शादी तो होकर रहेगी
भारतीय टेनिस परी सानिया मिर्जा और पाकिस्तानी क्रिकेटर शोएब मलिक ने आयशा सिद्दीकी के मलिक के साथ निकाह के सभी आरोपों का पूरी तरह खंडन करते हुए कहा कि वे दोनों 15 अप्रैल को विवाह के पवित्र बंधन में बँधने जा रहे हैं।
सानिया और शोएब ने मीडिया के हुजूम के अनगिनत सवालों का कभी मुस्कुराते हुए, कभी थोड़ी चिंता के साथ और कभी पूरी ढृढ़ता के साथ जवाब देते हुए कहा कि वे सारी सच्चाई जानते हैं और आयशा के आरोपों में कहीं कोई हकीकत नहीं है।
सानिया ने शोएब का पुरजोर समर्थन करते हुए कहा उन्होंने मुझे या मेरे परिवार को कभी अंधेरे में नहीं रखा। हम सारी सच्चाई जानते हैं और इस मामले में कानून अपना काम कर रहा है। हालाँकि इन बातों से मैं और मेरा परिवार तथा रिश्तेदार जरूर हताश हुए हैं लेकिन मुझे खुशी है कि मैं शोएब के साथ निकाह करने जा रही हूँ।
भारतीय टेनिस स्टार के साथ खडे शोएब ने भी अपनी होने वाली बेगम का समर्थन करते हुए कहा कि मैं यहाँ अपनी शादी के लिए आया हूँ और अब मेरी नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि मुझ पर जो आरोप लगाए जा रहे हैं मैं पहले उन सभी आरोपों से दोषमुक्त हो जाऊँ। मैं सानिया के साथ 15 अप्रैल को शादी करने जा रहा हूँ।
शोएब ने पूरी ढृढ़ता के साथ कहा मैंने कुछ भी गलत नहीं किया है। मैं शादीशुदा नहीं हूँ। आयशा ने आरोप लगाए हैं तो वह छुपकर क्यों बैठी हैं। वह बाहर आकर सारी हकीकत क्यों नहीं बयाँ करती। सानिया ने भी कहा मेरा और मेरे परिवार का शोएब में पूरा विश्वास है। आयशा ने जो आरोप लगाए हैं वे अभी तक साबित नहीं हुए हैं। पहले उन्हें अपने आरोप साबित तो कर लेने दीजिए।
शोएब ने कहा कि आयशा मेरी जिंदगी को तबाह करने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन मेरा खुदा जानता है कि मैं कितना पाक साफ हूँ। जब तक कुछ साबित नहीं हो जाता है़, तब तक कोई मुझे हाथ नहीं लगा सकता है। पूर्व पाकिस्तानी कप्तान ने कहा कि शिकायत उन्होंने की है तो जो कुछ भी साबित करना है वह आयशा को ही करना है। उसके बाद ही मैं कुछ कर सकूँगा, लेकिन यदि मामले में कुछ है ही नहीं तो मैं भी क्या करूँगा। पुलिस मामले की जाँच कर रही है। पुलिस ने मुझसे पूछताछ भी की है लेकिन इस मामले में जब कोई सच्चाई भी नहीं है तो वे भी क्या ढूँढ पाएँगे।
हैदराबाद आने का अपना कारण पूछने पर शोएब ने मुस्कुराते हुए कहा कि मैं हैदराबाद अपनी शादी के लिए आया हूँ। यह मेरी जिंदगी का सबसे अहम दिन साबित होने वाला है लेकिन अब मुझे इस मामले में अपना नाम पाक साफ करना है।
शोएब ने कहा कि आयशा जिस समय मुझसे शादी की बात का दावा कर रही हैं उस समय तो मेरी उम्र सिर्फ 18 साल थी। मैं सिर्फ माहा आपा से मिला था और आपा का मतलब बड़ी बहन होता है तो क्या आप चाहते हैं कि मैं बड़ी बहन को तलाक दूँ।
उन्होंने कहा कि मैं तो आयशा नाम की लड़की से कभी मिला तक नहीं हूँ, जिसकी तस्वीर दिखाई जा रही है उससे मेरा कभी आमना-सामना नहीं हुआ। मेरे पास भी कई फोटो है, जिन्हें मैं दिखा सकता हूँ लेकिन मैं सभी का सम्मान करता हूँ, इसलिए मैं ऐसा काम कभी नहीं कर सकता।
पाकिस्तानी क्रिकेटर ने बताया कि उनका परिवार इस निकाह के लिए यहाँ आ रहा है और इंशाअल्लाह यह शादी अपने तय समय पर पूरी होगी। शोएब ने भावुकता के साथ कहा कि आप सभी लोग आयशा के आँसू देख रहे हैं, मैं भी रो सकता हूँ। मेरी माँ दिल की मरीज हैं उन्हें भी इन सब बातों से सदमा लग सकता है लेकिन इन सब बातों पर ध्यान देने और हमारी बात सुनने के लिए कोई तैयार नहीं है।
सानिया ने साथ ही कहा कि एक भारतीय होने के नाते यह मेरी जिम्मेदारी बनती है कि हम पुलिस को अपना काम करने दें। पुलिस को जो तहकीकात करनी है उसे वह करेगी। मैं मीडिया से भी अपील करती हूँ कि वह इस पूरे मामले को ज्यादा तूल न देकर इसे अदालत पर छोड़ दे।
भारतीय टेनिस स्टार ने कहा कि यह सब कुछ जो हो रहा है वह निश्चित ही हमें चोट पहुँचाने वाला है लेकिन मुझे खुशी है कि मैं यहां शोएब के साथ खड़ी हूँ और सभी सवालों का सामना कर रही हूँ। आप समझ सकते हैं कि 10 दिन बाद मेरी शादी है और आज मैं किन हालातों से गुजर रही हूँ।
सानिया के अनुसार आयशा सिद्दीकी से हमारे पारिवारिक संबंध रहे हैं। मैंने जब आयशा को पहली पार टीवी पर देखा तो मैं स्तब्ध रह गई। एक तरह से मुझे शॉक पहुँचा। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि एक टीवी चैनल पर मुझे और शोएब को बालकनी में मोबाइल पर बात करते हुए दिखाया गया है। क्या जरूरी है कि मैं हर वक्त खुश ही नजर आऊँ? मैं तब काफी टैंस थी और शोएब भी तनाव में थे। सानिया ने स्वीकार किया कि विवाद के कारण मुझे दु:ख होता है।
