेगा। दूसरे लोगों को निराशा होगी। वाहन दुर्घटना का योग बनता है, सावधानी बरतें। प्रभु हनुमान की सेवा करें। उच्चाधिकारी से सहयोग प्राप्त होगा। खर्च अधिक होगा। दिनांक 23, 25, 29 शुभ नहीं हैं, सावधानी रखें।
कुंभ : कुंभ राशि वालों के लिए यह मंथ सांसारिक सुख भोग वाला रहेगा। गृहस्थी में मधुरता से लाभ मिलेगा, इस मंथ आपके विरोधी पराजित होंगे। प्रतिष्ठा बढ़ेगी। माता-पिता का ध्यान रखें, गुरु सेवा से लाभ मिलेगा।
मीन : मीन राशि वाले जातकों के लिए यह मंथ विरोधियों पर विजय वाला रहेगा। कोर्ट केस से छुटकारा मिलेगा, परिवार की समस्या का समाधान शीघ्र हो जाएगा। स्टूडेंट्स को रुकावट का सामना करना पड़ेगा। शारीरिक कष्ट के योग हैं। पेट संबंधी बीमारी हो सकती है। पुराने फ्रेंड्स के सहयोग से लाभ मिलेगा। धार्मिक कार्य में सहयोग से मन प्रसन्न रहेगा। दिनांक 18, 26 और 29 शुभ नहीं है।
मेष : मेष राशि वाले जातकों के लिए यह मंथ फैमिली में खुशी वाला रहेगा। परंतु आलस्य के कारण भाग्य में रुकावट हो सकती है। हर कदम सोच-समझकर उठाएँ। बिजनेसमैन को लाभ मिलेगा। शारीरिक सुख मिलेगा। शत्रुओं से सतर्क रहें, परेशानी में डाल सकते हैं। दि. 1, 10, 18 और 29 शुभ नहीं हैं।
वृषभ : वृषभ राशि वाले जातकों के लिए यह मंथ लाँग जर्नी वाला रहेगा। परंतु सम्मान को लेकर हानि हो सकती है। लंबी बीमारी से छुटकारा मिलेगा। समय की बर्बादी ज्यादा होगी, कार्य कम होंगे। हाई एंबिशन पूरी नहीं होगी। समझदारी से काम लें। व्यापार मध्यम रहेगा। पुराना प्यार लौटकर आएगा। दि. 9, 13, 22, 30 आपके लिए शुभ नहीं है।
मिथुन : मिथुन राशि वाले जातकों के लिए यह मंथ प्रमोशन वाला रहेगा। इस मंथ में अचानक यात्रा (धार्मिक) का योग बनेगा। इस मंथ में आप सोचकर कार्य करें, कोई मीठा बनकर आपको लूट सकता है। बिजनेस में पिछले माह की तुलना में अधिक लाभ मिलेगा।
कर्क : कर्क राशि वालों के लिए यह मंथ मिलाजुला रहेगा। बेवजह उलझनें आएँगी। डेली रूटीन के कामों में अधिक मेहनत से सक्सेस मिलेगी। बिजनेस में प्रॉफिट मिलेगा। हेल्थ के प्रति अवेयर रहें। फाइनेंशियली प्रॉब्लम आ सकती है। गणेश की आराधना करें, राहत मिलेगी। दिनांक 9, 14, 28 शुभ नहीं है। भाई से कष्ट के योग।
सिंह : सिंह राशि वाले जातकों के लिए यह मंथ प्रमोशन वाला रहेगा। फैमिली में कलह का माहौल रहेगा। भाई-बहन को कष्ट के योग बनते हैं। युवाओं के लिए मौज-मस्ती से यह माह गुजरेगा। आपको कहीं से आकस्मिक लाभ मिल सकता है। जरूरत का कोई बड़ा सामान घर में आएगा।
कन्या : कन्या राशि वालों के लिए इस माह धार्मिक यात्रा का योग बनता है, भवन निर्माण पूर्ण होगा। समाज में प्रतिष्ठा बनेगी, नौकरी वालों को प्रमोशन मिलेगा। सामाजिक एवं राजनैतिक हलचल बढ़ेगी। आर्थिक विकास होगा, माता से सहयोग मिलेगा। किसी के कहने में आकर ऐसे कदम न उठाएँ जिससे आप तकलीफ में आ जाएँ। 9, 13, 25 शुभ नहीं है।
तुला : तुला राशि वालों के लिए यह मंथ इकॉनॉमिक डेवलपमेंट वाला रहेगा। मनोकामनाएँ पूर्ण होगी। पुराने फ्रेंड्स से सहयोग प्राप्त होगा। घर में कोई मांगलिक कार्य के योग हैं। नौकरी में प्रमोशन के योग बनते हैं। घर का ध्यान रखें। दि. 4, 8, 26, 30 शुभ नहीं हैं। मंडे को शिव की आराधना करें। लाभ मिलेगा।
वृश्चिक : वृश्चिक राशि के लिए यह मंथ बौद्धिक कार्यों में सफलता वाला रहेगा। आर्थिक व्यवस्था सामान्य रहेगी। मानसिकता का ध्यान रखें, अच्छी सोच उन्नति देगी। जर्नी के योग बनते हैं। पुराने प्रेमी से मिलन के योग बनते हैं। नए फ्रेंड्स के बहकावे में आकर गलत कार्य न करें। दिनांक 21, 28 शुभ नहीं हैं।
धनु : धनु राशि वाले जातकों के लिए यह मंथ मिश्रित फल वाला रहेगा। सर्विस में बड़े अधिकारी से परेशानी आ सकती है, उनके अनुसार चलने पर ठीक रहेगा। किसी मिलने वाले से झगड़े के योग बनते हैं। सतर्कता बनाए रखें। अपने वाले से धोखा हो सकता है। राजनैतिक सफलता होगी। दिनांक 10, 16 और 23 अशुभ है।
मकर : मकर राशि वालों के लिए यह मंथ मान-सम्मान वाला रहेगा। दूसरे लोगों को निराशा होगी। वाहन दुर्घटना का योग बनता है, सावधानी बरतें। प्रभु हनुमान की सेवा करें। उच्चाधिकारी से सहयोग प्राप्त होगा। खर्च अधिक होगा। दिनांक 23, 25, 29 शुभ नहीं हैं, सावधानी रखें।
कुंभ : कुंभ राशि वालों के लिए यह मंथ सांसारिक सुख भोग वाला रहेगा। गृहस्थी में मधुरता से लाभ मिलेगा, इस मंथ आपके विरोधी पराजित होंगे। प्रतिष्ठा बढ़ेगी। माता-पिता का ध्यान रखें, गुरु सेवा से लाभ मिलेगा।
मीन : मीन राशि वाले जातकों के लिए यह मंथ विरोधियों पर विजय वाला रहेगा। कोर्ट केस से छुटकारा मिलेगा, परिवार की समस्या का समाधान शीघ्र हो जाएगा। स्टूडेंट्स को रुकावट का सामना करना पड़ेगा। शारीरिक कष्ट के योग हैं। पेट संबंधी बीमारी हो सकती है। पुराने फ्रेंड्स के सहयोग से लाभ मिलेगा। धार्मिक कार्य में सहयोग से मन प्रसन्न रहेगा। दिनांक 18, 26 और 29 शुभ नहीं है।
वामा
नम्रता कहो 'बच्चन' नहीं
फिल्म जैसे भड़कीले माध्यम और अथाह ग्लैमर के बीच कला के किसी और माध्यम के साधक के रूप में एक फिल्मी परिवार से आकर अपनी पहचान बनाना एक मुश्किल चुनौती है। ऐसे ही परिवेश में नम्रता बच्चन का आना और फिल्मों से दूर अपनी कविताओं और पेंटिंग से कला की दुनिया में अपनी जगह बनाना आसान तो नहीं रहा होगा लेकिन जब पेंटिंग की दुनिया में उसकी तुलना अमृता शेरगिल से की जाती हो तो कहा जा सकता है कि उसके काम में कुछ तो बात होगी ही।
पतली और छोटे कद की नम्रता पिछले दिनों दिल्ली में अपनी पेंटिंग प्रदर्शनी के दौरान विशुद्ध कलाकार की तरह दिखीं। वे अमिताभ, ऐश्वर्या, अभिषेक, जया और श्वेता नंदा के बीच कला के एक नितांत अलग से क्षेत्र में अपनी प्रतिभा दिखा रही हैं।
1976 में हरिवंशराय बच्चन के छोटे बेटे और अमिताभ बच्चन के छोटे भाई अजिताभ तथा रमोला के घर मुंबई में जन्मी नम्रता की पढ़ाई पहले स्विट्जरलैंड और इंग्लैंड में हुई। फिर उन्होंने फाईन आर्ट के तहत पेंटिंग और आर्ट हिस्ट्री में बैचलर डिग्री रोड आइलैंड स्कूल ऑफ डिजाइन से ली। बाद में ग्राफिक डिजाइन की डिग्री न्यूयॉर्क के पारसन स्कूल ऑफ डिजाइन से ली। 2003 से वे मुंबई में रह रही हैं।
अपने बारे में नम्रता कहती हैं-'चूँकि मैं स्वभाव से बहुत शांत हूँ, इसलिए हर वक्त आसपास की चौकस निगाहें मुझे सुविधाजनक नहीं लगती हैं। हाँ मैं पैदाइशी बच्चन हूँ लेकिन प्रसिद्धि सिर्फ नाम के साथ ही नहीं आती है। हमारे परिवार का इतिहास गौरवपूर्ण रहा है। हाँ, सार्वजनिक तौर पर इसके अपने फायदे भी हैं लेकिन यहाँ हर तलवार दो-धारी है। जब समय अच्छा होता है तो हम अच्छे, लेकिन जब समय अच्छा नहीं है तो सब कुछ धुल जाता है।
इसलिए मुझे अकेले रहना अच्छा लगता है। मैं जानती हूँ कि प्रसिद्धि स्वभाव से बहुत चंचल होती है।' अपने दादा हरिवंशराय बच्चन की 102वीं जयंती के मौके पर उनकी प्रसिद्ध किताब 'मधुशाला' के कॉफी टेबल बुक संस्करण में नम्रता ने चित्रों की भावांजलि दी। इस सिलसिले में वे कहती हैं-'मैंने खास तौर पर मधुशाला को चित्र बनाने के लिए चुना है क्योंकि इसे चित्रित करना आसान था और इसकी भाषा बहुत काव्यात्मक है।' वे कहती हैं कि वे हरिवंशराय बच्चन की कविताओं से प्रेरणा पाती हैं।
सन् 2006 में नम्रता की कविताओं की किताब 'डेलीवरेंस' भी प्रकाशित हुई। वे बताती हैं कि कला की तरफ उनका रुझान बचपन से ही है। वे जब बच्ची थीं तो रंगों और क्रेयॉन से खेला करती थीं। वे कहती हैं-'मुझे खुद को अभिव्यक्त करना अच्छा लगता है, इसलिए मैं कविताएँ लिखती हूँ।'
नम्रता की पेंटिंग की पहली एकल प्रदर्शनी 'गिव मी स्पेस' नवंबर 2004 में म्यूजियम गैलरी मुंबई में लगी थी। इसी तरह उनका दूसरा शो था 'डेलीवरेंस', जिसमें उनकी कविताओं की किताब में प्रकाशित चित्रों को शामिल किया गया था। इसकी प्रदर्शनी लंदन के आईपीसीए में 2007 में आयोजित की गई थी।
इसमें शामिल सारे चित्र विचारों और अनुभवों का संग्रह-से थे, जैसे कि कविता 'लीव्स ऑफ एबसेंस', जोकि नम्रता ने मुंबई में 2005 में हुई भयानक बारिश के बाद लिखी थी। नम्रता चित्रों और शब्दों के बीच के संबंध को समझाते हुए कहती हैं-' कई बार चित्रों के माध्यम से शब्दों को समझने के लिए तैयार किए जाते हैं लेकिन यह इससे भी ज्यादा लचीला संबंध है। यह बहुत ज्यादा कठोर और अनुशासित नहीं होता है।' आर्ट गैलरी के एक विशेषज्ञ कहते हैं कि नम्रता का ज्यादातर काम बहुत आलंकारिक पोर्ट्रेट है, स्वभाव से काल्पनिक जिनके माध्यम से वे खुद को प्रतिबिंबित करती हैं।
नम्रता अपने सरनेम बच्चन को लेकर बहुत संवेदनशील हैं जैसा कि लंदन के फाइन आर्ट गैलरी के विशेषज्ञ इंदर परसीचा कहते हैं-'कृपया उन्हें अमिताभ बच्चन की भतीजी मत कहो। उनमें बहुत प्रतिभा है। यह दुबली-पतली लड़की अमृता शेरगिल की तरह है। मैं तो चाहूँगा कि वे खुद को नम्रता ही कहें।'
फिल्म जैसे भड़कीले माध्यम और अथाह ग्लैमर के बीच कला के किसी और माध्यम के साधक के रूप में एक फिल्मी परिवार से आकर अपनी पहचान बनाना एक मुश्किल चुनौती है। ऐसे ही परिवेश में नम्रता बच्चन का आना और फिल्मों से दूर अपनी कविताओं और पेंटिंग से कला की दुनिया में अपनी जगह बनाना आसान तो नहीं रहा होगा लेकिन जब पेंटिंग की दुनिया में उसकी तुलना अमृता शेरगिल से की जाती हो तो कहा जा सकता है कि उसके काम में कुछ तो बात होगी ही।
पतली और छोटे कद की नम्रता पिछले दिनों दिल्ली में अपनी पेंटिंग प्रदर्शनी के दौरान विशुद्ध कलाकार की तरह दिखीं। वे अमिताभ, ऐश्वर्या, अभिषेक, जया और श्वेता नंदा के बीच कला के एक नितांत अलग से क्षेत्र में अपनी प्रतिभा दिखा रही हैं।
1976 में हरिवंशराय बच्चन के छोटे बेटे और अमिताभ बच्चन के छोटे भाई अजिताभ तथा रमोला के घर मुंबई में जन्मी नम्रता की पढ़ाई पहले स्विट्जरलैंड और इंग्लैंड में हुई। फिर उन्होंने फाईन आर्ट के तहत पेंटिंग और आर्ट हिस्ट्री में बैचलर डिग्री रोड आइलैंड स्कूल ऑफ डिजाइन से ली। बाद में ग्राफिक डिजाइन की डिग्री न्यूयॉर्क के पारसन स्कूल ऑफ डिजाइन से ली। 2003 से वे मुंबई में रह रही हैं।
अपने बारे में नम्रता कहती हैं-'चूँकि मैं स्वभाव से बहुत शांत हूँ, इसलिए हर वक्त आसपास की चौकस निगाहें मुझे सुविधाजनक नहीं लगती हैं। हाँ मैं पैदाइशी बच्चन हूँ लेकिन प्रसिद्धि सिर्फ नाम के साथ ही नहीं आती है। हमारे परिवार का इतिहास गौरवपूर्ण रहा है। हाँ, सार्वजनिक तौर पर इसके अपने फायदे भी हैं लेकिन यहाँ हर तलवार दो-धारी है। जब समय अच्छा होता है तो हम अच्छे, लेकिन जब समय अच्छा नहीं है तो सब कुछ धुल जाता है।
इसलिए मुझे अकेले रहना अच्छा लगता है। मैं जानती हूँ कि प्रसिद्धि स्वभाव से बहुत चंचल होती है।' अपने दादा हरिवंशराय बच्चन की 102वीं जयंती के मौके पर उनकी प्रसिद्ध किताब 'मधुशाला' के कॉफी टेबल बुक संस्करण में नम्रता ने चित्रों की भावांजलि दी। इस सिलसिले में वे कहती हैं-'मैंने खास तौर पर मधुशाला को चित्र बनाने के लिए चुना है क्योंकि इसे चित्रित करना आसान था और इसकी भाषा बहुत काव्यात्मक है।' वे कहती हैं कि वे हरिवंशराय बच्चन की कविताओं से प्रेरणा पाती हैं।
सन् 2006 में नम्रता की कविताओं की किताब 'डेलीवरेंस' भी प्रकाशित हुई। वे बताती हैं कि कला की तरफ उनका रुझान बचपन से ही है। वे जब बच्ची थीं तो रंगों और क्रेयॉन से खेला करती थीं। वे कहती हैं-'मुझे खुद को अभिव्यक्त करना अच्छा लगता है, इसलिए मैं कविताएँ लिखती हूँ।'
नम्रता की पेंटिंग की पहली एकल प्रदर्शनी 'गिव मी स्पेस' नवंबर 2004 में म्यूजियम गैलरी मुंबई में लगी थी। इसी तरह उनका दूसरा शो था 'डेलीवरेंस', जिसमें उनकी कविताओं की किताब में प्रकाशित चित्रों को शामिल किया गया था। इसकी प्रदर्शनी लंदन के आईपीसीए में 2007 में आयोजित की गई थी।
इसमें शामिल सारे चित्र विचारों और अनुभवों का संग्रह-से थे, जैसे कि कविता 'लीव्स ऑफ एबसेंस', जोकि नम्रता ने मुंबई में 2005 में हुई भयानक बारिश के बाद लिखी थी। नम्रता चित्रों और शब्दों के बीच के संबंध को समझाते हुए कहती हैं-' कई बार चित्रों के माध्यम से शब्दों को समझने के लिए तैयार किए जाते हैं लेकिन यह इससे भी ज्यादा लचीला संबंध है। यह बहुत ज्यादा कठोर और अनुशासित नहीं होता है।' आर्ट गैलरी के एक विशेषज्ञ कहते हैं कि नम्रता का ज्यादातर काम बहुत आलंकारिक पोर्ट्रेट है, स्वभाव से काल्पनिक जिनके माध्यम से वे खुद को प्रतिबिंबित करती हैं।
नम्रता अपने सरनेम बच्चन को लेकर बहुत संवेदनशील हैं जैसा कि लंदन के फाइन आर्ट गैलरी के विशेषज्ञ इंदर परसीचा कहते हैं-'कृपया उन्हें अमिताभ बच्चन की भतीजी मत कहो। उनमें बहुत प्रतिभा है। यह दुबली-पतली लड़की अमृता शेरगिल की तरह है। मैं तो चाहूँगा कि वे खुद को नम्रता ही कहें।'
खबर-संसार
पति भी होते हैं पत्नियों की सफलता के पीछे
हर सफल पुरुष के पीछे किसी महिला का हाथ होने की कहावत तो सही है ही इसके साथ ही यह भी सच है कि महिलाओं की सफलता के पीछे भी उनके पति का सहयोग होता है। पति अपनी पत्नी की इस सफलता पर बहुत खुश भी होते हैं।
उदय सी. सोनी उन्हीं पतियों में से एक हैं, जो अपनी पत्नी केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी की सफलता के पीछे खड़े हैं।
पूर्व राजनयिक रह चुके उदय ने कहा वे एक काबिल और मेहनती इन्सान हैं और उनकी निष्ठा असंदिग्ध है। उदय ने कहा कि वे महसूस करते हैं कि उनकी पत्नी पूरी सजगता के साथ सभी जिम्मेदारियों को पूरा करती हैं। उन्होंने कहा कि ड्यूटी उनकी प्राथमिकता है, लेकिन इसका असर वे अपने परिवार पर नहीं पड़ने देती हैं।
उदय ने कहा वे ऐसा करने में पूरी तरह सक्षम हैं। जब मैं तीस साल तक विदेश में नियुक्त था तब भी वह अपने बच्चों और मेरे लिए समय निकाल लेती थीं। उदय ने कहा कि उन्होंने काम के मामले में दखलअंदाजी नहीं करने की नीति अपनाई।
उन्होंने कहा वह दफ्तर का भी ढेर सारा काम घर पर ले आती हैं, लेकिन मैं उसमें दखल नहीं देता है। मैं राजनीति से दूरी बनाए रखता हूँ।
चार बार विश्व बॉक्सिंग चैंपियनशिप जीतने वाली मैरी कॉप के पति के ओंलेर कॉम घरेलू जिम्मेदारी खुद ही संभालते हैं और खेल रत्न से सम्मानित अपनी पत्नी को रोजमर्रा की भागदौड़ से दूर रखते हैं।
हर सफल पुरुष के पीछे किसी महिला का हाथ होने की कहावत तो सही है ही इसके साथ ही यह भी सच है कि महिलाओं की सफलता के पीछे भी उनके पति का सहयोग होता है। पति अपनी पत्नी की इस सफलता पर बहुत खुश भी होते हैं।
उदय सी. सोनी उन्हीं पतियों में से एक हैं, जो अपनी पत्नी केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी की सफलता के पीछे खड़े हैं।
पूर्व राजनयिक रह चुके उदय ने कहा वे एक काबिल और मेहनती इन्सान हैं और उनकी निष्ठा असंदिग्ध है। उदय ने कहा कि वे महसूस करते हैं कि उनकी पत्नी पूरी सजगता के साथ सभी जिम्मेदारियों को पूरा करती हैं। उन्होंने कहा कि ड्यूटी उनकी प्राथमिकता है, लेकिन इसका असर वे अपने परिवार पर नहीं पड़ने देती हैं।
उदय ने कहा वे ऐसा करने में पूरी तरह सक्षम हैं। जब मैं तीस साल तक विदेश में नियुक्त था तब भी वह अपने बच्चों और मेरे लिए समय निकाल लेती थीं। उदय ने कहा कि उन्होंने काम के मामले में दखलअंदाजी नहीं करने की नीति अपनाई।
उन्होंने कहा वह दफ्तर का भी ढेर सारा काम घर पर ले आती हैं, लेकिन मैं उसमें दखल नहीं देता है। मैं राजनीति से दूरी बनाए रखता हूँ।
चार बार विश्व बॉक्सिंग चैंपियनशिप जीतने वाली मैरी कॉप के पति के ओंलेर कॉम घरेलू जिम्मेदारी खुद ही संभालते हैं और खेल रत्न से सम्मानित अपनी पत्नी को रोजमर्रा की भागदौड़ से दूर रखते हैं।
वामा विशेष
उड़ान पर महिला वर्चस्व
समय के साथ-साथ या यूँ कह लें कि समय ने जब से साथ दिया तब से 'महिला' ये शब्द विवशता, भेदभाव और अत्याचार जैसी कई लड़ाइयाँ लड़ते हुए इतिहास और भविष्य कि उस पंक्ति में आ खड़ा हुआ है जहाँ से सिर्फ सफलता, गौरव और ऊँचाई की इबारत लिखी जा सकती है।
भारत समेत विश्व की अनगिनत महिलाओं ने अपने पुरषार्थ और साहस के बल पर 'अबला नारी हाय तुम्हारी यही कहानी...' इस पंक्ति को सिरे से खारिज कर दिया है, फिर वो चाहे आतंकियों से लोहा लेने वाली रुखसाना कौसर हो या अंतरिक्ष में भारतीय परचम लहराने वाली कल्पना चावला।
लेकिन इस बार महिला दिवस पर जिस महिला को नमन करने का मन करता है वो हैं दुनिया के सबसे जांबाज लड़ाकू विमान ‘सुखोई-30 एमकेआई’ की मेन डॉमिनेटेड (पुरुष वर्चस्व वाली) कॉकपिट पर कब्जा जमाने वाली भारतीय वायुसेवा की कमीशंड ऑफिसर सुमन शर्मा।
भारत की सुमन शर्मा ने रूस में हाल ही में सम्पन्न इंटरनेशन एयर शो में सुखोई लड़ाकू विमान में उड़ान भरकर इतिहास रच दिया। अब तक के पुरूष वर्चस्व वाले सुखोई-30 में उड़ान भरकर वे सुखोई फाइटर जेट में उड़ान भरने वाली विश्व की प्रथम महिला बन गई हैं।
सुखोई विमान भारतीय वायु सेना में 12 साल से है और रूस की वायु सेना का भी यह फर्स्ट लाइन एयरक्राफ्ट है लेकिन यह पहला मौका था जब कोई फीमेल इसकी कॉकपिट में बैठी।
सुमन शर्मा वही हैं जिन्होंने इस साल के ‘एयरो इंडिया’ में अमेरिकी लड़ाकू विमान ‘एफ-16’ और रूसी विमान ‘मिग-35’ में उड़ान भरने का कीर्तिमान बनाया था। लेकिन ‘सुखोई-30 एमकेआई’ असैनिकों की उड़ान अभी तक उनका ड्रीम ही बना हुआ था। दुनियाभर के पायलट सुखोई में उड़ान भरने की हसरत रखते हैं लेकिन एक इंडियन लेडी को सुखोई डिजाइन ब्यूरो ने यह कीर्तिमान बनाने का अवसर दिया।
सुमन की यह उड़ान मॉस्को से करीब 40 किलोमीटर जुकोव्स्की से हुई और सुखोई डिजाइन ब्यूरो के टेस्ट पायलट यूरी वास्चुक ने इस भारतीय युवती का सपना साकार किया।
बचपन26 अगस्त 1980 को जामनगर, गुजरात में जन्मी सुमन शर्मा की उनकी स्कूली शिक्षा दिल्ली नेवल पब्लिक स्कूल और विश्वविद्यालयीन शिक्षा दिल्ली विश्वविद्यालय में हुई। नेवी ऑफिसर की बेटी और आर्मी कोलोनल की बहन होने के कारण उनका बचपन बहुत अनुशासित माहौल में बीता। सुमन बताती हैं कि 'मेरी माँ हमेशा मेरे आहार का ध्यान रखती थी। उन्होंने ही मुझे प्रणायाम और ध्यान करना सिखाया और पापा ने मुझे योगा सिखाया।
मेरा भाई मुझे हमेशा जोगिंग, स्पोर्ट्स और फिटनेस पर फोकस करने के लिए कहा करता था। मेरे भाई द्वारा दी गई ट्रेनिंग से मुझे एयर शो के दौरान भरी गई उड़ान में काफी मदद मिली।' खेलों में शुरू से सुमन की रुचि थी और स्कूल के दिनों में वे कई गेम्स में पार्टिसिपेट किया करती थीं।
शिक्षा और पद स्थापना
सुमन शर्मा ने अंग्रेजी साहित्य में एमफिल करने के साथ-साथ जर्नलिज्म, पब्लिक रिलेशन और मार्केटिंग में डिप्लोमा भी किया है। सर्विस सिलेक्शन बोर्ड के जरिए उनका सिलेक्शन इंडियन आर्मी में ऑफिसर पद के लिए हुआ। नौकरी के लिए उनका चयन मिनिस्ट्री ऑफ डिफेंस द्वारा इंडियन मिलिट्री एकेडमी के लिए किया गया। इंडियन मिलिट्री एकेडमी, देहरादून में दो साल रही हैं।
सुमन की रुचियाँ
सुमन की रुचि मिलिट्री के इतिहास और एनिमल वेलफेयर में है। फुर्सत के पलों में उन्हें डिफेंस संबंधी सामग्री पढ़ना, मूवीज देखना, लेपटॉप पर फाइटर प्लेन उड़ाना, कोल्ड कॉफी पीना और दोस्तों व फैमिली के साथ वक्त बिताना पसंद है। डांसिंग और फिटनेस भी उनके खास शौकों में है।
30 वर्षीय सुमन शर्मा फिलहाल देहरादून में इंडियन मिलिट्री एकेडेमी में फ्लाइंग इंस्ट्रक्टर के पद पर पदस्थ हैं। सुमन शर्मा रिटायर्ड नेवी ऑफिसर एच पी शर्मा की बेटी और आर्मी कोलोनल राजेश शर्मा की बहन हैं।
सुमन शर्मा भविष्य में हर तरह के एयरक्राफ्ट उड़ाने की ख्वाहिश रखती हैं। उनका कहना है कि फायटर पायलट बनना कोई मुश्किल काम नहीं है, अच्छी एकेडेमिक क्वालिफिकेशन और साइंस बैकग्राउंड की कोई भी लड़की यह कर सकती है।
साहस और समर्पण दो ऐसे गुण हैं जो किसी को भी व्यक्ति से व्यक्तित्व बना देते हैं। निश्चित रूप से सुमन शर्मा की साहस के बल पर अर्जित की गई ये उपलब्धि पूरे देश की उपलब्धि है और संपूर्ण भारत को उन पर गर्व है। आज वो संपूर्ण महिला जाति के लिए एक मिसाल बनकर उभरी हैं।
समय के साथ-साथ या यूँ कह लें कि समय ने जब से साथ दिया तब से 'महिला' ये शब्द विवशता, भेदभाव और अत्याचार जैसी कई लड़ाइयाँ लड़ते हुए इतिहास और भविष्य कि उस पंक्ति में आ खड़ा हुआ है जहाँ से सिर्फ सफलता, गौरव और ऊँचाई की इबारत लिखी जा सकती है।
भारत समेत विश्व की अनगिनत महिलाओं ने अपने पुरषार्थ और साहस के बल पर 'अबला नारी हाय तुम्हारी यही कहानी...' इस पंक्ति को सिरे से खारिज कर दिया है, फिर वो चाहे आतंकियों से लोहा लेने वाली रुखसाना कौसर हो या अंतरिक्ष में भारतीय परचम लहराने वाली कल्पना चावला।
लेकिन इस बार महिला दिवस पर जिस महिला को नमन करने का मन करता है वो हैं दुनिया के सबसे जांबाज लड़ाकू विमान ‘सुखोई-30 एमकेआई’ की मेन डॉमिनेटेड (पुरुष वर्चस्व वाली) कॉकपिट पर कब्जा जमाने वाली भारतीय वायुसेवा की कमीशंड ऑफिसर सुमन शर्मा।
भारत की सुमन शर्मा ने रूस में हाल ही में सम्पन्न इंटरनेशन एयर शो में सुखोई लड़ाकू विमान में उड़ान भरकर इतिहास रच दिया। अब तक के पुरूष वर्चस्व वाले सुखोई-30 में उड़ान भरकर वे सुखोई फाइटर जेट में उड़ान भरने वाली विश्व की प्रथम महिला बन गई हैं।
सुखोई विमान भारतीय वायु सेना में 12 साल से है और रूस की वायु सेना का भी यह फर्स्ट लाइन एयरक्राफ्ट है लेकिन यह पहला मौका था जब कोई फीमेल इसकी कॉकपिट में बैठी।
सुमन शर्मा वही हैं जिन्होंने इस साल के ‘एयरो इंडिया’ में अमेरिकी लड़ाकू विमान ‘एफ-16’ और रूसी विमान ‘मिग-35’ में उड़ान भरने का कीर्तिमान बनाया था। लेकिन ‘सुखोई-30 एमकेआई’ असैनिकों की उड़ान अभी तक उनका ड्रीम ही बना हुआ था। दुनियाभर के पायलट सुखोई में उड़ान भरने की हसरत रखते हैं लेकिन एक इंडियन लेडी को सुखोई डिजाइन ब्यूरो ने यह कीर्तिमान बनाने का अवसर दिया।
सुमन की यह उड़ान मॉस्को से करीब 40 किलोमीटर जुकोव्स्की से हुई और सुखोई डिजाइन ब्यूरो के टेस्ट पायलट यूरी वास्चुक ने इस भारतीय युवती का सपना साकार किया।
बचपन26 अगस्त 1980 को जामनगर, गुजरात में जन्मी सुमन शर्मा की उनकी स्कूली शिक्षा दिल्ली नेवल पब्लिक स्कूल और विश्वविद्यालयीन शिक्षा दिल्ली विश्वविद्यालय में हुई। नेवी ऑफिसर की बेटी और आर्मी कोलोनल की बहन होने के कारण उनका बचपन बहुत अनुशासित माहौल में बीता। सुमन बताती हैं कि 'मेरी माँ हमेशा मेरे आहार का ध्यान रखती थी। उन्होंने ही मुझे प्रणायाम और ध्यान करना सिखाया और पापा ने मुझे योगा सिखाया।
मेरा भाई मुझे हमेशा जोगिंग, स्पोर्ट्स और फिटनेस पर फोकस करने के लिए कहा करता था। मेरे भाई द्वारा दी गई ट्रेनिंग से मुझे एयर शो के दौरान भरी गई उड़ान में काफी मदद मिली।' खेलों में शुरू से सुमन की रुचि थी और स्कूल के दिनों में वे कई गेम्स में पार्टिसिपेट किया करती थीं।
शिक्षा और पद स्थापना
सुमन शर्मा ने अंग्रेजी साहित्य में एमफिल करने के साथ-साथ जर्नलिज्म, पब्लिक रिलेशन और मार्केटिंग में डिप्लोमा भी किया है। सर्विस सिलेक्शन बोर्ड के जरिए उनका सिलेक्शन इंडियन आर्मी में ऑफिसर पद के लिए हुआ। नौकरी के लिए उनका चयन मिनिस्ट्री ऑफ डिफेंस द्वारा इंडियन मिलिट्री एकेडमी के लिए किया गया। इंडियन मिलिट्री एकेडमी, देहरादून में दो साल रही हैं।
सुमन की रुचियाँ
सुमन की रुचि मिलिट्री के इतिहास और एनिमल वेलफेयर में है। फुर्सत के पलों में उन्हें डिफेंस संबंधी सामग्री पढ़ना, मूवीज देखना, लेपटॉप पर फाइटर प्लेन उड़ाना, कोल्ड कॉफी पीना और दोस्तों व फैमिली के साथ वक्त बिताना पसंद है। डांसिंग और फिटनेस भी उनके खास शौकों में है।
30 वर्षीय सुमन शर्मा फिलहाल देहरादून में इंडियन मिलिट्री एकेडेमी में फ्लाइंग इंस्ट्रक्टर के पद पर पदस्थ हैं। सुमन शर्मा रिटायर्ड नेवी ऑफिसर एच पी शर्मा की बेटी और आर्मी कोलोनल राजेश शर्मा की बहन हैं।
सुमन शर्मा भविष्य में हर तरह के एयरक्राफ्ट उड़ाने की ख्वाहिश रखती हैं। उनका कहना है कि फायटर पायलट बनना कोई मुश्किल काम नहीं है, अच्छी एकेडेमिक क्वालिफिकेशन और साइंस बैकग्राउंड की कोई भी लड़की यह कर सकती है।
साहस और समर्पण दो ऐसे गुण हैं जो किसी को भी व्यक्ति से व्यक्तित्व बना देते हैं। निश्चित रूप से सुमन शर्मा की साहस के बल पर अर्जित की गई ये उपलब्धि पूरे देश की उपलब्धि है और संपूर्ण भारत को उन पर गर्व है। आज वो संपूर्ण महिला जाति के लिए एक मिसाल बनकर उभरी हैं।
नाम बदलो, भाग्य चमकाओ
नाम है अच्छा तो काम मिले सच्चा
एक समय वह भी था जब लोग अपने नाम के बजाए काम पर अधिक ध्यान दिया करते थे, परंतु इस संबंध में युवाओं की बदलती हुई प्रवृत्ति को देखकर लगता है कि अब उनके लिए नाम का इंपॉर्टेंस पहले की तुलना में बहुत ज्यादा हो गया है और इसीलिए वे अपने पहले रखे गए नामों को बदलने में लगे हैं।
अब प्रश्न आता है कि युवाओं को नाम बदलने की जरूरत क्यों पड़ती है! वास्तव में इस प्रश्न के कई पहलू हैं। नाम परिवर्तन के ज्यादातर मामलों में लड़कियाँ ही अपना नाम बदल रही होती हैं और इसका सबसे बड़ा कारण तो यही है कि करीब-करीब सभी धर्मों में मैरिज से पहले लड़कियों के नाम के साथ जहाँ पिता का उपनाम या सरनेम लगता है वहीं विवाह के बाद पति का कुलनाम लगने लगता है। ऐसे मामलों में नॉर्मली उनका उपनाम ही बदलता है। कुछ परिवारों में विवाह के बाद लड़की का नाम बदलने का भी ट्रेडीशन है।
कुछ मामलों में लोग इसलिए भी नाम बदलते हैं क्योंकि उनके नाम में पिता का नाम या उनका सरनेम नहीं जुड़ा होता। शुरू में तो इस बात पर ध्यान नहीं दिया जाता, लेकिन बाद में बड़े होने पर अथवा जरूरत पड़ने पर उन्हें यह फील होता है कि उनका सरनेम भी नाम के साथ होना चाहिए। अतः लोग अपना नाम चैंज कर लेते हैं।
कभी-कभी ऐसा भी होता है कि बचपन में रखे गए पिंकी, पिंकू, मुन्ना, मुन्नी, पप्पू आदि जैसे बच्चों के प्यार के नाम ही बर्थ सर्टिफिकिट्स या स्कूल के सर्टिफिकिट्स में यह सोचकर दर्ज करवा दिए जाते हैं कि फिलहाल तो यही रहने देते हैं, बाद में बदल देंगे, लेकिन समय बीतता रहता है और पैरेंट्स को नाम बदलना याद ही नहीं रहता। ऐसे में बड़े होने पर बच्चों को अपने ही नाम से शर्म आने लगती है। अतः इस स्थिति से छुटकारा पाने के लिए भी युवा अपना नाम बदल देते हैं।
कई बार लोग किसी एस्ट्रोलॉजर की सलाह पर अपने लक को बदलने के लिए नाम में परिवर्तन कर लेते हैं। ऑल इंडिया फेडरेशन ऑफ एस्ट्रोलॉजर्स सोसाइटी के अरुण कुमार बंसल बताते हैं - ज्योतिष में नाम बहुत महत्वपूर्ण होता है। नाम वह होता है जिसे सुनकर व्यक्ति या पशु जाग जाए या मुड़कर देखने लगे। व्यक्ति का नाम बार-बार बोला जाता है, इसलिए उसका बहुत बड़ा प्रभाव हम पर पड़ता है।
ज्योतिष में नाम का केवल पहला लेटर ही मैटर करता है, परंतु न्यूमरोलॉजी में पूरे नाम की स्पेलिंग का महत्व होता है। लोग अपने मूलांक और भाग्यांक को ध्यान में रखते हुए नाम रखने का प्रयास करते हैं। यदि किसी का नाम इनके अनुरूप न हो तो वह अपना नाम बदलने की सोचता है। वैसे एस्ट्रो के पॉइंट ऑफ व्यू से नाम बदलने का चलन ज्यादातर रइसजादों में ही देखा जाता है।
रिजन से युवा कभी तो अपना पूरा नाम ही बदल डालते हैं या कभी अपने पुराने नाम में ही थोड़ा बहुत हेरफेर अथवा स्पेलिंग में परिवर्तन कर देते हैं। ऐसे लोग नाम परिवर्तन करने के लिए कभी उसमें कुछ जोड़ते हैं तो कभी कुछ घटाते हैं। इसमें उनके नाम के अंकों को जोड़कर जो अंक आता है वह राशि के अनुसार भी लकी होता है। कभी-कभार लोग इसलिए भी नाम में मामूली परिवर्तन करते हैं क्योंकि उनके पुराने नाम की स्पेलिंग गलत होती है और जब उन्हें इस बात का ज्ञान होता है तो वे भी मानने लगते हैं कि गलत स्पेलिंग वाला नाम उनकी पर्सनेलिटी में बाधा डाल रहा है। इस प्रकार के मामलों में भी लोग अपना नाम बदल लेते हैं।
