सोमवार, 28 जून 2010

आलेख

वादा करे तो निभाएँ भी
तौबा ये असंभव वादे!

बढ़-चढ़कर बोलने वालों को लोगों द्वारा बड़बोला कहा जाता है। कुछ लोग इसलिए भी बड़बोले कहे जाते हैं कि वे अपने बारे में ढेरों खुशफहमियाँ रखते हैं और अपने गुण स्वयं गाते हुए अपने आपको दुनिया के श्रेष्ठतम लोगों में से मानते हैं।
दूसरी श्रेणी उन लोगों की होती है जो दूसरों को तात्कालिक सांत्वना या दिलासा देने के लिए और अपना बड़प्पन दिखाने के लिए ऐसी बातें कह जाते हैं, ऐसे वादे कर जाते हैं जो पूरे करना उनके लिए तो मुश्किल हो ही जाता है जिनसे वादे किए जाते हैं वे भी बेचारे उनकी बातों में आकर चोट खाते हैं।
हमारी कॉलोनी में शर्माजी अपने 'असंभव' वादों के लिए मशहूर हैं। मेरी सहेली के पति की नौकरी मंदी के चलते छूट गई। शर्माजी सांत्वना प्रकट करते-करते बोले, 'आप चिंता न करें। मेरे साले की तीन फैक्टरियाँ हैं। मैं आपको नौकरी चुटकियों में दिलवा दूँगा।'
सहेली और उसके पति को मानो डूबते में सहारा मिल गया। मगर उसके बाद शर्माजी का कन्नी काटना शुरू हो गया। आखिरकार महीनेभर उनके पीछे पड़ने के बाद सहेली को शर्माजी की खोखले वादे की असलियत का पता चल गया। हमारी महिला सभा की एक पदाधिकारी की माताजी का देहांत हो गया। उन्होंने माताजी की स्मृति में एक 'काव्य-संग्रह' प्रकाशित करने की घोषणा की और एक नवोदित कवयित्री को उस पुस्तक को लिखने का जिम्मा सौंपा।
कवयित्री बेचारी जुटी रही माताजी का जीवनवृत्त तैयार करने में... छः माह के परिश्रम के बाद जब वे तैयार संग्रह लेकर पदाधिकारी के पास पहुँचीं तो टका-सा जवाब मिला 'वो अभी यह विचार स्थगित कर दिया गया है, आगे विचार बना तो आपको सूचित किया जाएगा।'
नौकरी दिलाना, एडमिशन करवाना, पुस्तकें छपवाना, पुरस्कार के लिए अनुमोदन जैसी कई बातें होती हैं जो ये बड़बोले लोग अपना बड़प्पन जताने व स्वयं सहयोगी, लोकवत्सल सिद्ध करने के लिए कर जाते हैं। पर क्या ऐसा करते समय वे एक बार भी सोचते हैं कि दिलासे का यह भ्रम टूटने पर जब वास्तविकता सामने आएगी और उनके वादे भी झूठे साबित होंगे तो उस दुखी व्यक्ति की क्या हालत होगी?
यहाँ एक और घटना का उल्लेख करना जरूरी होगा। मेरे परिचित की एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई। उनकी बेटी पढ़ने में होनहार थी, परिचित के मित्र ने हामी भरी कि इस वर्ष इसकी फीस मैं भर दूँगा। दिवंगत मित्र की पत्नी भी निश्चिंत होकर आगे की व्यवस्था में लग गई। छः माह पश्चात स्कूल से 40 हजार की बकाया राशि का नोटिस आया और साथ ही न जमा करने पर स्कूल से निकालने की सूचना... परिचित की पत्नी ने जैसे-तैसे रुपए की व्यवस्था की मगर मित्र की वादाखिलाफी से जो रिश्ते टूटे वे क्या फिर बन पाएँगे?
सांत्वना देना, मन रखना, दिलासा देना सभी अच्छा है, मगर यह अवश्य ध्यान रखें कि बड़बोलेपन की होड़ में आप ऐसे वादे, ऐसी बातें तो 'कमिट' नहीं कर रहे हैं जो आपके लिए संभव न हो। आगे जाकर उनके टूटने से सामने वाला दुखी तो होगा ही, अच्छे-खासे संबंधों में भी दरार आ जाएगी। इसलिए बढ़बोलेजी... बंद करें अपने असंभव वादे।

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