शोएब ने कहा कि मैं पुलिस और सरकार के साथ पूरा सहयोग कर रहा हूँ। मैं यह देश छोड़कर कहीं नहीं जा रहा हूँ और सभी सवालों के जवाब मैं तसल्ली से दूँगा। शोएब ने साथ ही आयशा सिद्दीकी परिवार की माफी माँगने की माँग को भी ठुकरा दिया। उन्होंने कहा कि मैं कैमरे के सामने खड़ा होकर बात कर रहा हूँ और वह कैमरे से दूर छुपकर बैठी हैं। मेरा माफी माँगने का तो कोई मतलब ही नहीं बनता। बेहतर यही होगा कि वह सामने आएँ और अपनी बात को साबित करें।
इस मुद्दे को अदालत के बाहर सुलझाने के सवाल को सिरे से खारिज करते हुए सानिया ने कहा कि जब कोई शादी ही नहीं हुई है तो तलाक की बात कहाँ से आती है और अदालत के बाहर समझौते का तो कोई मतलब ही नहीं है। शोएब ने कहा कि मैं भारत में शादी करने आया हूँ और शादी करके ही जाऊँगा। जहाँ तक विवादों का सवाल है तो मैं कहना चाहता हूँ कि मेरा पासपोर्ट पुलिस के पास है और मुझे जल्दी हीवापस मिलने की उम्मीद है। मैं स्पष्ट कर दूँ कि मैं तब तक अपने देश नहीं जाऊँगा, जब तक कि यह विवाद खत्म नहीं हो जाता।
आयशा के कथित गर्भपात के बारे में पूछने पर शोएब ने साफ शब्दों में कहा कि पहले उन्हें अपनी बात अदालत में साबित करने दीजिए। सानिया ने भी कहा कि इस्लामिक कानूनों के अनुसार टेलीफोन पर शादी होने की कोई गुंजाइश नहीं है।
जब शोएब से यह पूछा गया कि क्या आपने आयशा सिद्दीकी से पीछा छुड़ाने के लिए एक बिलियन डॉलर की पेशकश की है? जवाब में शोएब के साथ-साथ सानिया भी इतनी बड़ी रकम सुनकर भौचक रह गई और उन्होंने कहा कि ऐसी कोई पेशकश नहीं की गई है।
सोमवार, 5 अप्रैल 2010
रविवार, 4 अप्रैल 2010
सानिया मिर्जा
ज्यादा दिन नहीं टिकेगी सानिया-शोएब की शादी
पाकिस्तान के अधिकतर लोग मानते हैं कि सीमा पार विवाह से उनके देश और भारत के बीच खाई पाटने में मदद मिल सकती है लेकिन उनका मानना है कि सानिया मिर्जा और शोएब मलिक की शादी ज्यादा दिन तक नहीं टिकी रहेगी। साथ ही किसी अन्य देश में बसने की योजना से भी समस्या का हल नहीं निकलेगा।
पाकिस्तान के एलीट स्कूल की सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापिका आयशा अंसारी [बदला हुआ नाम] ने कहा, 'मुझे लगता है कि शोएब मलिक और सानिया मिर्जा की जोड़ी बेमेल है जिसमें सानिया बहुत अच्छी है। यह बुरा सौदा है।' अंसारी ने दावा किया कि ऐसा मानने वाली वह अकेली नहीं हैं। उन्होंने कहा, 'बहुत से पाकिस्तानियों का मानना है कि यह शादी ज्यादा दिन तक नहीं चलेगी। यह बहुत मुश्किल है।' अंसारी हालांकि भारत और पाकिस्तानियों के बीच वैवाहिक संबंधों की पक्षधर हैं। उन्होंने कहा, 'इस तरह की शादियां होनी चाहिए। यह दोनों देशों के लिए अच्छा है। इससे मिथक टूटेंगे, डर दूर होगा और लोग एक दूसरे के करीब आएंगे।'
अधिकतर पाकिस्तानी शादी का मामला काफी जटिल होता है। आईटी सेक्टर से जुड़ी सादिया खान ने कहा, 'आपसी आकर्षण, शादी अच्छी बात है लेकिन यदि शादी नहीं चल पाई तो क्या होगा।' अंसारी ने कई साल पहले भारत से यहां आकर पाकिस्तानी से शादी की थी। दुर्भाग्य से उनका दांपत्य जीवन अधिक दिन तक नहीं चल पाया। उनकी लड़की ने इसके बाद पाकिस्तानी की बजाय भारतीय से शादी करना उचित समझा। अंसारी को हालांकि कई साल पहले खास वीजा पर भारत में रहने की अनुमति मिल गई थी लेकिन वह पाक लौट आई और अब अपनी सारी जिंदगी पाकिस्तानी के तौर पर बिताना चाहती हैं। उन्होंने कहा, 'इस तरह की शादियों में कुछ भी गलत नहीं है। राजनीतिक स्थिति भले ही अलग है। वे उन लोगों को दोहरी नागरिकता क्यों नहीं दे देते जो शादी के लिए सीमा पार जाकर शादी करते हैं।' उन्होंने कहा, 'पाकिस्तान के मेरे कई विद्यार्थियों की शादी भी लंबे समय तक नहीं चली। इसलिए केवल भारत और पाकिस्तान के जोड़ों के बीच होने वाली शादी ही समस्या नहीं है। यह हर जगह जटिल मामला है।'
अंसारी का मानना है कि तीसरे देश का विकल्प यानी सानिया और शोएब के मामले में शादी के बाद दुबई में बसने के फैसले भी समस्या हल नहीं होगी। उन्होंने कहा, 'आप अपने परिवार से दूर चले जाते हो। मुझे नहीं लगता कि इससे काम बनेगा।' वर्तमान परिस्थितियों में अधिकतर पाकिस्तानियों का मानना है कि सानिया और शोएब का दांपत्य जीवन लंबे समय तक चलने की संभावना कम है। अंसारी ने कहा कि शोएब की आयशा सिद्दीकी के साथ कथित निकाह ने स्थिति और जटिल कर दी है।
पाकिस्तान के अधिकतर लोग मानते हैं कि सीमा पार विवाह से उनके देश और भारत के बीच खाई पाटने में मदद मिल सकती है लेकिन उनका मानना है कि सानिया मिर्जा और शोएब मलिक की शादी ज्यादा दिन तक नहीं टिकी रहेगी। साथ ही किसी अन्य देश में बसने की योजना से भी समस्या का हल नहीं निकलेगा।
पाकिस्तान के एलीट स्कूल की सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापिका आयशा अंसारी [बदला हुआ नाम] ने कहा, 'मुझे लगता है कि शोएब मलिक और सानिया मिर्जा की जोड़ी बेमेल है जिसमें सानिया बहुत अच्छी है। यह बुरा सौदा है।' अंसारी ने दावा किया कि ऐसा मानने वाली वह अकेली नहीं हैं। उन्होंने कहा, 'बहुत से पाकिस्तानियों का मानना है कि यह शादी ज्यादा दिन तक नहीं चलेगी। यह बहुत मुश्किल है।' अंसारी हालांकि भारत और पाकिस्तानियों के बीच वैवाहिक संबंधों की पक्षधर हैं। उन्होंने कहा, 'इस तरह की शादियां होनी चाहिए। यह दोनों देशों के लिए अच्छा है। इससे मिथक टूटेंगे, डर दूर होगा और लोग एक दूसरे के करीब आएंगे।'