यूँ तो नाम रखना या उसमें परिवर्तन करना पूरी तरह से पर्सनल मैटर होता है और कोई भी कभी भी अपना नाम बदल सकता है लेकिन जहाँ तक सरकारी डॉक्यूमेंट्स, सर्टिफिकिट्स, अकाउंट्स आदि में नए नाम के अनुसार परिवर्तन करवाने की बात है तो इसके लिए कुछ रूल्स व रेग्यूलेशन का पालन करना पड़ता है। नाम बदलने के लिए व्यक्ति को इस संबंध में 'एफिडेविट' के साथ-साथ किन्हीं दो नेशनल न्यूज पेपर्स में अपनी डिटेल्स देते हुए इस बात की जानकारी देनी पड़ती है।
एक समय वह भी था जब लोग अपने नाम के बजाए काम पर अधिक ध्यान दिया करते थे, परंतु इस संबंध में युवाओं की बदलती हुई प्रवृत्ति को देखकर लगता है कि अब उनके लिए नाम का इंपॉर्टेंस पहले की तुलना में बहुत ज्यादा हो गया है और इसीलिए वे अपने पहले रखे गए नामों को बदलने में लगे हैं।
अब प्रश्न आता है कि युवाओं को नाम बदलने की जरूरत क्यों पड़ती है! वास्तव में इस प्रश्न के कई पहलू हैं। नाम परिवर्तन के ज्यादातर मामलों में लड़कियाँ ही अपना नाम बदल रही होती हैं और इसका सबसे बड़ा कारण तो यही है कि करीब-करीब सभी धर्मों में मैरिज से पहले लड़कियों के नाम के साथ जहाँ पिता का उपनाम या सरनेम लगता है वहीं विवाह के बाद पति का कुलनाम लगने लगता है। ऐसे मामलों में नॉर्मली उनका उपनाम ही बदलता है। कुछ परिवारों में विवाह के बाद लड़की का नाम बदलने का भी ट्रेडीशन है।
कुछ मामलों में लोग इसलिए भी नाम बदलते हैं क्योंकि उनके नाम में पिता का नाम या उनका सरनेम नहीं जुड़ा होता। शुरू में तो इस बात पर ध्यान नहीं दिया जाता, लेकिन बाद में बड़े होने पर अथवा जरूरत पड़ने पर उन्हें यह फील होता है कि उनका सरनेम भी नाम के साथ होना चाहिए। अतः लोग अपना नाम चैंज कर लेते हैं।
कभी-कभी ऐसा भी होता है कि बचपन में रखे गए पिंकी, पिंकू, मुन्ना, मुन्नी, पप्पू आदि जैसे बच्चों के प्यार के नाम ही बर्थ सर्टिफिकिट्स या स्कूल के सर्टिफिकिट्स में यह सोचकर दर्ज करवा दिए जाते हैं कि फिलहाल तो यही रहने देते हैं, बाद में बदल देंगे, लेकिन समय बीतता रहता है और पैरेंट्स को नाम बदलना याद ही नहीं रहता। ऐसे में बड़े होने पर बच्चों को अपने ही नाम से शर्म आने लगती है। अतः इस स्थिति से छुटकारा पाने के लिए भी युवा अपना नाम बदल देते हैं।
कई बार लोग किसी एस्ट्रोलॉजर की सलाह पर अपने लक को बदलने के लिए नाम में परिवर्तन कर लेते हैं। ऑल इंडिया फेडरेशन ऑफ एस्ट्रोलॉजर्स सोसाइटी के अरुण कुमार बंसल बताते हैं - ज्योतिष में नाम बहुत महत्वपूर्ण होता है। नाम वह होता है जिसे सुनकर व्यक्ति या पशु जाग जाए या मुड़कर देखने लगे। व्यक्ति का नाम बार-बार बोला जाता है, इसलिए उसका बहुत बड़ा प्रभाव हम पर पड़ता है।
ज्योतिष में नाम का केवल पहला लेटर ही मैटर करता है, परंतु न्यूमरोलॉजी में पूरे नाम की स्पेलिंग का महत्व होता है। लोग अपने मूलांक और भाग्यांक को ध्यान में रखते हुए नाम रखने का प्रयास करते हैं। यदि किसी का नाम इनके अनुरूप न हो तो वह अपना नाम बदलने की सोचता है। वैसे एस्ट्रो के पॉइंट ऑफ व्यू से नाम बदलने का चलन ज्यादातर रइसजादों में ही देखा जाता है।
रिजन से युवा कभी तो अपना पूरा नाम ही बदल डालते हैं या कभी अपने पुराने नाम में ही थोड़ा बहुत हेरफेर अथवा स्पेलिंग में परिवर्तन कर देते हैं। ऐसे लोग नाम परिवर्तन करने के लिए कभी उसमें कुछ जोड़ते हैं तो कभी कुछ घटाते हैं। इसमें उनके नाम के अंकों को जोड़कर जो अंक आता है वह राशि के अनुसार भी लकी होता है। कभी-कभार लोग इसलिए भी नाम में मामूली परिवर्तन करते हैं क्योंकि उनके पुराने नाम की स्पेलिंग गलत होती है और जब उन्हें इस बात का ज्ञान होता है तो वे भी मानने लगते हैं कि गलत स्पेलिंग वाला नाम उनकी पर्सनेलिटी में बाधा डाल रहा है। इस प्रकार के मामलों में भी लोग अपना नाम बदल लेते हैं।
यूँ तो नाम रखना या उसमें परिवर्तन करना पूरी तरह से पर्सनल मैटर होता है और कोई भी कभी भी अपना नाम बदल सकता है लेकिन जहाँ तक सरकारी डॉक्यूमेंट्स, सर्टिफिकिट्स, अकाउंट्स आदि में नए नाम के अनुसार परिवर्तन करवाने की बात है तो इसके लिए कुछ रूल्स व रेग्यूलेशन का पालन करना पड़ता है। नाम बदलने के लिए व्यक्ति को इस संबंध में 'एफिडेविट' के साथ-साथ किन्हीं दो नेशनल न्यूज पेपर्स में अपनी डिटेल्स देते हुए इस बात की जानकारी देनी पड़ती है।
रविवार, 7 मार्च 2010
पर्यटन
वैभवपूर्ण ओरछा
ओरछा का वैभव पत्थरों में जैसे कैद हो गया है, समय यहाँ ठहरा हुआ लगता है और हम चले जाते हैं बरसों बरस पीछे, मध्यकाल के एक शहर में। जहाँ के मंदिरों और महलों की चमक को समय की धुंध भी धुँधला न सकी है। 16 से 17 वीं शताब्दी में बुंदेला शासकों द्वारा बनवाई गई ये इमारतें प्राचीन वैभव को बयाँ करती हैं।
ओरछा, 16 वीं शताब्दी में बुंदेला राजपूत रुद्र प्रताप के द्वारा बसाया गया था। उनके आगे के राजाओं ने शानदार इमारतें और भवन बनवाकर इसकी शान में चार चाँद लगा दिए। जिनमें राजा बीर सिंह जूदेव का नाम प्रमुख है। ये भवन बाहर से दिखने में जितने खूबसूरत हैं उतने ही अंदर से भी। भीतर से भी इनका सौंदर्य किसी मायने में कम नहीं है। मंदिरों और महलों में बुंदेला कला की खूबसूरत कलाकारी देखते ही बनती है। लक्ष्मीनारायण मंदिर और राजमहल की दीवारें और छतों की कलात्मकता यहाँ की समृद्धि की कहानी कहती है।
जहाँगीर महल
यह महल राजा बीर सिंह जूदेव ने 17 वीं शताब्दी में जहाँगीर के ओरछा आने के पहले बनवाया था। इसकी मजबूत दीवारों के साथ नाजुकी से बनी हुई छत्रियाँ कमाल का संतुलन बनाती हैं और इससे पूरी इमारत अत्यंत समृद्धिपूर्ण प्राभव देती है।
राज महल
चतुर्भुज के आकार का यह महल 17 वीं शताब्दी में मधुकर शाह ने बनवाया था। ऊपर की ओर शानदार छतरियाँ इसकी शोभा बढ़ाती हैं। अंदर धार्मिकता को लिए हुए शोख रंगों की अनोखी शिल्प कलाकृतियाँ हैं।
राय प्रवीन महल
राय प्रवीन राजा इंद्रमणि के दरबार में कवियित्री और संगीतकार थीं। शहंशाह अकबर उन पर मोहित हो गए और दिल्ली बुलवा लिया लेकिन राजा इंद्रमणि के लिए राय प्रवीण का प्यार देखकर अकबर नतमस्तक हो गए और उन्हें वापिस ओरछा भेज दिया। उनके लिए बनवाया हुआ यह महल आस-पास के पेड़ों और वातावरण को देखकर छोटा दो मंजिला बनाया गया है। शानदार फूलों के बगीचे और जल वितरण व्यवस्था देखते ही बनती है। मुख्य हॉल में छोटे-छोटे दरीचे बनाए गए हैं जिनसे छनकर आता प्रकाश यहाँ की सुंदरता को द्विगुणित करता है।
चतुर्भुज मंदिर
पत्थर के बड़े चबूतरे पर बना यह मंदिर कुछ सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर है। भगवान श्रीराम का यह मंदिर राम राजा मंदिर की याद दिलाता है। यहाँ बनी कमल की आकृति और अन्य आकृतियाँ इसकी सुंदरता में चार चाँद लगाती हैं। मंदिर की ऊँची-ऊची दीवारें और शिखर इसे भव्यता प्रदान करते हैं।
लक्ष्मीनारायण मंदिर
राम राजा मंदिर से निकलने वाला रास्ता इस मंदिर तक जाता है। यह मंदिर किले और मंदिर के मिले-जुले रूप को दर्शाता है। यहाँ की दीवारों पर ओरछा की भव्य चित्रकला के नमूने अंकित हैं। मंदिर के तीन हॉल की दीवारों और छतों पर बने शिल्प धार्मिक कल्पनाओं पर आधारित भी हैं और इनमें सामान्य प्रतीक भी हैं। चित्रों के रंग आज भी उतने ही चटख हैं।
फूल बाग
एक सुंदर बगीचा जो बुंदेला राजाओं के सौंदर्यबोध से परिचित कराता है। बीच में बनी फव्वारों की कतार आपको आठ स्तंभों पर टिके महल के अहाते में ले जाती है। ओरछा नरेशों के लिए यह जगह ग्रीष्म अवकाश बिताने के लिए बनाई गई थी। चंदन कटोरा नामक रचना से भूमिगत भवन के हर हिस्से में पानी की फुहारें झरती हैं जो हल्की फुरहरी बारिश का अहसास कराती हैं।
सुंदर महल
यह छोटा सा महल है जो लगभग नष्ट हो चुका है पर मुस्लिम तीर्थयात्री अभी भी यहाँ आते हैं। जुझार के बेटे धुर्जबन ने दिल्ली की मुस्लिम लड़की से विवाह करने के लिए धर्म परिवर्तन कर लिया था। उसने अपना लगभग सारा जीवन ध्यान और प्रार्थना में यहीं बिताया था और संत के रूप में जाना गया।
छत्रियाँ
बेतवा नदी के कंचन घाट पर राजाओं की याद में 14 छत्रियाँ बनवाई गई हैं।
शहीद स्मारक
महान स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद यहाँ 1926 से लेकर 1927 तक गुप-चुप तरीके से काम करते रहे थे।
राम राजा मंदिर
यह मंदिर अपनी खूबसूरत बनावट के लिए प्रसिद्ध है। भारत के कुछ अनोखे मंदिरों में से एक है। भारत में संभवतः यह ही एकमात्र मंदिर है जिसमें भगवान राम की पूजा एक राजा के रूप में की जाती है।
दिनमान हरदौल का महल
हरदौल बीर सिंह जूदेव का बेटा था। उसने अपने बड़े भाई जुझार के प्रति वफादारी सिद्ध करने के लिए प्रमाण के तौर पर प्राण त्यागे थे। तब से ही इन्हें पूजा जाने लगा। आज भी बुंदेलखंड के लोग गाँव के किसी चबूतरेनुमा स्थल को हरदौल बाबा का स्थान बनाकर पूजते हैं।
इन मुख्य स्थलों के अलावा यहाँ सिद्ध बाबा का स्थान, जुगल किशोर, जानकी मंदिर और हनुमान मंदिर भी दर्शनीय हैं।
कैसे जाएँ
हवाई मार्ग से
सबसे निकट का हवाई अड्डा ग्वालियर 119 किमी. दूर है जो दिल्ली तथा भोपाल से जुड़ा है।
रेल मार्ग से
निकट का रेल मुख्यालय झाँसी 16 किमी. दूर है जो दिल्ली-मुंबई और दिल्ली-चेन्नई मुख्य लाइन्स पर है। सभी मेल और एक्सप्रेस झाँसी में रुकती हैं।
सड़क मार्ग से
ओरछा झाँसी-खजुराहो मार्ग के डायवर्जन पर है। झाँसी से यहाँ के लिए नियमित बस सेवा और टैक्सियाँ चलती हैं।
कब जाएँ
अक्टूबर से मार्च का समय यहाँ जाने के लिए उपयुक्त है।
ओरछा का वैभव पत्थरों में जैसे कैद हो गया है, समय यहाँ ठहरा हुआ लगता है और हम चले जाते हैं बरसों बरस पीछे, मध्यकाल के एक शहर में। जहाँ के मंदिरों और महलों की चमक को समय की धुंध भी धुँधला न सकी है। 16 से 17 वीं शताब्दी में बुंदेला शासकों द्वारा बनवाई गई ये इमारतें प्राचीन वैभव को बयाँ करती हैं।
ओरछा, 16 वीं शताब्दी में बुंदेला राजपूत रुद्र प्रताप के द्वारा बसाया गया था। उनके आगे के राजाओं ने शानदार इमारतें और भवन बनवाकर इसकी शान में चार चाँद लगा दिए। जिनमें राजा बीर सिंह जूदेव का नाम प्रमुख है। ये भवन बाहर से दिखने में जितने खूबसूरत हैं उतने ही अंदर से भी। भीतर से भी इनका सौंदर्य किसी मायने में कम नहीं है। मंदिरों और महलों में बुंदेला कला की खूबसूरत कलाकारी देखते ही बनती है। लक्ष्मीनारायण मंदिर और राजमहल की दीवारें और छतों की कलात्मकता यहाँ की समृद्धि की कहानी कहती है।
जहाँगीर महल
यह महल राजा बीर सिंह जूदेव ने 17 वीं शताब्दी में जहाँगीर के ओरछा आने के पहले बनवाया था। इसकी मजबूत दीवारों के साथ नाजुकी से बनी हुई छत्रियाँ कमाल का संतुलन बनाती हैं और इससे पूरी इमारत अत्यंत समृद्धिपूर्ण प्राभव देती है।
राज महल
चतुर्भुज के आकार का यह महल 17 वीं शताब्दी में मधुकर शाह ने बनवाया था। ऊपर की ओर शानदार छतरियाँ इसकी शोभा बढ़ाती हैं। अंदर धार्मिकता को लिए हुए शोख रंगों की अनोखी शिल्प कलाकृतियाँ हैं।
राय प्रवीन महल
राय प्रवीन राजा इंद्रमणि के दरबार में कवियित्री और संगीतकार थीं। शहंशाह अकबर उन पर मोहित हो गए और दिल्ली बुलवा लिया लेकिन राजा इंद्रमणि के लिए राय प्रवीण का प्यार देखकर अकबर नतमस्तक हो गए और उन्हें वापिस ओरछा भेज दिया। उनके लिए बनवाया हुआ यह महल आस-पास के पेड़ों और वातावरण को देखकर छोटा दो मंजिला बनाया गया है। शानदार फूलों के बगीचे और जल वितरण व्यवस्था देखते ही बनती है। मुख्य हॉल में छोटे-छोटे दरीचे बनाए गए हैं जिनसे छनकर आता प्रकाश यहाँ की सुंदरता को द्विगुणित करता है।
चतुर्भुज मंदिर
पत्थर के बड़े चबूतरे पर बना यह मंदिर कुछ सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर है। भगवान श्रीराम का यह मंदिर राम राजा मंदिर की याद दिलाता है। यहाँ बनी कमल की आकृति और अन्य आकृतियाँ इसकी सुंदरता में चार चाँद लगाती हैं। मंदिर की ऊँची-ऊची दीवारें और शिखर इसे भव्यता प्रदान करते हैं।
लक्ष्मीनारायण मंदिर
राम राजा मंदिर से निकलने वाला रास्ता इस मंदिर तक जाता है। यह मंदिर किले और मंदिर के मिले-जुले रूप को दर्शाता है। यहाँ की दीवारों पर ओरछा की भव्य चित्रकला के नमूने अंकित हैं। मंदिर के तीन हॉल की दीवारों और छतों पर बने शिल्प धार्मिक कल्पनाओं पर आधारित भी हैं और इनमें सामान्य प्रतीक भी हैं। चित्रों के रंग आज भी उतने ही चटख हैं।
फूल बाग
एक सुंदर बगीचा जो बुंदेला राजाओं के सौंदर्यबोध से परिचित कराता है। बीच में बनी फव्वारों की कतार आपको आठ स्तंभों पर टिके महल के अहाते में ले जाती है। ओरछा नरेशों के लिए यह जगह ग्रीष्म अवकाश बिताने के लिए बनाई गई थी। चंदन कटोरा नामक रचना से भूमिगत भवन के हर हिस्से में पानी की फुहारें झरती हैं जो हल्की फुरहरी बारिश का अहसास कराती हैं।
सुंदर महल
यह छोटा सा महल है जो लगभग नष्ट हो चुका है पर मुस्लिम तीर्थयात्री अभी भी यहाँ आते हैं। जुझार के बेटे धुर्जबन ने दिल्ली की मुस्लिम लड़की से विवाह करने के लिए धर्म परिवर्तन कर लिया था। उसने अपना लगभग सारा जीवन ध्यान और प्रार्थना में यहीं बिताया था और संत के रूप में जाना गया।
छत्रियाँ
बेतवा नदी के कंचन घाट पर राजाओं की याद में 14 छत्रियाँ बनवाई गई हैं।
शहीद स्मारक
महान स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद यहाँ 1926 से लेकर 1927 तक गुप-चुप तरीके से काम करते रहे थे।
राम राजा मंदिर
यह मंदिर अपनी खूबसूरत बनावट के लिए प्रसिद्ध है। भारत के कुछ अनोखे मंदिरों में से एक है। भारत में संभवतः यह ही एकमात्र मंदिर है जिसमें भगवान राम की पूजा एक राजा के रूप में की जाती है।
दिनमान हरदौल का महल
हरदौल बीर सिंह जूदेव का बेटा था। उसने अपने बड़े भाई जुझार के प्रति वफादारी सिद्ध करने के लिए प्रमाण के तौर पर प्राण त्यागे थे। तब से ही इन्हें पूजा जाने लगा। आज भी बुंदेलखंड के लोग गाँव के किसी चबूतरेनुमा स्थल को हरदौल बाबा का स्थान बनाकर पूजते हैं।
इन मुख्य स्थलों के अलावा यहाँ सिद्ध बाबा का स्थान, जुगल किशोर, जानकी मंदिर और हनुमान मंदिर भी दर्शनीय हैं।
कैसे जाएँ
हवाई मार्ग से
सबसे निकट का हवाई अड्डा ग्वालियर 119 किमी. दूर है जो दिल्ली तथा भोपाल से जुड़ा है।
रेल मार्ग से
निकट का रेल मुख्यालय झाँसी 16 किमी. दूर है जो दिल्ली-मुंबई और दिल्ली-चेन्नई मुख्य लाइन्स पर है। सभी मेल और एक्सप्रेस झाँसी में रुकती हैं।
सड़क मार्ग से
ओरछा झाँसी-खजुराहो मार्ग के डायवर्जन पर है। झाँसी से यहाँ के लिए नियमित बस सेवा और टैक्सियाँ चलती हैं।
कब जाएँ
अक्टूबर से मार्च का समय यहाँ जाने के लिए उपयुक्त है।
रोमांस
दिल अपना और प्रीत पराई
हाय फ्रैंड्स ! रोमांस करने वाले बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो पहले दिन से अंतिम दिन तक खुशी के झूले पर सवार हों और उन्हें कोई कष्ट नहीं हुआ हो। ज्यादातर लोग तो इसकी पीड़ा से ही कराहते रहते हैं। फिर भी यदि आप यह पैगाम दें कि कोई प्यार न करे, दुनियादारी के हिसाब से चले तो प्यार करने वाले शायद ही इस बात को मानें।
प्यार करने वालों की सबसे विचित्र बात यह लगती है कि वे कई बार ऐसे रिश्ते में पड़ जाते हैं जो समाज के सांचे में किसी तरह से फिट नहीं बैठते उसके बावजूद उनकी उम्मीद यही होती है कि अन्य सोशल रिलेशनशिप की तरह ही उनका यह रिलेशन भी स्वीकार हो जाए, परमानेंट हो जाए। सोसाइटी द्वारा अस्वीकार किए जाने की बात तो छोड़ें, कई बार वे खुद ऐसे रिश्ते से कब मुकर जाएँगे खुद उन्हें मालूम नहीं होता पर जब एक दिन ऐसा हो जाता है तो वे इस कदर आसमान-जमीन एक करने लगते हैं मानों उन्हें इसका रत्ती भर भी अनुमान या आभास नहीं था ।
ऐसे ही एक अनएक्सपेक्टेड अलगाव से विचलित हो गए हैं, प्रकाश। पहले तो वह एक शादीशुदा महिला से प्रेम कर बैठे और फिर जब उस महिला को प्रकाश के प्यार के अति गंभीर रूप का अहसास हुआ तो वह डर कर पीछे हट गई। उसने इस रिश्ते से तौबा कर लिया लेकिन प्रकाश हैं कि उन्हें भूल नहीं पा रहे हैं।
दिन-रात उससे मिलने के लिए बेकरार रहते हैं। उनकी मानसिक व शारीरिक सेहत खराब हो रही है। सबसे मिलना-जुलना छोड़ उन्होंने तनहाई को ही अपना साथी बना लिया है। प्रकाश जी, आपकी फ्रैंड न तो अपने हसबैंड से अलग रह रही थीं और न ही उनका डिवोर्स का इरादा था फिर आपने कैसे सोच लिया कि वह आपके साथ रहने लगेंगी या मिलती रहेंगी । उनका अपने हसबैंड के साथ मनमुटाव हो गया था, वह जीवन में उदास और अकेली हो गई थीं, उन्हें एक हमदर्द दोस्त की जरूरत थी जिससे कि वह अपनी उदासीनता और नीरसता तोड़ सकें।
आपमें उन्हें वह दोस्त नजर आया। देखते-देखते वह इतने करीब आ गई कि आप दोनों में कोई भेद नहीं रह गया। इसलिए अब आपको उनकी जुदाई सही नहीं जा रही है । आप इस सच को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं कि वह आपको छोड़ सकती हैं पर हकीकत यही है कि वह आपको कभी नहीं मिलेंगी । आपको इस बात का भी कष्ट है कि आपकी भावना के साथ खेला गया। आपका इस्तेमाल किया गया और जब वह संभल गई और अपने पति के साथ ताल-मेल बैठा लिया तो आपको दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल कर फेंक दिया।
आप जितना जी चाहें उसे या खुद को कोस लें पर अब इस रिश्ते में कुछ नहीं हो सकता है। दरअसल, आप अकेले थे और आपको उसका साथ मिला तो आप उसकी तुलना में अधिक भावुकता से जुड़ते गए। यूँ तो उसे भी एक समय आपकी बहुत ज्यादा जरूरत थी पर इसलिए नहीं कि वह अपना घर-बार तोड़कर या छोड़कर आपके पास आना चाहती बल्कि इसलिए कि वह अपना घर बचाना चाहती थी। वह चाहती थी कि वह खुश रहे ताकि वह अपने पति की छोटी-मोटी अप्रिय बातों को नजरअंदाज कर उसे खुश रख सके। दोस्ती की ताकत से उसकी सहनशक्ति बढ़ जाए।
NDहर समय कुढ़ने-घुटने के बजाय वह खुशी-खुशी अपने पति का खयाल रख सके। यदि गहराई से देखा जाए तो वह खुद से ज्यादा अपने शादी के रिश्ते की परवाह करती रही। उसने तमाम प्रकार का निजीपन बाँटने के बाद भी कभी आपके साथ जीवन बिताने का कोई वायदा नहीं किया। इसके बावजूद आप उसे स्वार्थी समझ रहे हैं।
प्रकाश जी, आपको चाहे जितना भी बुरा लगे पर आपको यह बात स्वीकार करनी ही पड़ेगी कि आपकी भूमिका केवल एक नर्स की रही है। नर्स एक मरीज की जितनी भी सेवा कर ले, उसके कष्ट को कम करने के लिए जितना भी जतन कर ले, उसके सिरहाने बैठकर अपनी कितनी भी नींदें उड़ा ले, मोह बढ़ा ले पर अच्छा होने पर मरीज अपने घर ही लौटता है। यही दुनिया का दस्तूर है। इसे समझते हुए आगे बढ़ें तो जीना आसान हो जाएगा। जब भी इस प्रकार के रिश्ते होते हैं उसमें तभी तक तीसरे की जरूरत होती है जब तक उस रिश्ते में उसकी गुंजाइश होती है। जब किसी भी वजह से वह जरूरत दरकार नहीं होती है तो रिश्ता खुद ब खुद कमजोर पड़ता जाता है और एक दिन टूट जाता है।
प्रकाश जी, अव्वल तो आपको ऐसे रिश्ते में पड़ना नहीं चाहिए था। हर व्यक्ति को पहले अपने बारे में सोचना चाहिए। आप मैंटली और फिजीकली हेल्दी रहेंगे तो दूसरों की भी मदद कर सकते हैं। आपकी दोस्त ने अपने बारे में सोचा। खुद को संभालकर उसने अपने परिवार को बचाया। उसे गिल्ट इसलिए नहीं है क्योंकि एक तो वह यह सोचती है कि इस रिश्ते से आपको भी उतनी ही खुशी मिली, दूसरे ऐसे रिश्ते का यही अंजाम होना था यह कमोबेश आप भी मानकर ही चल रहे होंगे।
प्रकाश जी, जीने का सबसे अच्छा और आसान तरीका यह है कि आप अपने सभी कदम को हर हाल में न्यायसंगत ठहरा दें। अगर वह सबकुछ छोड़कर आपके पास आ जाती तो उनका तर्क होता, सच्चे प्यार के साथ कैसे बेवफाई करे और नहीं छोड़ा तो उसका तर्क है कि पहला फर्ज उसके पति की मान मर्यादा है।
इसी प्रकार आप भी सोचें कि यह एक नेक मदद थी और साथ ही आपको एक अनुभव का अवसर मिला। आगे किसी भी पेचीदा रिश्ते या कहें कि उलझे हुए रिलेशन में पड़ने के बजाय आप अपने लिए उचित रिश्ते की तलाश करेंगे। यकीनन यह एक्सपिरिएंस आपको अपने लाइफ-पार्टनर के साथ एक बेहतर हसबैंड के रूप में पेश आने के काम आएगा।
हाय फ्रैंड्स ! रोमांस करने वाले बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो पहले दिन से अंतिम दिन तक खुशी के झूले पर सवार हों और उन्हें कोई कष्ट नहीं हुआ हो। ज्यादातर लोग तो इसकी पीड़ा से ही कराहते रहते हैं। फिर भी यदि आप यह पैगाम दें कि कोई प्यार न करे, दुनियादारी के हिसाब से चले तो प्यार करने वाले शायद ही इस बात को मानें।
प्यार करने वालों की सबसे विचित्र बात यह लगती है कि वे कई बार ऐसे रिश्ते में पड़ जाते हैं जो समाज के सांचे में किसी तरह से फिट नहीं बैठते उसके बावजूद उनकी उम्मीद यही होती है कि अन्य सोशल रिलेशनशिप की तरह ही उनका यह रिलेशन भी स्वीकार हो जाए, परमानेंट हो जाए। सोसाइटी द्वारा अस्वीकार किए जाने की बात तो छोड़ें, कई बार वे खुद ऐसे रिश्ते से कब मुकर जाएँगे खुद उन्हें मालूम नहीं होता पर जब एक दिन ऐसा हो जाता है तो वे इस कदर आसमान-जमीन एक करने लगते हैं मानों उन्हें इसका रत्ती भर भी अनुमान या आभास नहीं था ।
ऐसे ही एक अनएक्सपेक्टेड अलगाव से विचलित हो गए हैं, प्रकाश। पहले तो वह एक शादीशुदा महिला से प्रेम कर बैठे और फिर जब उस महिला को प्रकाश के प्यार के अति गंभीर रूप का अहसास हुआ तो वह डर कर पीछे हट गई। उसने इस रिश्ते से तौबा कर लिया लेकिन प्रकाश हैं कि उन्हें भूल नहीं पा रहे हैं।
दिन-रात उससे मिलने के लिए बेकरार रहते हैं। उनकी मानसिक व शारीरिक सेहत खराब हो रही है। सबसे मिलना-जुलना छोड़ उन्होंने तनहाई को ही अपना साथी बना लिया है। प्रकाश जी, आपकी फ्रैंड न तो अपने हसबैंड से अलग रह रही थीं और न ही उनका डिवोर्स का इरादा था फिर आपने कैसे सोच लिया कि वह आपके साथ रहने लगेंगी या मिलती रहेंगी । उनका अपने हसबैंड के साथ मनमुटाव हो गया था, वह जीवन में उदास और अकेली हो गई थीं, उन्हें एक हमदर्द दोस्त की जरूरत थी जिससे कि वह अपनी उदासीनता और नीरसता तोड़ सकें।
आपमें उन्हें वह दोस्त नजर आया। देखते-देखते वह इतने करीब आ गई कि आप दोनों में कोई भेद नहीं रह गया। इसलिए अब आपको उनकी जुदाई सही नहीं जा रही है । आप इस सच को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं कि वह आपको छोड़ सकती हैं पर हकीकत यही है कि वह आपको कभी नहीं मिलेंगी । आपको इस बात का भी कष्ट है कि आपकी भावना के साथ खेला गया। आपका इस्तेमाल किया गया और जब वह संभल गई और अपने पति के साथ ताल-मेल बैठा लिया तो आपको दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल कर फेंक दिया।
आप जितना जी चाहें उसे या खुद को कोस लें पर अब इस रिश्ते में कुछ नहीं हो सकता है। दरअसल, आप अकेले थे और आपको उसका साथ मिला तो आप उसकी तुलना में अधिक भावुकता से जुड़ते गए। यूँ तो उसे भी एक समय आपकी बहुत ज्यादा जरूरत थी पर इसलिए नहीं कि वह अपना घर-बार तोड़कर या छोड़कर आपके पास आना चाहती बल्कि इसलिए कि वह अपना घर बचाना चाहती थी। वह चाहती थी कि वह खुश रहे ताकि वह अपने पति की छोटी-मोटी अप्रिय बातों को नजरअंदाज कर उसे खुश रख सके। दोस्ती की ताकत से उसकी सहनशक्ति बढ़ जाए।
NDहर समय कुढ़ने-घुटने के बजाय वह खुशी-खुशी अपने पति का खयाल रख सके। यदि गहराई से देखा जाए तो वह खुद से ज्यादा अपने शादी के रिश्ते की परवाह करती रही। उसने तमाम प्रकार का निजीपन बाँटने के बाद भी कभी आपके साथ जीवन बिताने का कोई वायदा नहीं किया। इसके बावजूद आप उसे स्वार्थी समझ रहे हैं।
प्रकाश जी, आपको चाहे जितना भी बुरा लगे पर आपको यह बात स्वीकार करनी ही पड़ेगी कि आपकी भूमिका केवल एक नर्स की रही है। नर्स एक मरीज की जितनी भी सेवा कर ले, उसके कष्ट को कम करने के लिए जितना भी जतन कर ले, उसके सिरहाने बैठकर अपनी कितनी भी नींदें उड़ा ले, मोह बढ़ा ले पर अच्छा होने पर मरीज अपने घर ही लौटता है। यही दुनिया का दस्तूर है। इसे समझते हुए आगे बढ़ें तो जीना आसान हो जाएगा। जब भी इस प्रकार के रिश्ते होते हैं उसमें तभी तक तीसरे की जरूरत होती है जब तक उस रिश्ते में उसकी गुंजाइश होती है। जब किसी भी वजह से वह जरूरत दरकार नहीं होती है तो रिश्ता खुद ब खुद कमजोर पड़ता जाता है और एक दिन टूट जाता है।
प्रकाश जी, अव्वल तो आपको ऐसे रिश्ते में पड़ना नहीं चाहिए था। हर व्यक्ति को पहले अपने बारे में सोचना चाहिए। आप मैंटली और फिजीकली हेल्दी रहेंगे तो दूसरों की भी मदद कर सकते हैं। आपकी दोस्त ने अपने बारे में सोचा। खुद को संभालकर उसने अपने परिवार को बचाया। उसे गिल्ट इसलिए नहीं है क्योंकि एक तो वह यह सोचती है कि इस रिश्ते से आपको भी उतनी ही खुशी मिली, दूसरे ऐसे रिश्ते का यही अंजाम होना था यह कमोबेश आप भी मानकर ही चल रहे होंगे।
प्रकाश जी, जीने का सबसे अच्छा और आसान तरीका यह है कि आप अपने सभी कदम को हर हाल में न्यायसंगत ठहरा दें। अगर वह सबकुछ छोड़कर आपके पास आ जाती तो उनका तर्क होता, सच्चे प्यार के साथ कैसे बेवफाई करे और नहीं छोड़ा तो उसका तर्क है कि पहला फर्ज उसके पति की मान मर्यादा है।
इसी प्रकार आप भी सोचें कि यह एक नेक मदद थी और साथ ही आपको एक अनुभव का अवसर मिला। आगे किसी भी पेचीदा रिश्ते या कहें कि उलझे हुए रिलेशन में पड़ने के बजाय आप अपने लिए उचित रिश्ते की तलाश करेंगे। यकीनन यह एक्सपिरिएंस आपको अपने लाइफ-पार्टनर के साथ एक बेहतर हसबैंड के रूप में पेश आने के काम आएगा।
योगासन
विपरीत नौकासन
नौकासन को पीठ के बल लेटकर किया जाता है, जबकि विपरीत नौकासन को पेट के बल। इसमें शरीर की आकृति नौका समान प्रतित होती है, इसीलिए इसे विपरीत नौकासन कहते है।
विधि : यह आसन भी पेट के बल लेटकर किया जाता है। पेट के बल पहले मकरासन में लेट जाएँ। फिर दोनों हाथों को सामने फैलाएँ और हथेलियों को एक-दूसरे से सटाते हुए भूमि पर टिकाएँ। पैर भी पीछे एक-दूसरे से मिले हुए तथा सीधें रहें। पंजे पीछे की ओर तने हुए हों।
श्वास अन्दर भरकर हाथ और पैर दोनों ओर से शरीर को उपर उठाइए। पैर, छाती, सिर एवं हाथ भूमि से उपर उठे हुए होने चाहिए। इस अवस्था में शरीर का पूरा वजन नाभि पर आ जाता है। वापस आने के लिए धीरे-धीरे हाथ और पैरों को समानांतर क्रम में नीचे लाते हुए कपाल को भूमि पर लगाएँ। फिर पुन: मकरासन की स्थिति में आ जाएँ। इस प्रकार 4-5 बार यह आवृत्ति करें।
सावधानी : जिन लोगों को मेरुदंड और पेट संबंधी कोई गंभीर रोग हो वह यह आसन न करें। स्त्रियाँ यह आसन योग चिकित्सक की सलाह अनुसार ही करें।
इसके लाभ : नाभि प्रदेश और मेरुदंड को शक्ति प्रदान करता है। गैस निकालता है। यौन रोग व दुरबलता दूर करता है। इससे पेट व कमर का मोटापा दूर होता है। नेत्र ज्योति में भी यह आसन लाभदायक माना गया है।
नौकासन को पीठ के बल लेटकर किया जाता है, जबकि विपरीत नौकासन को पेट के बल। इसमें शरीर की आकृति नौका समान प्रतित होती है, इसीलिए इसे विपरीत नौकासन कहते है।
विधि : यह आसन भी पेट के बल लेटकर किया जाता है। पेट के बल पहले मकरासन में लेट जाएँ। फिर दोनों हाथों को सामने फैलाएँ और हथेलियों को एक-दूसरे से सटाते हुए भूमि पर टिकाएँ। पैर भी पीछे एक-दूसरे से मिले हुए तथा सीधें रहें। पंजे पीछे की ओर तने हुए हों।
श्वास अन्दर भरकर हाथ और पैर दोनों ओर से शरीर को उपर उठाइए। पैर, छाती, सिर एवं हाथ भूमि से उपर उठे हुए होने चाहिए। इस अवस्था में शरीर का पूरा वजन नाभि पर आ जाता है। वापस आने के लिए धीरे-धीरे हाथ और पैरों को समानांतर क्रम में नीचे लाते हुए कपाल को भूमि पर लगाएँ। फिर पुन: मकरासन की स्थिति में आ जाएँ। इस प्रकार 4-5 बार यह आवृत्ति करें।
सावधानी : जिन लोगों को मेरुदंड और पेट संबंधी कोई गंभीर रोग हो वह यह आसन न करें। स्त्रियाँ यह आसन योग चिकित्सक की सलाह अनुसार ही करें।
इसके लाभ : नाभि प्रदेश और मेरुदंड को शक्ति प्रदान करता है। गैस निकालता है। यौन रोग व दुरबलता दूर करता है। इससे पेट व कमर का मोटापा दूर होता है। नेत्र ज्योति में भी यह आसन लाभदायक माना गया है।
विविध
कैसे भूलूँ, क्या याद करूँ?
राहों का अनजानापन
अपनों का बेगानापन
ले गया तुम्हें मुझसे दूर
तोड़ गया संबंधों की डोर
कैसे भूलूँ, क्या याद करूँ?
तुम हो गए नजरों से दूर
सूनी राहों पर टिकी निगाहें
खोजती हैं तुम्हारी परछाई
नयनों में दो दीप लिए हुए
तुम्हें ढूँढ़ रही मेरी तन्हाई
शाम के सुरमई अँधेरों में
एक पहचानी-सी सदा आती है
जो जाने-अनजाने में मुझे तुम्हारी
यादों के आँगन में ले जाती है
जान कर भी इस जहान में
वजूद तुम्हारा मौजूद नहीं है
फिर भी हर आहट तुम्हारे यहाँ
होने का अहसास करा जाती है
कैसे भूलूँ, क्या याद करूँ?
तुम हो गए नजरों से दूर
अनजानी राहों का अनजानापन
अपने ही अपनों का बेगानापन
ले गया तुम्हें मुझसे दूर
कैसे भूलूँ, क्या याद करूँ?
तुम हो मेरी नजरों से दूर।
राहों का अनजानापन
अपनों का बेगानापन
ले गया तुम्हें मुझसे दूर
तोड़ गया संबंधों की डोर
कैसे भूलूँ, क्या याद करूँ?
तुम हो गए नजरों से दूर
सूनी राहों पर टिकी निगाहें
खोजती हैं तुम्हारी परछाई
नयनों में दो दीप लिए हुए
तुम्हें ढूँढ़ रही मेरी तन्हाई
शाम के सुरमई अँधेरों में
एक पहचानी-सी सदा आती है
जो जाने-अनजाने में मुझे तुम्हारी
यादों के आँगन में ले जाती है
जान कर भी इस जहान में
वजूद तुम्हारा मौजूद नहीं है
फिर भी हर आहट तुम्हारे यहाँ
होने का अहसास करा जाती है
कैसे भूलूँ, क्या याद करूँ?
तुम हो गए नजरों से दूर
अनजानी राहों का अनजानापन
अपने ही अपनों का बेगानापन
ले गया तुम्हें मुझसे दूर
कैसे भूलूँ, क्या याद करूँ?
तुम हो मेरी नजरों से दूर।
हॉलीवुड
लेजर ट्रीटमेंट से जवान हुई एना फ्रायल
ब्रिटेन की अभिनेत्री एना फ्रायल ने झुर्रियों से बचने के एक विशेष लेजर ट्रीटमेंट का सहारा लिया है।
एना ने स्वीकार किया है कि उन्होंने जवान बने रहने के लिए बोटोक्स का उपयोग नहीं किया, बल्कि इसके लिए उन्होंने एक विशेष लेजर उपचार का सहारा लिया है।
एना ने कहा ‘‘मैंने एक पोलेरिस ट्रीटमेंट लिया है। ये लेजर मशीन की तरह है। इससे तुरंत अंतर दिखता है।’’
वाइनहाउस को लव हुआ
ब्रिटिश सिंगर एमी वाइनहाउस और उनके एक्स हसबैंड ब्लैक फील्डर सिविल अलग होने के बाद भी एक-दूसरे को भूला नहीं पा रहे हैं। इन दोनों के बारे में चर्चा है कि उन्हें अपने रिश्ते की अहमियत अब पता चली है और एक बार फिर वे शादी कर सकते हैं।
इन चर्चाओं को उस समय और बल मिला जब नॉर्थ लंदन स्थित एक बार के बाहर दोनों किस करते हुए देखे गए। दोनों ने साथ में डेढ़ घंटे से भी ज्यादा वक्त बिताया और कई बार जमाने की परवाह किए बगैर किस किया।
वाइनहाउस के एक दोस्त का कहना है कि एक बार फिर दोनों में प्यार हो गया है और ये दोनों के लिए अच्छी बात है।
ब्रिटेन की अभिनेत्री एना फ्रायल ने झुर्रियों से बचने के एक विशेष लेजर ट्रीटमेंट का सहारा लिया है।
एना ने स्वीकार किया है कि उन्होंने जवान बने रहने के लिए बोटोक्स का उपयोग नहीं किया, बल्कि इसके लिए उन्होंने एक विशेष लेजर उपचार का सहारा लिया है।
एना ने कहा ‘‘मैंने एक पोलेरिस ट्रीटमेंट लिया है। ये लेजर मशीन की तरह है। इससे तुरंत अंतर दिखता है।’’
वाइनहाउस को लव हुआ
ब्रिटिश सिंगर एमी वाइनहाउस और उनके एक्स हसबैंड ब्लैक फील्डर सिविल अलग होने के बाद भी एक-दूसरे को भूला नहीं पा रहे हैं। इन दोनों के बारे में चर्चा है कि उन्हें अपने रिश्ते की अहमियत अब पता चली है और एक बार फिर वे शादी कर सकते हैं।
इन चर्चाओं को उस समय और बल मिला जब नॉर्थ लंदन स्थित एक बार के बाहर दोनों किस करते हुए देखे गए। दोनों ने साथ में डेढ़ घंटे से भी ज्यादा वक्त बिताया और कई बार जमाने की परवाह किए बगैर किस किया।
वाइनहाउस के एक दोस्त का कहना है कि एक बार फिर दोनों में प्यार हो गया है और ये दोनों के लिए अच्छी बात है।
शनिवार, 6 मार्च 2010
विचार-मंथन
भारत-पाक के नक्शे बदल सकता है युद्ध
वर्ष 1947 से लेकर अब तक तीन युद्ध कर चुके भारत-पाकिस्तान पिछ्ले एक महीने से एक बार फिर युद्ध के मुहाने पर खड़े हैं। जबानी जंग तो मुंबई पर हुए आतंकी हमले के बाद से ही जारी है।
तनाव के इस दौर में आतंकियों द्वारा किया गया कोई भी और हमला इन दो पड़ोसियों को युद्ध की आग में झोंकने के लिए काफी होगा। पर इस बात को ध्यान में रखना होगा की अगर युद्ध की स्थिति बनती है तो भारत और पाकिस्तान में क्या-क्या परिस्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं- रत पर क्या प्रभाव पड़ेगा : 2008 में हुए बम धमाके तथा 26/11 को मुंबई पर आतंकी हमले के बाद देश की आंतरिक सुरक्षा पर सवालिया निशान लग गया है। जनता में आतंकवादियों के खिलाफ भारी रोष है और पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठनों के विरुद्ध कार्रवाई (भले ही पाकिस्तान से युद्ध ही क्यों न करना पड़े) से अप्रैल-मई में होने वाले आम चुनाव में कांग्रेस को भारी जनसमर्थन मिलने की उम्मीद बन रही है। जनता का मूड भाँपकर भारतीय जनता पार्टी भी युद्ध की स्थिति में सरकार को पूर्ण समर्थन देने का संकेत दे चुकी है।
परमाणु करार कर चुके भारत और अमेरिका के संबंध प्रगाढ़ता की ओर हैं। मिसाइल तथा लड़ाकू विमानों द्वारा नियंत्रित कार्रवाई की स्थिति में अमेरिका द्वारा समर्थन देने से भारत तथा वॉशिंगटन के बढ़ते राजनयिक रिश्ते और भी मजबूत होने की उम्मीद है। पर नए-नवेले राष्ट्रपति बराक ओबामा की फिलहाल अपनी प्राथमिकता अफगानिस्तान और पाकिस्तान के सीमावर्ती इलाके होगी और भारत-पाक युद्ध होने पर अमेरिका को अफगानिस्तान में अपनी फौजें बढ़ाना होंगी जो एक मुश्किल कदम साबित होगा। इस बीच के समय का फायदा उठाकर अल कायदा के अफगानिस्तान स्थित आतंकी कश्मीर में घुसपैठ कर भारतीय सेना के लिए मुश्किलें खड़ी करेंगे।
अफगानिस्तान में तैनात नाटो और अमेरिकी फौजों द्वारा इस्तेमाल में लाए जाने वाले अधिकतर सैन्य साजो-सामान को पाकिस्तान के बंदरगाहों तथा पेशावर स्थित सैन्य डिपो से ही अफगानिस्तान पहुँचाया जाता है। इन उपकरणों का इस्तेमाल भी पाकिस्तानी सेना भारत के विरुद्ध कर सकती है।
युद्ध होने की स्थिति में जम्मू-कश्मीर के कुछ स्थानीय आतंकी संगठन अल कायदा या तालिबान से मिलकर भारतीय सुरक्षा बलों पर आत्मघाती हमले तेज कर सकते हैं। प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह द्वारा सबसे बड़ा खतरा करार दिए गए 'नक्सलवादी' भी इस मौके का पूरा लाभ उठाकर नेपाल से लेकर तमिलनाडु तक अपना 'लाल गलियारा' स्थापित करने की कोशिश करेंगे। श्रीलंका में हाल ही की हार के बाद कमजोर पड़े लिट्टे विद्रोही भी तमिलनाडु में अपनी आखिरी शरणस्थली बना सकते हैं।
बरसों से अशांति फैला रहे उत्तर-पूर्व के अलगाववादी संगठन भी अपनी गतिविधियाँ तेज कर सकते हैं। इसी तरह पश्चिमी सीमा से बांग्लादेशी आतंकी भारत से लगी थल सीमा और समुद्र के रास्ते घुसपैठ कर ध्यान बँटाने के लिए देश में कोई बड़ी वारदात करने की फिराक में रहेंगे।
सीमाओं के साथ-साथ भारत को आंतरिक सुरक्षा पर भी खासा ध्यान देना पड़ेगा। भारत में आर्थिक विकास थम जाएगा पर युद्ध सामग्री का उत्पादन बढ़ने से रोजगार बढ़ने की भी उम्मीद है। जरूरी वस्तुओं की राशनिंग के चलते जमाखोरी तथा कालाबाजारी होगी। देश में एक बार फिर आपातकाल लगाने जैसी स्थिति से भी इनकार नहीं किया जा सकता है।
दोनों देश परमाणु शक्ति सम्पन्न हैं और आशंका है कि इस बार युद्ध परंपरागत हथियारों से आगे बढ़कर परमाणु युद्ध में बदल सकता है। ऐसा होने पर हताहतों की संख्या गंभीर रूप से बढ़ सकती है जिसका खामियाजा पूरी दुनिया को भुगतना होगा। अमेरिकी रक्षा विभाग ने 1989 में
अर्ध-सरकारी विचार समूह (थिंक टैंक) रैंड कॉरपोरेशन द्वारा एक रिपोर्ट में पूर्वानुमान लगाया था कि भारत-पाकिस्तान के बीच जम्मू-कश्मीर में चल रही आतंकवादी गतिविधियों की वजह से संघर्ष होगा, जो परमाणु युद्ध के रूप में बदल जाएगा।
इसी तरह कई विदेशी सुरक्षा एजेंसियों द्वारा चिंता जताई जा चुकी है कि पाकिस्तान के परमाणु हथियारों पर पाकिस्तान के युद्ध हारने की सूरत में कट्टरपंथियों तथा आतंकियों द्वारा परमाणु हथियारों पर कब्जा करने का खतरा हर पल बना रहेगा।
वर्ष 1947 से लेकर अब तक तीन युद्ध कर चुके भारत-पाकिस्तान पिछ्ले एक महीने से एक बार फिर युद्ध के मुहाने पर खड़े हैं। जबानी जंग तो मुंबई पर हुए आतंकी हमले के बाद से ही जारी है।
तनाव के इस दौर में आतंकियों द्वारा किया गया कोई भी और हमला इन दो पड़ोसियों को युद्ध की आग में झोंकने के लिए काफी होगा। पर इस बात को ध्यान में रखना होगा की अगर युद्ध की स्थिति बनती है तो भारत और पाकिस्तान में क्या-क्या परिस्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं- रत पर क्या प्रभाव पड़ेगा : 2008 में हुए बम धमाके तथा 26/11 को मुंबई पर आतंकी हमले के बाद देश की आंतरिक सुरक्षा पर सवालिया निशान लग गया है। जनता में आतंकवादियों के खिलाफ भारी रोष है और पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठनों के विरुद्ध कार्रवाई (भले ही पाकिस्तान से युद्ध ही क्यों न करना पड़े) से अप्रैल-मई में होने वाले आम चुनाव में कांग्रेस को भारी जनसमर्थन मिलने की उम्मीद बन रही है। जनता का मूड भाँपकर भारतीय जनता पार्टी भी युद्ध की स्थिति में सरकार को पूर्ण समर्थन देने का संकेत दे चुकी है।
परमाणु करार कर चुके भारत और अमेरिका के संबंध प्रगाढ़ता की ओर हैं। मिसाइल तथा लड़ाकू विमानों द्वारा नियंत्रित कार्रवाई की स्थिति में अमेरिका द्वारा समर्थन देने से भारत तथा वॉशिंगटन के बढ़ते राजनयिक रिश्ते और भी मजबूत होने की उम्मीद है। पर नए-नवेले राष्ट्रपति बराक ओबामा की फिलहाल अपनी प्राथमिकता अफगानिस्तान और पाकिस्तान के सीमावर्ती इलाके होगी और भारत-पाक युद्ध होने पर अमेरिका को अफगानिस्तान में अपनी फौजें बढ़ाना होंगी जो एक मुश्किल कदम साबित होगा। इस बीच के समय का फायदा उठाकर अल कायदा के अफगानिस्तान स्थित आतंकी कश्मीर में घुसपैठ कर भारतीय सेना के लिए मुश्किलें खड़ी करेंगे।
अफगानिस्तान में तैनात नाटो और अमेरिकी फौजों द्वारा इस्तेमाल में लाए जाने वाले अधिकतर सैन्य साजो-सामान को पाकिस्तान के बंदरगाहों तथा पेशावर स्थित सैन्य डिपो से ही अफगानिस्तान पहुँचाया जाता है। इन उपकरणों का इस्तेमाल भी पाकिस्तानी सेना भारत के विरुद्ध कर सकती है।
युद्ध होने की स्थिति में जम्मू-कश्मीर के कुछ स्थानीय आतंकी संगठन अल कायदा या तालिबान से मिलकर भारतीय सुरक्षा बलों पर आत्मघाती हमले तेज कर सकते हैं। प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह द्वारा सबसे बड़ा खतरा करार दिए गए 'नक्सलवादी' भी इस मौके का पूरा लाभ उठाकर नेपाल से लेकर तमिलनाडु तक अपना 'लाल गलियारा' स्थापित करने की कोशिश करेंगे। श्रीलंका में हाल ही की हार के बाद कमजोर पड़े लिट्टे विद्रोही भी तमिलनाडु में अपनी आखिरी शरणस्थली बना सकते हैं।
बरसों से अशांति फैला रहे उत्तर-पूर्व के अलगाववादी संगठन भी अपनी गतिविधियाँ तेज कर सकते हैं। इसी तरह पश्चिमी सीमा से बांग्लादेशी आतंकी भारत से लगी थल सीमा और समुद्र के रास्ते घुसपैठ कर ध्यान बँटाने के लिए देश में कोई बड़ी वारदात करने की फिराक में रहेंगे।
सीमाओं के साथ-साथ भारत को आंतरिक सुरक्षा पर भी खासा ध्यान देना पड़ेगा। भारत में आर्थिक विकास थम जाएगा पर युद्ध सामग्री का उत्पादन बढ़ने से रोजगार बढ़ने की भी उम्मीद है। जरूरी वस्तुओं की राशनिंग के चलते जमाखोरी तथा कालाबाजारी होगी। देश में एक बार फिर आपातकाल लगाने जैसी स्थिति से भी इनकार नहीं किया जा सकता है।
दोनों देश परमाणु शक्ति सम्पन्न हैं और आशंका है कि इस बार युद्ध परंपरागत हथियारों से आगे बढ़कर परमाणु युद्ध में बदल सकता है। ऐसा होने पर हताहतों की संख्या गंभीर रूप से बढ़ सकती है जिसका खामियाजा पूरी दुनिया को भुगतना होगा। अमेरिकी रक्षा विभाग ने 1989 में
अर्ध-सरकारी विचार समूह (थिंक टैंक) रैंड कॉरपोरेशन द्वारा एक रिपोर्ट में पूर्वानुमान लगाया था कि भारत-पाकिस्तान के बीच जम्मू-कश्मीर में चल रही आतंकवादी गतिविधियों की वजह से संघर्ष होगा, जो परमाणु युद्ध के रूप में बदल जाएगा।
इसी तरह कई विदेशी सुरक्षा एजेंसियों द्वारा चिंता जताई जा चुकी है कि पाकिस्तान के परमाणु हथियारों पर पाकिस्तान के युद्ध हारने की सूरत में कट्टरपंथियों तथा आतंकियों द्वारा परमाणु हथियारों पर कब्जा करने का खतरा हर पल बना रहेगा।
तीस मार खाँ’
अक्षय कुमार को लगी हथकड़ी!
अक्षय कुमार को ‘तीस मार खाँ’ की शूटिंग के बाद सेट पर चार घंटे तक हथकड़ी पहने हुए बैठा रहना पड़ा क्योंकि हथकड़ी की चाबी टूट गई और नई चाबी का इंतजाम करने में समय लगा।यह मजेदार घटना हुई फिल्मसिटी में जहाँ डायरेक्टर फराह खान अक्षय पर शॉट फिल्मा रही थी। हथकड़ी पहने अक्षय पर शॉट फिल्मा लिया गया। हथकड़ी खोलते समय चाबी टूट गई। हथकड़ी की एक ही चाबी थी। डुप्लिकेट चाबी का इंतजाम करने में चार घंटे का समय लगा और तब तक खिलाड़ी कुमार हथकड़ी पहने घूमते रहे। सेट पर मौजूद एक सूत्र के मुताबिक अक्षय कुमार इस दौरान बिलकुल भी गुस्सा नहीं हुए और वे पूरे धैर्य के साथ नई चाबी का इंतजार करते रहे।
अक्षय कुमार को ‘तीस मार खाँ’ की शूटिंग के बाद सेट पर चार घंटे तक हथकड़ी पहने हुए बैठा रहना पड़ा क्योंकि हथकड़ी की चाबी टूट गई और नई चाबी का इंतजाम करने में समय लगा।यह मजेदार घटना हुई फिल्मसिटी में जहाँ डायरेक्टर फराह खान अक्षय पर शॉट फिल्मा रही थी। हथकड़ी पहने अक्षय पर शॉट फिल्मा लिया गया। हथकड़ी खोलते समय चाबी टूट गई। हथकड़ी की एक ही चाबी थी। डुप्लिकेट चाबी का इंतजाम करने में चार घंटे का समय लगा और तब तक खिलाड़ी कुमार हथकड़ी पहने घूमते रहे। सेट पर मौजूद एक सूत्र के मुताबिक अक्षय कुमार इस दौरान बिलकुल भी गुस्सा नहीं हुए और वे पूरे धैर्य के साथ नई चाबी का इंतजार करते रहे।
फिल्म समीक्षा
अतिथि तुम कब जाओगे? : पति, पत्नी और अतिथि
बैनर : वॉर्नर ब्रॉस. पिक्चर्स, वाइड फ्रेम फिल्म्स
निर्माता : अमिता पाठक, वॉनर ब्रॉस.
निर्देशक : अश्वनी धीर
संगीत : प्रीतम
कलाकार : अजय देवगन, कोंकणा सेन शर्मा, परेश रावल
यू सर्टिफिकेट * 13 रील * एक घंटा 59 मिनट
रेटिंग : 3/5
इस बिज़ी लाइफ और महँगाई के दौर में अतिथि किसी को भी अच्छा नहीं लगता। वो जमाना बीत चुका है जब गेस्ट घर में कई दिनों तक डेरा डालकर रखते थे और बुरे नहीं लगते थे। इस बात को लेकर निर्देशक अश्विनी धीर ने ‘अतिथि तुम कब जाओगे’ बनाई है। वैसे तो इसकी स्टोरी टीवी के लिए ज्यादा फिट है, लेकिन अश्विनी ने फिल्म बना डाली है। लेकिन फिल्म बुरी नहीं है और समय काटने के लिए देखी जा सकती है।
मुंबई में रहने वाले पुनीत (अजय देवगन) और मुनमुन (कोंकणा सेन शर्मा) की अपनी-अपनी व्यस्त लाइफ है। पुनीत फिल्मों की स्क्रिप्ट लिखता है और मुनमुन एक ऑफिस में काम करती है। दोनों का एक बेटा है, जो अक्सर उनसे सवाल करता रहता है कि अपने घर गेस्ट क्यों नहीं आते? आखिरकार एक दिन पुनीत के दूर के रिश्तेदार लम्बोदर (परेश रावल) उनके घर आ धमकता है। उन्हें सब चाचाजी कहते हैं। चाचाजी का अंदाज बड़ा निराला है। घर की बाई से ऐसा काम लेते हैं कि वह नौकरी छोड़कर भाग जाती है। मुनमुन इससे बड़ी निराश होती है। उसका कहना है कि पति यदि छोड़ के चले जाए तो तुरंत दूसरा मिल जाता है, लेकिन बाई नहीं मिलती।
चाचाजी के लिए खाना बनाना हो तो नहा कर ही किचन में जाना पड़ता है। ऐसे कई उनके नियम कायदे हैं। एक-दो दिन तो अच्छा लगता है, लेकिन जब चाचाजी जाने का नाम ही नहीं लेते तो पुनीत-मुनमुन उन्हें घर से निकालने के लिए नई-नई तरकीबों का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन चाचाजी के आगे सारी ट्रिक्स फेल हो जाती है।
पुनीत अंडरवर्ल्ड के पास भी जाता है, लेकिन फिर भी उसे नाकामी मिलती है। किस तरह वे कामयाब होते हैं और उन्हें चाचाजी का महत्व समझ में आता है यह फिल्म का सार है।
अश्विनी धीर ने इसके पहले ‘वन टू थ्री’ नामक फिल्म बनाई थी, जिसमें उन्होंने अश्लीलता से परहेज नहीं किया था। लेकिन इस फिल्म को उन्होंने फूहड़ता से बचाए रखा और एकदम साफ-सुथरी फिल्म पेश की है।
गणेश जी से अतिथि को जोड़ना और कालिया (विजू खोटे) तथा चाचाजी के वाले कुछ दृश्य अच्छे बन पड़े हैं। फिल्म अंतिम कुछ रीलों में कमजोर पड़ जाती है और कहानी को ठीक से समेटा नहीं गया है। साथ ही कुछ दृश्यों का दोहराव भी है। अंत में जो ड्रामा और उपदेश दिए गए हैं वो बोरियत भरे हैं।
चाचा की हरकतों से परेशान पुनीत का किरदार अजय ने अच्छी तरह से निभाया है। कोंकणा सेन को निर्देशक ने कम मौके दिए। परेश रावल इस फिल्म के हीरो हैं। गोरखपुर में रहने वाले लम्बोदर चाचा की बारीकियों को उन्होंने बेहतरीन तरीके से पर्दे पर पेश किया है। सतीश कौशिक, विजू खोटे का अभिनय भी उम्दा है।
संगीत के नाम पर एकाध गाना है और कुछ पैरोडियाँ हैं, जो नहीं भी होती तो खास फर्क नहीं पड़ता। कुल मिलाकर ‘अतिथि तुम कब जाओगे?’ एक साफ-सुथरी हास्य फिल्म है जो देखी जा सकती है।
बैनर : वॉर्नर ब्रॉस. पिक्चर्स, वाइड फ्रेम फिल्म्स
निर्माता : अमिता पाठक, वॉनर ब्रॉस.
निर्देशक : अश्वनी धीर
संगीत : प्रीतम
कलाकार : अजय देवगन, कोंकणा सेन शर्मा, परेश रावल
यू सर्टिफिकेट * 13 रील * एक घंटा 59 मिनट
रेटिंग : 3/5
इस बिज़ी लाइफ और महँगाई के दौर में अतिथि किसी को भी अच्छा नहीं लगता। वो जमाना बीत चुका है जब गेस्ट घर में कई दिनों तक डेरा डालकर रखते थे और बुरे नहीं लगते थे। इस बात को लेकर निर्देशक अश्विनी धीर ने ‘अतिथि तुम कब जाओगे’ बनाई है। वैसे तो इसकी स्टोरी टीवी के लिए ज्यादा फिट है, लेकिन अश्विनी ने फिल्म बना डाली है। लेकिन फिल्म बुरी नहीं है और समय काटने के लिए देखी जा सकती है।
मुंबई में रहने वाले पुनीत (अजय देवगन) और मुनमुन (कोंकणा सेन शर्मा) की अपनी-अपनी व्यस्त लाइफ है। पुनीत फिल्मों की स्क्रिप्ट लिखता है और मुनमुन एक ऑफिस में काम करती है। दोनों का एक बेटा है, जो अक्सर उनसे सवाल करता रहता है कि अपने घर गेस्ट क्यों नहीं आते? आखिरकार एक दिन पुनीत के दूर के रिश्तेदार लम्बोदर (परेश रावल) उनके घर आ धमकता है। उन्हें सब चाचाजी कहते हैं। चाचाजी का अंदाज बड़ा निराला है। घर की बाई से ऐसा काम लेते हैं कि वह नौकरी छोड़कर भाग जाती है। मुनमुन इससे बड़ी निराश होती है। उसका कहना है कि पति यदि छोड़ के चले जाए तो तुरंत दूसरा मिल जाता है, लेकिन बाई नहीं मिलती।
चाचाजी के लिए खाना बनाना हो तो नहा कर ही किचन में जाना पड़ता है। ऐसे कई उनके नियम कायदे हैं। एक-दो दिन तो अच्छा लगता है, लेकिन जब चाचाजी जाने का नाम ही नहीं लेते तो पुनीत-मुनमुन उन्हें घर से निकालने के लिए नई-नई तरकीबों का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन चाचाजी के आगे सारी ट्रिक्स फेल हो जाती है।
पुनीत अंडरवर्ल्ड के पास भी जाता है, लेकिन फिर भी उसे नाकामी मिलती है। किस तरह वे कामयाब होते हैं और उन्हें चाचाजी का महत्व समझ में आता है यह फिल्म का सार है।
अश्विनी धीर ने इसके पहले ‘वन टू थ्री’ नामक फिल्म बनाई थी, जिसमें उन्होंने अश्लीलता से परहेज नहीं किया था। लेकिन इस फिल्म को उन्होंने फूहड़ता से बचाए रखा और एकदम साफ-सुथरी फिल्म पेश की है।
गणेश जी से अतिथि को जोड़ना और कालिया (विजू खोटे) तथा चाचाजी के वाले कुछ दृश्य अच्छे बन पड़े हैं। फिल्म अंतिम कुछ रीलों में कमजोर पड़ जाती है और कहानी को ठीक से समेटा नहीं गया है। साथ ही कुछ दृश्यों का दोहराव भी है। अंत में जो ड्रामा और उपदेश दिए गए हैं वो बोरियत भरे हैं।
चाचा की हरकतों से परेशान पुनीत का किरदार अजय ने अच्छी तरह से निभाया है। कोंकणा सेन को निर्देशक ने कम मौके दिए। परेश रावल इस फिल्म के हीरो हैं। गोरखपुर में रहने वाले लम्बोदर चाचा की बारीकियों को उन्होंने बेहतरीन तरीके से पर्दे पर पेश किया है। सतीश कौशिक, विजू खोटे का अभिनय भी उम्दा है।
संगीत के नाम पर एकाध गाना है और कुछ पैरोडियाँ हैं, जो नहीं भी होती तो खास फर्क नहीं पड़ता। कुल मिलाकर ‘अतिथि तुम कब जाओगे?’ एक साफ-सुथरी हास्य फिल्म है जो देखी जा सकती है।
‘तीस मार खाँ’
क्रिसमस पर आएँगे ‘तीस मार खाँ’
अक्षय कुमार और कैटरीना कैफWatch Katrina Kaif Beautiful Pictures अभिनीत तथा फराह खान द्वारा निर्देशित फिल्म ‘तीस मार खाँ’ को 24 दिसंबर 2010 यानी कि क्रिसमस के एक दिन पहले रिलीज करने की घोषणा की गई है।
फराह कहती हैं ‘मुझे खुशी है कि क्रिसमस की छुट्टियों में मेरी फिल्म रिलीज होगी। ‘तीस मार खाँ’ को बच्चे बेहद पसंद करेंगे। इसमें मस्ती है, डांस नंबर्स हैं, एक्शन के साथ कॉमेडी है। कुल मिलाकर छुट्टियों के दौरान जिस तरह की फिल्म का मजा हम लेना चाहते हैं, उसके लिए यह एक परफेक्ट फिल्म है।‘
पिछले कुछ वर्षों से क्रिसम के दौरान प्रदर्शित होने वाली फिल्मों ने लगातार सफलता हासिल की है। ‘वेलकम’, ‘तारे जमीं पर’, ‘गजनी’ और ‘3 इडियट्स’ इसके उदाहरण हैं।
‘तीस मार खाँ’ के बारे में अक्षय बताते हैं ‘यह फिल्म हॉलीडे सीजन के दौरान दर्शकों को हमारी ओर से गिफ्ट है। फिल्म की स्क्रिप्ट शानदार है। फराह की हर चीज ग्रेटर देन लाइफ होती है, चाहे वो सीन हो, म्यूजिक हो या संवाद हो। फिल्म में आपकी हँसी रोके नहीं रूकेगी।‘
फिलहाल फिल्म की शूटिंग चल रही है, लेकिन अक्षय-कैटरीना की हॉट जोड़ी के कारण यह फिल्म अभी से चर्चा का विषय बन गई है। इस फिल्म का निर्माण शिरीष और फराह के बैनर ‘थ्रीज़ कंपनी प्रा.लि.’ तले किया जा रहा है। अक्षय कुमार इस फिल्म के को-प्रोड्यूसर हैं।
‘तीस मार खाँ’ के बारे में अक्षय बताते हैं ‘यह फिल्म हॉलीडे सीजन के दौरान दर्शकों को हमारी ओर से गिफ्ट है। फिल्म की स्क्रिप्ट शानदार है। फराह की हर चीज ग्रेटर देन लाइफ होती है, चाहे वो सीन हो, म्यूजिक हो या संवाद हो। फिल्म में आपकी हँसी रोके नहीं रूकेगी।‘
फिलहाल फिल्म की शूटिंग चल रही है, लेकिन अक्षय-कैटरीना की हॉट जोड़ी के कारण यह फिल्म अभी से चर्चा का विषय बन गई है। इस फिल्म का निर्माण शिरीष और फराह के बैनर ‘थ्रीज़ कंपनी प्रा.लि.’ तले किया जा रहा है। अक्षय कुमारAkashay Kumar photo collection इस फिल्म के को-प्रोड्यूसर हैं।
अक्षय कुमार और कैटरीना कैफWatch Katrina Kaif Beautiful Pictures अभिनीत तथा फराह खान द्वारा निर्देशित फिल्म ‘तीस मार खाँ’ को 24 दिसंबर 2010 यानी कि क्रिसमस के एक दिन पहले रिलीज करने की घोषणा की गई है।
फराह कहती हैं ‘मुझे खुशी है कि क्रिसमस की छुट्टियों में मेरी फिल्म रिलीज होगी। ‘तीस मार खाँ’ को बच्चे बेहद पसंद करेंगे। इसमें मस्ती है, डांस नंबर्स हैं, एक्शन के साथ कॉमेडी है। कुल मिलाकर छुट्टियों के दौरान जिस तरह की फिल्म का मजा हम लेना चाहते हैं, उसके लिए यह एक परफेक्ट फिल्म है।‘
पिछले कुछ वर्षों से क्रिसम के दौरान प्रदर्शित होने वाली फिल्मों ने लगातार सफलता हासिल की है। ‘वेलकम’, ‘तारे जमीं पर’, ‘गजनी’ और ‘3 इडियट्स’ इसके उदाहरण हैं।
‘तीस मार खाँ’ के बारे में अक्षय बताते हैं ‘यह फिल्म हॉलीडे सीजन के दौरान दर्शकों को हमारी ओर से गिफ्ट है। फिल्म की स्क्रिप्ट शानदार है। फराह की हर चीज ग्रेटर देन लाइफ होती है, चाहे वो सीन हो, म्यूजिक हो या संवाद हो। फिल्म में आपकी हँसी रोके नहीं रूकेगी।‘
फिलहाल फिल्म की शूटिंग चल रही है, लेकिन अक्षय-कैटरीना की हॉट जोड़ी के कारण यह फिल्म अभी से चर्चा का विषय बन गई है। इस फिल्म का निर्माण शिरीष और फराह के बैनर ‘थ्रीज़ कंपनी प्रा.लि.’ तले किया जा रहा है। अक्षय कुमार इस फिल्म के को-प्रोड्यूसर हैं।
‘तीस मार खाँ’ के बारे में अक्षय बताते हैं ‘यह फिल्म हॉलीडे सीजन के दौरान दर्शकों को हमारी ओर से गिफ्ट है। फिल्म की स्क्रिप्ट शानदार है। फराह की हर चीज ग्रेटर देन लाइफ होती है, चाहे वो सीन हो, म्यूजिक हो या संवाद हो। फिल्म में आपकी हँसी रोके नहीं रूकेगी।‘
फिलहाल फिल्म की शूटिंग चल रही है, लेकिन अक्षय-कैटरीना की हॉट जोड़ी के कारण यह फिल्म अभी से चर्चा का विषय बन गई है। इस फिल्म का निर्माण शिरीष और फराह के बैनर ‘थ्रीज़ कंपनी प्रा.लि.’ तले किया जा रहा है। अक्षय कुमारAkashay Kumar photo collection इस फिल्म के को-प्रोड्यूसर हैं।
प्रेम का दृष्टिकोण
प्रेम 'आत्मा की एक शक्ति'
प्रेम किसी एक व्यक्ति से हमारे संबंधों का नाम नहीं है, यह एक दृष्टिकोण है, एक चारित्रिक रुझान है जो किसी व्यक्ति के साथ-साथ पूरी दुनिया से हमारे संबंधों को अभिव्यक्त करता है। वह केवल एक लक्ष्य और उसके साथ के संबंधों का नाम नहीं है। यदि एक व्यक्ति केवल दूसरे एक व्यक्ति से प्रेम करता है और अन्य सभी व्यक्तियों में उसकी रुचि नहीं है, तो उसका प्रेम, प्रेम न होकर उसके अहं का विस्तार मात्र है। फिर भी ज्यादातर लोग यही समझते हैं कि प्रेम एक 'लक्ष्य' है न कि एक 'क्षमता'।
वे समझते हैं कि भूल भी करते हैं कि यदि वे केवल अपने 'प्रेमी' या 'प्रेमिका' से ही प्रेम करते हैं, तो यह उनके प्रेम की गहराई का प्रतीक है। इसका मतलब है कि वे प्रेम को एक गतिविधि के रूप में, 'आत्मा की एक शक्ति' के रूप में नहीं देखते।
उन्हें लगता है कि एक 'प्रेमी' या 'प्रेमिका' होने का अर्थ है 'प्रेम' को पा लेना। यह बिलकुल वैसी ही बात है, जैसे कोई व्यक्ति चित्रकारी करना चाहता है और समझे कि उसे केवल एक प्रेरक विषय की जरूरत है, जिसके मिल जाने पर वह स्वत: ही बढ़िया चित्रकारी कर लेगा। अगर मैं किसी एक व्यक्ति से सचमुच प्रेम करता हूँ तो मैं सभी व्यक्तियों से प्रेम करता हूँ। किसी से 'मैं तुम्हें प्यार करने का सच्चा अर्थ' यह है कि 'मैं उसके माध्यम से पूरी दुनिया और पूरी जिंदगी से प्यार करता हूँ।
प्रेम किसी एक व्यक्ति से हमारे संबंधों का नाम नहीं है, यह एक दृष्टिकोण है, एक चारित्रिक रुझान है जो किसी व्यक्ति के साथ-साथ पूरी दुनिया से हमारे संबंधों को अभिव्यक्त करता है। वह केवल एक लक्ष्य और उसके साथ के संबंधों का नाम नहीं है। यदि एक व्यक्ति केवल दूसरे एक व्यक्ति से प्रेम करता है और अन्य सभी व्यक्तियों में उसकी रुचि नहीं है, तो उसका प्रेम, प्रेम न होकर उसके अहं का विस्तार मात्र है। फिर भी ज्यादातर लोग यही समझते हैं कि प्रेम एक 'लक्ष्य' है न कि एक 'क्षमता'।
वे समझते हैं कि भूल भी करते हैं कि यदि वे केवल अपने 'प्रेमी' या 'प्रेमिका' से ही प्रेम करते हैं, तो यह उनके प्रेम की गहराई का प्रतीक है। इसका मतलब है कि वे प्रेम को एक गतिविधि के रूप में, 'आत्मा की एक शक्ति' के रूप में नहीं देखते।
उन्हें लगता है कि एक 'प्रेमी' या 'प्रेमिका' होने का अर्थ है 'प्रेम' को पा लेना। यह बिलकुल वैसी ही बात है, जैसे कोई व्यक्ति चित्रकारी करना चाहता है और समझे कि उसे केवल एक प्रेरक विषय की जरूरत है, जिसके मिल जाने पर वह स्वत: ही बढ़िया चित्रकारी कर लेगा। अगर मैं किसी एक व्यक्ति से सचमुच प्रेम करता हूँ तो मैं सभी व्यक्तियों से प्रेम करता हूँ। किसी से 'मैं तुम्हें प्यार करने का सच्चा अर्थ' यह है कि 'मैं उसके माध्यम से पूरी दुनिया और पूरी जिंदगी से प्यार करता हूँ।
धार्मिक स्थल
वैष्णो देवी की यात्रा
चलो बुलावा आया है ...