अधिकतर पाकिस्तानी शादी का मामला काफी जटिल होता है। आईटी सेक्टर से जुड़ी सादिया खान ने कहा, 'आपसी आकर्षण, शादी अच्छी बात है लेकिन यदि शादी नहीं चल पाई तो क्या होगा।' अंसारी ने कई साल पहले भारत से यहां आकर पाकिस्तानी से शादी की थी। दुर्भाग्य से उनका दांपत्य जीवन अधिक दिन तक नहीं चल पाया। उनकी लड़की ने इसके बाद पाकिस्तानी की बजाय भारतीय से शादी करना उचित समझा। अंसारी को हालांकि कई साल पहले खास वीजा पर भारत में रहने की अनुमति मिल गई थी लेकिन वह पाक लौट आई और अब अपनी सारी जिंदगी पाकिस्तानी के तौर पर बिताना चाहती हैं। उन्होंने कहा, 'इस तरह की शादियों में कुछ भी गलत नहीं है। राजनीतिक स्थिति भले ही अलग है। वे उन लोगों को दोहरी नागरिकता क्यों नहीं दे देते जो शादी के लिए सीमा पार जाकर शादी करते हैं।' उन्होंने कहा, 'पाकिस्तान के मेरे कई विद्यार्थियों की शादी भी लंबे समय तक नहीं चली। इसलिए केवल भारत और पाकिस्तान के जोड़ों के बीच होने वाली शादी ही समस्या नहीं है। यह हर जगह जटिल मामला है।'
अंसारी का मानना है कि तीसरे देश का विकल्प यानी सानिया और शोएब के मामले में शादी के बाद दुबई में बसने के फैसले भी समस्या हल नहीं होगी। उन्होंने कहा, 'आप अपने परिवार से दूर चले जाते हो। मुझे नहीं लगता कि इससे काम बनेगा।' वर्तमान परिस्थितियों में अधिकतर पाकिस्तानियों का मानना है कि सानिया और शोएब का दांपत्य जीवन लंबे समय तक चलने की संभावना कम है। अंसारी ने कहा कि शोएब की आयशा सिद्दीकी के साथ कथित निकाह ने स्थिति और जटिल कर दी है।
शनिवार, 3 अप्रैल 2010
रोमांस
ये इश्क नहीं आसाँ..
'मुझे तो अब भी यकीन नहीं हो रहा यार कि राजेश ने सोनम के अलावा किसी और से शादी कर ली। आदमी इतना बदल कैसे जाता है?' सचिन के मुँह से यह वाक्य सुनकर अब तक चुपचाप बैठे मनीष ने कहा, 'हाँ यार, राजेश और सोनम को हम लोग दो जिस्म एक जान समझा करते थे। कॉलेज के दिनों में कैसे दोनों के चेहरे हमेशा फूल की तरह खिले रहते थे।
कॉलेज के लड़के-लड़कियाँ उनके प्रेम को अपना आदर्श मानते थे। मैंने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि राजेश सोनम के अलावा किसी और से शादी करने के बारे में सोच तक सकता है। 'सोनम और राजेश की यह कहानी अकेले उनकी ही नहीं है। कॉलेज जाने वाला हर लड़का और लड़की प्रेम के इस दरिया में डुबकियाँ लगाना चाहते हैं। यह बात अलग है कि ज्यादातर की परिणति वही होती है, जो राजेश और सोनम के प्यार की हुई। कॉलेज के संबंध बेवफाई की एक अंतहीन दास्ताँ है। यह कोई नया ट्रेंड भी नहीं है। हमेशा से ऐसा होता रहा है।
यह बात अलग है कि कॉलेज जाने वाला हर लड़का और लड़की प्रेम करना चाहते हैं, लेकिन कुछ ही किस्मत वाले होते हैं जो तमाम बाधाओं के बावजूद कॉलेज के दिनों के कसमें-वादों को उम्र भर हमसफर बनकर निभाते हैं। एक शायर ने भी कहा है-
'ये इश्क नहीं आसाँ इतना तो समझ लीजै,
एक आग का दरिया है और डूब के जाना है।'
ये दो पंक्तियाँ प्यार की कठिन डगर को बयान करने के लिए काफी हैं। फिर भी सब कुछ जानते हुए भी लड़के-लड़कियाँ इस दरिया में कूद ही जाते हैं।
समाज में लैला-मजनू के किस्से बेशक ध्यान से सुने जाते हों, लेकिन समाज को यह कतई मंजूर नहीं कि इस तरह की प्रेम कहानी उसका हिस्सा भी बने। फिर भी गली-मोहल्लों से लेकर कॉलेजों तक प्यार में दिल लूटने-लुटाने वालों की कमी नहीं रहती। हर लड़के-लड़की का ख्वाब होता है कि उसके सपनों का हमसफर उसे कहीं जिंदगी की राहों पर टकरा जाए।
इसी कामना के वशीभूत वे एक-दूसरे में अपने प्यार का प्रतिबिंब तलाशते हैं। जहाँ भी इस प्रतिबिंब की झलक दिखाई देती है, वहीं नजदीकियाँ बढ़ने लगती हैं। ये नजदीकियाँ प्यार में बदलती हैं, जिसकी परिणति अक्सर बेवफाई के रूप में सामने आती है।
वास्तव में देखा जाए तो प्यार की अग्निपरीक्षा शादी ही है। पर देखा गया है कि प्रेम की गाड़ी में सवार होकर चलने वाले इस अग्निपरीक्षा में अक्सर असफल हो जाते हैं। कॉलेज के प्रेम संबंधों का अक्सर दुखांत होता है। ऐसा आखिर क्यों है? यह सवाल प्रेम संबंधों के समाजशास्त्र में एक फाँस की तरह अटका हुआ है?
कॉलेज में जो लड़का-लड़की एक पल भी एक-दूसरे के बगैर चैन से नहीं रह पाते, कॉलेज छोड़ते ही अक्सर एक-दूसरे को यूँ भूल जाते हैं जैसे ट्रेन में सफर के यात्री अपने स्टेशन के प्लेटफार्म पर उतरते ही अजनबी हो जाते हैं। अगर किसी का प्यार किसी तरह से शादी की मंजिल तक पहुँचता भी है, तो देखने में आता है कि वह अक्सर टूट जाता है। आखिर ऐसा क्यों होता है?