कहते हैं पहाड़ों वाली माता वैष्णो देवी सबकी मुरादें पूरी करती हैं। उसके दरबार में जो कोई सच्चे दिल से जाता है, उसकी हर मुराद पूरी होती है। ऐसा ही सच्चा दरबार है- माता वैष्णो देवी का।
माता का बुलावा आने पर भक्त किसी न किसी बहाने से उसके दरबार पहुँच जाता है। हसीन वादियों में त्रिकूट पर्वत पर गुफा में विराजित माता वैष्णो देवी का स्थान हिंदुओं का एक प्रमुख तीर्थ स्थल है, जहाँ दूर-दूर से लाखों श्रद्धालु माँ के दर्शन के लिए आते हैं।
क्या है मान्यता :-
माता वैष्णो देवी को लेकर कई कथाएँ प्रचलित हैं। एक प्रसिद्ध प्राचीन मान्यता के अनुसार माता वैष्णो के एक परम भक्त श्रीधर की भक्ति से प्रसन्न होकर माँ ने उसकी लाज रखी और दुनिया को अपने अस्तित्व का प्रमाण दिया। एक बार ब्राह्मण श्रीधर ने अपने गाँव में माता का भण्डारा रखा और सभी गाँववालों व साधु-संतों को भंडारे में पधारने का निमंत्रण दिया।
भोजन को लेकर भैरवनाथ के हठ पर अड़ जाने के कारण कन्यारूपी माता वैष्णो देवी ने भैरवनाथ को समझाने की कोशिश की किंतु भैरवनाथ ने उसकी एक ना मानी। जब भैरवनाथ ने उस कन्या को पकड़ना चाहा, तब वह कन्या वहाँ से त्रिकूट पर्वत की ओर भागी और उस कन्यारूपी वैष्णो देवी ने एक गुफा में नौ माह तक तपस्या की।
इस गुफा के बाहर माता की रक्षा के लिए हनुमानजी ने पहरा दिया। आज इस पवित्र गुफा को 'अर्धक्वाँरी' के नाम से जाना जाता है। अर्धक्वाँरी के पास ही माता की चरण पादुका भी है। यह वह स्थान है, जहाँ माता ने भागते-भागते मुड़कर भैरवनाथ को देखा था।
कहते हैं उस वक्त हनुमानजी माँ की रक्षा के लिए माँ वैष्णो देवी के साथ ही थे। हनुमानजी को प्यास लगने पर माता ने उनके आग्रह पर धनुष से पहाड़ पर एक बाण चलाकर जलधारा को निकाला और उस जल में अपने केश धोए। आज यह पवित्र जलधारा 'बाणगंगा' के नाम से जानी जाती है, जिसके पवित्र जल का पान करने या इससे स्नान करने से भक्तों की सारी व्याधियाँ दूर हो जाती हैं।
जिस स्थान पर माँ वैष्णो देवी ने हठी भैरवनाथ का वध किया, वह स्थान आज पूरी दुनिया में 'भवन' के नाम से प्रसिद्ध है। इस स्थान पर माँ काली (दाएँ), माँ सरस्वती (मध्य) और माँ लक्ष्मी पिंडी (बाएँ) के रूप में गुफा में विराजित है, जिनकी एक झलक पाने मात्र से ही भक्तों के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। इन तीनों के सम्मिलित रूप को ही माँ वैष्णो देवी का रूप कहा जाता है।
भैरवनाथ का वध करने पर उसका शीश भवन से 8 किमी दूर जिस स्थान पर गिरा, आज उस स्थान को 'भैरोनाथ के मंदिर' के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है कि अपने वध के बाद भैरवनाथ को अपनी भूल का पश्चाताप हुआ और उसने माँ से क्षमादान की भीख माँगी। माता वैष्णो देवी ने भैरवनाथ को वरदान देते हुए कहा कि मेरे दर्शन तब तक पूरे नहीं माने जाएँगे, जब तक कोई भक्त मेरे बाद तुम्हारे दर्शन नहीं करेगा।
कैसे पहुँचें माँ के दरबार :-
माँ वैष्णो देवी की यात्रा का पहला पड़ाव जम्मू होता है। जम्मू तक आप बस, टैक्सी, ट्रेन या फिर हवाई जहाज से पहुँच सकते हैं। जम्मू ब्राड गेज लाइन द्वारा जुड़ा है। गर्मियों में वैष्णो देवी जाने वाले यात्रियों की संख्या में अचानक वृद्धि हो जाती है इसलिए रेलवे द्वारा प्रतिवर्ष यात्रियों की सुविधा के लिए दिल्ली से जम्मू के लिए विशेष ट्रेनें चलाई जाती हैं।
जम्मू भारत के राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 1 ए पर स्थित है। अत: यदि आप बस या टैक्सी से भी जम्मू पहुँचना चाहते हैं तो भी आपको कोई परेशानी नहीं होगी। उत्तर भारत के कई प्रमुख शहरों से जम्मू के लिए आपको आसानी से बस व टैक्सी मिल सकती है।
माँ के भवन तक की यात्रा की शुरुआत कटरा से होती है, जो कि जम्मू जिले का एक गाँव है। जम्मू से कटरा की दूरी लगभग 50 किमी है। आप जम्मू से बस या टैक्सी द्वारा कटरा पहुँच सकते हैं। जम्मू रेलवे स्टेशन से कटरा के लिए आपको कई बसें मिल जाएँगी, जिनसे आप 2 घंटे में आसानी से कटरा पहुँच सकते हैं। यदि आप प्रायवेट टैक्सी से कटरा पहुँचना चाहते हैं तो आप 500 से 1000 रुपए खर्च कर टैक्सी से कटरा तक की यात्रा कर सकते हैं, जो कि लगभग 1 घंटे में आपको कटरा तक पहुँचा देगी।
वैष्णों देवी यात्रा की शुरुआत :-
माँ वैष्णो देवी यात्रा की शुरुआत कटरा से होती है। अधिकांश यात्री यहाँ विश्राम करके अपनी यात्रा की शुरुआत करते हैं। माँ के दर्शन के लिए रातभर यात्रियों की चढ़ाई का सिलसिला चलता रहता है। कटरा से ही माता के दर्शन के लिए नि:शुल्क 'यात्रा पर्ची' मिलती है।
यह पर्ची लेने के बाद ही आप कटरा से माँ वैष्णो के दरबार तक की चढ़ाई की शुरुआत कर सकते हैं। यह पर्ची लेने के तीन घंटे बाद आपको चढ़ाई के पहले 'बाण गंगा' चैक पॉइंट पर इंट्री करानी पड़ती है और वहाँ सामान की चैकिंग कराने के बाद ही आप चढ़ाई प्रारंभ कर सकते हैं। यदि आप यात्रा पर्ची लेने के तीन घंटे बाद तक चैक पोस्ट पर इंट्री नहीं कराते हैं तो आपकी यात्रा पर्ची रद्द हो जाती है। अत: यात्रा प्रारंभ करते वक्त ही यात्रा पर्ची लेना सुविधाजनक होता है।
पूरी यात्रा में स्थान-स्थान पर जलपान व भोजन की व्यवस्था है। इस कठिन चढ़ाई में आप थोड़ा विश्राम कर चाय, कॉफी पीकर फिर से उसी जोश से अपनी यात्रा प्रारंभ कर सकते हैं। कटरा, भवन व भवन तक की चढ़ाई के अनेक स्थानों पर 'क्लॉक रूम' की सुविधा भी उपलब्ध है, जिनमें निर्धारित शुल्क पर अपना सामान रखकर यात्री आसानी से चढ़ाई कर सकते हैं।
कटरा समुद्रतल से 2500 फुट की ऊँचाई पर स्थित है। यही वह अंतिम स्थान है जहाँ तक आधुनिकतम परिवहन के साधनों (हेलिकॉप्टर को छोड़कर) से आप पहुँच सकते हैं। कटरा से 12 किमी की खड़ी चढ़ाई पर भवन (माता वैष्णो देवी की पवित्र गुफा) है। भवन से 8 किमी दूर 'भैरवनाथ का मंदिर' है। भवन से भैरवनाथ मंदिर की चढ़ाई हेतु किराए पर पिट्ठू, पालकी व घोड़े की सुविधा भी उपलब्ध है।
कम समय में माँ के दर्शन के इच्छुक यात्री हेलिकॉप्टर सुविधा का लाभ भी उठा सकते हैं। लगभग 2200 से 2800 रुपए खर्च कर दर्शनार्थी कटरा से 'साँझीछत' (भैरवनाथ मंदिर से कुछ किमी की दूरी पर) तक हेलिकॉप्टर से पहुँच सकते हैं।
आजकल अर्धक्वाँरी से भवन तक की चढ़ाई के लिए बैटरी कार भी शुरू की गई है, जिसमें लगभग 4 से 5 यात्री एक साथ बैठ सकते हैं। माता की गुफा के दर्शन हेतु कुछ भक्त पैदल चढ़ाई करते हैं और कुछ इस कठिन चढ़ाई को आसान बनाने के लिए पालकी, घोड़े या पिट्ठू किराए पर लेते हैं।
छोटे बच्चों को चढ़ाई पर उठाने के लिए आप किराए पर स्थानीय लोगों को बुक कर सकते हैं, जो निर्धारित शुल्क पर आपके बच्चों को पीठ पर बैठाकर चढ़ाई करते हैं। एक व्यक्ति के लिए कटरा से भवन (माँ वैष्णो देवी की पवित्र गुफा) तक की चढ़ाई का पालकी, पिट्ठू या घोड़े का किराया 250 से 350 रुपए तक होता है। इसके अलावा छोटे बच्चों को साथ बैठाने या ओवरवेट व्यक्ति को बैठाने का आपको अतिरिक्त शुल्क देना पड़ेगा।
ठहरने का स्थान :-
माता के भवन में पहुँचने वाले यात्रियों के लिए जम्मू, कटरा, भवन के आसपास आदि स्थानों पर माँ वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड की कई धर्मशालाएँ व होटले हैं, जिनमें विश्राम करके आप अपनी यात्रा की थकान को मिटा सकते हैं, जिनकी पूर्व बुकिंग कराके आप परेशानियों से बच सकते हैं। आप चाहें तो प्रायवेट होटलों में भी रुक सकते हैं।
नवरात्रि में लगता है मेला :
माँ वैष्णो देवी के दरबार में नवरात्रि के नौ दिनों में प्रतिदिन लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं। कई बार तो श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या से ऐसी स्थिति निर्मित हो जाती है कि पर्ची काउंटर से यात्रा पर्ची देना बंद करनी पड़ती है। इस वर्ष भी नवरात्रि में हर रोज लगभग 50,000 से अधिक श्रद्धालु माँ वैष्णो के दर्शन के लिए कटरा पहुँच रहे हैं।
आसपास के दर्शनीय स्थल :-
कटरा व जम्मू के नज़दीक कई दर्शनीय स्थल व हिल स्टेशन हैं, जहाँ जाकर आप जम्मू की ठंडी हसीन वादियों का लुत्फ उठा सकते हैं। जम्मू में अमर महल, बहू फोर्ट, मंसर लेक, रघुनाथ टेंपल आदि देखने लायक स्थान हैं। जम्मू से लगभग 112 किमी की दूरी पर 'पटनी टॉप' एक प्रसिद्ध हिल स्टेशन है। सर्दियों में यहाँ आप स्नो फॉल का भी मजा ले सकते हैं।
कटरा के नजदीक शिव खोरी, झज्झर कोटली, सनासर, बाबा धनसार, मानतलाई, कुद, बटोट आदि कई दर्शनीय स्थल हैं।
इन बातों का रखें ख्याल :-
* वैसे तो माँ वैष्णो देवी के दर्शनार्थ वर्षभर श्रद्धालु जाते हैं परंतु यहाँ जाने का बेहतर मौसम गर्मी है।
* सर्दियों में भवन का न्यूनतम तापमान -3 से -4 डिग्री तक चला जाता है और इस मौसम से चट्टानों के खिसकने का खतरा भी रहता है। अत: इस मौसम में यात्रा करने से बचें।
* ब्लड प्रेशर के मरीज चढ़ाई के लिए सीढि़यों का उपयोग न करें।
* भवन ऊँचाई पर स्थित होने से यहाँ तक की चढ़ाई में आपको उलटी व जी मचलाने संबंधी परेशानियाँ हो सकती हैं, जिनसे बचने के लिए अपने साथ आवश्यक दवाइयाँ जरूर रखें।
* चढ़ाई के वक्त जहाँ तक हो सके, कम से कम सामान अपने साथ ले जाएँ ताकि चढ़ाई में आपको कोई परेशानी न हो।
* पैदल चढ़ाई करने में छड़ी आपके लिए बेहद मददगार सिद्ध होगी।
* ट्रेकिंग शूज चढ़ाई में आपके लिए बहुत आरामदायक होंगे।
* माँ का जयकारा आपके रास्ते की सारी मुश्किलें हल कर देगा।
चलो बुलावा आया है ...
कहते हैं पहाड़ों वाली माता वैष्णो देवी सबकी मुरादें पूरी करती हैं। उसके दरबार में जो कोई सच्चे दिल से जाता है, उसकी हर मुराद पूरी होती है। ऐसा ही सच्चा दरबार है- माता वैष्णो देवी का।
माता का बुलावा आने पर भक्त किसी न किसी बहाने से उसके दरबार पहुँच जाता है। हसीन वादियों में त्रिकूट पर्वत पर गुफा में विराजित माता वैष्णो देवी का स्थान हिंदुओं का एक प्रमुख तीर्थ स्थल है, जहाँ दूर-दूर से लाखों श्रद्धालु माँ के दर्शन के लिए आते हैं।
क्या है मान्यता :-
माता वैष्णो देवी को लेकर कई कथाएँ प्रचलित हैं। एक प्रसिद्ध प्राचीन मान्यता के अनुसार माता वैष्णो के एक परम भक्त श्रीधर की भक्ति से प्रसन्न होकर माँ ने उसकी लाज रखी और दुनिया को अपने अस्तित्व का प्रमाण दिया। एक बार ब्राह्मण श्रीधर ने अपने गाँव में माता का भण्डारा रखा और सभी गाँववालों व साधु-संतों को भंडारे में पधारने का निमंत्रण दिया।
भोजन को लेकर भैरवनाथ के हठ पर अड़ जाने के कारण कन्यारूपी माता वैष्णो देवी ने भैरवनाथ को समझाने की कोशिश की किंतु भैरवनाथ ने उसकी एक ना मानी। जब भैरवनाथ ने उस कन्या को पकड़ना चाहा, तब वह कन्या वहाँ से त्रिकूट पर्वत की ओर भागी और उस कन्यारूपी वैष्णो देवी ने एक गुफा में नौ माह तक तपस्या की।
इस गुफा के बाहर माता की रक्षा के लिए हनुमानजी ने पहरा दिया। आज इस पवित्र गुफा को 'अर्धक्वाँरी' के नाम से जाना जाता है। अर्धक्वाँरी के पास ही माता की चरण पादुका भी है। यह वह स्थान है, जहाँ माता ने भागते-भागते मुड़कर भैरवनाथ को देखा था।
कहते हैं उस वक्त हनुमानजी माँ की रक्षा के लिए माँ वैष्णो देवी के साथ ही थे। हनुमानजी को प्यास लगने पर माता ने उनके आग्रह पर धनुष से पहाड़ पर एक बाण चलाकर जलधारा को निकाला और उस जल में अपने केश धोए। आज यह पवित्र जलधारा 'बाणगंगा' के नाम से जानी जाती है, जिसके पवित्र जल का पान करने या इससे स्नान करने से भक्तों की सारी व्याधियाँ दूर हो जाती हैं।
जिस स्थान पर माँ वैष्णो देवी ने हठी भैरवनाथ का वध किया, वह स्थान आज पूरी दुनिया में 'भवन' के नाम से प्रसिद्ध है। इस स्थान पर माँ काली (दाएँ), माँ सरस्वती (मध्य) और माँ लक्ष्मी पिंडी (बाएँ) के रूप में गुफा में विराजित है, जिनकी एक झलक पाने मात्र से ही भक्तों के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। इन तीनों के सम्मिलित रूप को ही माँ वैष्णो देवी का रूप कहा जाता है।
भैरवनाथ का वध करने पर उसका शीश भवन से 8 किमी दूर जिस स्थान पर गिरा, आज उस स्थान को 'भैरोनाथ के मंदिर' के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है कि अपने वध के बाद भैरवनाथ को अपनी भूल का पश्चाताप हुआ और उसने माँ से क्षमादान की भीख माँगी। माता वैष्णो देवी ने भैरवनाथ को वरदान देते हुए कहा कि मेरे दर्शन तब तक पूरे नहीं माने जाएँगे, जब तक कोई भक्त मेरे बाद तुम्हारे दर्शन नहीं करेगा।
कैसे पहुँचें माँ के दरबार :-
माँ वैष्णो देवी की यात्रा का पहला पड़ाव जम्मू होता है। जम्मू तक आप बस, टैक्सी, ट्रेन या फिर हवाई जहाज से पहुँच सकते हैं। जम्मू ब्राड गेज लाइन द्वारा जुड़ा है। गर्मियों में वैष्णो देवी जाने वाले यात्रियों की संख्या में अचानक वृद्धि हो जाती है इसलिए रेलवे द्वारा प्रतिवर्ष यात्रियों की सुविधा के लिए दिल्ली से जम्मू के लिए विशेष ट्रेनें चलाई जाती हैं।
जम्मू भारत के राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 1 ए पर स्थित है। अत: यदि आप बस या टैक्सी से भी जम्मू पहुँचना चाहते हैं तो भी आपको कोई परेशानी नहीं होगी। उत्तर भारत के कई प्रमुख शहरों से जम्मू के लिए आपको आसानी से बस व टैक्सी मिल सकती है।
माँ के भवन तक की यात्रा की शुरुआत कटरा से होती है, जो कि जम्मू जिले का एक गाँव है। जम्मू से कटरा की दूरी लगभग 50 किमी है। आप जम्मू से बस या टैक्सी द्वारा कटरा पहुँच सकते हैं। जम्मू रेलवे स्टेशन से कटरा के लिए आपको कई बसें मिल जाएँगी, जिनसे आप 2 घंटे में आसानी से कटरा पहुँच सकते हैं। यदि आप प्रायवेट टैक्सी से कटरा पहुँचना चाहते हैं तो आप 500 से 1000 रुपए खर्च कर टैक्सी से कटरा तक की यात्रा कर सकते हैं, जो कि लगभग 1 घंटे में आपको कटरा तक पहुँचा देगी।
वैष्णों देवी यात्रा की शुरुआत :-
माँ वैष्णो देवी यात्रा की शुरुआत कटरा से होती है। अधिकांश यात्री यहाँ विश्राम करके अपनी यात्रा की शुरुआत करते हैं। माँ के दर्शन के लिए रातभर यात्रियों की चढ़ाई का सिलसिला चलता रहता है। कटरा से ही माता के दर्शन के लिए नि:शुल्क 'यात्रा पर्ची' मिलती है।
यह पर्ची लेने के बाद ही आप कटरा से माँ वैष्णो के दरबार तक की चढ़ाई की शुरुआत कर सकते हैं। यह पर्ची लेने के तीन घंटे बाद आपको चढ़ाई के पहले 'बाण गंगा' चैक पॉइंट पर इंट्री करानी पड़ती है और वहाँ सामान की चैकिंग कराने के बाद ही आप चढ़ाई प्रारंभ कर सकते हैं। यदि आप यात्रा पर्ची लेने के तीन घंटे बाद तक चैक पोस्ट पर इंट्री नहीं कराते हैं तो आपकी यात्रा पर्ची रद्द हो जाती है। अत: यात्रा प्रारंभ करते वक्त ही यात्रा पर्ची लेना सुविधाजनक होता है।
पूरी यात्रा में स्थान-स्थान पर जलपान व भोजन की व्यवस्था है। इस कठिन चढ़ाई में आप थोड़ा विश्राम कर चाय, कॉफी पीकर फिर से उसी जोश से अपनी यात्रा प्रारंभ कर सकते हैं। कटरा, भवन व भवन तक की चढ़ाई के अनेक स्थानों पर 'क्लॉक रूम' की सुविधा भी उपलब्ध है, जिनमें निर्धारित शुल्क पर अपना सामान रखकर यात्री आसानी से चढ़ाई कर सकते हैं।
कटरा समुद्रतल से 2500 फुट की ऊँचाई पर स्थित है। यही वह अंतिम स्थान है जहाँ तक आधुनिकतम परिवहन के साधनों (हेलिकॉप्टर को छोड़कर) से आप पहुँच सकते हैं। कटरा से 12 किमी की खड़ी चढ़ाई पर भवन (माता वैष्णो देवी की पवित्र गुफा) है। भवन से 8 किमी दूर 'भैरवनाथ का मंदिर' है। भवन से भैरवनाथ मंदिर की चढ़ाई हेतु किराए पर पिट्ठू, पालकी व घोड़े की सुविधा भी उपलब्ध है।
कम समय में माँ के दर्शन के इच्छुक यात्री हेलिकॉप्टर सुविधा का लाभ भी उठा सकते हैं। लगभग 2200 से 2800 रुपए खर्च कर दर्शनार्थी कटरा से 'साँझीछत' (भैरवनाथ मंदिर से कुछ किमी की दूरी पर) तक हेलिकॉप्टर से पहुँच सकते हैं।
आजकल अर्धक्वाँरी से भवन तक की चढ़ाई के लिए बैटरी कार भी शुरू की गई है, जिसमें लगभग 4 से 5 यात्री एक साथ बैठ सकते हैं। माता की गुफा के दर्शन हेतु कुछ भक्त पैदल चढ़ाई करते हैं और कुछ इस कठिन चढ़ाई को आसान बनाने के लिए पालकी, घोड़े या पिट्ठू किराए पर लेते हैं।
छोटे बच्चों को चढ़ाई पर उठाने के लिए आप किराए पर स्थानीय लोगों को बुक कर सकते हैं, जो निर्धारित शुल्क पर आपके बच्चों को पीठ पर बैठाकर चढ़ाई करते हैं। एक व्यक्ति के लिए कटरा से भवन (माँ वैष्णो देवी की पवित्र गुफा) तक की चढ़ाई का पालकी, पिट्ठू या घोड़े का किराया 250 से 350 रुपए तक होता है। इसके अलावा छोटे बच्चों को साथ बैठाने या ओवरवेट व्यक्ति को बैठाने का आपको अतिरिक्त शुल्क देना पड़ेगा।
ठहरने का स्थान :-
माता के भवन में पहुँचने वाले यात्रियों के लिए जम्मू, कटरा, भवन के आसपास आदि स्थानों पर माँ वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड की कई धर्मशालाएँ व होटले हैं, जिनमें विश्राम करके आप अपनी यात्रा की थकान को मिटा सकते हैं, जिनकी पूर्व बुकिंग कराके आप परेशानियों से बच सकते हैं। आप चाहें तो प्रायवेट होटलों में भी रुक सकते हैं।
नवरात्रि में लगता है मेला :
माँ वैष्णो देवी के दरबार में नवरात्रि के नौ दिनों में प्रतिदिन लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं। कई बार तो श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या से ऐसी स्थिति निर्मित हो जाती है कि पर्ची काउंटर से यात्रा पर्ची देना बंद करनी पड़ती है। इस वर्ष भी नवरात्रि में हर रोज लगभग 50,000 से अधिक श्रद्धालु माँ वैष्णो के दर्शन के लिए कटरा पहुँच रहे हैं।
आसपास के दर्शनीय स्थल :-
कटरा व जम्मू के नज़दीक कई दर्शनीय स्थल व हिल स्टेशन हैं, जहाँ जाकर आप जम्मू की ठंडी हसीन वादियों का लुत्फ उठा सकते हैं। जम्मू में अमर महल, बहू फोर्ट, मंसर लेक, रघुनाथ टेंपल आदि देखने लायक स्थान हैं। जम्मू से लगभग 112 किमी की दूरी पर 'पटनी टॉप' एक प्रसिद्ध हिल स्टेशन है। सर्दियों में यहाँ आप स्नो फॉल का भी मजा ले सकते हैं।
कटरा के नजदीक शिव खोरी, झज्झर कोटली, सनासर, बाबा धनसार, मानतलाई, कुद, बटोट आदि कई दर्शनीय स्थल हैं।
इन बातों का रखें ख्याल :-
* वैसे तो माँ वैष्णो देवी के दर्शनार्थ वर्षभर श्रद्धालु जाते हैं परंतु यहाँ जाने का बेहतर मौसम गर्मी है।
* सर्दियों में भवन का न्यूनतम तापमान -3 से -4 डिग्री तक चला जाता है और इस मौसम से चट्टानों के खिसकने का खतरा भी रहता है। अत: इस मौसम में यात्रा करने से बचें।
* ब्लड प्रेशर के मरीज चढ़ाई के लिए सीढि़यों का उपयोग न करें।
* भवन ऊँचाई पर स्थित होने से यहाँ तक की चढ़ाई में आपको उलटी व जी मचलाने संबंधी परेशानियाँ हो सकती हैं, जिनसे बचने के लिए अपने साथ आवश्यक दवाइयाँ जरूर रखें।
* चढ़ाई के वक्त जहाँ तक हो सके, कम से कम सामान अपने साथ ले जाएँ ताकि चढ़ाई में आपको कोई परेशानी न हो।
* पैदल चढ़ाई करने में छड़ी आपके लिए बेहद मददगार सिद्ध होगी।
* ट्रेकिंग शूज चढ़ाई में आपके लिए बहुत आरामदायक होंगे।
* माँ का जयकारा आपके रास्ते की सारी मुश्किलें हल कर देगा।
शुक्रवार, 5 मार्च 2010
ऐसा प्यार और कहाँ?
ध्वनि और प्रकाश की कहानी हीर-रांझा, सोहनी-महिवाल से कम नहीं। जिसे पढ़ने और सुनने के बाद मुँह से केवल एक ही बात निकलती है। आह! इसे कहते हैं प्यार, जिसे अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता, सिर्फ महसूस किया जा सकता है।
ध्वनि और प्रकाश दोनों एक ही काम्प्लेक्स में हाल ही में रहने आए हैं। इस बिल्डिंग को बने ज्यादा समय नहीं हुआ। ध्वनि जहाँ सुंदर दिखती है, वहीं प्रकाश भी स्मार्ट और हैंडसम है। निगाहों-निगाहों से उतरे दोनों एक-दूसरे के दिल में। लिफ्ट में जब पहली बार दोनों अकेले मिले। तो जान-पहचान के हिसाब से प्रकाश ने ध्वनि से हलो किया और खुद का नाम बताते हुए ध्वनि से नाम पूछ लिया। ध्वनि ने रिएक्ट ऐसे किया जैसे उनके अलावा और भी कोई लिफ्ट में हो। मी? आई एम ध्वनि।
ऐसे ही कभी कभार टकराने पर दोनों कुछेक जुमले छोड़ दिया करते थे। पहले कहाँ रहते थे या आप क्या करते हैं। वगैरह-वगैरह। उसके बाद दोनों के फ्रेंड सर्कल के जरिये दोनों में संपर्क बढ़ा। अन्य फ्लैट्स के दोस्त और ध्वनि की फ्रेंड्स के जरिये आगे की जानकारी दोनों तक पहुँच जाती थी। आग दोनों तरफ लगी हुई। चोरी-छिपे मिलना, फोन पर बात करना शुरू हुआ।
साल-दो साल की इन मुलाकातों के बाद ध्वनि ने एक दिन प्रकाश को बताया कि उसके दिल में छेद है। पहले तो प्रकाश का दिल धक करके रह गया। एक क्षण तो लगा जैसे ऐसी गंभीर बीमारी उसे खुद ही हो। लेकिन घर की आर्थिक स्थिति ज्यादा ठीक न होने के कारण उसका ऑपरेशन नहीं हो पा रहा है। यदि तुम चाहो तो अपना जीवनसाथी कोई दूसरा चुन सकते हो। मैं तुम्हें यह बात पहले भी बताना चाहती थी लेकिन पता नहीं समय कब निकलता गया और आज हमें मिले 2 साल होने को आए। लेकिन अभी भी कुछ देर नहीं हुई है।
सोच-विचार करने के बाद प्रकाश ध्वनि की मेडिकल रिपोर्ट लेकर चेन्नई के हॉस्पिटल गया और इलाज के खर्च के बारे में पता लगा जिसमें लगभग ढाई से तीन लाख रुपए खर्च आना था। प्रकाश ने अपनी सैलेरी से सारे खर्च बंद करके पैसा जोड़ना शुरू किया। यहाँ तक कि घंटों ध्वनि से फोन पर बात करना बंद कर दिया। क्योंकि उसे फोन लगाने के लिए एसटीडी का ही उपयोग करना पड़ता था और उसका बिल महीने भर का लगभग दो-ढाई हजार आता था। कभी-कभार ही थोड़े समय के लिए फोन लगाता। अब उसके जीवन में रुपयों की अहमियत काफी बढ़ गई थी।
लगभग 2 साल में उसने डेढ़ लाख रुपया जोड़ लिया। प्रकाश और ध्वनि के दोस्तों ने भी उसकी आर्थिक मदद की। अपने माता-पिता को जैसे-तैसे राजी कर वह सवा लाख रुपया लेने में सफल हो गया। अंतरजातीय होने के कारण लड़की के माता-पिता बिल्कुल भी दोनों की शादी के पक्ष में नहीं थे। इसलिए दोनों ने चुपचाप चेन्नई जाकर इलाज करवाया और फोन पर ध्वनि के माता-पिता को इसकी जानकारी दी।
दोनों के साथ होने की खबर लगते ही ध्वनि के माता-पिता नाराज हुए और प्रकाश के घर उसके माता-पिता से लड़ने पहुँच गए कि कैसे तुम्हारा बेटा हमारी बेटी को लेकर चला गया और पुलिस में जाकर रिपोर्ट लिखाने की बात करने लगे। लेकिन कुछ घंटों के बाद प्रकाश के माता-पिता ध्वनि के घर गए और उनसे विनम्रता पूर्वक बोले 'आप ही नहीं दोनों की शादी के हम भी खिलाफ थे। परंतु जब प्रकाश ने हमें सारी बात बताई कि दोनों एक-दूसरे को प्यार करते हैं और इलाज के बाद शादी भी करने को तैयार हैं तो आखिर मुझे भी हार माननी पड़ी और शादी के लिए राजी होना पड़ा और जब वह इतना परेशान हो ही रहा है आपकी बेटी के इलाज के लिए तो मेरा आपसे हाथ जोड़कर निवेदन है कि आप भी इतनी सी बात मान लें।
प्रकाश ने कभी पैसे का इतना महत्व नहीं समझा जितना पिछले 2 सालों में उसे समझ में आया है। मैंने तो हकीकत में इतना प्रेम पहली बार ही देखा है। सोचने का समय माँगकर उस समय भी ध्वनि के माता-पिता बात को टाल गए और दो दिन बाद जब प्रकाश और ध्वनि चेन्नई से लौटे तो प्रकाश से मिलने के बाद उन्होंने भी शादी के लिए हाँ कर दी। दोनों ने बड़ी धूमधाम से शादी रचाकर अन्य प्रेमी युगलों के लिए मिसाल पेश की। आज भी दोनों अपनी गृहस्थी भलीभाँति चला रहे हैं।
जीवन में कभी उन लोगों पर भरोसा मत करो, समय बदलने के साथ जिनकी भावनाएँ भी बदल जाती हैं बल्कि उन लोगों पर भरोसा करो जिनकी भावनाएँ समय बदलने के साथ नहीं बदलती। जैसा प्रकाश ने किया ध्वनि की बीमारी पता लगने के बाद भी उसकी चाहत में कोई कमी नहीं आई।
वो तेरे प्यार का गम!
'तुम्हें क्या मिला वह तो मैं नहीं जानता लेकिन एक बात जरूर जानता हूँ कि तुमने उस शख्स को खोया है जो कभी अपने आपसे भी ज्यादा तुम्हें प्यार करता था। तुमने उसे धोखा दिया है जिसने अपने जीवन में सिर्फ और सिर्फ तुम पर भरोसा किया। खैर तुम्हे जो करना था वह तुमने कर लिया बस अब एक आखिरी गुजारिश है। मेरे बाकी बचे जीवन में कभी भी और कहीं भी अगर तुम्हारा मुझसे सामना हो जाए तो भगवान के लिए अपना रास्ता बदल देना या फिर अपना मुँह फेर लेना। क्योंकि मैं जानता हूँ कि जब कभी भी मैं तुम्हारा चेहरा देखूँगा तब मुझे सिर्फ एक ही बात का अफसोस रहेगा कि मैंने इस चेहरे के पीछे छुपे हुए उस शख्स से प्यार किया जिसने आखिर तक मुझे धोखे के अलावा और कुछ भी नहीं दिया। हो सकता है कि उस वक्त मैं गुस्से में आकर कुछ ऎसा काम कर जाऊँ जो मैं कभी नहीं करना चाहता।''
उस दिन अचानक ही रीटा की नजर राजीव के द्वारा लिखे गए उस खत पर पड़ गई जो कई सालों से एक किताब के पन्नों के बीच में सड़ रहा था। यह खत राजीव और रीटा की प्यार की यादों को बयाँ करने वाला आखिर खत था।
कॉलेज के दिनो में ही इन दोनों के प्यार का गुल खिला था। रीटा प्रिंसीपल साहब की ऑफिस से बाहर ही निकली थी कि अचानक ही सामने के कैन्टीन में राजीव अपने दोस्तों के साथ काफी पी रहा था। नई स्टूडेंट को देखकर सभी सीनियर्स रीटा के नजदीक आ गए और देखते ही देखते उसकी रैगिंग शरू कर दी। हद तो तब हो गई जब रीटा को कहा गया कि 'वह एक अपाहिज महिला की तरह लंगडाती लंगडाती सभी स्टूडेन्ट्स के सामने आकर भीख माँगे।
रीटा के लिए दिल्ली शहर बिल्कुल नया था और यहाँ के लोग भी। वह बिलकुल घबरा गई और फूट फूट कर रोने लगी। उस समय राजीव ही था जो एक फरिश्ता बनकर उसे बचाने आया था। उसने सभी सीनियर्स को खूब डाँटा और उन्हें रीटा से माफी माँगने के लिए भी कहा।
उसी दिन से राजीव रीटा के मन को भा गया। धीरे-धीरे उन दोनों की दोस्ती बढ़ने लगी। दूरियाँ नजदीकियों में तब्दील होने लगी और एक दिन रीटा ने सामने से ही राजीव को प्रप्रोज कर दिया। राजीव को भी रीटा बहुत पसंद थी उसने भी उसे खुले मन से स्वीकार कर लिया। समय बीतता गया और उनका प्यार परवान चढ़ते गया। बात शादी तक भी आ पहुँची।
अब राजीव एक प्रतिष्ठित कंपनी में मैनेजर था उसकी तनख्वाह भी अच्छी थी। रीटा भी हाईस्कूल के विद्यार्थियों को पढ़ाती थी। अचानक ही राजीव का तबादला मुंबईClick here to see more news from this city शहर में हो गया। रीटा से कोसों दूर होने के बावजूद भी वह हर महीने उसे मिलने के लिए मुंबई से दिल्ली आता रहता था। दोनों घंटों तक टेलीफोन पर एक-दूसरे से बातें किया करते थे। लेकिन धीरे-धीरे रीटा के फोन आने बंद हो गए। राजीव जब कभी भी फोन करता या तो फोन काट दिया जाता या फिर लंबे समय तक उसमे घंटियाँ बजती रहती।
राजीव भी थोड़ा व्यस्त होने के कारण चार-पाँच महीनों तक दिल्ली नहीं जा पाया। बाद में राजीव को मालूम हुआ कि रीटा और उनका परिवार दिल्ली छोड़कर कहीं दूर चले गए हैं। राजीव ने रीटा के बारे में जानने के लिए पूरी कोशिश की। वह रीटा के हर दोस्त, हर रिश्तेदार से मिला लेकिन किसी को भी रीटा कहाँ है उसकी जानकारी नहीं थी।इस बात को पूरे पाँच साल बीत गए। एक दिन राजीव ऑफिस से बाहर ही निकला था कि सामने सड़क पर खड़े एक गुब्बारे वाले के पास एक महिला अपने छोटे बच्चे के साथ खड़ी थी। उसका बेटा गुब्बारे खरीदने के लिए बार बार उससे जिद करता था लेकिन वह मना कर रही थी।
राजीव को उस महिला का चेहरा कुछ जाना पहचाना लगा। वह न चाहते हुए भी अपनी कार को रोड के दूसरी तरफ ले गया। उसने उस महिला को गौर से देखने का प्रयास किया, वह महिला और कोई नहीं बल्कि रीटा ही थी और वह बच्चा जो कब से उससे गुब्बारा खरीदने की जिद कर रहा था वह उसका ही बेटा था। एक मिनट के लिए राजीव अपने आपको सँभाल नहीं पाया। रीटा अब तक कहाँ थी और कब उसकी शादी हो गई, उसने क्यों मुझे नहीं बताया? ऎसे कई सवाल थे जो राजीव को परेशान कर रहे थे। उसने धीरे से अपनी गाड़ी का दरवाजा खोला और रीटा के नजदीक आकर खड़ा हो गया।
एक पल के लिए तो अपने सामने राजीव को देखकर रीटा हैरान ही रह गई लेकिन बाद में अपने आपको सँभालते हुए सिर्फ फॉर्मलिटी के लिए उसने न चाहते हुए भी कहा 'हैलो राजीव कैसे हो?'
जिंदा हूँ। राजीव ने कड़वे लहजे में जवाब दिया। उसके जेहन में पिछले कई सालों से जो सवाल एक शूल की भाँति चुभ रहा था वह आज बाहर निकल ही गया 'रीटा तुम बिना बताए कहाँ चली गई थीं? मैंने तुम्हें कहाँ-कहाँ नहीं ढूँढा।
रीटा ने राजीव की इस बात का जवाब देना मुनासिब नहीं समझा और अपने बेटे के पास जाकर कहा' सोहम, बेटा यह राजीव अंकल हैं उन्हें हैलो कहो। सोहम ने मीठी मुस्कान के साथ राजीव को हैलो कहा। उसकी मुस्कान को देखकर राजीव अपनी कड़वाहट और गुस्सा भूल गया, उसने गुब्बारे वाले से एक बड़ा गुब्बारा खरीदकर उसके हाथ में थमा दिया।
रीटा सोहम की अँगुली पकड़कर अब सड़क के दूसरे छोर पर चलने लगी। सामने के मल्टी में ही उसका फ्लैट था। राजीव ने सोहम का दूसरा हाथ पकड़ लिया। राजीव बार-बार एक ही बात रट रहा था जिससे परेशान होकर आखिर में रीटा भड़क गई।
'देखो राजीव अब हमारे बीच में ऎसा कुछ भी नहीं रहा, जैसा तुम चाहते थे। कहीं मेरे पति ने तुम्हें मेरे साथ देख लिया तो मेरी गृहस्थी बर्बाद हो जाएगी। भगवान के लिए यहाँ से चले जाओ। प्लीस राजीव यहाँ से चले जाओ।' रीटा ने मुँह फेरते हुए कहा।
आज रीटा पूरी तरह बदल चुकी थी। यह वही रीटा थी जो कभी राजीव के लिए अपनी जान देने के लिए भी तैयार हो जाती थी लेकिन अचानक उसे क्या हो गया। आधी अधूरी बातों से राजीव को यह तो मालूम हो गया कि रीटा ने लंदन के एक बड़े उद्योगपति मोहन अग्रवाल से उसी समय शादी कर ली थी जब वह मुंबई में था। यह रिश्ता रीटा के चाचाजी लाए थे। उस वक्त रीटा असमंज में थी कि वह किसे चुने एक तरफ राजीव था तो और दूसरी और मोहन।मोहन के सामने राजीव की औकात फूटी कौड़ी की भी नहीं थी। उसके पास पुरखों की जायदाद और एक बड़ा कारोबार था। घर में दस-दस नौकर थे, वह रीटा के वो सभी सपने पूरे कर सकता था जिसे वह दिन-रात देखा करती थी। जबकि दूसरी और राजीव के पास उस व्यक्त रहने के लिए खुद का एक कमरा भी नहीं था। काफी सोच विचारकर अंत में रीटा ने प्यार के बदले पैसे देखकर मोहन से शादी कर ली और उसका पूरा परिवार दिल्ली छोड़ लंडन जा बसा।
बेचारा राजीव आखिर तक यह बात नहीं जान पाया कि वह सालों से जिस लड़की की प्रतिक्षा कर रहा था, वह आज एक लड़के की माँ बन चुकी है और मुंबई में अपने एक रिश्तेदार की शादी के लिए आई है।
राजीव अब तुम वापस चले जाओ। मेरे परिचितों का घर आ गया है। वो हम दोनों को जानते हैं। प्लीज चले जाओ' रीटा ने सामने वाली बिल्डिंग की और इशारा करते हुए कहा।
'लेकिन रीटा मेरी बात तो सुनो' राजीव अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया और रीटा अपने पति का विजिटिंग कार्ड देकर मल्टी के भीतर चली गई कार्ड में लिखा था। मि.मोहन कुमार अग्रवाल, एमडी फोर्च्युन प्राइवेट लि. लंदन।
उस मल्टी में दो-तीन तक शादी का माहौल रहा। शादी खत्म होने के बाद जब रीटा अपने परिवार के साथ लंदन जाने के लिए रवाना हो रही थी तभी मल्टी के चौकीदार ने उसे एक लेटर दिया और कहा कि मैडम यह एक साहब आपके लिए छोड़कर चले गए हैं। यह वही लेटर था जो रीटा आज पढ़ रही थी। उसने उसका दूसरा पन्ना खोला जिसे पढ़ने का कष्ट रीटा ने आज से पहले कभी नहीं किया था। जिसमें राजीव ने एक बड़ी बात लिखी थी। 'रीटा मालूम नहीं क्यों मैं चाहकर भी तुमसे नफरत नहीं कर पाया। तुम्हारे जाने के बाद भी मुझे हमेशा ऎसा लगा कि तुम मेरे साथ हो रीटा तुम नहीं हो फिर भी हमेशा ऎसा लगता कि तुम मेरे साथ हो, जब भी कोई बात होती है तब लोगों से मैं तुम्हारी बात छेड़ देता हूँ। तुम्हीं मेरी वो आँखें हो जो मुझे सूनी और तन्हा राहों में रास्ता दिखाती है। तुम्हारे मुस्कान को याद करके में दुनियाभर का गम भूल जाता हूँ। मैं तुम्हें कल भी प्यार करता था, आज भी करता हूँ और हमेशा करता रहूँगा। हो सके तो अगले जन्म में जरूर मिलना। सदा तुम्हें प्यार करने वाला राजीव!
रीटा ने लेटर के नीचे देखा जिसमें उसी कंपनी का पता लिखा था जिसमें रीटा के पति काम करते थे। दूसरे दिन सुबह-सुबह रीटा ने अपने पति से पूछा 'क्या आप राजीव शर्मा को जानते हैं?
क्यों नहीं भला एक नौकर अपने बॉस को कैसे भूल सकता है। वह हमारी कंपनी के सीईओ हैं। फिलहाल वह मुंबई में हैं। मोहन ने बिना रीटा को देखे एक हाथ में चाय का कप और दूसरे हाथ में अखबार रखते हुए कहा।
ध्वनि और प्रकाश की कहानी हीर-रांझा, सोहनी-महिवाल से कम नहीं। जिसे पढ़ने और सुनने के बाद मुँह से केवल एक ही बात निकलती है। आह! इसे कहते हैं प्यार, जिसे अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता, सिर्फ महसूस किया जा सकता है।
ध्वनि और प्रकाश दोनों एक ही काम्प्लेक्स में हाल ही में रहने आए हैं। इस बिल्डिंग को बने ज्यादा समय नहीं हुआ। ध्वनि जहाँ सुंदर दिखती है, वहीं प्रकाश भी स्मार्ट और हैंडसम है। निगाहों-निगाहों से उतरे दोनों एक-दूसरे के दिल में। लिफ्ट में जब पहली बार दोनों अकेले मिले। तो जान-पहचान के हिसाब से प्रकाश ने ध्वनि से हलो किया और खुद का नाम बताते हुए ध्वनि से नाम पूछ लिया। ध्वनि ने रिएक्ट ऐसे किया जैसे उनके अलावा और भी कोई लिफ्ट में हो। मी? आई एम ध्वनि।
ऐसे ही कभी कभार टकराने पर दोनों कुछेक जुमले छोड़ दिया करते थे। पहले कहाँ रहते थे या आप क्या करते हैं। वगैरह-वगैरह। उसके बाद दोनों के फ्रेंड सर्कल के जरिये दोनों में संपर्क बढ़ा। अन्य फ्लैट्स के दोस्त और ध्वनि की फ्रेंड्स के जरिये आगे की जानकारी दोनों तक पहुँच जाती थी। आग दोनों तरफ लगी हुई। चोरी-छिपे मिलना, फोन पर बात करना शुरू हुआ।
साल-दो साल की इन मुलाकातों के बाद ध्वनि ने एक दिन प्रकाश को बताया कि उसके दिल में छेद है। पहले तो प्रकाश का दिल धक करके रह गया। एक क्षण तो लगा जैसे ऐसी गंभीर बीमारी उसे खुद ही हो। लेकिन घर की आर्थिक स्थिति ज्यादा ठीक न होने के कारण उसका ऑपरेशन नहीं हो पा रहा है। यदि तुम चाहो तो अपना जीवनसाथी कोई दूसरा चुन सकते हो। मैं तुम्हें यह बात पहले भी बताना चाहती थी लेकिन पता नहीं समय कब निकलता गया और आज हमें मिले 2 साल होने को आए। लेकिन अभी भी कुछ देर नहीं हुई है।
सोच-विचार करने के बाद प्रकाश ध्वनि की मेडिकल रिपोर्ट लेकर चेन्नई के हॉस्पिटल गया और इलाज के खर्च के बारे में पता लगा जिसमें लगभग ढाई से तीन लाख रुपए खर्च आना था। प्रकाश ने अपनी सैलेरी से सारे खर्च बंद करके पैसा जोड़ना शुरू किया। यहाँ तक कि घंटों ध्वनि से फोन पर बात करना बंद कर दिया। क्योंकि उसे फोन लगाने के लिए एसटीडी का ही उपयोग करना पड़ता था और उसका बिल महीने भर का लगभग दो-ढाई हजार आता था। कभी-कभार ही थोड़े समय के लिए फोन लगाता। अब उसके जीवन में रुपयों की अहमियत काफी बढ़ गई थी।
लगभग 2 साल में उसने डेढ़ लाख रुपया जोड़ लिया। प्रकाश और ध्वनि के दोस्तों ने भी उसकी आर्थिक मदद की। अपने माता-पिता को जैसे-तैसे राजी कर वह सवा लाख रुपया लेने में सफल हो गया। अंतरजातीय होने के कारण लड़की के माता-पिता बिल्कुल भी दोनों की शादी के पक्ष में नहीं थे। इसलिए दोनों ने चुपचाप चेन्नई जाकर इलाज करवाया और फोन पर ध्वनि के माता-पिता को इसकी जानकारी दी।
दोनों के साथ होने की खबर लगते ही ध्वनि के माता-पिता नाराज हुए और प्रकाश के घर उसके माता-पिता से लड़ने पहुँच गए कि कैसे तुम्हारा बेटा हमारी बेटी को लेकर चला गया और पुलिस में जाकर रिपोर्ट लिखाने की बात करने लगे। लेकिन कुछ घंटों के बाद प्रकाश के माता-पिता ध्वनि के घर गए और उनसे विनम्रता पूर्वक बोले 'आप ही नहीं दोनों की शादी के हम भी खिलाफ थे। परंतु जब प्रकाश ने हमें सारी बात बताई कि दोनों एक-दूसरे को प्यार करते हैं और इलाज के बाद शादी भी करने को तैयार हैं तो आखिर मुझे भी हार माननी पड़ी और शादी के लिए राजी होना पड़ा और जब वह इतना परेशान हो ही रहा है आपकी बेटी के इलाज के लिए तो मेरा आपसे हाथ जोड़कर निवेदन है कि आप भी इतनी सी बात मान लें।
प्रकाश ने कभी पैसे का इतना महत्व नहीं समझा जितना पिछले 2 सालों में उसे समझ में आया है। मैंने तो हकीकत में इतना प्रेम पहली बार ही देखा है। सोचने का समय माँगकर उस समय भी ध्वनि के माता-पिता बात को टाल गए और दो दिन बाद जब प्रकाश और ध्वनि चेन्नई से लौटे तो प्रकाश से मिलने के बाद उन्होंने भी शादी के लिए हाँ कर दी। दोनों ने बड़ी धूमधाम से शादी रचाकर अन्य प्रेमी युगलों के लिए मिसाल पेश की। आज भी दोनों अपनी गृहस्थी भलीभाँति चला रहे हैं।
जीवन में कभी उन लोगों पर भरोसा मत करो, समय बदलने के साथ जिनकी भावनाएँ भी बदल जाती हैं बल्कि उन लोगों पर भरोसा करो जिनकी भावनाएँ समय बदलने के साथ नहीं बदलती। जैसा प्रकाश ने किया ध्वनि की बीमारी पता लगने के बाद भी उसकी चाहत में कोई कमी नहीं आई।
वो तेरे प्यार का गम!
'तुम्हें क्या मिला वह तो मैं नहीं जानता लेकिन एक बात जरूर जानता हूँ कि तुमने उस शख्स को खोया है जो कभी अपने आपसे भी ज्यादा तुम्हें प्यार करता था। तुमने उसे धोखा दिया है जिसने अपने जीवन में सिर्फ और सिर्फ तुम पर भरोसा किया। खैर तुम्हे जो करना था वह तुमने कर लिया बस अब एक आखिरी गुजारिश है। मेरे बाकी बचे जीवन में कभी भी और कहीं भी अगर तुम्हारा मुझसे सामना हो जाए तो भगवान के लिए अपना रास्ता बदल देना या फिर अपना मुँह फेर लेना। क्योंकि मैं जानता हूँ कि जब कभी भी मैं तुम्हारा चेहरा देखूँगा तब मुझे सिर्फ एक ही बात का अफसोस रहेगा कि मैंने इस चेहरे के पीछे छुपे हुए उस शख्स से प्यार किया जिसने आखिर तक मुझे धोखे के अलावा और कुछ भी नहीं दिया। हो सकता है कि उस वक्त मैं गुस्से में आकर कुछ ऎसा काम कर जाऊँ जो मैं कभी नहीं करना चाहता।''
उस दिन अचानक ही रीटा की नजर राजीव के द्वारा लिखे गए उस खत पर पड़ गई जो कई सालों से एक किताब के पन्नों के बीच में सड़ रहा था। यह खत राजीव और रीटा की प्यार की यादों को बयाँ करने वाला आखिर खत था।
कॉलेज के दिनो में ही इन दोनों के प्यार का गुल खिला था। रीटा प्रिंसीपल साहब की ऑफिस से बाहर ही निकली थी कि अचानक ही सामने के कैन्टीन में राजीव अपने दोस्तों के साथ काफी पी रहा था। नई स्टूडेंट को देखकर सभी सीनियर्स रीटा के नजदीक आ गए और देखते ही देखते उसकी रैगिंग शरू कर दी। हद तो तब हो गई जब रीटा को कहा गया कि 'वह एक अपाहिज महिला की तरह लंगडाती लंगडाती सभी स्टूडेन्ट्स के सामने आकर भीख माँगे।
रीटा के लिए दिल्ली शहर बिल्कुल नया था और यहाँ के लोग भी। वह बिलकुल घबरा गई और फूट फूट कर रोने लगी। उस समय राजीव ही था जो एक फरिश्ता बनकर उसे बचाने आया था। उसने सभी सीनियर्स को खूब डाँटा और उन्हें रीटा से माफी माँगने के लिए भी कहा।
उसी दिन से राजीव रीटा के मन को भा गया। धीरे-धीरे उन दोनों की दोस्ती बढ़ने लगी। दूरियाँ नजदीकियों में तब्दील होने लगी और एक दिन रीटा ने सामने से ही राजीव को प्रप्रोज कर दिया। राजीव को भी रीटा बहुत पसंद थी उसने भी उसे खुले मन से स्वीकार कर लिया। समय बीतता गया और उनका प्यार परवान चढ़ते गया। बात शादी तक भी आ पहुँची।
अब राजीव एक प्रतिष्ठित कंपनी में मैनेजर था उसकी तनख्वाह भी अच्छी थी। रीटा भी हाईस्कूल के विद्यार्थियों को पढ़ाती थी। अचानक ही राजीव का तबादला मुंबईClick here to see more news from this city शहर में हो गया। रीटा से कोसों दूर होने के बावजूद भी वह हर महीने उसे मिलने के लिए मुंबई से दिल्ली आता रहता था। दोनों घंटों तक टेलीफोन पर एक-दूसरे से बातें किया करते थे। लेकिन धीरे-धीरे रीटा के फोन आने बंद हो गए। राजीव जब कभी भी फोन करता या तो फोन काट दिया जाता या फिर लंबे समय तक उसमे घंटियाँ बजती रहती।
राजीव भी थोड़ा व्यस्त होने के कारण चार-पाँच महीनों तक दिल्ली नहीं जा पाया। बाद में राजीव को मालूम हुआ कि रीटा और उनका परिवार दिल्ली छोड़कर कहीं दूर चले गए हैं। राजीव ने रीटा के बारे में जानने के लिए पूरी कोशिश की। वह रीटा के हर दोस्त, हर रिश्तेदार से मिला लेकिन किसी को भी रीटा कहाँ है उसकी जानकारी नहीं थी।इस बात को पूरे पाँच साल बीत गए। एक दिन राजीव ऑफिस से बाहर ही निकला था कि सामने सड़क पर खड़े एक गुब्बारे वाले के पास एक महिला अपने छोटे बच्चे के साथ खड़ी थी। उसका बेटा गुब्बारे खरीदने के लिए बार बार उससे जिद करता था लेकिन वह मना कर रही थी।
राजीव को उस महिला का चेहरा कुछ जाना पहचाना लगा। वह न चाहते हुए भी अपनी कार को रोड के दूसरी तरफ ले गया। उसने उस महिला को गौर से देखने का प्रयास किया, वह महिला और कोई नहीं बल्कि रीटा ही थी और वह बच्चा जो कब से उससे गुब्बारा खरीदने की जिद कर रहा था वह उसका ही बेटा था। एक मिनट के लिए राजीव अपने आपको सँभाल नहीं पाया। रीटा अब तक कहाँ थी और कब उसकी शादी हो गई, उसने क्यों मुझे नहीं बताया? ऎसे कई सवाल थे जो राजीव को परेशान कर रहे थे। उसने धीरे से अपनी गाड़ी का दरवाजा खोला और रीटा के नजदीक आकर खड़ा हो गया।
एक पल के लिए तो अपने सामने राजीव को देखकर रीटा हैरान ही रह गई लेकिन बाद में अपने आपको सँभालते हुए सिर्फ फॉर्मलिटी के लिए उसने न चाहते हुए भी कहा 'हैलो राजीव कैसे हो?'
जिंदा हूँ। राजीव ने कड़वे लहजे में जवाब दिया। उसके जेहन में पिछले कई सालों से जो सवाल एक शूल की भाँति चुभ रहा था वह आज बाहर निकल ही गया 'रीटा तुम बिना बताए कहाँ चली गई थीं? मैंने तुम्हें कहाँ-कहाँ नहीं ढूँढा।
रीटा ने राजीव की इस बात का जवाब देना मुनासिब नहीं समझा और अपने बेटे के पास जाकर कहा' सोहम, बेटा यह राजीव अंकल हैं उन्हें हैलो कहो। सोहम ने मीठी मुस्कान के साथ राजीव को हैलो कहा। उसकी मुस्कान को देखकर राजीव अपनी कड़वाहट और गुस्सा भूल गया, उसने गुब्बारे वाले से एक बड़ा गुब्बारा खरीदकर उसके हाथ में थमा दिया।
रीटा सोहम की अँगुली पकड़कर अब सड़क के दूसरे छोर पर चलने लगी। सामने के मल्टी में ही उसका फ्लैट था। राजीव ने सोहम का दूसरा हाथ पकड़ लिया। राजीव बार-बार एक ही बात रट रहा था जिससे परेशान होकर आखिर में रीटा भड़क गई।
'देखो राजीव अब हमारे बीच में ऎसा कुछ भी नहीं रहा, जैसा तुम चाहते थे। कहीं मेरे पति ने तुम्हें मेरे साथ देख लिया तो मेरी गृहस्थी बर्बाद हो जाएगी। भगवान के लिए यहाँ से चले जाओ। प्लीस राजीव यहाँ से चले जाओ।' रीटा ने मुँह फेरते हुए कहा।
आज रीटा पूरी तरह बदल चुकी थी। यह वही रीटा थी जो कभी राजीव के लिए अपनी जान देने के लिए भी तैयार हो जाती थी लेकिन अचानक उसे क्या हो गया। आधी अधूरी बातों से राजीव को यह तो मालूम हो गया कि रीटा ने लंदन के एक बड़े उद्योगपति मोहन अग्रवाल से उसी समय शादी कर ली थी जब वह मुंबई में था। यह रिश्ता रीटा के चाचाजी लाए थे। उस वक्त रीटा असमंज में थी कि वह किसे चुने एक तरफ राजीव था तो और दूसरी और मोहन।मोहन के सामने राजीव की औकात फूटी कौड़ी की भी नहीं थी। उसके पास पुरखों की जायदाद और एक बड़ा कारोबार था। घर में दस-दस नौकर थे, वह रीटा के वो सभी सपने पूरे कर सकता था जिसे वह दिन-रात देखा करती थी। जबकि दूसरी और राजीव के पास उस व्यक्त रहने के लिए खुद का एक कमरा भी नहीं था। काफी सोच विचारकर अंत में रीटा ने प्यार के बदले पैसे देखकर मोहन से शादी कर ली और उसका पूरा परिवार दिल्ली छोड़ लंडन जा बसा।
बेचारा राजीव आखिर तक यह बात नहीं जान पाया कि वह सालों से जिस लड़की की प्रतिक्षा कर रहा था, वह आज एक लड़के की माँ बन चुकी है और मुंबई में अपने एक रिश्तेदार की शादी के लिए आई है।
राजीव अब तुम वापस चले जाओ। मेरे परिचितों का घर आ गया है। वो हम दोनों को जानते हैं। प्लीज चले जाओ' रीटा ने सामने वाली बिल्डिंग की और इशारा करते हुए कहा।
'लेकिन रीटा मेरी बात तो सुनो' राजीव अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया और रीटा अपने पति का विजिटिंग कार्ड देकर मल्टी के भीतर चली गई कार्ड में लिखा था। मि.मोहन कुमार अग्रवाल, एमडी फोर्च्युन प्राइवेट लि. लंदन।
उस मल्टी में दो-तीन तक शादी का माहौल रहा। शादी खत्म होने के बाद जब रीटा अपने परिवार के साथ लंदन जाने के लिए रवाना हो रही थी तभी मल्टी के चौकीदार ने उसे एक लेटर दिया और कहा कि मैडम यह एक साहब आपके लिए छोड़कर चले गए हैं। यह वही लेटर था जो रीटा आज पढ़ रही थी। उसने उसका दूसरा पन्ना खोला जिसे पढ़ने का कष्ट रीटा ने आज से पहले कभी नहीं किया था। जिसमें राजीव ने एक बड़ी बात लिखी थी। 'रीटा मालूम नहीं क्यों मैं चाहकर भी तुमसे नफरत नहीं कर पाया। तुम्हारे जाने के बाद भी मुझे हमेशा ऎसा लगा कि तुम मेरे साथ हो रीटा तुम नहीं हो फिर भी हमेशा ऎसा लगता कि तुम मेरे साथ हो, जब भी कोई बात होती है तब लोगों से मैं तुम्हारी बात छेड़ देता हूँ। तुम्हीं मेरी वो आँखें हो जो मुझे सूनी और तन्हा राहों में रास्ता दिखाती है। तुम्हारे मुस्कान को याद करके में दुनियाभर का गम भूल जाता हूँ। मैं तुम्हें कल भी प्यार करता था, आज भी करता हूँ और हमेशा करता रहूँगा। हो सके तो अगले जन्म में जरूर मिलना। सदा तुम्हें प्यार करने वाला राजीव!
रीटा ने लेटर के नीचे देखा जिसमें उसी कंपनी का पता लिखा था जिसमें रीटा के पति काम करते थे। दूसरे दिन सुबह-सुबह रीटा ने अपने पति से पूछा 'क्या आप राजीव शर्मा को जानते हैं?
क्यों नहीं भला एक नौकर अपने बॉस को कैसे भूल सकता है। वह हमारी कंपनी के सीईओ हैं। फिलहाल वह मुंबई में हैं। मोहन ने बिना रीटा को देखे एक हाथ में चाय का कप और दूसरे हाथ में अखबार रखते हुए कहा।
प्रेम कथाएँ
प्रेम क्या होता है?
खिड़की के बाहर गर्मी की रात बिखरी हुई है, गर्मी की गुनगुनी-सी रात। खिड़की से सटकर लगी हुई रातरानी की झाड़ी के फूलों की मादक गंध खिड़की के परदे से अठखेलियाँ कर रही हवा के साथ कमरे में आ रही है। खिड़की के छज्जे पर लदी हुई रंगून क्रीपर की तलर भी लाल, सफेद और गुलाबी गुच्छों के कारण झुकी जा रही है।
खिड़की के पार दूर आसमान में आधा अधूरा चाँद टंका हुआ है। ग्रीष्म की धूप को दिन भर सहन करने के बाद झुलसे पेड़ों की पत्तियों और शाखाओं को रात की ठंडी हवा सहला रही है। हवा का स्पर्श पाकर पत्तियाँ कृतज्ञतावश झुकी जा रही हैं। गर्मी के मौसम की सबसे बड़ी विशेषता उसकी रात होती है। जितना तपता हुआ, जलता हुआ दिन उतनी ही सुहानी रात।
खिड़की से हटकर सोनू अंदर आ गया और अपनी कविता की डायरी लेकर कुर्सी पर बैठ गया। लड़का अभी भी उसी प्रकार सो रहा है। सोनू गौर से उस लड़के के चेहरे को देखने लगा। चौदह-पंद्रह वर्ष की मासूमियत से भरा हुआ चेहरा, जिस पर जवानी ने होठों के ऊपर कल्ले की तरह फूट रहे मूँछों के बारीक़-बारीक़ रोम के रूप में अभी दस्तक देना प्रारंभ ही किया है। गुलाबी होंठ जिनको बीमारी ने भले ही सुखा दिया है मगर अभी भी उनमें ताजगी है। बीमारी के बाद भी चेहरे पर किशोरावस्था की चमक और स्निग्धता बिखरी है।
सोनू को यहाँ लड़के की देखभाल के लिए रखा गया है। वैसे वो एक निजी अस्पताल का कर्मचारी है जिसके मालिक लड़के के पिता के करीबी दोस्त हैं उनके ही कारण सोनू को यहाँ भेजा गया है। लड़के को दवा देना उसे पलंग से उठाकर टहलाना, खाना खिलाना सबकी व्यवस्था सोनू को करनी होती है। लड़के की माँ नहीं है केवल पिता ही हैं, जिनको कारोबार के सिलसिले में घर से बाहर रहना पड़ता है। इससे ज्यादा न सोनू को पता है, न ही उसको पूछने की इजाजत है। उसे बस ये पता है कि यहाँ से उसे अच्छा पैसा मिलेगा जो कॉलेज की परीक्षा फीस भरने में काम आ जाएगा। यहाँ पर जब तक है तब तक कविता लिखने का भी समय है उसके पास।
अस्पताल की नौकरी वह केवल अपनी कॉलेज की पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए ही कर रहा है, मगर अस्पताल में काम करते समय कविता? सोचा ही नहीं जा सकता।
सोनू भैय्या! लड़के की आवाज सुनकर सोनू की तंद्रा टूटी।
'हाँ बोलो।' सोनू ने कुर्सी से उठकर पलंग की तरफ जाते हुए कहा। 'पानी चाहिए सोनू भैया।'
लड़के ने उत्तर दिया। 'देता हूँ तुम लेटे रहो।' फिर घड़ी देखते हुए कहा, 'दवा लेने का टाइम भी तो हो गया है।' कहते हुए सोनू दवा निकालने लगा।
चलो उठकर बैठ जाओ दवा लेना है।' सोनू के कहते ही लड़का धीरे-धीरे उठा और तकिये से टिककर बैठ गया। दवा देने के बाद जब सोनू वापस कुर्सी पर बैठने लगा तो लड़के ने कहा, सोनू भैया यहीं बैठ जाओ न पलंग पर, आपसे बातें करूँगा, अब नींद तो आएगी नहीं।'
लड़के के अनुरोध पर सोनू वहीं बैठ गया। पलंग के पास रखी टेबल पर से कंघी उठा कर लड़के के बाल ठीक करने लगा। गर्मी की मस्त हवा के कारण लड़के के बाल बिखर-बिखर जा रहे हैं। शाम को नहाते समय लड़के ने जिद करके शैम्पू लगाया था और देर तक नहाता रहा था।
'सोनू भैया।' लड़के के सिर पर गिर रही एक लट को जब वो पीछे कर रहा था तब लड़के ने कहा, 'हूँ... कंघी को टेबल पर रखते हुए कहा सोनू ने। कुछ देर तक लड़का चुप रहा फिर बोला, 'ये प्रेम क्या होता है..?' लड़के के प्रश्न से सोनू कुछ चौंका फिर मुस्कराता हुआ बोला, 'प्रेम...? अभी तीन चार साल रुक जाओ, सब पता चल जाएगा।'
कहते हुए उसने लड़के के बालों को हल्के से बिखरा दिया।
तीन चार साल रुक पाऊँगा मैं...?'
लड़के ने उदासी से पूछा। लड़के के पूछते ही कमरे की हवा रुक गई।
क्या होता है प्रेम सोनू भैय्या...!?' सोनू को चुप देखकर लड़के ने फिर पूछा।
'प्रेम वह होता है जो हमें किसी दूसरे से जोड़ता है।' सोनू ने कुछ टालने वाले अंदाज में कहा।
'किससे?' लड़के ने फिर पूछा।
किसी से भी, उन सबसे जो हमें अच्छे लगते हैं, हमारे माँ-बाप, हमारे भाई-बहन, हमारे दोस्त।' सोनू ने जवाब दिया।
माँ तो मेरे पास नहीं है पापा हैं पर वो भी... भाई बहन भी नहीं हैं।'
कहते-कहते लड़का फिर चुप हो गया। लड़के की आँखें अचानक नम हो गई थीं। सोनू को लगा उसकी पलकों के किनारे झिलमिला भी रहे हैं।
उसने लड़के को सहज करने के लिए कहा, 'और सबसे खास प्रेम हमें किसी एक खास से भी होता है।' सोनू के इतना कहते ही लड़के के चेहरे के भाव अचानक बदल गए, मानो सोनू ने उसके मन की बात कह दी हो।
'कौन खास सोनू भैया?' उसने उत्सुकता से पूछा।
ये जो बाहर चाँद नजर आ रहा है न, आधा अधूरा-सा चाँद, इसको देखकर न तो रात की रानी के फूल झूम रहे हैं न पेड़ों की पत्तियाँ इठला रही हैं। क्योंकि ये सब एक खास चाँद से प्रेम करते हैं। पूर्णमासी के पूरे चाँद से। अभी दो दिन बाद जब ये चाँद पूरा हो जाएगा तब से सब उस खास के प्रेम में पागल हो जाएँगे। सोनू ने उत्तर दिया।
सचमुच? लड़के ने उत्सुकता से फिर पूछा।
हाँ बिल्कुल दिखाऊँगा। सोनू ने उत्तर दिया।
लड़का गौर से खिड़की के पार के चाँद को देखने लगा। उसके चेहरे के भाव पल-पल बदल रहे थे। कुछ देर तक देखते रहने के बाद लड़का फिर उदास हो गया।
तुम्हें मिला कोई खास? सोनू ने लड़के का मूड बदलने के लिए फिर पूछा।
लड़के ने सोनू की तरफ देखा। सोनू ने देखा उन दो नन्ही आँखों में सितारे झिलमिला रहे थे। फिर अचानक वो शरमा गया और चादर के धागे खींचने लगा।
हूँ... मतलब मिली है।' सोनू ने मजाक के अंदाज में पूछा।
'है नहीं थी..।' लड़के ने उसी तरह झुके हुए कहा पर उसकी आवाज डूबी हुई थी।
'कब? सोनू ने पूछा।
जब मैं स्कूल जाता था। लड़के के स्वर में उदासी थी। उसकी आवाज ऐसी थी मानो किसी सुनसान रात में पहाड़ पर लगे पेड़ों पर बर्फ गिर रही हो।
कौन थी..? सोनू ने फिर पूछा।
'मेरे साथ ही पढ़ती थी और मेरे साथ वही होता था जो अभी आपने कहा ना कि पूर्णमासी के चाँद को देखकर पेड़ों को हो जाता है।' लड़के ने धीरे से कहा।
हूँ... खूब बात-वात होती होंगी तब तो उससे।' सोनू ने शरारत के लहज़े में पूछा।
नहीं, बात तो एक बार भी नहीं हुई। लड़के ने सिर उठाकर उत्तर दिया।
अरे..! क्यों? सोनू ने पूछा।
हिम्मत नहीं होती थी और वो भी शायद बात करना नहीं चाहती थी। लड़के की आँखें बुझ गई थीं।
चलो अब जब स्कूल जाना शुरू करो तो सबसे पहले उससे जाकर बात करना और नहीं कर पाओ तो मुझे ले चलना मैं तुम्हारी तरफ से बात कर लूँगा। सोनू ने लड़के के सिर पर हाथ रखते हुए कहा।
क्यों मजाक करते हो सोनू भैय्या, अब कहाँ जा पाऊँगा मैं स्कूल? अब तो शायद मम्मी के पास चला जाऊँगा। कहते हुए लड़के ने सिर पर रखा सोनू का हाथ लेकर गोद में रख लिया और दोनों हाथों में दबा लिया। सोनू ने दूसरे हाथ से लड़के की आँखों में आई नमी को अपनी अँगुलियों में समेटते हुए कहा। लड़के ने कोई उत्तर नहीं दिया उसी तरह लेटा रहा। सोनू उसके बालों को सहलाता रहा। कुछ देर बाद जब उसको लगा कि लड़का सो गया है तो उसने आहिस्ता से लड़के का सिर अपनी गोद से उठाकर तकिये पर रखा उसे चादर ओढ़ाई और आकर अपने पलंग पर लेट गया।
अगले दिन से लड़के की तबीयत बिगड़ने लग गई थी। तेज बुखार में बड़बड़ाता रहता था। सोनू ने सुना कि उसकी बड़बड़ाहट में बार-बार मम्मी शब्द आ रहा है। नर्सिंग होम से कई बार डॉक्टर आकर लड़के को देखकर जा चुके थे।
बुखार के तीसरे दिन जब डॉक्टर सिन्हा लड़के को देखकर वापस जा रहे थे तब सोनू ने पूछा था, कोई डरने की बात तो नहीं है न सर।'
डरने की बात तो है, अब इसे अस्पताल में शिफ्ट करना ही पड़ेगा, ये रिकवर हो ही नहीं पा रहा है। इसके पिता कब तक आ जाएँगे?' डॉक्टर सिन्हा ने कहा था। 'बस शायद परसों तक आ जाएँगे, सर्वेंट बता रहा था कि उनका फोन आया था।' सोनू ने उत्तर दिया।
'ठीक है उनके आते ही इसे शिफ्ट कर देंगे, तब तक ध्यान रखना कुछ भी हो तो तुरंत खबर करना। कहते हुए डॉक्टर सिन्हा चले गए। सोनू आकर लड़के के सिरहाने बैठ गया और धीरे-धीरे उसका सिर दबाने लगा। कुछ देर बाद लड़का कसमसाया और उसने आँखें खोल दीं। सोनू को देखा तो मुस्करा दिया।
'उठ गए, चलो अच्छा किया, शाम भी हो गई है।' सोनू ने कहा।
लड़का कुछ देर तक सोनू को देखता रहा फिर बोला, 'सोनू भैया क्या अब मैं उसको कभी नहीं देख पाऊँगा?'