वास्तव में इसकी प्रमुख वजह यही है कि ये रिश्ते केवल दिल की भावनाओं पर टिके होते हैं। भावनाएँ भी ऐसी, जो एक हल्की सी ठोकर में ही चकनाचूर हो जाएँ। अक्सर कहा जाता है कि भावनात्मक आदमी अपने जीवन में कभी खुश नहीं रह सकता। यह बात सोलह आने सच है। भावनाएँ सपनों की आधारशिला पर टिकी होती हैं।
दूसरी तरफ सपनों का वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं होता। जब एक लड़का और एक लड़की प्रेम के मोहपाश में बँधते हैं, तो उनकी दुनिया सिर्फ और सिर्फ अपने तक ही सीमित होकर रह जाती है। वे सुबह सोकर उठने से लेकर रात को सोने तक केवल एक-दूसरे के बारे में ही सोचते हैं। इतना ही नहीं, सोने से पूर्व भगवान से यह प्रार्थना करना नहीं भूलते कि रात को सपने में उसका प्रिय दिखाई दे।
प्यार को अगर नशा कहा गया है तो यह सही ही कहा गया है। जिस तरीके से नशेड़ी को दुनियादारी से कोई लेना-देना नहीं होता ठीक उसी तरह प्रेमी युगल का समाज के बंधनों अथवा रीति-रिवाजों से कोई सरोकार नहीं होता। यह प्यार सिर्फ 'टाइमपास' के लिए होता है। कॉलेज के दिनों में प्रेमी-प्रेमिकाओं की मुहब्बत मंजिल नहीं पाती अगर कोई जोड़ा शादी कर भी लेता है, तो ज्यादातर की शादी टूट जाती है क्योंकि शादी के बाद वे एक-दूसरे का वास्तविक स्वरूप देखते हैं, जो अक्सर कल्पनाओं से भिन्न होता है।
यही वह चीज होती है जो दोनों को अलगाव की नींव तक ले जाती है। जो लोग वास्तविकता से समझौता कर लेते हैं, वे तो सफल हो जाते हैं। जो सिर्फ अपनी कल्पनाओं को ही साकार देखना चाहते हैं, उनके बीच दूरियाँ बढ़ने लगती हैं। यही दूरी आखिर में दोनों को अलगाव की दहलीज तक खींचकर ले जाती है। यह अलगाव कई बार सामान्य अलगाव से अलग और उलझन भरा होता है। कहते हैं कि प्यार जब नफरत में बदल जाए तो वह ज्यादा खतरनाक होता है। यही वजह है कि जब दो प्रेमियों के बीच शादी के बाद अलगाव होता है तो उसकी प्रक्रिया काफी कष्टदायी होती है।
इस तरह के सैकड़ों उदाहरण हमारे सामने हैं। ये उदाहरण इस बात की पुष्टि करते हैं कि सपनों का टूटना आदमी को पागलपन की हद तक पहुँचा देता है। कॉलेज के ऐसे प्रेम-संबंध जो शादी की परिणति तक पहुँचते हैं, उनमे से नब्बे फीसदी अलगाव की भेंट चढ़ जाते हैं। यह सारा खेल सपनों के बनने एवं उनके टूटने पर टिका है। सच कहा जाए तो प्यार की दुनिया स्वप्निल दुनिया है। जब तक जमीनी सच्चाई से इसका मेल-मिलाप नहीं होता, तब तक इस दुनिया पर खतरे के बादल मँडराते रहते हैं।
शादी से पूर्व लड़की ख्वाब देखती है कि मेरा प्रेमी मुझे राजकुमारी की तरह रखेगा। लड़का सोचता है कि प्रेमिका मेरे सारे दुःखों को एक ही झटके में समाप्त कर देगी। लेकिन शादी के बाद ठीक इसके विपरीत होता है। इस विपरीत परिस्थिति से वे सामंजस्य नहीं बिठा पाते और गंभीर परिणाम भुगतते हैं। अतः कितना अच्छा हो कि यदि कल्पनाओं पर आधारित प्रेम को हकीकत की तराजू पर पहले ही तौलकर देख लिया जाए।
अनाम रिश्ता बेनाम उलझनें
हेलो दोस्तो! आपसे जुड़े ज्यादातर रिश्ते ऐसे होते हैं जिनको आप किसी न किसी नाम से पुकारते हैं। उन रिश्तों के बारे में सोचने की आपको जरूरत ही नहीं पड़ती है। उनके प्रति आपका फर्ज एवं अधिकार मानो जन्म से ही समझा दिया गया होता है इसीलिए बिना किसी विचार-विमर्श के सहजता से आप उसे निभाते चले जाते हैं। करीबी रिश्तेदार, दूर के रिश्तेदार इन सबकी भी एक श्रेणी बन जाती है। आप अपनी सुविधा और पसंद के अनुसार उनके साथ भी तालमेल बिठा लेते हैं।
इसी प्रकार दोस्तों की भी कई श्रेणियाँ होती हैं, वर्ग होते हैं। कुछ ऐसे होते हैं जिनसे आप हमेशा मिलते हैं पर उनसे आपका अपनापन नहीं होता है। कुछ ऐसे होते हैं जो आपका दुख-दर्द सुन तो लेते हैं पर उससे ज्यादा वे और कुछ नहीं करते। एक या दो दोस्त ऐसे होते हैं जिनसे आपकी महीनों बात नहीं होती पर मुसीबत में आप उन्हें फोन करते हैं और आपकी बातों और आवाज से उन्हें लगता है कि आपको उनकी हमदर्दी की जरूरत है। वह आपसे परेशानी पूछते हैं, आपको दिलासा देते हैं और उनसे कुछ बन पड़ता है तो वे आपके लिए करते भी हैं।पर, कई बार आप एक विचित्र से रिश्ते में पड़ जाते हैं। न तो उसका कोई नाम होता है और न ही आपको यह पता होता है कि आपका उस व्यक्ति पर कितना अधिकार है। इतना ही नहीं, आपका उस व्यक्ति के प्रति क्या कर्तव्य होना चाहिए यह भी आप नहीं समझ पाते हैं। कभी आप उससे हफ्तों नहीं मिलते और जब मिलते हैं तो खूब अधिकार से झगड़ा करते हैं। आपकी यही ख्वाहिश होती है कि आपको वह मनाए, आपकी सारी शिकायतों पर माफी माँगे, कान पकड़े और सारी गलतियों को सर आँखों पर ले।
उनसे फूलों का उपहार लेना और घंटों बैठकर गप्पें लगाना आदि आपको दिल व जान से प्यारा होता है। इन सबके बावजूद आप उस रिश्ते को वहीं तक ठहरा देते हैं, उसे कोई नाम नहीं देते और उसके स्थायित्व पर भी प्रश्नचिह्न लगा रहता है पर ऐसे रिश्ते में मुश्किल यह होती है कि दूसरा पक्ष अपने बारे में कोई निर्णय नहीं कर पाता है और वह अपने भविष्य के बारे में कोई फैसला नहीं ले पाता है। यह दुविधा उसकी परेशानी का सबब बनती है।