क्यों नहीं देख पाओगे? मुझे उसका पता, टेलीफोन नंबर दो अभी बुला लेता हूँ।' सोनू ने उत्तर दिया।
वो तो मुझे कुछ भी नहीं पता। लड़के ने उदासी के साथ कहा।
चलो मैं कल स्कूल जाकर पता कर लूँगा और उसको बुला लाऊँगा। सोनू ने लड़के का उत्साह बढ़ाने के लिए कहा। लड़का फिर अचानक बोला, 'सोनू भैया आज पूर्णिमा है ना? आज आपने कुछ दिखाने को कहा था।'
'हाँ भाई दिखा दूँगा रात तो होने दो।'
सोनू भैया मैं अपनी मम्मी को भी देखना चाहता था पर नहीं देख पाया, ये सब मेरे साथ ही..' कहते-कहते लड़का चुप हो गया।
चलो आज दिखा दूँगा जब चाँद पूरा होगा ना तब उसमें तुमको अपनी मम्मी भी दिखेंगी और वो भी। वो सब दिखेंगे, जिनको तुम प्रेम करते हो। सोनू ने कहा।
'सच...।' लड़के ने उत्साह में भरकर कहा।
बिल्कुल सच! सोनू ने उत्तर दिया।
पर मैं उनको छू तो नहीं पाऊँगा न?' लड़का फिर उदास हो गया।
क्यों नहीं छू पाओगे? जब चाँद को देखो तो मेरी इस हथेली को छू लेना तुमको ऐसा लगेगा कि तुम उन सबको छू रहे हो जिनको तुम प्रेम करते हो। सोनू ने अपनी हथेली दिखाते हुए कहा।
ठीक है। लड़का फिर उत्साह में भर गया।
पर देखो जब चाँद में तुम्हारी वो खास नजर आए तो उसे देखकर शरमा मत जाना।
सोनू ने लड़के की कमर में गुदगुदी करते हुए कहा लड़का खिलखिला उठा।
रात को लड़का सोनू ने गोद में उठाकर खिड़की पर बैठा दिया था क्योंकि तब उसके चलने-फिरने की ताकत बिल्कुल क्षीण हो गई थी।
'देखो वो पूरा पील चाँद।' अमलतास के दो पेड़ों के ऊपर दिख रहे चाँद की ओर इशारा करते हुए सोनू ने कहा। लड़के ने सिर उठा कर चाँद को देखा।
'देखो उसमें अपनी मम्मी को। दिख रही हैं ना? सोनू ने पूछा, लड़के ने हाँ में सिर हिलाया।
ठीक है अब आँखें बंद करके मेरी इस हथेली को छुओ। सोनू के कहते ही लड़के ने वैसा ही किया। थोड़ी देर बाद लड़के ने हथेली को खींचकर अपने चेहरे से सटा लिया। कुछ ही देर में सोनू की हथेली भीग गई।
सोनू ने लड़के की आँखें पोंछीं और फिर कहा, चलो अब फिर देखो चाँद को, अब वो दिखेगी। लड़के ने फिर चाँद को देखा।
दिखी? सोनू ने पूछा। लड़के ने फिर हाँ में सिर हिलाया और आँखें बंद कर लीं और सोनू की हथेली को फिर चेहरे से लगा लिया। अबकी बार सोनू को हथेली पर नमी की जगह आँच का एहसास हुआ लड़के की गर्म साँसों की आँच का एहसास। आँच धीरे-धीरे बढ़ती जा रही थी। बढ़ते-बढ़ते अचानक एकदम ठंडी हो गई और हथेली पर साँसों के टकराने का एहसास भी बंद हो गया। सोनू ने देखा दूर आसमान पर एक सितारा टूटा और रोशनी की लकीर छोड़ता हुआ चाँद की तरफ बढ़ा। चाँद के ठीक पास आकर वो सितारा बुझ गया मानो चाँद को छूकर खामोश हो गया हो।
सोनू ने आहिस्ता से लड़के का चेहरा हथेली पर से हटाया, लड़का उसकी बाँहों में झूल गया। हवा बिल्कुल ठहर गई थी मगर रात रानी के छोटे-छोटे फूल चुपचाप आँसुओं की तरह टप-टप करके जमीन पर टपक रहे थे।
खिड़की के बाहर गर्मी की रात बिखरी हुई है, गर्मी की गुनगुनी-सी रात। खिड़की से सटकर लगी हुई रातरानी की झाड़ी के फूलों की मादक गंध खिड़की के परदे से अठखेलियाँ कर रही हवा के साथ कमरे में आ रही है। खिड़की के छज्जे पर लदी हुई रंगून क्रीपर की तलर भी लाल, सफेद और गुलाबी गुच्छों के कारण झुकी जा रही है।
खिड़की के पार दूर आसमान में आधा अधूरा चाँद टंका हुआ है। ग्रीष्म की धूप को दिन भर सहन करने के बाद झुलसे पेड़ों की पत्तियों और शाखाओं को रात की ठंडी हवा सहला रही है। हवा का स्पर्श पाकर पत्तियाँ कृतज्ञतावश झुकी जा रही हैं। गर्मी के मौसम की सबसे बड़ी विशेषता उसकी रात होती है। जितना तपता हुआ, जलता हुआ दिन उतनी ही सुहानी रात।
खिड़की से हटकर सोनू अंदर आ गया और अपनी कविता की डायरी लेकर कुर्सी पर बैठ गया। लड़का अभी भी उसी प्रकार सो रहा है। सोनू गौर से उस लड़के के चेहरे को देखने लगा। चौदह-पंद्रह वर्ष की मासूमियत से भरा हुआ चेहरा, जिस पर जवानी ने होठों के ऊपर कल्ले की तरह फूट रहे मूँछों के बारीक़-बारीक़ रोम के रूप में अभी दस्तक देना प्रारंभ ही किया है। गुलाबी होंठ जिनको बीमारी ने भले ही सुखा दिया है मगर अभी भी उनमें ताजगी है। बीमारी के बाद भी चेहरे पर किशोरावस्था की चमक और स्निग्धता बिखरी है।
सोनू को यहाँ लड़के की देखभाल के लिए रखा गया है। वैसे वो एक निजी अस्पताल का कर्मचारी है जिसके मालिक लड़के के पिता के करीबी दोस्त हैं उनके ही कारण सोनू को यहाँ भेजा गया है। लड़के को दवा देना उसे पलंग से उठाकर टहलाना, खाना खिलाना सबकी व्यवस्था सोनू को करनी होती है। लड़के की माँ नहीं है केवल पिता ही हैं, जिनको कारोबार के सिलसिले में घर से बाहर रहना पड़ता है। इससे ज्यादा न सोनू को पता है, न ही उसको पूछने की इजाजत है। उसे बस ये पता है कि यहाँ से उसे अच्छा पैसा मिलेगा जो कॉलेज की परीक्षा फीस भरने में काम आ जाएगा। यहाँ पर जब तक है तब तक कविता लिखने का भी समय है उसके पास।
अस्पताल की नौकरी वह केवल अपनी कॉलेज की पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए ही कर रहा है, मगर अस्पताल में काम करते समय कविता? सोचा ही नहीं जा सकता।
सोनू भैय्या! लड़के की आवाज सुनकर सोनू की तंद्रा टूटी।
'हाँ बोलो।' सोनू ने कुर्सी से उठकर पलंग की तरफ जाते हुए कहा। 'पानी चाहिए सोनू भैया।'
लड़के ने उत्तर दिया। 'देता हूँ तुम लेटे रहो।' फिर घड़ी देखते हुए कहा, 'दवा लेने का टाइम भी तो हो गया है।' कहते हुए सोनू दवा निकालने लगा।
चलो उठकर बैठ जाओ दवा लेना है।' सोनू के कहते ही लड़का धीरे-धीरे उठा और तकिये से टिककर बैठ गया। दवा देने के बाद जब सोनू वापस कुर्सी पर बैठने लगा तो लड़के ने कहा, सोनू भैया यहीं बैठ जाओ न पलंग पर, आपसे बातें करूँगा, अब नींद तो आएगी नहीं।'
लड़के के अनुरोध पर सोनू वहीं बैठ गया। पलंग के पास रखी टेबल पर से कंघी उठा कर लड़के के बाल ठीक करने लगा। गर्मी की मस्त हवा के कारण लड़के के बाल बिखर-बिखर जा रहे हैं। शाम को नहाते समय लड़के ने जिद करके शैम्पू लगाया था और देर तक नहाता रहा था।
'सोनू भैया।' लड़के के सिर पर गिर रही एक लट को जब वो पीछे कर रहा था तब लड़के ने कहा, 'हूँ... कंघी को टेबल पर रखते हुए कहा सोनू ने। कुछ देर तक लड़का चुप रहा फिर बोला, 'ये प्रेम क्या होता है..?' लड़के के प्रश्न से सोनू कुछ चौंका फिर मुस्कराता हुआ बोला, 'प्रेम...? अभी तीन चार साल रुक जाओ, सब पता चल जाएगा।'
कहते हुए उसने लड़के के बालों को हल्के से बिखरा दिया।
तीन चार साल रुक पाऊँगा मैं...?'
लड़के ने उदासी से पूछा। लड़के के पूछते ही कमरे की हवा रुक गई।
क्या होता है प्रेम सोनू भैय्या...!?' सोनू को चुप देखकर लड़के ने फिर पूछा।
'प्रेम वह होता है जो हमें किसी दूसरे से जोड़ता है।' सोनू ने कुछ टालने वाले अंदाज में कहा।
'किससे?' लड़के ने फिर पूछा।
किसी से भी, उन सबसे जो हमें अच्छे लगते हैं, हमारे माँ-बाप, हमारे भाई-बहन, हमारे दोस्त।' सोनू ने जवाब दिया।
माँ तो मेरे पास नहीं है पापा हैं पर वो भी... भाई बहन भी नहीं हैं।'
कहते-कहते लड़का फिर चुप हो गया। लड़के की आँखें अचानक नम हो गई थीं। सोनू को लगा उसकी पलकों के किनारे झिलमिला भी रहे हैं।
उसने लड़के को सहज करने के लिए कहा, 'और सबसे खास प्रेम हमें किसी एक खास से भी होता है।' सोनू के इतना कहते ही लड़के के चेहरे के भाव अचानक बदल गए, मानो सोनू ने उसके मन की बात कह दी हो।
'कौन खास सोनू भैया?' उसने उत्सुकता से पूछा।
ये जो बाहर चाँद नजर आ रहा है न, आधा अधूरा-सा चाँद, इसको देखकर न तो रात की रानी के फूल झूम रहे हैं न पेड़ों की पत्तियाँ इठला रही हैं। क्योंकि ये सब एक खास चाँद से प्रेम करते हैं। पूर्णमासी के पूरे चाँद से। अभी दो दिन बाद जब ये चाँद पूरा हो जाएगा तब से सब उस खास के प्रेम में पागल हो जाएँगे। सोनू ने उत्तर दिया।
सचमुच? लड़के ने उत्सुकता से फिर पूछा।
हाँ बिल्कुल दिखाऊँगा। सोनू ने उत्तर दिया।
लड़का गौर से खिड़की के पार के चाँद को देखने लगा। उसके चेहरे के भाव पल-पल बदल रहे थे। कुछ देर तक देखते रहने के बाद लड़का फिर उदास हो गया।
तुम्हें मिला कोई खास? सोनू ने लड़के का मूड बदलने के लिए फिर पूछा।
लड़के ने सोनू की तरफ देखा। सोनू ने देखा उन दो नन्ही आँखों में सितारे झिलमिला रहे थे। फिर अचानक वो शरमा गया और चादर के धागे खींचने लगा।
हूँ... मतलब मिली है।' सोनू ने मजाक के अंदाज में पूछा।
'है नहीं थी..।' लड़के ने उसी तरह झुके हुए कहा पर उसकी आवाज डूबी हुई थी।
'कब? सोनू ने पूछा।
जब मैं स्कूल जाता था। लड़के के स्वर में उदासी थी। उसकी आवाज ऐसी थी मानो किसी सुनसान रात में पहाड़ पर लगे पेड़ों पर बर्फ गिर रही हो।
कौन थी..? सोनू ने फिर पूछा।
'मेरे साथ ही पढ़ती थी और मेरे साथ वही होता था जो अभी आपने कहा ना कि पूर्णमासी के चाँद को देखकर पेड़ों को हो जाता है।' लड़के ने धीरे से कहा।
हूँ... खूब बात-वात होती होंगी तब तो उससे।' सोनू ने शरारत के लहज़े में पूछा।
नहीं, बात तो एक बार भी नहीं हुई। लड़के ने सिर उठाकर उत्तर दिया।
अरे..! क्यों? सोनू ने पूछा।
हिम्मत नहीं होती थी और वो भी शायद बात करना नहीं चाहती थी। लड़के की आँखें बुझ गई थीं।
चलो अब जब स्कूल जाना शुरू करो तो सबसे पहले उससे जाकर बात करना और नहीं कर पाओ तो मुझे ले चलना मैं तुम्हारी तरफ से बात कर लूँगा। सोनू ने लड़के के सिर पर हाथ रखते हुए कहा।
क्यों मजाक करते हो सोनू भैय्या, अब कहाँ जा पाऊँगा मैं स्कूल? अब तो शायद मम्मी के पास चला जाऊँगा। कहते हुए लड़के ने सिर पर रखा सोनू का हाथ लेकर गोद में रख लिया और दोनों हाथों में दबा लिया। सोनू ने दूसरे हाथ से लड़के की आँखों में आई नमी को अपनी अँगुलियों में समेटते हुए कहा। लड़के ने कोई उत्तर नहीं दिया उसी तरह लेटा रहा। सोनू उसके बालों को सहलाता रहा। कुछ देर बाद जब उसको लगा कि लड़का सो गया है तो उसने आहिस्ता से लड़के का सिर अपनी गोद से उठाकर तकिये पर रखा उसे चादर ओढ़ाई और आकर अपने पलंग पर लेट गया।
अगले दिन से लड़के की तबीयत बिगड़ने लग गई थी। तेज बुखार में बड़बड़ाता रहता था। सोनू ने सुना कि उसकी बड़बड़ाहट में बार-बार मम्मी शब्द आ रहा है। नर्सिंग होम से कई बार डॉक्टर आकर लड़के को देखकर जा चुके थे।
बुखार के तीसरे दिन जब डॉक्टर सिन्हा लड़के को देखकर वापस जा रहे थे तब सोनू ने पूछा था, कोई डरने की बात तो नहीं है न सर।'
डरने की बात तो है, अब इसे अस्पताल में शिफ्ट करना ही पड़ेगा, ये रिकवर हो ही नहीं पा रहा है। इसके पिता कब तक आ जाएँगे?' डॉक्टर सिन्हा ने कहा था। 'बस शायद परसों तक आ जाएँगे, सर्वेंट बता रहा था कि उनका फोन आया था।' सोनू ने उत्तर दिया।
'ठीक है उनके आते ही इसे शिफ्ट कर देंगे, तब तक ध्यान रखना कुछ भी हो तो तुरंत खबर करना। कहते हुए डॉक्टर सिन्हा चले गए। सोनू आकर लड़के के सिरहाने बैठ गया और धीरे-धीरे उसका सिर दबाने लगा। कुछ देर बाद लड़का कसमसाया और उसने आँखें खोल दीं। सोनू को देखा तो मुस्करा दिया।
'उठ गए, चलो अच्छा किया, शाम भी हो गई है।' सोनू ने कहा।
लड़का कुछ देर तक सोनू को देखता रहा फिर बोला, 'सोनू भैया क्या अब मैं उसको कभी नहीं देख पाऊँगा?'
क्यों नहीं देख पाओगे? मुझे उसका पता, टेलीफोन नंबर दो अभी बुला लेता हूँ।' सोनू ने उत्तर दिया।
वो तो मुझे कुछ भी नहीं पता। लड़के ने उदासी के साथ कहा।
चलो मैं कल स्कूल जाकर पता कर लूँगा और उसको बुला लाऊँगा। सोनू ने लड़के का उत्साह बढ़ाने के लिए कहा। लड़का फिर अचानक बोला, 'सोनू भैया आज पूर्णिमा है ना? आज आपने कुछ दिखाने को कहा था।'
'हाँ भाई दिखा दूँगा रात तो होने दो।'
सोनू भैया मैं अपनी मम्मी को भी देखना चाहता था पर नहीं देख पाया, ये सब मेरे साथ ही..' कहते-कहते लड़का चुप हो गया।
चलो आज दिखा दूँगा जब चाँद पूरा होगा ना तब उसमें तुमको अपनी मम्मी भी दिखेंगी और वो भी। वो सब दिखेंगे, जिनको तुम प्रेम करते हो। सोनू ने कहा।
'सच...।' लड़के ने उत्साह में भरकर कहा।
बिल्कुल सच! सोनू ने उत्तर दिया।
पर मैं उनको छू तो नहीं पाऊँगा न?' लड़का फिर उदास हो गया।
क्यों नहीं छू पाओगे? जब चाँद को देखो तो मेरी इस हथेली को छू लेना तुमको ऐसा लगेगा कि तुम उन सबको छू रहे हो जिनको तुम प्रेम करते हो। सोनू ने अपनी हथेली दिखाते हुए कहा।
ठीक है। लड़का फिर उत्साह में भर गया।
पर देखो जब चाँद में तुम्हारी वो खास नजर आए तो उसे देखकर शरमा मत जाना।
सोनू ने लड़के की कमर में गुदगुदी करते हुए कहा लड़का खिलखिला उठा।
रात को लड़का सोनू ने गोद में उठाकर खिड़की पर बैठा दिया था क्योंकि तब उसके चलने-फिरने की ताकत बिल्कुल क्षीण हो गई थी।
'देखो वो पूरा पील चाँद।' अमलतास के दो पेड़ों के ऊपर दिख रहे चाँद की ओर इशारा करते हुए सोनू ने कहा। लड़के ने सिर उठा कर चाँद को देखा।
'देखो उसमें अपनी मम्मी को। दिख रही हैं ना? सोनू ने पूछा, लड़के ने हाँ में सिर हिलाया।
ठीक है अब आँखें बंद करके मेरी इस हथेली को छुओ। सोनू के कहते ही लड़के ने वैसा ही किया। थोड़ी देर बाद लड़के ने हथेली को खींचकर अपने चेहरे से सटा लिया। कुछ ही देर में सोनू की हथेली भीग गई।
सोनू ने लड़के की आँखें पोंछीं और फिर कहा, चलो अब फिर देखो चाँद को, अब वो दिखेगी। लड़के ने फिर चाँद को देखा।
दिखी? सोनू ने पूछा। लड़के ने फिर हाँ में सिर हिलाया और आँखें बंद कर लीं और सोनू की हथेली को फिर चेहरे से लगा लिया। अबकी बार सोनू को हथेली पर नमी की जगह आँच का एहसास हुआ लड़के की गर्म साँसों की आँच का एहसास। आँच धीरे-धीरे बढ़ती जा रही थी। बढ़ते-बढ़ते अचानक एकदम ठंडी हो गई और हथेली पर साँसों के टकराने का एहसास भी बंद हो गया। सोनू ने देखा दूर आसमान पर एक सितारा टूटा और रोशनी की लकीर छोड़ता हुआ चाँद की तरफ बढ़ा। चाँद के ठीक पास आकर वो सितारा बुझ गया मानो चाँद को छूकर खामोश हो गया हो।
सोनू ने आहिस्ता से लड़के का चेहरा हथेली पर से हटाया, लड़का उसकी बाँहों में झूल गया। हवा बिल्कुल ठहर गई थी मगर रात रानी के छोटे-छोटे फूल चुपचाप आँसुओं की तरह टप-टप करके जमीन पर टपक रहे थे।
तेंडुलकर का दोहरा शतक
प्रश्न : दद्दू, महान सचिन तेंडुलकर ने 24 फरवरी 2010 को दक्षिण अफ्रीका के विरुद्ध ग्वालियर वन डे क्रिकेट मैच में वन डे इतिहास का पहला दोहरा शतक लगाया। इस विश्व रिकार्ड को बनाने में उन्हें इतनी देर क्यों लगी?
उत्तर- क्योंकि इसके पहले वे कई बार अंपायरों के गलत फैसलों का शिकार होकर आउट हो गए थे।
प्रश्न : दद्दू, महान सचिन तेंडुलकर ने 24 फरवरी 2010 को दक्षिण अफ्रीका के विरुद्ध ग्वालियर वन डे क्रिकेट मैच में वन डे इतिहास का पहला दोहरा शतक लगाया। इस विश्व रिकार्ड को बनाने में उन्हें इतनी देर क्यों लगी?
उत्तर- क्योंकि इसके पहले वे कई बार अंपायरों के गलत फैसलों का शिकार होकर आउट हो गए थे।
पर्यटन
कला-शिल्प का अद्भुत संगम : खजुराहो
खजुराहो के मंदिर भारतीय कला का एक उत्कृष्ट नमूना है। इन मंदिरों की दीवारों पर उकरी देवी-देवताओं की विभिन्न मुद्राओं की मनोहारी प्रतिमा अपने आप में दुलर्भ है, जिसके समान कोई ओर नहीं है। मध्यप्रदेश में स्थित खजुराहो पर्यटकों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र है।
हर साल लाखों की संख्या में देशी व विदेशी पर्यटक खजुराहों आते हैं व यहाँ की खूबसूरती को अपनी स्मृति में कैद करके ले जाते हैं। यहाँ शाम के वक्त होने वाले लाइट शो में खजुराहो के मंदिरों की खूबसूरती का चरम देखने को मिलता है, जो एक यादगार व अविस्मरणीय अनुभव होता है।
भारतीय कला व संस्कृति के संगम स्थल खजुराहों के आसपास भी कई ऐसे स्थान है, जो आपकी खजुराहो यात्रा को पूर्णता प्रदान करते हैं। इनमें खजुराहो से 25 किमी दूर स्थित राजगढ़ पैलेस (हैरिटेज होटल), रंगून झील (पिकनिक स्पॉट), पन्ना राष्ट्रीय उद्यान आदि स्थल है।
खजुराहो को प्यार का प्रतीक भी कहा जाता है। यहाँ काम मुद्रा में मग्न देवताओं की भी मूर्तियाँ है, जो अश्लीलता नहीं बल्कि सौंदर्य और प्यार की प्रतीक हैं। प्यार के साक्षी इन्हीं मंदिरों में प्रतिवर्ष कई जोड़े परिणय सूत्र में बँधकर अपने दांपत्य जीवन की शुरुआत करते हैं।
खजुराहो एक पर्यटक स्थल होने के साथ-साथ मंदिरों के गाँव के रूप में भी विख्यात है। यहाँ के मंदिर लगभग 1000 सालों से भी अधिक पुराने हैं, जिन्हें मध्यभारत के चंदेल राजपूत राजाओं ने बनवाया था।
वर्तमान में प्राचीन 85 मंदिरों में से मात्र 22 मंदिर ही सुरक्षित बचे हैं। शेष मंदिर आज खंडहर के रूप में तब्दील होकर जीर्ण-शीर्ण अवस्था में हैं। खजुराहो के प्रसिद्ध मंदिर पूर्वी, पश्चिमी व दक्षिणी आदि तीन भागों में विभाजित हैं।
पश्चिमी भाग के मंदिर :-
खजुराहो में पश्चिमी भाग के मंदिरों में प्रमुख मंदिर कंडरिया महादेव मंदिर, चौंसठ योगिनी मंदिर (ग्रेनाइट से बना सुंदर मंदिर), काली माँ का मंदिर, देवी जगदंबा मंदिर आदि प्रमुख हैं। इन मंदिरों के उत्तर में चित्रगुप्त मंदिर (सूर्य देवता का मंदिर), विश्वनाथन मंदिर (तीन मुखी ब्रह्मा की प्रतिमा तथा 6 फीट ऊँची नंदी प्रतिमा), मटंगेश्वर मंदिर (8 फीट ऊँचा शिवलिंग) आदि स्थित है।
मंदिरों में स्थित प्रतिमाओं की जर्जर स्थिति को देखते हुए इनमें से कई मंदिरों में पूजा करना प्रतिबंधित है। इनमें से केवल ममटंगेश्वर मंदिर में ही अब तक पूजा करना जारी है।
पूर्वी भाग के मंदिर :-
इस भाग में हिंदू व जैन दोनों के देवी-देवताओं की दुर्लभ प्रतिमाएँ स्थित हैं। मंदिरों का यह भाग खजुराहो गाँव के समीप स्थित है। पूर्वी भाग का सबसे बड़ा मंदिर जैन तीर्थंकर 'भगवान पार्श्वनाथ जी का मंदिर' है। इसके बाद दूसरा जैन मंदिर 'घाटी मंदिर' है। इस मंदिर के उत्तर में 'आदिनाथ मंदिर' हैं। मंदिरों के इस समूह में ब्रह्मा, वामन आदि हिंदू देवताओं के मंदिर भी शोभायमान है।
दक्षिणी भाग के मंदिर :-
मंदिरों का यह समूह खजुराहो गाँव से लगभग 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इनमें सबसे अच्छा मंदिर 'चित्रभुज मंदिर' है। इस भाग के मंदिरों से कुछ दूरी पर सड़क के उस पार जैन मंदिरों का एक समूह है, जिनमें कई जैन तीर्थंकरों के सुंदर व आकर्षक मंदिर है।
खजुराहो के आसपास :-
भारतीय कला व संस्कृति के संगम स्थल खजुराहों के आसपास भी कई ऐसे स्थान है, जो आपकी खजुराहो यात्रा को पूर्णता प्रदान करते हैं। इनमें खजुराहो से 25 किमी दूर स्थित राजगढ़ पैलेस (हैरिटेज होटल), रंगून झील (पिकनिक स्पॉट), पन्ना राष्ट्रीय उद्यान (34 किमी दूर) आदि रमणीय स्थल हैं।
भारत की इस विरासत को देखना मात्र ही अपने आप में भारतीय कला से रूबरू होना है, जो अपने आप में अनूठी है, प्राचीन है व गौरवशाली है। आप भी मंदिरों के इस गाँव की सुंदरता को निहारने एक बार अवश्य खजुराहों जाएँ।
ऐतिहासिक स्थलों की नगरी शिवपुरी
हल्की-हल्की बूँदों की वर्षा हो रही थी। प्रभात ने घने काले बादल की चुनरी ओढ़ रखी थी। सखियों के साथ मैं टाटा सफारी में सवार होकर आगरा-मुंबई राष्ट्रीय राजमार्ग पर जा रही थी कि हमें एक ढाबा खुला दिखाई दिया। प्रातः पाँच बजे थे, मन कर रहा था कि हमें गरमागरम चाय मिल जाए तो सफर तय करना और भी आसान हो जाएगा।
गाड़ी ढाबे के पास रुकी, हमारी नज़र कोयले की आँच पर बन रही चाय से निकलते धुएँ पर पड़ी एवं उसके साथ-साथ नाश्ते के लिए बाजरे की रोटी तथा सब्जी मिली। ढाबे के चारों ओर हरियाली नज़र आ रही थी, रंग-बिरंगे महुए एवं पलास के फूल खिले हुए थे जिन पर वर्षा की बूँदें मोती की तरह चमक रही थीं।
इंदौर से शिवपुरी तक का सफर हम लगभग तय कर चुके थे। गुना क्षेत्र से हम गुजरते हुए शिवपुरी ज़िले में पहुँचे। हमारी नज़र यहाँ के पहा़डों पर पड़ी, जिन पर हरियाली थी एवं घने जंगल स्थित थे। वादियों के मध्य प्रकृति की गोद से झरने बह रहे थे एवं उठती सूर्य की किरणों के प्रकाश में वे झिलमिलाते, बलखाते हुए नदियों की ओर बह रहे थे।
गुना जिले से हम जब शिवपुरी नगर की ओर गाड़ी में सफर कर रहे थे तब हमने देखा कि सिंध नदी गुना से उत्तर दिशा से बहती हुई भिड़ से चंबल नदी से जा मिलती है। शिवपुरी की चार मुख्य नदियाँ हैं सिंध, कूनो, बेतवा एवं पार्वती।
कहते हैं कि शिवपुरी का माधव नेशनल पार्क, विभिन्न प्रकार के वन्यजीवों के लिए बहुत ही प्रसिद्ध है। मुख्य रूप से नहार बाघ, तेंदुआ, लक्कड़ बग्घा, तरक्षु, भालू, सांभर आदि जानवर यहाँ पर पाए जाते हैं। वर्षा के आने से मोर अपने रंग-बिरंगे पंख को फैला देते हैं। उपस्थित जनता खूबसूरत दृश्य की प्रशंसा करने लगी तथा कैमरे से छायाचित्र लेने लगी। नेशनल पार्क में पक्षी एवं जानवरों का हमने जीवंत रूप देखा। माधव विलास महल में सिंधिया राजवंश ग्रीष्म काल के समय निवास करते थे। वन वाटिका के मध्य स्थित यह महल गुलाब के फूल के समान प्रतीत हो रहा था। महल के भीतर कला की सुंदर मूर्तियाँ प्रदर्शित थीं। सुंदर आकृतियों वाले महल की छत से शिवपुरी नगर एवं माधव नेशनल पार्क नजर आते हैं। खूबसूरत चित्रकला से महल के विभिन्न कक्षों को सजाया गया था। अब यह महल भारत सरकार के अधीन है।
शिवपुरी में पर्यटक महाराजा एवं राजकुमारों द्वारा बनाई गई छतरियों को देखने आते हैं। इस ऐतिहासिक स्थल पर विभिन्न गाथाएँ एवं प्राचीन कहानियाँ सुन सकते हैं। ये छतरियाँ संगमरमर की हैं एवं इन पर सुंदर आकृतियाँ उकेरी गई हैं। सिंधिया राजकुमारों ने इन्हें मुगल वाटिका में स्थापित किया था। इस स्थान पर माधवराव सिंधिया की छतरी स्थित है उसी तरह महारानी सँख्याराजे सिंधिया की सुंदर छतरी भी है। हिंदू एवं इस्लामी के वास्तुशिल्पीय मिश्रित रूप नजर आते हैं। राजपूत एवं मुगल परम्पराओं के वास्तुशिल्पीय को रूपांतर करती कला दर्शकों को अपनी ओर आकृष्ट करती है।
ऐतिहासिक स्थलों के दर्शन करने में काफी देर हो गई थी। सूरज ढलने वाला था कि हमारी दृष्टि जॉर्ज किले की ओर आकर्षित हुई। सँख्या सागर के तट पर स्थित इस किले को जीवाजीराव सिंधिया ने निर्मित किया था।
ऐतिहासिक स्थलों के दर्शन करने में काफी देर हो गई थी। सूरज ढलने वाला था कि हमारी दृष्टि जॉर्ज किले की ओर आकर्षित हुई। सँख्या सागर के तट पर स्थित इस किले को जीवाजीराव सिंधिया ने निर्मित किया था। परंतु इस किले की एक विशेषता है जो अक्सर आम किलों के स्थान पर देखी नहीं जाती, वह यह है कि यह महल माधव नेशनल पार्क के अंदर स्थित है। इसलिए महल की सुंदरता और निखर उठती है जब किले के चारों ओर घने जंगल स्थित हैं।
प्राचीन महलों एवं प्रसिद्ध पर्यटक स्थलों के दर्शन कर जब हम वापस लौट रहे थे तब हमने वहाँ के स्थानीय रंगमंच एवं लोकगीत सुने जो आदिवासी लोगों ने पात्रों के माध्यम से दर्शाए थे। कार्यक्रम के अंत में हम होटल वापस लौट आए।
खजुराहो के मंदिर भारतीय कला का एक उत्कृष्ट नमूना है। इन मंदिरों की दीवारों पर उकरी देवी-देवताओं की विभिन्न मुद्राओं की मनोहारी प्रतिमा अपने आप में दुलर्भ है, जिसके समान कोई ओर नहीं है। मध्यप्रदेश में स्थित खजुराहो पर्यटकों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र है।
हर साल लाखों की संख्या में देशी व विदेशी पर्यटक खजुराहों आते हैं व यहाँ की खूबसूरती को अपनी स्मृति में कैद करके ले जाते हैं। यहाँ शाम के वक्त होने वाले लाइट शो में खजुराहो के मंदिरों की खूबसूरती का चरम देखने को मिलता है, जो एक यादगार व अविस्मरणीय अनुभव होता है।
भारतीय कला व संस्कृति के संगम स्थल खजुराहों के आसपास भी कई ऐसे स्थान है, जो आपकी खजुराहो यात्रा को पूर्णता प्रदान करते हैं। इनमें खजुराहो से 25 किमी दूर स्थित राजगढ़ पैलेस (हैरिटेज होटल), रंगून झील (पिकनिक स्पॉट), पन्ना राष्ट्रीय उद्यान आदि स्थल है।
खजुराहो को प्यार का प्रतीक भी कहा जाता है। यहाँ काम मुद्रा में मग्न देवताओं की भी मूर्तियाँ है, जो अश्लीलता नहीं बल्कि सौंदर्य और प्यार की प्रतीक हैं। प्यार के साक्षी इन्हीं मंदिरों में प्रतिवर्ष कई जोड़े परिणय सूत्र में बँधकर अपने दांपत्य जीवन की शुरुआत करते हैं।
खजुराहो एक पर्यटक स्थल होने के साथ-साथ मंदिरों के गाँव के रूप में भी विख्यात है। यहाँ के मंदिर लगभग 1000 सालों से भी अधिक पुराने हैं, जिन्हें मध्यभारत के चंदेल राजपूत राजाओं ने बनवाया था।
वर्तमान में प्राचीन 85 मंदिरों में से मात्र 22 मंदिर ही सुरक्षित बचे हैं। शेष मंदिर आज खंडहर के रूप में तब्दील होकर जीर्ण-शीर्ण अवस्था में हैं। खजुराहो के प्रसिद्ध मंदिर पूर्वी, पश्चिमी व दक्षिणी आदि तीन भागों में विभाजित हैं।
पश्चिमी भाग के मंदिर :-
खजुराहो में पश्चिमी भाग के मंदिरों में प्रमुख मंदिर कंडरिया महादेव मंदिर, चौंसठ योगिनी मंदिर (ग्रेनाइट से बना सुंदर मंदिर), काली माँ का मंदिर, देवी जगदंबा मंदिर आदि प्रमुख हैं। इन मंदिरों के उत्तर में चित्रगुप्त मंदिर (सूर्य देवता का मंदिर), विश्वनाथन मंदिर (तीन मुखी ब्रह्मा की प्रतिमा तथा 6 फीट ऊँची नंदी प्रतिमा), मटंगेश्वर मंदिर (8 फीट ऊँचा शिवलिंग) आदि स्थित है।
मंदिरों में स्थित प्रतिमाओं की जर्जर स्थिति को देखते हुए इनमें से कई मंदिरों में पूजा करना प्रतिबंधित है। इनमें से केवल ममटंगेश्वर मंदिर में ही अब तक पूजा करना जारी है।
पूर्वी भाग के मंदिर :-
इस भाग में हिंदू व जैन दोनों के देवी-देवताओं की दुर्लभ प्रतिमाएँ स्थित हैं। मंदिरों का यह भाग खजुराहो गाँव के समीप स्थित है। पूर्वी भाग का सबसे बड़ा मंदिर जैन तीर्थंकर 'भगवान पार्श्वनाथ जी का मंदिर' है। इसके बाद दूसरा जैन मंदिर 'घाटी मंदिर' है। इस मंदिर के उत्तर में 'आदिनाथ मंदिर' हैं। मंदिरों के इस समूह में ब्रह्मा, वामन आदि हिंदू देवताओं के मंदिर भी शोभायमान है।
दक्षिणी भाग के मंदिर :-
मंदिरों का यह समूह खजुराहो गाँव से लगभग 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इनमें सबसे अच्छा मंदिर 'चित्रभुज मंदिर' है। इस भाग के मंदिरों से कुछ दूरी पर सड़क के उस पार जैन मंदिरों का एक समूह है, जिनमें कई जैन तीर्थंकरों के सुंदर व आकर्षक मंदिर है।
खजुराहो के आसपास :-
भारतीय कला व संस्कृति के संगम स्थल खजुराहों के आसपास भी कई ऐसे स्थान है, जो आपकी खजुराहो यात्रा को पूर्णता प्रदान करते हैं। इनमें खजुराहो से 25 किमी दूर स्थित राजगढ़ पैलेस (हैरिटेज होटल), रंगून झील (पिकनिक स्पॉट), पन्ना राष्ट्रीय उद्यान (34 किमी दूर) आदि रमणीय स्थल हैं।
भारत की इस विरासत को देखना मात्र ही अपने आप में भारतीय कला से रूबरू होना है, जो अपने आप में अनूठी है, प्राचीन है व गौरवशाली है। आप भी मंदिरों के इस गाँव की सुंदरता को निहारने एक बार अवश्य खजुराहों जाएँ।
ऐतिहासिक स्थलों की नगरी शिवपुरी
हल्की-हल्की बूँदों की वर्षा हो रही थी। प्रभात ने घने काले बादल की चुनरी ओढ़ रखी थी। सखियों के साथ मैं टाटा सफारी में सवार होकर आगरा-मुंबई राष्ट्रीय राजमार्ग पर जा रही थी कि हमें एक ढाबा खुला दिखाई दिया। प्रातः पाँच बजे थे, मन कर रहा था कि हमें गरमागरम चाय मिल जाए तो सफर तय करना और भी आसान हो जाएगा।
गाड़ी ढाबे के पास रुकी, हमारी नज़र कोयले की आँच पर बन रही चाय से निकलते धुएँ पर पड़ी एवं उसके साथ-साथ नाश्ते के लिए बाजरे की रोटी तथा सब्जी मिली। ढाबे के चारों ओर हरियाली नज़र आ रही थी, रंग-बिरंगे महुए एवं पलास के फूल खिले हुए थे जिन पर वर्षा की बूँदें मोती की तरह चमक रही थीं।
इंदौर से शिवपुरी तक का सफर हम लगभग तय कर चुके थे। गुना क्षेत्र से हम गुजरते हुए शिवपुरी ज़िले में पहुँचे। हमारी नज़र यहाँ के पहा़डों पर पड़ी, जिन पर हरियाली थी एवं घने जंगल स्थित थे। वादियों के मध्य प्रकृति की गोद से झरने बह रहे थे एवं उठती सूर्य की किरणों के प्रकाश में वे झिलमिलाते, बलखाते हुए नदियों की ओर बह रहे थे।
गुना जिले से हम जब शिवपुरी नगर की ओर गाड़ी में सफर कर रहे थे तब हमने देखा कि सिंध नदी गुना से उत्तर दिशा से बहती हुई भिड़ से चंबल नदी से जा मिलती है। शिवपुरी की चार मुख्य नदियाँ हैं सिंध, कूनो, बेतवा एवं पार्वती।
कहते हैं कि शिवपुरी का माधव नेशनल पार्क, विभिन्न प्रकार के वन्यजीवों के लिए बहुत ही प्रसिद्ध है। मुख्य रूप से नहार बाघ, तेंदुआ, लक्कड़ बग्घा, तरक्षु, भालू, सांभर आदि जानवर यहाँ पर पाए जाते हैं। वर्षा के आने से मोर अपने रंग-बिरंगे पंख को फैला देते हैं। उपस्थित जनता खूबसूरत दृश्य की प्रशंसा करने लगी तथा कैमरे से छायाचित्र लेने लगी। नेशनल पार्क में पक्षी एवं जानवरों का हमने जीवंत रूप देखा। माधव विलास महल में सिंधिया राजवंश ग्रीष्म काल के समय निवास करते थे। वन वाटिका के मध्य स्थित यह महल गुलाब के फूल के समान प्रतीत हो रहा था। महल के भीतर कला की सुंदर मूर्तियाँ प्रदर्शित थीं। सुंदर आकृतियों वाले महल की छत से शिवपुरी नगर एवं माधव नेशनल पार्क नजर आते हैं। खूबसूरत चित्रकला से महल के विभिन्न कक्षों को सजाया गया था। अब यह महल भारत सरकार के अधीन है।
शिवपुरी में पर्यटक महाराजा एवं राजकुमारों द्वारा बनाई गई छतरियों को देखने आते हैं। इस ऐतिहासिक स्थल पर विभिन्न गाथाएँ एवं प्राचीन कहानियाँ सुन सकते हैं। ये छतरियाँ संगमरमर की हैं एवं इन पर सुंदर आकृतियाँ उकेरी गई हैं। सिंधिया राजकुमारों ने इन्हें मुगल वाटिका में स्थापित किया था। इस स्थान पर माधवराव सिंधिया की छतरी स्थित है उसी तरह महारानी सँख्याराजे सिंधिया की सुंदर छतरी भी है। हिंदू एवं इस्लामी के वास्तुशिल्पीय मिश्रित रूप नजर आते हैं। राजपूत एवं मुगल परम्पराओं के वास्तुशिल्पीय को रूपांतर करती कला दर्शकों को अपनी ओर आकृष्ट करती है।
ऐतिहासिक स्थलों के दर्शन करने में काफी देर हो गई थी। सूरज ढलने वाला था कि हमारी दृष्टि जॉर्ज किले की ओर आकर्षित हुई। सँख्या सागर के तट पर स्थित इस किले को जीवाजीराव सिंधिया ने निर्मित किया था।
ऐतिहासिक स्थलों के दर्शन करने में काफी देर हो गई थी। सूरज ढलने वाला था कि हमारी दृष्टि जॉर्ज किले की ओर आकर्षित हुई। सँख्या सागर के तट पर स्थित इस किले को जीवाजीराव सिंधिया ने निर्मित किया था। परंतु इस किले की एक विशेषता है जो अक्सर आम किलों के स्थान पर देखी नहीं जाती, वह यह है कि यह महल माधव नेशनल पार्क के अंदर स्थित है। इसलिए महल की सुंदरता और निखर उठती है जब किले के चारों ओर घने जंगल स्थित हैं।
प्राचीन महलों एवं प्रसिद्ध पर्यटक स्थलों के दर्शन कर जब हम वापस लौट रहे थे तब हमने वहाँ के स्थानीय रंगमंच एवं लोकगीत सुने जो आदिवासी लोगों ने पात्रों के माध्यम से दर्शाए थे। कार्यक्रम के अंत में हम होटल वापस लौट आए।
मिर्च-मसाला
आसान नहीं है कॉमेडी : दीपिका
दीपिका पादुकोण का कहना है कि कॉमेडी करना बहुत मुश्किल है और इसके लिए सही टाइमिंग और मेहनत की जरूरत होती है। आने वाली फिल्म ‘हाउसफुल’ में वे कॉमेडी करती हुई नजर आएँगी।
कई एक्टर्स का कहना है कि कॉमेडी रोल निभाना आसान नहीं है और दीपिका की भी यही राय है। ‘हाउसफुल’ की तारीफ करते हुए दीपिका का कहना है कि इस फिल्म में कई ऐसे दृश्य हैं, जिन्हें करते हुए कलाकारों को हँसी रोकना मुश्किल हो गया था। बड़ी मुश्किल से उन्होंने इन दृश्यों की शूटिंग की।
‘हाउसफुल’ के डायरेक्टर साजिद खान के बारे में दीपिका बताती हैं कि उनकी फिल्म की शूटिंग करना पिकनिक जैसा है। सेट पर किसी किस्म का तनाव नहीं रहता था और शूटिंग के दौरान सभी कलाकारों ने खूब धमाल मचाई। दीपिका के अलावा ‘हाउसफुल’ में लारा दत्ता और जिया खान भी हैं।
दीपिका पादुकोण का कहना है कि कॉमेडी करना बहुत मुश्किल है और इसके लिए सही टाइमिंग और मेहनत की जरूरत होती है। आने वाली फिल्म ‘हाउसफुल’ में वे कॉमेडी करती हुई नजर आएँगी।
कई एक्टर्स का कहना है कि कॉमेडी रोल निभाना आसान नहीं है और दीपिका की भी यही राय है। ‘हाउसफुल’ की तारीफ करते हुए दीपिका का कहना है कि इस फिल्म में कई ऐसे दृश्य हैं, जिन्हें करते हुए कलाकारों को हँसी रोकना मुश्किल हो गया था। बड़ी मुश्किल से उन्होंने इन दृश्यों की शूटिंग की।
‘हाउसफुल’ के डायरेक्टर साजिद खान के बारे में दीपिका बताती हैं कि उनकी फिल्म की शूटिंग करना पिकनिक जैसा है। सेट पर किसी किस्म का तनाव नहीं रहता था और शूटिंग के दौरान सभी कलाकारों ने खूब धमाल मचाई। दीपिका के अलावा ‘हाउसफुल’ में लारा दत्ता और जिया खान भी हैं।
गुरुवार, 4 मार्च 2010
खबर-संसार
बढ़ रहे हैं माइग्रेन के युवा मरीज
माइग्रेन के युवा मरीज तेजी से बढ़ रहे हैं। एक अनुमान के अनुसार करीब 10 फीसदी आबादी किसी न किसी रूप में माइग्रेन से पीड़ित है। स्पेशलिस्ट के अनुसार इसके बढ़ने का कारण शुरुआत में ही युवा मरीजों का इस पर ज्यादा ध्यान न देना है। जब तक प्रॉब्लम बढ़ नहीं जाती माइग्रेन से पीड़ित युवा मरीज डॉक्टर के पास नहीं जाते हैं और इसे सामान्य सिरदर्द ही समझते रहते हैं। इससे उनकी प्रॉब्लम बढ़ती जाती है।
वास्तव में मॉर्डन लाइफ स्टाइल अपना असर दिखाने लगी है। भागमभाग भरी जिंदगी, लेट नाइट स्लीपिंग, देर से उठना, असमय खाना और बढ़ते टेंशन आदि जैसे कई कारणों से माइग्रेन के युवा मरीज तेजी से बढ़ रहे हैं। सावधानी न रखने से यह गंभीर भी हो सकता है। अस्पतालों में प्रति माह 100 से अधिक युवा मरीज माइग्रेन के पहुँचते हैं। न्यूरोलोजिस्ट के अनुसार अस्पताल में मरीज तभी पहुँचते हैं जब स्थिति बिगड़ जाती है। माइग्रेन की शुरुआती स्थिति में ही यदि एक्सपर्ट से मिल लिया जाए तो इसे आसानी से कंट्रोल किया जा सकता है। बाद में ठीक होने में इसे थोड़ा समय लगता है।
माइग्रेन रक्त वाहिकाओं यानी ब्लड नर्व्स के फैलने और उनसे कुछ केमिकल निकलने के कारण होता है। कुछ खास कारण इसे प्रेरित करते हैं। माइग्रेन की 4 स्टेज रहती हैं- प्रोडोम, ऑरा, हैडेक और पोस्टड्रोम। खास बात यह है कि माइग्रेन युवाओं में ज्यादा पाया जाता है। आजकल दवाओं से इसे पूरी तरह ठीक किया जा सकता है। इसकी अलग-अलग स्टेज के आधार पर ही इसे पूरी तरह ठीक होने में लगने वाला समय भी अलग-अलग होता है।
माइग्रेन के लक्षण
आधे सिर में दर्द होना और धीरे-धीरे बढ़ते जाना।
सिरदर्द के साथ उल्टी की इच्छा होना या उल्टी होना।
सिरदर्द के साथ डायरिया होना।
धीरे-धीरे आँखों के सामने अंधेरा छा जाना। कुछ चीजें धुँधली दिखाई देना।
सिरदर्द के पहले भी आलस्य, नींद आना, भूख न लगना, ध्वनि का चुभना जैसे लक्षण भी देखने को मिलते हैं।
माइग्रेन से कैसे बचें
प्रतिदिन सोने और जागने का समय निश्चित करें। कोशिश करें कि रात में जल्दी सोएँ और सुबह जल्दी जागें।
समय पर भोजन करें। लंबे समय तक उपवास न रखें।
केफीन का सेवन कम करने के लिए कॉफी और चाय का सेवन कम करें।
तेज प्रकाश से बचें।
माइग्रेन को प्रेरित करने वाली चीजों को पहचानें और उनसे बचें।
व्यायाम और योगा को अपनी दिनचर्या का अनिवार्य हिस्सा बनाएँ।
तनाव कम करने के लिए रिलेक्सेशन तकनीकों का उपयोग करें।
दिमाग को तेज बनाता है इंटरनेट
इंटरनेट का सही इस्तेमाल इंसानी दिमाग को और तेज बना सकता है। अमेरिकी प्रांत उत्तरी कैरोलीना के एलान विश्वविद्यालय के इमेजिनिंग इंटरनेट सेंटर और प्यू इंटरनेट तथा अमेरिकन लाइफ प्रोजेक्ट की ओर से कराए गए एक सर्वे में यह बात सामने आई है।
सर्वे में शामिल 395 इंटरनेट यूजर्स और एक्सपर्ट्स में से तीन चौथाई से ज्यादा ने माना है कि इंटरनेट के इस्तेमाल से लोगों के दिमाग को तेज किया जा सकता है। इमेजिंग इंटरनेट सेंटर की निदेशक जेना एंडरसन ने बताया कि सर्वे में शामिल अधिकतर युवाओं ने माना कि इंटरनेट 2020 तक पढ़ने और लिखने की इंसानी क्षमता को बढ़ा देगा।
उन्होंने कहा कि चार में से तीन एक्सपर्ट्स के अनुसार इंटरनेट के प्रयोग से मनुष्य की इंटेलिजेंस को बढ़ाया जा सकता है और दो तिहाई लोगों ने माना कि इंटरनेट लिखने-पढ़ने और ज्ञान में वृद्धि करता है। हालाँकि सर्वे में शामिल 21 प्रतिशत युवाओं ने यह भी माना कि इंटरनेट का बहुत अधिक इस्तेमाल करने वालों पर इसका विपरीत प्रभाव भी पड़ सकता है और उनके जनरल नॉलेज का लेवल घट सकता है। एंडरसन ने कहा कि अब भी कई लोग ऐसे हैं जो ऑनलाइन सर्च इंजनों का विरोध करते हैं।
ज्यादा टीवी देखने से उम्र होगी कम
टेलीविजन के आगे घंटों बैठने वाले युवाओं को सावधान होने की जरूरत है। लगातार टीवी देखने से आपकी उम्र घट सकती है। ऑस्ट्रेलिया के बेकर आईडीआई हार्ट और डायबिटीज इंस्टीट्यूट के रिसर्च में यह परिणाम निकला है। इस स्टडी में करीब 8,800 युवाओं के डेली रूटीन पर नजर रखी और पाया कि लगातार बैठकर टीवी देखने से युवाओं में हार्ट डीसिज का खतरा बढ़ जाता है।
अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के न्यूज लेटर में पब्लिश रिपोर्ट के अनुसार रोजाना घंटों टीवी देखने से युवाओं में दिल के रोग बढ़ रहे हैं। टीवी के घातक इफेक्ट तेजी से फैल रहे हैं। इससे कम उम्र में हार्ट डीसिज से मरने की संभावना 18 प्रतिशत, जबकि कैंसर जैसी बीमारी के शिकार होने की संभावना 9 प्रतिशत बढ़ जाती है।
दो घंटे से कम टीवी देखने वाले युवाओं का कम्पैरिजन में चार घंटों से ज्यादा टीवी देखने वाले युवाओं से करने पर यह पाया गया कि ज्यादा टीवी देखने वाले 46 प्रतिशत युवा की किसी भी बीमारी से जल्दी मौत होती है, जबकि हार्ट डीसिज से होने वाली मौतों का खतरा 80 प्रतिशत तक बढ़ जाता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि हार्ट डीसिज और अन्य मौतों के पीछे सिगरेट पीना, हाई ब्लड प्रैशर, इम्बैलेंस्ड डाइट, अनियमित लाइफस्टाइल जैसे कई कारण हो सकते हैं, लेकिन यह स्टडी लगातार टीवी देखने वालों पर फोकस्ड था और उसमें यह तथ्य उभर कर आया कि लगातार बैठे रहने से फिर चाहे वो टेबल कुर्सी में बैठना हो या कम्प्यूटर या फिर टीवी पर इससे सेहत संबंधी विकार पैदा हो जाते हैं। शोधकर्ता डेविड डनस्टॉन के अनुसार मानव का शरीर चलने फिरने के लिए बना है लगातार बैठे रहने के लिए नहीं।
तकनीकी, सोशल और फाइनेंशियल चैंजेस का मतलब है कि मनुष्य की मांसपेशियाँ पर्याप्त काम नहीं कर रही है। प्रतिदिन जितनी एनर्जी खर्च होनी चाहिए वह नहीं होने से आयु भी कम हो रही है। डनस्टॉन के मुताबिक यह बातें सिर्फ ज्यादा वजन वाले या मोटे लोगों पर ही लागू नहीं है, बल्कि स्वस्थ युवाओं के लिए भी है।
स्वस्थ व्यक्ति के भी लगातार बैठे रहने से उसके शुगर फैट्स और ब्लड फैट्स पर बुरा असर पड़ता है। इस रिसर्च में 25 वर्ष और अधिक आयु के 3846 युवा और 4954 युवा महिलाओं का ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट किया गया और उनके ब्लड टेस्ट से कोलेस्ट्राल और ब्लड शुगर के लेवल की जाँच की गई। इन सभी युवाओं से उनकी टीवी देखने संबंधी आदतों की जानकारी भी ली गई।
लारा दत्ता : प्यार किया तो डरना क्या
लारा दत्ता और टेनिस खिलाड़ी महेश भूपति की नजदीकियों के बारे में हमेशा चर्चा होती है, लेकिन लारा इससे साफ मुकर जाती थी। वो मेरा दोस्त है, जैसे रटे रटाए बयान वे देती थी। लेकिन लारा ने अब सोच लिया है कि प्यार किया तो डरना क्या, इसलिए पिछले दिनों वे सार्वजनिक रूप से महेश भूपति के साथ नजर आईं। फिल्मफेयर अवॉर्ड समारोह में दोनों कपल की तरह साथ आए और साथ बैठकर उन्होंने कार्यक्रम का आनंद लिया।
केली दोरजी से लारा का वर्षों तक रोमांस चला। ब्रेकअप के बाद डीनो से कुछ समय तक उनका नाम जोड़ा गया, लेकिन बाद में महेश भूपति, लारा की जिंदगी में आ गए।
जहाँ तक करियर का सवाल है तो ‘ब्लू’ की असफलता को लारा भूला चुकी हैं और उनकी निगाहें अब ‘हाउसफुल’ पर लगी हुई हैं। इसमें भी लारा के साथ अक्षय कुमार हैं। फिल्म से जुड़े सूत्रों के मुताबिक दीपिका पादुकोण और जिया खान के फिल्म में होने के बावजूद लारा उनसे ज्यादा सेक्सी फिल्म में नजर आ रही हैं।
राहुल महाजन किससे शादी करेंगे?
कौन बनेगी मिसेस महाजन?
हरप्रीत छाबड़ा, डिम्पी गाँगुली और निकुंज मलिक में से किसी एक को राहुल महाजन अपनी दुल्हनियाँ बनाने वाले हैं और निर्णय लेने के लिए उनके पास कुछ घंटों का समय शेष है।
कौन बनेगी मिसेस महाजन? उम्मीद है कि राहुल ने अब तक इसका जवाब खोज लिया होगा। ‘राहुल दुल्हनियाँ ले जाएगा’ कार्यक्रम के जरिए उन्होंने कई लड़कियों को इस कसौटी पर परखा कि क्या वे उनकी जीवन-संगिनी बनने लायक है।हरप्रीत, डिम्पी और निकुंज को राहुल ने नजदीकी से जाना। उनके घरवालों से मिले। अपने परिवार से मिलवाया। ऑन स्क्रीन पर हम वही देखते हैं जो दिखाया जाता है। ऑफ स्क्रीन भी बहुत कुछ ऐसा घटता है, जिससे राहुल को इन्हें परखने में मदद मिली होगी। आखिर राहुल किसे चुनेंगे? दिल्ली की हरप्रीत सुंदर हैं। मासूम हैं। कम उम्र में ही परिपक्व बातें करती हैं। एक सीधी लकीर पर अब तक वे चली हैं। बुराई करने और विवादों से दूर रहना उन्हें पसंद है। क्या हरप्रीत की यह सादगी से राहुल प्रभावित होंगे?
कोलकाता की डिम्पी गाँगुली बेहद चंचल है। जो दिल पर है वो उसकी जुबाँ पर है। उनका दिल एकदम साफ है। राहुल कार्यक्रम शुरू होने के पहले कह चुके हैं कि बंगाली संस्कृति और लोग उन्हें पसंद है। क्या बंगाल की डिम्पी का जादू उन पर चलेगा?
निकुंज मलिक को जो सही लगता है उसे कहने से वे घबराती नहीं हैं। कम बोलने वाली निकुंज उम्र में अन्य दोनों लड़कियों से बड़ी हैं। उनमें एक किस्म की अकड़ है। अपने विचारों को वे छिपाती नहीं हैं, व्यक्त कर देती हैं। क्या निकुंज की खामोशी के अर्थ को राहुल समझेंगे? 6 मार्च की शाम को इसका जवाब मिल जाएगा। राहुल अनेक बार कह चुके हैं कि वे राखी की तरह अपने वादे से मुकरेंगे नहीं। शादी जरूर करेंगे। चलिए, राहुल पर विश्वास कर लेते हैं।
कैटरीना ने ऐश्वर्या को फिर पछाड़ा
कुछ दिनों पहले कैटरीना उस ज्वैलरी कंपनी की ब्रांड एम्बेसेडर बन गईं, जिस प्रचार ऐश्वर्या करती थीं। अब ऐश्वर्या को एक और झटका कैटरीना ने दे दिया है। एक साबुन का प्रचार ऐश्वर्या अपने पति अभिषेक के साथ करते हुए नजर आती थीं, लेकिन अब ऐश की जगह कैटरीना नजर आएँगी। उम्र और युवाओं में लोकप्रियता का फायदा कैटरीना को मिल रहा है।
कैटरीना की ऐश से कोई प्रतिद्वंद्विता नहीं है और न ही वे ऐश्वर्या की जगह लेने की कोशिश कर रही है, लेकिन ऐसा लगातार होने से कहा जा रहा है कि कैटरीना, ऐश्वर्या को मात देने की कोशिश कर रही हैं।
बॉर्बी डॉल को लेकर भी दोनों के बीच जो कुछ हुआ उसको लेकर खूब चर्चाएँ हुईं। इसके बाद सुंदरता या गूगल सर्च को लेकर जो सर्वेक्षण हुए उसमें भी कैटरीना का स्थान ऐश्वर्या से ऊपर रहा है।
माइग्रेन के युवा मरीज तेजी से बढ़ रहे हैं। एक अनुमान के अनुसार करीब 10 फीसदी आबादी किसी न किसी रूप में माइग्रेन से पीड़ित है। स्पेशलिस्ट के अनुसार इसके बढ़ने का कारण शुरुआत में ही युवा मरीजों का इस पर ज्यादा ध्यान न देना है। जब तक प्रॉब्लम बढ़ नहीं जाती माइग्रेन से पीड़ित युवा मरीज डॉक्टर के पास नहीं जाते हैं और इसे सामान्य सिरदर्द ही समझते रहते हैं। इससे उनकी प्रॉब्लम बढ़ती जाती है।
वास्तव में मॉर्डन लाइफ स्टाइल अपना असर दिखाने लगी है। भागमभाग भरी जिंदगी, लेट नाइट स्लीपिंग, देर से उठना, असमय खाना और बढ़ते टेंशन आदि जैसे कई कारणों से माइग्रेन के युवा मरीज तेजी से बढ़ रहे हैं। सावधानी न रखने से यह गंभीर भी हो सकता है। अस्पतालों में प्रति माह 100 से अधिक युवा मरीज माइग्रेन के पहुँचते हैं। न्यूरोलोजिस्ट के अनुसार अस्पताल में मरीज तभी पहुँचते हैं जब स्थिति बिगड़ जाती है। माइग्रेन की शुरुआती स्थिति में ही यदि एक्सपर्ट से मिल लिया जाए तो इसे आसानी से कंट्रोल किया जा सकता है। बाद में ठीक होने में इसे थोड़ा समय लगता है।
माइग्रेन रक्त वाहिकाओं यानी ब्लड नर्व्स के फैलने और उनसे कुछ केमिकल निकलने के कारण होता है। कुछ खास कारण इसे प्रेरित करते हैं। माइग्रेन की 4 स्टेज रहती हैं- प्रोडोम, ऑरा, हैडेक और पोस्टड्रोम। खास बात यह है कि माइग्रेन युवाओं में ज्यादा पाया जाता है। आजकल दवाओं से इसे पूरी तरह ठीक किया जा सकता है। इसकी अलग-अलग स्टेज के आधार पर ही इसे पूरी तरह ठीक होने में लगने वाला समय भी अलग-अलग होता है।
माइग्रेन के लक्षण
आधे सिर में दर्द होना और धीरे-धीरे बढ़ते जाना।
सिरदर्द के साथ उल्टी की इच्छा होना या उल्टी होना।
सिरदर्द के साथ डायरिया होना।
धीरे-धीरे आँखों के सामने अंधेरा छा जाना। कुछ चीजें धुँधली दिखाई देना।
सिरदर्द के पहले भी आलस्य, नींद आना, भूख न लगना, ध्वनि का चुभना जैसे लक्षण भी देखने को मिलते हैं।
माइग्रेन से कैसे बचें
प्रतिदिन सोने और जागने का समय निश्चित करें। कोशिश करें कि रात में जल्दी सोएँ और सुबह जल्दी जागें।
समय पर भोजन करें। लंबे समय तक उपवास न रखें।
केफीन का सेवन कम करने के लिए कॉफी और चाय का सेवन कम करें।
तेज प्रकाश से बचें।
माइग्रेन को प्रेरित करने वाली चीजों को पहचानें और उनसे बचें।
व्यायाम और योगा को अपनी दिनचर्या का अनिवार्य हिस्सा बनाएँ।
तनाव कम करने के लिए रिलेक्सेशन तकनीकों का उपयोग करें।
दिमाग को तेज बनाता है इंटरनेट
इंटरनेट का सही इस्तेमाल इंसानी दिमाग को और तेज बना सकता है। अमेरिकी प्रांत उत्तरी कैरोलीना के एलान विश्वविद्यालय के इमेजिनिंग इंटरनेट सेंटर और प्यू इंटरनेट तथा अमेरिकन लाइफ प्रोजेक्ट की ओर से कराए गए एक सर्वे में यह बात सामने आई है।
सर्वे में शामिल 395 इंटरनेट यूजर्स और एक्सपर्ट्स में से तीन चौथाई से ज्यादा ने माना है कि इंटरनेट के इस्तेमाल से लोगों के दिमाग को तेज किया जा सकता है। इमेजिंग इंटरनेट सेंटर की निदेशक जेना एंडरसन ने बताया कि सर्वे में शामिल अधिकतर युवाओं ने माना कि इंटरनेट 2020 तक पढ़ने और लिखने की इंसानी क्षमता को बढ़ा देगा।
उन्होंने कहा कि चार में से तीन एक्सपर्ट्स के अनुसार इंटरनेट के प्रयोग से मनुष्य की इंटेलिजेंस को बढ़ाया जा सकता है और दो तिहाई लोगों ने माना कि इंटरनेट लिखने-पढ़ने और ज्ञान में वृद्धि करता है। हालाँकि सर्वे में शामिल 21 प्रतिशत युवाओं ने यह भी माना कि इंटरनेट का बहुत अधिक इस्तेमाल करने वालों पर इसका विपरीत प्रभाव भी पड़ सकता है और उनके जनरल नॉलेज का लेवल घट सकता है। एंडरसन ने कहा कि अब भी कई लोग ऐसे हैं जो ऑनलाइन सर्च इंजनों का विरोध करते हैं।
ज्यादा टीवी देखने से उम्र होगी कम
टेलीविजन के आगे घंटों बैठने वाले युवाओं को सावधान होने की जरूरत है। लगातार टीवी देखने से आपकी उम्र घट सकती है। ऑस्ट्रेलिया के बेकर आईडीआई हार्ट और डायबिटीज इंस्टीट्यूट के रिसर्च में यह परिणाम निकला है। इस स्टडी में करीब 8,800 युवाओं के डेली रूटीन पर नजर रखी और पाया कि लगातार बैठकर टीवी देखने से युवाओं में हार्ट डीसिज का खतरा बढ़ जाता है।
अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के न्यूज लेटर में पब्लिश रिपोर्ट के अनुसार रोजाना घंटों टीवी देखने से युवाओं में दिल के रोग बढ़ रहे हैं। टीवी के घातक इफेक्ट तेजी से फैल रहे हैं। इससे कम उम्र में हार्ट डीसिज से मरने की संभावना 18 प्रतिशत, जबकि कैंसर जैसी बीमारी के शिकार होने की संभावना 9 प्रतिशत बढ़ जाती है।
दो घंटे से कम टीवी देखने वाले युवाओं का कम्पैरिजन में चार घंटों से ज्यादा टीवी देखने वाले युवाओं से करने पर यह पाया गया कि ज्यादा टीवी देखने वाले 46 प्रतिशत युवा की किसी भी बीमारी से जल्दी मौत होती है, जबकि हार्ट डीसिज से होने वाली मौतों का खतरा 80 प्रतिशत तक बढ़ जाता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि हार्ट डीसिज और अन्य मौतों के पीछे सिगरेट पीना, हाई ब्लड प्रैशर, इम्बैलेंस्ड डाइट, अनियमित लाइफस्टाइल जैसे कई कारण हो सकते हैं, लेकिन यह स्टडी लगातार टीवी देखने वालों पर फोकस्ड था और उसमें यह तथ्य उभर कर आया कि लगातार बैठे रहने से फिर चाहे वो टेबल कुर्सी में बैठना हो या कम्प्यूटर या फिर टीवी पर इससे सेहत संबंधी विकार पैदा हो जाते हैं। शोधकर्ता डेविड डनस्टॉन के अनुसार मानव का शरीर चलने फिरने के लिए बना है लगातार बैठे रहने के लिए नहीं।
तकनीकी, सोशल और फाइनेंशियल चैंजेस का मतलब है कि मनुष्य की मांसपेशियाँ पर्याप्त काम नहीं कर रही है। प्रतिदिन जितनी एनर्जी खर्च होनी चाहिए वह नहीं होने से आयु भी कम हो रही है। डनस्टॉन के मुताबिक यह बातें सिर्फ ज्यादा वजन वाले या मोटे लोगों पर ही लागू नहीं है, बल्कि स्वस्थ युवाओं के लिए भी है।
स्वस्थ व्यक्ति के भी लगातार बैठे रहने से उसके शुगर फैट्स और ब्लड फैट्स पर बुरा असर पड़ता है। इस रिसर्च में 25 वर्ष और अधिक आयु के 3846 युवा और 4954 युवा महिलाओं का ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट किया गया और उनके ब्लड टेस्ट से कोलेस्ट्राल और ब्लड शुगर के लेवल की जाँच की गई। इन सभी युवाओं से उनकी टीवी देखने संबंधी आदतों की जानकारी भी ली गई।
लारा दत्ता : प्यार किया तो डरना क्या
लारा दत्ता और टेनिस खिलाड़ी महेश भूपति की नजदीकियों के बारे में हमेशा चर्चा होती है, लेकिन लारा इससे साफ मुकर जाती थी। वो मेरा दोस्त है, जैसे रटे रटाए बयान वे देती थी। लेकिन लारा ने अब सोच लिया है कि प्यार किया तो डरना क्या, इसलिए पिछले दिनों वे सार्वजनिक रूप से महेश भूपति के साथ नजर आईं। फिल्मफेयर अवॉर्ड समारोह में दोनों कपल की तरह साथ आए और साथ बैठकर उन्होंने कार्यक्रम का आनंद लिया।
केली दोरजी से लारा का वर्षों तक रोमांस चला। ब्रेकअप के बाद डीनो से कुछ समय तक उनका नाम जोड़ा गया, लेकिन बाद में महेश भूपति, लारा की जिंदगी में आ गए।
जहाँ तक करियर का सवाल है तो ‘ब्लू’ की असफलता को लारा भूला चुकी हैं और उनकी निगाहें अब ‘हाउसफुल’ पर लगी हुई हैं। इसमें भी लारा के साथ अक्षय कुमार हैं। फिल्म से जुड़े सूत्रों के मुताबिक दीपिका पादुकोण और जिया खान के फिल्म में होने के बावजूद लारा उनसे ज्यादा सेक्सी फिल्म में नजर आ रही हैं।
राहुल महाजन किससे शादी करेंगे?
कौन बनेगी मिसेस महाजन?
हरप्रीत छाबड़ा, डिम्पी गाँगुली और निकुंज मलिक में से किसी एक को राहुल महाजन अपनी दुल्हनियाँ बनाने वाले हैं और निर्णय लेने के लिए उनके पास कुछ घंटों का समय शेष है।
कौन बनेगी मिसेस महाजन? उम्मीद है कि राहुल ने अब तक इसका जवाब खोज लिया होगा। ‘राहुल दुल्हनियाँ ले जाएगा’ कार्यक्रम के जरिए उन्होंने कई लड़कियों को इस कसौटी पर परखा कि क्या वे उनकी जीवन-संगिनी बनने लायक है।हरप्रीत, डिम्पी और निकुंज को राहुल ने नजदीकी से जाना। उनके घरवालों से मिले। अपने परिवार से मिलवाया। ऑन स्क्रीन पर हम वही देखते हैं जो दिखाया जाता है। ऑफ स्क्रीन भी बहुत कुछ ऐसा घटता है, जिससे राहुल को इन्हें परखने में मदद मिली होगी। आखिर राहुल किसे चुनेंगे? दिल्ली की हरप्रीत सुंदर हैं। मासूम हैं। कम उम्र में ही परिपक्व बातें करती हैं। एक सीधी लकीर पर अब तक वे चली हैं। बुराई करने और विवादों से दूर रहना उन्हें पसंद है। क्या हरप्रीत की यह सादगी से राहुल प्रभावित होंगे?
कोलकाता की डिम्पी गाँगुली बेहद चंचल है। जो दिल पर है वो उसकी जुबाँ पर है। उनका दिल एकदम साफ है। राहुल कार्यक्रम शुरू होने के पहले कह चुके हैं कि बंगाली संस्कृति और लोग उन्हें पसंद है। क्या बंगाल की डिम्पी का जादू उन पर चलेगा?