इसी कशमकश में आज घिर गए हैं अरुण आहूजा (बदला हुआ नाम)। अरुण की एक दोस्त हैं। दोनों बातचीत में बेहद करीबी महसूस करते हैं पर अरुण की दोस्त अपनी ओर से पहल नहीं करतीं। यदि अरुण एक या दो सप्ताह तक बात न करें तो वह खोज-खबर नहीं लेतीं लेकिन अरुण द्वारा संपर्क करने पर उनसे खूब लड़ती-झगड़ती हैं, शिकायतों की झड़ी लगा देती हैं।
यह कहते हुए कि तोहफों पर पैसे क्यों खर्च करते हो, फूल और अन्य उपहार से खुश भी हो जाती हैं। पर यह पूछने पर कि इस रिश्ते का भविष्य क्या है ? क्या हमेशा साथ रहने के बारे में सोचा जा सकता है? तो अरुण की दोस्त का जवाब होता है, 'अभी इस रिश्ते में प्यार शामिल नहीं हुआ है। हम केवल दोस्त हैं।' अरुण की परेशानी यह है कि वह इस रिश्ते को समझ नहीं पा रहे हैं। इस रिश्ते पर अपना कितना समय लगाएँ या समय देना उचित है या नहीं यह उन्हें समझ में नहीं आ रहा है।अरुण जी, आपकी दोस्त ने यूँ तो साफ लफ्जों में आपको कह दिया है कि वह केवल दोस्त हैं। प्यार उन्हें नहीं है इसलिए भविष्य के बारे में उनकी कोई योजना नहीं दिखती है फिर भी आप रिश्ते में जटिलता महसूस करते हैं। आप इसलिए परेशान हैं कि आप जो उनसे सुनना चाहते थे वह आप नहीं सुन पा रहे हैं। शायद आप अपनी दोस्त को प्यार करते हैं इसलिए उसको खुश करने का जतन करते हैं। यह बात तो साफ है कि आप दोस्त से ज्यादा उन्हें अपने जीवन में जगह देते हैं तभी उनका व्यवहार आपको विचलित किए रहता है।
आपकी दोस्त आपको प्यार नहीं करती बल्कि केवल दोस्त समझती है। यदि कहीं उनके भीतर प्यार की भावना है भी तो वह उसे अभी महसूस नहीं कर पा रही हैं। सच्चाई यह है कि उनकी नजर में आपके प्यार की कोई अहमियत नहीं है। आपको इस रिश्ते को केवल दोस्ती की श्रेणी में रखकर आगे बढ़ जाना चाहिए। साथ समय बिताना अच्छा लगता है तो समय बिताएँ पर उससे ज्यादा अपेक्षा न करें।
आप कुछ कदम ऐसा उठा सकते हैं जिससे आपकी दोस्त को इस रिश्ते को समझने में सहायता मिल सकती है। आपके प्रति उनके मन के भीतर क्या है वह समझ सकती है। आप उसे साफ तौर पर कह दें कि आप अपनी जीवनसाथी तलाश कर रहे हैं। यह बात आपकी ओर से गंभीरता से सामने आनी चाहिए। आप कोई तोहफा उन्हें अब नहीं दें। उन्हें संपर्क करने दें। एक माह तक संपर्क न करें।
यदि वह संपर्क नहीं करती हैं तो आप एक माह बाद यह बताएँ कि आप लंबे रिश्ते की तलाश में हैं इसीलिए समय नहीं मिला। जब उन्हें आपको खो देने का डर होगा तब वह गंभीरता से आपके बारे में विचार कर पाएँगी। रिश्ते को लेकर यह चिंतन व मंथन बेजा नहीं जाएगा। आप दोनों बेहतर तौर पर अपने भविष्य की योजना बना पाएँगे। इन सारी प्रक्रिया से गुजर कर आपकी दोस्ती भी अच्छी मजबूत हो जाएगी और भावनाओं के पैमाने का भी पता चल जाएगा।
'मुझे तो अब भी यकीन नहीं हो रहा यार कि राजेश ने सोनम के अलावा किसी और से शादी कर ली। आदमी इतना बदल कैसे जाता है?' सचिन के मुँह से यह वाक्य सुनकर अब तक चुपचाप बैठे मनीष ने कहा, 'हाँ यार, राजेश और सोनम को हम लोग दो जिस्म एक जान समझा करते थे। कॉलेज के दिनों में कैसे दोनों के चेहरे हमेशा फूल की तरह खिले रहते थे।
कॉलेज के लड़के-लड़कियाँ उनके प्रेम को अपना आदर्श मानते थे। मैंने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि राजेश सोनम के अलावा किसी और से शादी करने के बारे में सोच तक सकता है। 'सोनम और राजेश की यह कहानी अकेले उनकी ही नहीं है। कॉलेज जाने वाला हर लड़का और लड़की प्रेम के इस दरिया में डुबकियाँ लगाना चाहते हैं। यह बात अलग है कि ज्यादातर की परिणति वही होती है, जो राजेश और सोनम के प्यार की हुई। कॉलेज के संबंध बेवफाई की एक अंतहीन दास्ताँ है। यह कोई नया ट्रेंड भी नहीं है। हमेशा से ऐसा होता रहा है।
यह बात अलग है कि कॉलेज जाने वाला हर लड़का और लड़की प्रेम करना चाहते हैं, लेकिन कुछ ही किस्मत वाले होते हैं जो तमाम बाधाओं के बावजूद कॉलेज के दिनों के कसमें-वादों को उम्र भर हमसफर बनकर निभाते हैं। एक शायर ने भी कहा है-
'ये इश्क नहीं आसाँ इतना तो समझ लीजै,
एक आग का दरिया है और डूब के जाना है।'
ये दो पंक्तियाँ प्यार की कठिन डगर को बयान करने के लिए काफी हैं। फिर भी सब कुछ जानते हुए भी लड़के-लड़कियाँ इस दरिया में कूद ही जाते हैं।
समाज में लैला-मजनू के किस्से बेशक ध्यान से सुने जाते हों, लेकिन समाज को यह कतई मंजूर नहीं कि इस तरह की प्रेम कहानी उसका हिस्सा भी बने। फिर भी गली-मोहल्लों से लेकर कॉलेजों तक प्यार में दिल लूटने-लुटाने वालों की कमी नहीं रहती। हर लड़के-लड़की का ख्वाब होता है कि उसके सपनों का हमसफर उसे कहीं जिंदगी की राहों पर टकरा जाए।
इसी कामना के वशीभूत वे एक-दूसरे में अपने प्यार का प्रतिबिंब तलाशते हैं। जहाँ भी इस प्रतिबिंब की झलक दिखाई देती है, वहीं नजदीकियाँ बढ़ने लगती हैं। ये नजदीकियाँ प्यार में बदलती हैं, जिसकी परिणति अक्सर बेवफाई के रूप में सामने आती है।
वास्तव में देखा जाए तो प्यार की अग्निपरीक्षा शादी ही है। पर देखा गया है कि प्रेम की गाड़ी में सवार होकर चलने वाले इस अग्निपरीक्षा में अक्सर असफल हो जाते हैं। कॉलेज के प्रेम संबंधों का अक्सर दुखांत होता है। ऐसा आखिर क्यों है? यह सवाल प्रेम संबंधों के समाजशास्त्र में एक फाँस की तरह अटका हुआ है?
कॉलेज में जो लड़का-लड़की एक पल भी एक-दूसरे के बगैर चैन से नहीं रह पाते, कॉलेज छोड़ते ही अक्सर एक-दूसरे को यूँ भूल जाते हैं जैसे ट्रेन में सफर के यात्री अपने स्टेशन के प्लेटफार्म पर उतरते ही अजनबी हो जाते हैं। अगर किसी का प्यार किसी तरह से शादी की मंजिल तक पहुँचता भी है, तो देखने में आता है कि वह अक्सर टूट जाता है। आखिर ऐसा क्यों होता है?
वास्तव में इसकी प्रमुख वजह यही है कि ये रिश्ते केवल दिल की भावनाओं पर टिके होते हैं। भावनाएँ भी ऐसी, जो एक हल्की सी ठोकर में ही चकनाचूर हो जाएँ। अक्सर कहा जाता है कि भावनात्मक आदमी अपने जीवन में कभी खुश नहीं रह सकता। यह बात सोलह आने सच है। भावनाएँ सपनों की आधारशिला पर टिकी होती हैं।
दूसरी तरफ सपनों का वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं होता। जब एक लड़का और एक लड़की प्रेम के मोहपाश में बँधते हैं, तो उनकी दुनिया सिर्फ और सिर्फ अपने तक ही सीमित होकर रह जाती है। वे सुबह सोकर उठने से लेकर रात को सोने तक केवल एक-दूसरे के बारे में ही सोचते हैं। इतना ही नहीं, सोने से पूर्व भगवान से यह प्रार्थना करना नहीं भूलते कि रात को सपने में उसका प्रिय दिखाई दे।
प्यार को अगर नशा कहा गया है तो यह सही ही कहा गया है। जिस तरीके से नशेड़ी को दुनियादारी से कोई लेना-देना नहीं होता ठीक उसी तरह प्रेमी युगल का समाज के बंधनों अथवा रीति-रिवाजों से कोई सरोकार नहीं होता। यह प्यार सिर्फ 'टाइमपास' के लिए होता है। कॉलेज के दिनों में प्रेमी-प्रेमिकाओं की मुहब्बत मंजिल नहीं पाती अगर कोई जोड़ा शादी कर भी लेता है, तो ज्यादातर की शादी टूट जाती है क्योंकि शादी के बाद वे एक-दूसरे का वास्तविक स्वरूप देखते हैं, जो अक्सर कल्पनाओं से भिन्न होता है।
यही वह चीज होती है जो दोनों को अलगाव की नींव तक ले जाती है। जो लोग वास्तविकता से समझौता कर लेते हैं, वे तो सफल हो जाते हैं। जो सिर्फ अपनी कल्पनाओं को ही साकार देखना चाहते हैं, उनके बीच दूरियाँ बढ़ने लगती हैं। यही दूरी आखिर में दोनों को अलगाव की दहलीज तक खींचकर ले जाती है। यह अलगाव कई बार सामान्य अलगाव से अलग और उलझन भरा होता है। कहते हैं कि प्यार जब नफरत में बदल जाए तो वह ज्यादा खतरनाक होता है। यही वजह है कि जब दो प्रेमियों के बीच शादी के बाद अलगाव होता है तो उसकी प्रक्रिया काफी कष्टदायी होती है।
इस तरह के सैकड़ों उदाहरण हमारे सामने हैं। ये उदाहरण इस बात की पुष्टि करते हैं कि सपनों का टूटना आदमी को पागलपन की हद तक पहुँचा देता है। कॉलेज के ऐसे प्रेम-संबंध जो शादी की परिणति तक पहुँचते हैं, उनमे से नब्बे फीसदी अलगाव की भेंट चढ़ जाते हैं। यह सारा खेल सपनों के बनने एवं उनके टूटने पर टिका है। सच कहा जाए तो प्यार की दुनिया स्वप्निल दुनिया है। जब तक जमीनी सच्चाई से इसका मेल-मिलाप नहीं होता, तब तक इस दुनिया पर खतरे के बादल मँडराते रहते हैं।
शादी से पूर्व लड़की ख्वाब देखती है कि मेरा प्रेमी मुझे राजकुमारी की तरह रखेगा। लड़का सोचता है कि प्रेमिका मेरे सारे दुःखों को एक ही झटके में समाप्त कर देगी। लेकिन शादी के बाद ठीक इसके विपरीत होता है। इस विपरीत परिस्थिति से वे सामंजस्य नहीं बिठा पाते और गंभीर परिणाम भुगतते हैं। अतः कितना अच्छा हो कि यदि कल्पनाओं पर आधारित प्रेम को हकीकत की तराजू पर पहले ही तौलकर देख लिया जाए।
अनाम रिश्ता बेनाम उलझनें
हेलो दोस्तो! आपसे जुड़े ज्यादातर रिश्ते ऐसे होते हैं जिनको आप किसी न किसी नाम से पुकारते हैं। उन रिश्तों के बारे में सोचने की आपको जरूरत ही नहीं पड़ती है। उनके प्रति आपका फर्ज एवं अधिकार मानो जन्म से ही समझा दिया गया होता है इसीलिए बिना किसी विचार-विमर्श के सहजता से आप उसे निभाते चले जाते हैं। करीबी रिश्तेदार, दूर के रिश्तेदार इन सबकी भी एक श्रेणी बन जाती है। आप अपनी सुविधा और पसंद के अनुसार उनके साथ भी तालमेल बिठा लेते हैं।