निकुंज मलिक को जो सही लगता है उसे कहने से वे घबराती नहीं हैं। कम बोलने वाली निकुंज उम्र में अन्य दोनों लड़कियों से बड़ी हैं। उनमें एक किस्म की अकड़ है। अपने विचारों को वे छिपाती नहीं हैं, व्यक्त कर देती हैं। क्या निकुंज की खामोशी के अर्थ को राहुल समझेंगे? 6 मार्च की शाम को इसका जवाब मिल जाएगा। राहुल अनेक बार कह चुके हैं कि वे राखी की तरह अपने वादे से मुकरेंगे नहीं। शादी जरूर करेंगे। चलिए, राहुल पर विश्वास कर लेते हैं।
कैटरीना ने ऐश्वर्या को फिर पछाड़ा
कुछ दिनों पहले कैटरीना उस ज्वैलरी कंपनी की ब्रांड एम्बेसेडर बन गईं, जिस प्रचार ऐश्वर्या करती थीं। अब ऐश्वर्या को एक और झटका कैटरीना ने दे दिया है। एक साबुन का प्रचार ऐश्वर्या अपने पति अभिषेक के साथ करते हुए नजर आती थीं, लेकिन अब ऐश की जगह कैटरीना नजर आएँगी। उम्र और युवाओं में लोकप्रियता का फायदा कैटरीना को मिल रहा है।
कैटरीना की ऐश से कोई प्रतिद्वंद्विता नहीं है और न ही वे ऐश्वर्या की जगह लेने की कोशिश कर रही है, लेकिन ऐसा लगातार होने से कहा जा रहा है कि कैटरीना, ऐश्वर्या को मात देने की कोशिश कर रही हैं।
बॉर्बी डॉल को लेकर भी दोनों के बीच जो कुछ हुआ उसको लेकर खूब चर्चाएँ हुईं। इसके बाद सुंदरता या गूगल सर्च को लेकर जो सर्वेक्षण हुए उसमें भी कैटरीना का स्थान ऐश्वर्या से ऊपर रहा है।
मंगलवार, 2 मार्च 2010
पर्यटन
अमर प्रेम कहानी का साक्षी मांडू
मांडू मध्यप्रदेश का एक ऐसा पर्यटनस्थल है, जो रानी रूपमती और बादशाह बाज बहादुर के अमर प्रेम का साक्षी है। यहाँ के खंडहर व इमारतें हमें इतिहास के उस झरोखे के दर्शन कराते हैं, जिसमें हम मांडू के शासकों की विशाल समृद्ध विरासत व शानो-शौकत से रूबरू होते हैं।
कहने को लोग मांडू को खंडहरों का गाँव भी कहते हैं परंतु इन खंडहरों के पत्थर भी बोलते हैं और सुनाते हैं हमें इतिहास की अमर गाथा। हरियाली की खूबसूरत चादर ओढ़ा मांडू विदेशी पर्यटकों के लिए विशेष तौर पर एक सुंदर पर्यटनस्थल रहा है। यहाँ के शानदार व विशाल दरवाजे मांडू प्रवेश के साथ ही इस तरह हमारा स्वागत करते हैं। मानों हमने किसी समृद्ध शासक के नगर में प्रवेश कर रहे हो। मांडू में प्रवेश के घुमावदार रास्तों के साथ ही मांडू के बारे में जानने की तथा इसकी खूबसूरत इमारतों को देखने की हमारी जिज्ञासा चरम तक पहुँच जाती है। यहाँ के विशाल इमली के पेड़ व मीठे सीताफलों से लदे पेड़ों को देखकर हमारे मुँह में पानी आना स्वभाविक है।
यहाँ की कबीटनुमा स्पेशल इमली के स्वाद के चटखारे लिए बगैर भला कैसे हमारी मांडू यात्रा पूरी हो सकती है। आप भी यदि मांडू दर्शन को जा रहे हैं तो एक बार अवश्य यहाँ की इमली, सीताफल व कमलगट्टे का स्वाद चखिएगा। आइए चलते हैं मध्यप्रदेश के ऐतिहासिक स्थल मांडू की सैर पर।
मांडू के बारे में कुछ बातें :
मांडू का दूसरा नाम 'मांडवगढ़' भी है। यह विन्ध्याचल की पहाड़ियों पर लगभग 2,000 फीट की ऊँचाई पर स्थित है। मांडू को पहले 'शादियाबाद' के नाम से भी जाना जाता था, जिसका अर्थ है 'खुशियों का नगर'।
मांडू पहाड़ों व चट्टानों का इलाका है, जहाँ पर ऐतिहासिक महत्व की कई पुरानी इमारते हैं। मालवा के राजपूत परमार शासक भी बाहरी आक्रमण से अपनी रक्षा के लिए मांडू को एक महफूज स्थान मानते थे।
मांडू में यहाँ जरूर जाएँ :
मांडू में पर्यटकों के लिए देखने लायक बहुत से स्थान हैं, जिनमें रानी रूपमती का महल, हिंडोला महल, जहाज महल, जामा मस्जिद, अशरफी महल आदि स्थान प्रमुख हैं।
इसी के साथ ही मांडू को 'मांडवगढ़ जैन तीर्थ' के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ भगवान सुपार्श्वनाथ की पद्मासन मुद्रा में विराजित श्वेत वर्णी सुंदर प्राचीन प्रतिमा है। इस प्रतिमा की स्थापना सन् 1472 में की गई थी। मांडवगढ़ में कई अन्य पुराने ऐतिहासिक महत्व के जैन मंदिर भी है, जिसके कारण यह जैन धर्मावलंबियों के लिए एक तीर्थ स्थान है।
स्वागत करते प्रवेश द्वार :
मांडू में लगभग 12 प्रवेश द्वार है, जो मांडू में 45 किलोमीटर के दायरे में मुंडेर के समान निर्मित है। इन दरवाजों में 'दिल्ली दरवाजा' प्रमुख है। यह मांडू का प्रवेश द्वार है। इसका निर्माण सन् 1405 से 1407 के मध्य में हुआ था। यह खड़ी ढाल के रूप में घुमावदार मार्ग पर बनाया गया है, जहाँ पहुँचने पर हाथियों की गति धीमी हो जाती थी।
इस दरवाजे में प्रवेश करते ही अन्य दरवाजों की शुरुआत के साथ ही मांडू दर्शन का आरंभ हो जाता है। मांडू के प्रमुख दरवाजों में आलमगीर दरवाजा, भंगी दरवाजा, रामपोल दरवाजा, जहाँगीर दरवाजा, तारापुर दरवाजा आदि अनेक दरवाजे हैं।
जामा मस्जिद (जामी मस्जिद) :
मांडू का मुख्य आकर्षण जामा मस्जिद है, इस विशाल मस्जिद का निर्माण कार्य होशंगशाह के शासनकाल में आरंभ किया गया था तथा महमूद प्रथम के शासनकाल में यह मस्जिद बनकर तैयार हुई थी। इस मस्जिद की गिनती मांडू की नायाब व शानदार इमारतों में की जाती है। यह भी कहा जाता है कि जामा मस्जिद डेमास्कस (सीरिया देश की राजधानी) की एक प्रसिद्ध मस्जिद का प्रतिरूप है।
अशरफी महल :
जामा मस्जिद के सामने ही अशरफी महल है। अशरफी का अर्थ होता है 'सोने के सिक्के'। इस महल का निर्माण होशंगशाह खिलजी के उत्तराधिकारी मोहम्मद खिलजी ने इस्लामिक भाषा के विद्यालय (मदरसा) के लिए किया था। यहाँ विद्धार्थियों के रहने के लिए कई कमरों का निर्माण भी किया गया था।
जहाज महल :
जहाज महल का निर्माण 1469 से 1500 ईस्वी के मध्य कराया था। यह महल जहाज की आकृति में दो कृत्रिम तालाबों कपूर तालाब व मुंज तालाब दो तालाबों के मध्य में बना हुआ है। लगभग 120 मीटर लंबे इस खूबसूरत महल को दूर से देखने पर ऐसा लगता है मानों तालाब के बीच में कोई सुंदर जहाज तैर रहा हो। संभवत: इसका निर्माण श्रृंगारप्रेमी सुल्तान ग्यासुद्दीन खिलजी ने विशेष तौर पर अंत:पुर (महिलाओं के लिए बनाए गए महल) के रूप में किया था।
होशंगशाह की कब्र :
होशंगशाह की कब्र, जो कि भारत में मार्बल से बनाई हुई ऐसी पहली कब्र है, जिसमें आपको अफगानी शिल्पकला का बेहतर नमूना देखने को मिलता है। यह यहाँ का गुंबज, बरामदे तथा मार्बल की जाली आदि की खूबसूरती बेजोड़ है।
हिंडोला महल :
हिंडोला महल मांडू के खूबसूरत महलों में से एक है। हिंडोला का अर्थ होता 'झूला'। इस महल की दीवारे कुछ झुकी होने के कारण यह महल हवा में झुलते हिंडोले के समान प्रतीत होता है। अत: इसे हिंडोला महल के नाम से जाना जाता है। हिंडोला महल का निर्माण ग्यासुद्दीन खिलजी ने 1469 से 1500 ईस्वी के मध्य सभा भवन के रूप में निर्मित सुंदर महल है। यहाँ के सुंदर कॉलम इसे और भी खूबसूरती प्रदान करते हैं। इस महल के पश्चिम में कई छोटे-बड़े सुंदर महल है। इसके समीप ही चंपा बाबड़ी है।
रानी रूपमती का महल :
रानी रूपमती के महल को देखे बगैर मांडू दर्शन अधूरा सा है। 365 मीटर ऊँची खड़ी चट्टान पर स्थित इस महल का निर्माण बाजबहादुर ने रानी रूपमती के लिए कराया था। इसी के साथ ही सैनिकों के लिए मांडू की सुरक्षा व्यवस्था पर नजर रखने के बेहतर स्थान के रूप में भी इसका प्रयोग किया जाता था।
कहा जाता है कि रानी रूपमती सुबह ऊठकर माँ नर्मदा के दर्शन करने के बाद ही अन्न-जल ग्रहण करती थी। अत: रूपमती के नर्मदा दर्शन को सुलभ बनाने हेतु बाजबहादुर ने ऊँचाई पर स्थित इस महल का निर्माण कराया था।
बाज बहादुर का महल :
बाज बहादुर के महल का निर्माण 16वीं शताब्दी में किया गया था। इस महल में विशाल आँगन व हॉल बने हुए हैं। यहाँ से हमें मांडू का सुंदर नजारा देखने को मिलता है।
रेवा कुंड :
रेवा कुंड का निर्माण बादशाह बाजबहादुर ने अपनी प्रेयसी रानी रूपमती के महल में पानी की पर्याप्त व्यवस्था के स्त्रोत के रूप में किया था।
अन्य स्थल
नीलकंठ
यहाँ शिवजी का मंदिर है जिसमें जाने के लिए अंदर सीढ़ी उतरकर जाना पड़ता है। इस मंदिर के सौंदर्य को शब्दों में बयाँ नहीं किया सकता। ऊपर पेड़ों से घिरे तालाब से एक धार नीचे शिवजी का अभिषेक करती जाती है।
नीलकंठ महल
मंदिर के समीप स्थित इस महल का निर्माण शाह बदगा खान ने अकबर की हिंदू पत्नी के लिए करवाया था। इसकी दीवारों पर अकबर कालीन कला के नमूने देखे जा सकते हैं।
हाथी महल, दरिया खान की मजार, दाई का महल, दाई की छोटी बहन का महल, मलिक मघत की मस्जिद और जाली महल भी दर्शनीय हैं। यहाँ ईको पॉइंट पर पर्यटकों की भीड़ लगी ही रहती है। लोहानी गुफाएँ और उनके सामने स्थित सनसेट पॉइंट भी पर्यटकों को खींचता है।
मांडू से दूरी :
धार से दूरी - लगभग 33 किलोमीटर
इंदौर से दूरी - लगभग 100 किलोमीटर
नजदीकी रेलवे स्टेशन - इंदौर व रतलाम
बस सुविधा उपलब्ध : रतलाम, उज्जैन, भोपाल, महू, धार आदि स्थानों से मांडू हेतु डेली बस सुविधा उपलब्ध है।
मांडू जाने का बेहतर समय : जुलाई से मार्च माह का समय मांडू जाने के लिए बेहतर स्थान है। बेहतर होगा कि आप बरसात के मौसम में मांडू जाएँ क्योंकि इस मौसम में मांडू की खूबसूरती चरम पर होती है।
ठहरने के स्थान :
मांडू में म. प्र. पर्यटन विभाग का होटल मालवा रिर्जोट है। इसके अलावा मांडू में कई छोटे-बड़े होटल व धर्मशालाएँ हैं, जहाँ आप ठहरकर मांडू के खूबसूरत नजारों का आनंद उठा सकते हैं।
अपने में इतिहास समेटे बाग की गुफाएँ
'शब-ए-मालवा' इंदौर 150 किलोमीटर दूर एक ऐसी एतेहासिक और प्राकृतिक धरोहर स्थित है जिसका ज्यादातर लोगों ने नाम तो सुना है लेकिन देखा कम ही है। दुर्गम स्थल पर स्थित होने के कारण सैर-सपाटा पसंद करने वाले लोग उस तरफ आसानी से रुख नहीं करते लेकिन दूर देश से आने वाले विदेशी पर्यटकों के लिए यह धरोहर एक जिज्ञासा का विषय हमेशा से बनी रहती है।
खासतौर से बौद्ध धर्म से जुड़े लोगों के लिए यह किसी तीर्थ से कम नहीं है। यह धार जिले में स्थित विश्व प्रसिद्ध बाग की गुफाएँ हैं जो अपने भित्ति चित्रों की वजह से अजंता के समकक्ष मानी जाती हैं। इन्हें भारत सरकार ने राष्ट्रीय महत्व का सुरक्षित पुरा स्मारक घोषित कर रखा है।
क्या है बाग में :
बाग नदी और बाग कस्बे के नाम की वजह से इन गुफाओं को 'बाग की गुफाओं' के नाम से जाना जाता है। गुफाओं के बनाने के लिए खूबसूरत जगह का चुनना यह बताता है कि बाग गुफा मंडप के निर्माता प्राकृतिक सौन्दर्य के उपासक थे। वर्ष 1953 में भारत सरकार द्वारा बाग गुफाओं को 'राष्ट्रीय स्मारक' घोषित किया गया। इसके संरक्षण का जिम्मा पुरातत्व विभाग को सौंपा गया। विंध्याचल पर्वत श्रृंखला के एक रेतीले पत्थर के पर्वत पर निर्मित इन गुफाओं की संख्या 9 है।
बाग की गुफाएँ बहुत सुंदर स्थान पर स्थित हैं। सामने बाग नदी बहती है और चारों ओर हरियाली तथा जंगल हैं। धार जिले में विंध्य श्रेणी के दक्षिणी ढाल पर, नर्मदा नदी की एक सहायक नदी बागवती के किनारे उसकी सतह से 150 फुट की ऊँचाई पर यह विश्व प्रसिद्ध गुफाएँ है
पहली गुफा 'गृह गुफा' कहलाती है। दूसरी गुफा 'पांडव गुफा' के नाम से प्रख्यात है। यह बाकी सब गुफाओं से अधिक बड़ी और अधिक सुरक्षित प्रतीत होती है। तीसरी गुफा का नाम 'हाथीखाना' है। इसमें बौद्ध भिक्षुओं के रहने के लिए कोठरियाँ बनी हुई हैं। चौथी गुफा को 'रंगमहल' कहा जाता है। पाँचवी गुफा बौद्ध भिक्षुओं के एक स्थान पर बैठकर प्रवचन सुनने के लिए बनाई गई थी। पाँचवी और छठी गुफा आपस में मिली हुई हैं तथा इनके बीच का सभा मंडप 46 फुट वर्गाकार है।
सातवीं, आठवीं और नौवीं गुफाओं की हालत ठीक नहीं है और वे अवशेष मात्र ही नजर आती हैं। इन गुफाओं की एक विशेषता यह भी है कि इनके अंदर जाकर इतनी ठंडक का अहसास होता है जैसे आप किसी एयरकंडीशन कक्ष में आ गए हों। गुफाओं के अंदर कई जगह से पहाड़ों से प्राकृतिक तरीके से पानी भी रिसकर आता रहता है। ये गुफाएँ कई शताब्दी पुरानी हैं।
लेकिन इनका काल निर्धारण आज भी नहीं हो पाया है। इतिहासविद इन्हें अजंता से पुराना तो नहीं मानते लेकिन यह जरूर मानते हैं कि यहाँ के भित्ति चित्रों में अंकित मनुष्यों की वेश-भूषा व अलंकार आदि से इनका समय वही निश्चित होता है जो अजंता की पहली और दूसरी गुफाओं का है। विख्यात इतिहासविद और पुराविद श्री कुमार स्वामी ने इन्हें पाँचवी शताब्दी का माना है।
भित्ति चित्र अब संग्रहालय में :
बाग की गुफाओं के भित्ति चित्र कई शताब्दियों तक प्रकृति ने सहेजकर रखे थे। बाद में जंगलों की कटाई और गुफाओं में बाबाओं-महात्माओं द्वारा आग जलाने और धुँआ करने के बाद इन भित्ति चित्रों पर संकट मंडराने लगा। गुफाओं के अंदर चमगादड़ों ने भी अपने डेरे बना लिए थे। नमी और आर्द्रता की वजह से भी भित्ति चित्र प्रभावित हो रहे थे। तब इन्हें गुफा से हटाने का निर्णय लिया गया।
1982 से इन चित्रों को दीवारों व छतों से निकालने का कार्य शुरू हुआ। नमी से प्रभावित इन चित्रों को तेज धार वाले औजारों से काटकर दीवारों से अलग किया गया। निकाले गए चित्रों को मजबूती देने के उद्देश्य से फाइबर ग्लास एवं अन्य पदार्थों से माउंटिंग की गई। चित्रों को वापस मूल स्वरूप में लाने के लिए उनकी रासायनिक पदार्थों से फैंसिंग की गई।
बाद में इन चित्रों को गुफाओं के सामने निर्मित संग्रहालय में रखा गया। इन चित्रों को अब संग्रहालय में ही देखा जा सकता है। गुफाओं के भीतर अब सिर्फ मूर्तियाँ ही बची हैं जिनमें से अधिकांश बुद्ध की हैं या फिर बुद्ध के जीवनकाल से जुड़ी घटनाओं को बयान करती हैं।
कैसे जाएँ, कब जाएँ :
बाग की गुफाएँ बहुत सुंदर स्थान पर स्थित हैं। सामने बाग नदी बहती है और चारों ओर हरियाली तथा जंगल हैं। धार जिले में विंध्य श्रेणी के दक्षिणी ढाल पर, नर्मदा नदी की एक सहायक नदी बागवती के किनारे उसकी सतह से 150 फुट की ऊँचाई पर यह विश्व प्रसिद्ध गुफाएँ हैं। अगर आप स्वंय के वाहन से बाग जाना चाहते हैं तो उसमें काफी सहूलियत रहेगी। इंदौर से 65 किलोमीटर दूर है धार।
धार से 71 किलोमीटर की दूरी पर आदिवासी क्षेत्र टांडा है। यहाँ पहुँचने के बाद बाग कस्बा सिर्फ 20 किमी दूर रह जाता है। बाग पहुँचने के बाद 7 किमी का रास्ता तय करके इन गुफाओं तक पहुँचा जा सकता है। यहाँ जाने का सबसे अच्छा मौसम बारिश का है क्योंकि गुफाओं के सामने बहने वाली बाग नदी उस समय बहती है। यह मौसमी नदी है और गर्मियाँ आने तक सूख जाती है। नदी के सूखने से वहाँ का दृश्य थोड़ा अधूरा-अधूरा सा लगने लगता है।
मांडू मध्यप्रदेश का एक ऐसा पर्यटनस्थल है, जो रानी रूपमती और बादशाह बाज बहादुर के अमर प्रेम का साक्षी है। यहाँ के खंडहर व इमारतें हमें इतिहास के उस झरोखे के दर्शन कराते हैं, जिसमें हम मांडू के शासकों की विशाल समृद्ध विरासत व शानो-शौकत से रूबरू होते हैं।
कहने को लोग मांडू को खंडहरों का गाँव भी कहते हैं परंतु इन खंडहरों के पत्थर भी बोलते हैं और सुनाते हैं हमें इतिहास की अमर गाथा। हरियाली की खूबसूरत चादर ओढ़ा मांडू विदेशी पर्यटकों के लिए विशेष तौर पर एक सुंदर पर्यटनस्थल रहा है। यहाँ के शानदार व विशाल दरवाजे मांडू प्रवेश के साथ ही इस तरह हमारा स्वागत करते हैं। मानों हमने किसी समृद्ध शासक के नगर में प्रवेश कर रहे हो। मांडू में प्रवेश के घुमावदार रास्तों के साथ ही मांडू के बारे में जानने की तथा इसकी खूबसूरत इमारतों को देखने की हमारी जिज्ञासा चरम तक पहुँच जाती है। यहाँ के विशाल इमली के पेड़ व मीठे सीताफलों से लदे पेड़ों को देखकर हमारे मुँह में पानी आना स्वभाविक है।
यहाँ की कबीटनुमा स्पेशल इमली के स्वाद के चटखारे लिए बगैर भला कैसे हमारी मांडू यात्रा पूरी हो सकती है। आप भी यदि मांडू दर्शन को जा रहे हैं तो एक बार अवश्य यहाँ की इमली, सीताफल व कमलगट्टे का स्वाद चखिएगा। आइए चलते हैं मध्यप्रदेश के ऐतिहासिक स्थल मांडू की सैर पर।
मांडू के बारे में कुछ बातें :
मांडू का दूसरा नाम 'मांडवगढ़' भी है। यह विन्ध्याचल की पहाड़ियों पर लगभग 2,000 फीट की ऊँचाई पर स्थित है। मांडू को पहले 'शादियाबाद' के नाम से भी जाना जाता था, जिसका अर्थ है 'खुशियों का नगर'।
मांडू पहाड़ों व चट्टानों का इलाका है, जहाँ पर ऐतिहासिक महत्व की कई पुरानी इमारते हैं। मालवा के राजपूत परमार शासक भी बाहरी आक्रमण से अपनी रक्षा के लिए मांडू को एक महफूज स्थान मानते थे।
मांडू में यहाँ जरूर जाएँ :
मांडू में पर्यटकों के लिए देखने लायक बहुत से स्थान हैं, जिनमें रानी रूपमती का महल, हिंडोला महल, जहाज महल, जामा मस्जिद, अशरफी महल आदि स्थान प्रमुख हैं।
इसी के साथ ही मांडू को 'मांडवगढ़ जैन तीर्थ' के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ भगवान सुपार्श्वनाथ की पद्मासन मुद्रा में विराजित श्वेत वर्णी सुंदर प्राचीन प्रतिमा है। इस प्रतिमा की स्थापना सन् 1472 में की गई थी। मांडवगढ़ में कई अन्य पुराने ऐतिहासिक महत्व के जैन मंदिर भी है, जिसके कारण यह जैन धर्मावलंबियों के लिए एक तीर्थ स्थान है।
स्वागत करते प्रवेश द्वार :
मांडू में लगभग 12 प्रवेश द्वार है, जो मांडू में 45 किलोमीटर के दायरे में मुंडेर के समान निर्मित है। इन दरवाजों में 'दिल्ली दरवाजा' प्रमुख है। यह मांडू का प्रवेश द्वार है। इसका निर्माण सन् 1405 से 1407 के मध्य में हुआ था। यह खड़ी ढाल के रूप में घुमावदार मार्ग पर बनाया गया है, जहाँ पहुँचने पर हाथियों की गति धीमी हो जाती थी।
इस दरवाजे में प्रवेश करते ही अन्य दरवाजों की शुरुआत के साथ ही मांडू दर्शन का आरंभ हो जाता है। मांडू के प्रमुख दरवाजों में आलमगीर दरवाजा, भंगी दरवाजा, रामपोल दरवाजा, जहाँगीर दरवाजा, तारापुर दरवाजा आदि अनेक दरवाजे हैं।
जामा मस्जिद (जामी मस्जिद) :
मांडू का मुख्य आकर्षण जामा मस्जिद है, इस विशाल मस्जिद का निर्माण कार्य होशंगशाह के शासनकाल में आरंभ किया गया था तथा महमूद प्रथम के शासनकाल में यह मस्जिद बनकर तैयार हुई थी। इस मस्जिद की गिनती मांडू की नायाब व शानदार इमारतों में की जाती है। यह भी कहा जाता है कि जामा मस्जिद डेमास्कस (सीरिया देश की राजधानी) की एक प्रसिद्ध मस्जिद का प्रतिरूप है।
अशरफी महल :
जामा मस्जिद के सामने ही अशरफी महल है। अशरफी का अर्थ होता है 'सोने के सिक्के'। इस महल का निर्माण होशंगशाह खिलजी के उत्तराधिकारी मोहम्मद खिलजी ने इस्लामिक भाषा के विद्यालय (मदरसा) के लिए किया था। यहाँ विद्धार्थियों के रहने के लिए कई कमरों का निर्माण भी किया गया था।
जहाज महल :
जहाज महल का निर्माण 1469 से 1500 ईस्वी के मध्य कराया था। यह महल जहाज की आकृति में दो कृत्रिम तालाबों कपूर तालाब व मुंज तालाब दो तालाबों के मध्य में बना हुआ है। लगभग 120 मीटर लंबे इस खूबसूरत महल को दूर से देखने पर ऐसा लगता है मानों तालाब के बीच में कोई सुंदर जहाज तैर रहा हो। संभवत: इसका निर्माण श्रृंगारप्रेमी सुल्तान ग्यासुद्दीन खिलजी ने विशेष तौर पर अंत:पुर (महिलाओं के लिए बनाए गए महल) के रूप में किया था।
होशंगशाह की कब्र :
होशंगशाह की कब्र, जो कि भारत में मार्बल से बनाई हुई ऐसी पहली कब्र है, जिसमें आपको अफगानी शिल्पकला का बेहतर नमूना देखने को मिलता है। यह यहाँ का गुंबज, बरामदे तथा मार्बल की जाली आदि की खूबसूरती बेजोड़ है।
हिंडोला महल :
हिंडोला महल मांडू के खूबसूरत महलों में से एक है। हिंडोला का अर्थ होता 'झूला'। इस महल की दीवारे कुछ झुकी होने के कारण यह महल हवा में झुलते हिंडोले के समान प्रतीत होता है। अत: इसे हिंडोला महल के नाम से जाना जाता है। हिंडोला महल का निर्माण ग्यासुद्दीन खिलजी ने 1469 से 1500 ईस्वी के मध्य सभा भवन के रूप में निर्मित सुंदर महल है। यहाँ के सुंदर कॉलम इसे और भी खूबसूरती प्रदान करते हैं। इस महल के पश्चिम में कई छोटे-बड़े सुंदर महल है। इसके समीप ही चंपा बाबड़ी है।
रानी रूपमती का महल :
रानी रूपमती के महल को देखे बगैर मांडू दर्शन अधूरा सा है। 365 मीटर ऊँची खड़ी चट्टान पर स्थित इस महल का निर्माण बाजबहादुर ने रानी रूपमती के लिए कराया था। इसी के साथ ही सैनिकों के लिए मांडू की सुरक्षा व्यवस्था पर नजर रखने के बेहतर स्थान के रूप में भी इसका प्रयोग किया जाता था।
कहा जाता है कि रानी रूपमती सुबह ऊठकर माँ नर्मदा के दर्शन करने के बाद ही अन्न-जल ग्रहण करती थी। अत: रूपमती के नर्मदा दर्शन को सुलभ बनाने हेतु बाजबहादुर ने ऊँचाई पर स्थित इस महल का निर्माण कराया था।
बाज बहादुर का महल :
बाज बहादुर के महल का निर्माण 16वीं शताब्दी में किया गया था। इस महल में विशाल आँगन व हॉल बने हुए हैं। यहाँ से हमें मांडू का सुंदर नजारा देखने को मिलता है।
रेवा कुंड :
रेवा कुंड का निर्माण बादशाह बाजबहादुर ने अपनी प्रेयसी रानी रूपमती के महल में पानी की पर्याप्त व्यवस्था के स्त्रोत के रूप में किया था।
अन्य स्थल
नीलकंठ
यहाँ शिवजी का मंदिर है जिसमें जाने के लिए अंदर सीढ़ी उतरकर जाना पड़ता है। इस मंदिर के सौंदर्य को शब्दों में बयाँ नहीं किया सकता। ऊपर पेड़ों से घिरे तालाब से एक धार नीचे शिवजी का अभिषेक करती जाती है।
नीलकंठ महल
मंदिर के समीप स्थित इस महल का निर्माण शाह बदगा खान ने अकबर की हिंदू पत्नी के लिए करवाया था। इसकी दीवारों पर अकबर कालीन कला के नमूने देखे जा सकते हैं।
हाथी महल, दरिया खान की मजार, दाई का महल, दाई की छोटी बहन का महल, मलिक मघत की मस्जिद और जाली महल भी दर्शनीय हैं। यहाँ ईको पॉइंट पर पर्यटकों की भीड़ लगी ही रहती है। लोहानी गुफाएँ और उनके सामने स्थित सनसेट पॉइंट भी पर्यटकों को खींचता है।
मांडू से दूरी :
धार से दूरी - लगभग 33 किलोमीटर
इंदौर से दूरी - लगभग 100 किलोमीटर
नजदीकी रेलवे स्टेशन - इंदौर व रतलाम
बस सुविधा उपलब्ध : रतलाम, उज्जैन, भोपाल, महू, धार आदि स्थानों से मांडू हेतु डेली बस सुविधा उपलब्ध है।
मांडू जाने का बेहतर समय : जुलाई से मार्च माह का समय मांडू जाने के लिए बेहतर स्थान है। बेहतर होगा कि आप बरसात के मौसम में मांडू जाएँ क्योंकि इस मौसम में मांडू की खूबसूरती चरम पर होती है।
ठहरने के स्थान :
मांडू में म. प्र. पर्यटन विभाग का होटल मालवा रिर्जोट है। इसके अलावा मांडू में कई छोटे-बड़े होटल व धर्मशालाएँ हैं, जहाँ आप ठहरकर मांडू के खूबसूरत नजारों का आनंद उठा सकते हैं।
अपने में इतिहास समेटे बाग की गुफाएँ
'शब-ए-मालवा' इंदौर 150 किलोमीटर दूर एक ऐसी एतेहासिक और प्राकृतिक धरोहर स्थित है जिसका ज्यादातर लोगों ने नाम तो सुना है लेकिन देखा कम ही है। दुर्गम स्थल पर स्थित होने के कारण सैर-सपाटा पसंद करने वाले लोग उस तरफ आसानी से रुख नहीं करते लेकिन दूर देश से आने वाले विदेशी पर्यटकों के लिए यह धरोहर एक जिज्ञासा का विषय हमेशा से बनी रहती है।
खासतौर से बौद्ध धर्म से जुड़े लोगों के लिए यह किसी तीर्थ से कम नहीं है। यह धार जिले में स्थित विश्व प्रसिद्ध बाग की गुफाएँ हैं जो अपने भित्ति चित्रों की वजह से अजंता के समकक्ष मानी जाती हैं। इन्हें भारत सरकार ने राष्ट्रीय महत्व का सुरक्षित पुरा स्मारक घोषित कर रखा है।
क्या है बाग में :
बाग नदी और बाग कस्बे के नाम की वजह से इन गुफाओं को 'बाग की गुफाओं' के नाम से जाना जाता है। गुफाओं के बनाने के लिए खूबसूरत जगह का चुनना यह बताता है कि बाग गुफा मंडप के निर्माता प्राकृतिक सौन्दर्य के उपासक थे। वर्ष 1953 में भारत सरकार द्वारा बाग गुफाओं को 'राष्ट्रीय स्मारक' घोषित किया गया। इसके संरक्षण का जिम्मा पुरातत्व विभाग को सौंपा गया। विंध्याचल पर्वत श्रृंखला के एक रेतीले पत्थर के पर्वत पर निर्मित इन गुफाओं की संख्या 9 है।
बाग की गुफाएँ बहुत सुंदर स्थान पर स्थित हैं। सामने बाग नदी बहती है और चारों ओर हरियाली तथा जंगल हैं। धार जिले में विंध्य श्रेणी के दक्षिणी ढाल पर, नर्मदा नदी की एक सहायक नदी बागवती के किनारे उसकी सतह से 150 फुट की ऊँचाई पर यह विश्व प्रसिद्ध गुफाएँ है
पहली गुफा 'गृह गुफा' कहलाती है। दूसरी गुफा 'पांडव गुफा' के नाम से प्रख्यात है। यह बाकी सब गुफाओं से अधिक बड़ी और अधिक सुरक्षित प्रतीत होती है। तीसरी गुफा का नाम 'हाथीखाना' है। इसमें बौद्ध भिक्षुओं के रहने के लिए कोठरियाँ बनी हुई हैं। चौथी गुफा को 'रंगमहल' कहा जाता है। पाँचवी गुफा बौद्ध भिक्षुओं के एक स्थान पर बैठकर प्रवचन सुनने के लिए बनाई गई थी। पाँचवी और छठी गुफा आपस में मिली हुई हैं तथा इनके बीच का सभा मंडप 46 फुट वर्गाकार है।
सातवीं, आठवीं और नौवीं गुफाओं की हालत ठीक नहीं है और वे अवशेष मात्र ही नजर आती हैं। इन गुफाओं की एक विशेषता यह भी है कि इनके अंदर जाकर इतनी ठंडक का अहसास होता है जैसे आप किसी एयरकंडीशन कक्ष में आ गए हों। गुफाओं के अंदर कई जगह से पहाड़ों से प्राकृतिक तरीके से पानी भी रिसकर आता रहता है। ये गुफाएँ कई शताब्दी पुरानी हैं।
लेकिन इनका काल निर्धारण आज भी नहीं हो पाया है। इतिहासविद इन्हें अजंता से पुराना तो नहीं मानते लेकिन यह जरूर मानते हैं कि यहाँ के भित्ति चित्रों में अंकित मनुष्यों की वेश-भूषा व अलंकार आदि से इनका समय वही निश्चित होता है जो अजंता की पहली और दूसरी गुफाओं का है। विख्यात इतिहासविद और पुराविद श्री कुमार स्वामी ने इन्हें पाँचवी शताब्दी का माना है।
भित्ति चित्र अब संग्रहालय में :
बाग की गुफाओं के भित्ति चित्र कई शताब्दियों तक प्रकृति ने सहेजकर रखे थे। बाद में जंगलों की कटाई और गुफाओं में बाबाओं-महात्माओं द्वारा आग जलाने और धुँआ करने के बाद इन भित्ति चित्रों पर संकट मंडराने लगा। गुफाओं के अंदर चमगादड़ों ने भी अपने डेरे बना लिए थे। नमी और आर्द्रता की वजह से भी भित्ति चित्र प्रभावित हो रहे थे। तब इन्हें गुफा से हटाने का निर्णय लिया गया।
1982 से इन चित्रों को दीवारों व छतों से निकालने का कार्य शुरू हुआ। नमी से प्रभावित इन चित्रों को तेज धार वाले औजारों से काटकर दीवारों से अलग किया गया। निकाले गए चित्रों को मजबूती देने के उद्देश्य से फाइबर ग्लास एवं अन्य पदार्थों से माउंटिंग की गई। चित्रों को वापस मूल स्वरूप में लाने के लिए उनकी रासायनिक पदार्थों से फैंसिंग की गई।
बाद में इन चित्रों को गुफाओं के सामने निर्मित संग्रहालय में रखा गया। इन चित्रों को अब संग्रहालय में ही देखा जा सकता है। गुफाओं के भीतर अब सिर्फ मूर्तियाँ ही बची हैं जिनमें से अधिकांश बुद्ध की हैं या फिर बुद्ध के जीवनकाल से जुड़ी घटनाओं को बयान करती हैं।
कैसे जाएँ, कब जाएँ :
बाग की गुफाएँ बहुत सुंदर स्थान पर स्थित हैं। सामने बाग नदी बहती है और चारों ओर हरियाली तथा जंगल हैं। धार जिले में विंध्य श्रेणी के दक्षिणी ढाल पर, नर्मदा नदी की एक सहायक नदी बागवती के किनारे उसकी सतह से 150 फुट की ऊँचाई पर यह विश्व प्रसिद्ध गुफाएँ हैं। अगर आप स्वंय के वाहन से बाग जाना चाहते हैं तो उसमें काफी सहूलियत रहेगी। इंदौर से 65 किलोमीटर दूर है धार।
धार से 71 किलोमीटर की दूरी पर आदिवासी क्षेत्र टांडा है। यहाँ पहुँचने के बाद बाग कस्बा सिर्फ 20 किमी दूर रह जाता है। बाग पहुँचने के बाद 7 किमी का रास्ता तय करके इन गुफाओं तक पहुँचा जा सकता है। यहाँ जाने का सबसे अच्छा मौसम बारिश का है क्योंकि गुफाओं के सामने बहने वाली बाग नदी उस समय बहती है। यह मौसमी नदी है और गर्मियाँ आने तक सूख जाती है। नदी के सूखने से वहाँ का दृश्य थोड़ा अधूरा-अधूरा सा लगने लगता है।
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