इसी प्रकार दोस्तों की भी कई श्रेणियाँ होती हैं, वर्ग होते हैं। कुछ ऐसे होते हैं जिनसे आप हमेशा मिलते हैं पर उनसे आपका अपनापन नहीं होता है। कुछ ऐसे होते हैं जो आपका दुख-दर्द सुन तो लेते हैं पर उससे ज्यादा वे और कुछ नहीं करते। एक या दो दोस्त ऐसे होते हैं जिनसे आपकी महीनों बात नहीं होती पर मुसीबत में आप उन्हें फोन करते हैं और आपकी बातों और आवाज से उन्हें लगता है कि आपको उनकी हमदर्दी की जरूरत है। वह आपसे परेशानी पूछते हैं, आपको दिलासा देते हैं और उनसे कुछ बन पड़ता है तो वे आपके लिए करते भी हैं।पर, कई बार आप एक विचित्र से रिश्ते में पड़ जाते हैं। न तो उसका कोई नाम होता है और न ही आपको यह पता होता है कि आपका उस व्यक्ति पर कितना अधिकार है। इतना ही नहीं, आपका उस व्यक्ति के प्रति क्या कर्तव्य होना चाहिए यह भी आप नहीं समझ पाते हैं। कभी आप उससे हफ्तों नहीं मिलते और जब मिलते हैं तो खूब अधिकार से झगड़ा करते हैं। आपकी यही ख्वाहिश होती है कि आपको वह मनाए, आपकी सारी शिकायतों पर माफी माँगे, कान पकड़े और सारी गलतियों को सर आँखों पर ले।
उनसे फूलों का उपहार लेना और घंटों बैठकर गप्पें लगाना आदि आपको दिल व जान से प्यारा होता है। इन सबके बावजूद आप उस रिश्ते को वहीं तक ठहरा देते हैं, उसे कोई नाम नहीं देते और उसके स्थायित्व पर भी प्रश्नचिह्न लगा रहता है पर ऐसे रिश्ते में मुश्किल यह होती है कि दूसरा पक्ष अपने बारे में कोई निर्णय नहीं कर पाता है और वह अपने भविष्य के बारे में कोई फैसला नहीं ले पाता है। यह दुविधा उसकी परेशानी का सबब बनती है।
इसी कशमकश में आज घिर गए हैं अरुण आहूजा (बदला हुआ नाम)। अरुण की एक दोस्त हैं। दोनों बातचीत में बेहद करीबी महसूस करते हैं पर अरुण की दोस्त अपनी ओर से पहल नहीं करतीं। यदि अरुण एक या दो सप्ताह तक बात न करें तो वह खोज-खबर नहीं लेतीं लेकिन अरुण द्वारा संपर्क करने पर उनसे खूब लड़ती-झगड़ती हैं, शिकायतों की झड़ी लगा देती हैं।
यह कहते हुए कि तोहफों पर पैसे क्यों खर्च करते हो, फूल और अन्य उपहार से खुश भी हो जाती हैं। पर यह पूछने पर कि इस रिश्ते का भविष्य क्या है ? क्या हमेशा साथ रहने के बारे में सोचा जा सकता है? तो अरुण की दोस्त का जवाब होता है, 'अभी इस रिश्ते में प्यार शामिल नहीं हुआ है। हम केवल दोस्त हैं।' अरुण की परेशानी यह है कि वह इस रिश्ते को समझ नहीं पा रहे हैं। इस रिश्ते पर अपना कितना समय लगाएँ या समय देना उचित है या नहीं यह उन्हें समझ में नहीं आ रहा है।अरुण जी, आपकी दोस्त ने यूँ तो साफ लफ्जों में आपको कह दिया है कि वह केवल दोस्त हैं। प्यार उन्हें नहीं है इसलिए भविष्य के बारे में उनकी कोई योजना नहीं दिखती है फिर भी आप रिश्ते में जटिलता महसूस करते हैं। आप इसलिए परेशान हैं कि आप जो उनसे सुनना चाहते थे वह आप नहीं सुन पा रहे हैं। शायद आप अपनी दोस्त को प्यार करते हैं इसलिए उसको खुश करने का जतन करते हैं। यह बात तो साफ है कि आप दोस्त से ज्यादा उन्हें अपने जीवन में जगह देते हैं तभी उनका व्यवहार आपको विचलित किए रहता है।
आपकी दोस्त आपको प्यार नहीं करती बल्कि केवल दोस्त समझती है। यदि कहीं उनके भीतर प्यार की भावना है भी तो वह उसे अभी महसूस नहीं कर पा रही हैं। सच्चाई यह है कि उनकी नजर में आपके प्यार की कोई अहमियत नहीं है। आपको इस रिश्ते को केवल दोस्ती की श्रेणी में रखकर आगे बढ़ जाना चाहिए। साथ समय बिताना अच्छा लगता है तो समय बिताएँ पर उससे ज्यादा अपेक्षा न करें।
आप कुछ कदम ऐसा उठा सकते हैं जिससे आपकी दोस्त को इस रिश्ते को समझने में सहायता मिल सकती है। आपके प्रति उनके मन के भीतर क्या है वह समझ सकती है। आप उसे साफ तौर पर कह दें कि आप अपनी जीवनसाथी तलाश कर रहे हैं। यह बात आपकी ओर से गंभीरता से सामने आनी चाहिए। आप कोई तोहफा उन्हें अब नहीं दें। उन्हें संपर्क करने दें। एक माह तक संपर्क न करें।
यदि वह संपर्क नहीं करती हैं तो आप एक माह बाद यह बताएँ कि आप लंबे रिश्ते की तलाश में हैं इसीलिए समय नहीं मिला। जब उन्हें आपको खो देने का डर होगा तब वह गंभीरता से आपके बारे में विचार कर पाएँगी। रिश्ते को लेकर यह चिंतन व मंथन बेजा नहीं जाएगा। आप दोनों बेहतर तौर पर अपने भविष्य की योजना बना पाएँगे। इन सारी प्रक्रिया से गुजर कर आपकी दोस्ती भी अच्छी मजबूत हो जाएगी और भावनाओं के पैमाने का भी पता चल जाएगा।
खुशियों पर लगता ग्रहण...
पाकिस्तानी क्रिकेटर शोएब मलिक से निकाह के ऐलान के बाद उनके लगातार विवादों में घिरने से भारतीय टेनिस परी सानिया मिर्जा की रातों की नींद उड़ गई है। सानिया ने आज तड़के ट्विटर के जरिए कहा कि वे पूरी रात सो नहीं पाई हैं। शोएब का इस महीने सानिया मिर्जा के साथ विवाह होने जा रहा है।
नींद गायब हो गई-सानिया
पाकिस्तानी क्रिकेटर शोएब मलिक से निकाह के ऐलान के बाद उनके लगातार विवादों में घिरने से भारतीय टेनिस परी सानिया मिर्जा की रातों की नींद उड़ गई है।
सानिया ने आज तड़के ट्विटर के जरिए कहा कि वे पूरी रात सो नहीं पाई हैं। शोएब का इस महीने सानिया मिर्जा के साथ विवाह होने जा रहा है।
गौरतलब है कि सानिया के गृहनगर हैदराबाद की ही रहने वाली आयशा सिद्दिकी नाम की लड़की ने शोएब के साथ अपने निकाह का दावा किया है। उनके परिवार ने कल ही इस सिलसिले में निकाहनामे को मीडिया में जारी भी किया। इस बीच एक पाकिस्तानी चैनल ने शोएब की एक और गर्लफ्रेंड होने का खुलासा किया है।
30 मार्च के बाद आज पहली बार ट्विटर पर लौटीं सानिया ने कहा कि ऐसा केवल शादी के पहले की खुशी और उनके रिश्तदारों द्वारा की जा रही चर्चाओं के कारण नहीं है। उन्होंने कहा अभी उन्हें काफी कुछ करना है और अगले दिन फिर नए हालात का सामना करना है।
सानिया ने इससे घंटे भर पहले की ट्वीट में कहा यह कुछ ज्यादा ही हो रहा है। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मेरी मेंहदी के अलावा अपनी जिंदगी में मुझे किसी बात के लिए इतनी चिंता भी करना पड़ेगी। इन हालात पर हँसने के सिवाय मेरे पास कोई चारा नहीं है।
पाक व्यापारियों का डर : पाकिस्तानी व्यापारियों ने क्रिकेटर शोएब मलिक और भारतीय टेनिस स्टार सानिया मिर्जा की तस्वीरों वाली टीम शर्ट के पाँच लाख की राशि के ऑर्डर को इस डर से रद्द कर दिया कि कहीं विवादों के चलते उनकी शादी में देरी न हो जाए।
कराची ट्रेडर्स एक्शन कमेटी के अध्यक्ष सिद्दिकी मेमन ने चीन और थाईलैंड में इस तरह की टी-शर्ट का ऑर्डर दिया था, लेकिन उन्हें इस डर से यह रद्द करना पड़ा कहीं मलिक और आयशा सिद्दिकी के बीच कानूनी कार्रवाई से इस निकाह में देरी न हो जाए।
नींद गायब हो गई-सानिया
पाकिस्तानी क्रिकेटर शोएब मलिक से निकाह के ऐलान के बाद उनके लगातार विवादों में घिरने से भारतीय टेनिस परी सानिया मिर्जा की रातों की नींद उड़ गई है।
सानिया ने आज तड़के ट्विटर के जरिए कहा कि वे पूरी रात सो नहीं पाई हैं। शोएब का इस महीने सानिया मिर्जा के साथ विवाह होने जा रहा है।
गौरतलब है कि सानिया के गृहनगर हैदराबाद की ही रहने वाली आयशा सिद्दिकी नाम की लड़की ने शोएब के साथ अपने निकाह का दावा किया है। उनके परिवार ने कल ही इस सिलसिले में निकाहनामे को मीडिया में जारी भी किया। इस बीच एक पाकिस्तानी चैनल ने शोएब की एक और गर्लफ्रेंड होने का खुलासा किया है।
30 मार्च के बाद आज पहली बार ट्विटर पर लौटीं सानिया ने कहा कि ऐसा केवल शादी के पहले की खुशी और उनके रिश्तदारों द्वारा की जा रही चर्चाओं के कारण नहीं है। उन्होंने कहा अभी उन्हें काफी कुछ करना है और अगले दिन फिर नए हालात का सामना करना है।
सानिया ने इससे घंटे भर पहले की ट्वीट में कहा यह कुछ ज्यादा ही हो रहा है। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मेरी मेंहदी के अलावा अपनी जिंदगी में मुझे किसी बात के लिए इतनी चिंता भी करना पड़ेगी। इन हालात पर हँसने के सिवाय मेरे पास कोई चारा नहीं है।
पाक व्यापारियों का डर : पाकिस्तानी व्यापारियों ने क्रिकेटर शोएब मलिक और भारतीय टेनिस स्टार सानिया मिर्जा की तस्वीरों वाली टीम शर्ट के पाँच लाख की राशि के ऑर्डर को इस डर से रद्द कर दिया कि कहीं विवादों के चलते उनकी शादी में देरी न हो जाए।
कराची ट्रेडर्स एक्शन कमेटी के अध्यक्ष सिद्दिकी मेमन ने चीन और थाईलैंड में इस तरह की टी-शर्ट का ऑर्डर दिया था, लेकिन उन्हें इस डर से यह रद्द करना पड़ा कहीं मलिक और आयशा सिद्दिकी के बीच कानूनी कार्रवाई से इस निकाह में देरी न हो जाए।
स्वास्थ्य-सौन्दर्य
पूरी होगी जवाँ दिखने की हसरत
महिलाओं को अगर ताउम्र जवान रहना है और अपनी खूबसूरती को बरकरार रखना है तो रोजाना कसरत करने में अपना वक्त गुजारें। एक ताजा अध्ययन के मुताबिक यदि महिलाएँ खुद को ग्लैमरस, जवाँ और सेहतमंद बनाए रखना चाहती हैं तो सुबह-शाम महज कुत्ते टहलाना या मॉल की सैर करना काफी नहीं।
अध्ययन के नतीजे के मुताबिक ताउम्र जवाँ दिखने की चाहत रखने वाली महिलाओं को हर रोज एक घंटे की कसरत जरूर करनी चाहिए। यह सलाह खासतौर पर वैसी महिलाओं के लिए है जिनका वजन तो ज्यादा है लेकिन बावजूद इसके वह डायटिंग नहीं कर रहीं।
अधेड़ उम्र में कदम रख चुकी ओवरवेट महिलाओं को अपनी पूरी डाइट तो लेने की सलाह दी गई है लेकिन इसके साथ-साथ उन्हें ज्यादा कसरत करने की भी नसीहत इस अध्ययन के नतीजे से मिली है। ताजा अध्ययन की समीक्षा करने वाले जॉन फोरिट ने कहा कि हम सब को इस पर काम करना होगा।
अध्ययन में कसरत के जिन तरीकों के सुझाव दिए गए हैं उनमें हलका वॉक करना, साइकिल चलाना और गोल्फ खेलना शामिल है।
महिलाओं को अगर ताउम्र जवान रहना है और अपनी खूबसूरती को बरकरार रखना है तो रोजाना कसरत करने में अपना वक्त गुजारें। एक ताजा अध्ययन के मुताबिक यदि महिलाएँ खुद को ग्लैमरस, जवाँ और सेहतमंद बनाए रखना चाहती हैं तो सुबह-शाम महज कुत्ते टहलाना या मॉल की सैर करना काफी नहीं।
अध्ययन के नतीजे के मुताबिक ताउम्र जवाँ दिखने की चाहत रखने वाली महिलाओं को हर रोज एक घंटे की कसरत जरूर करनी चाहिए। यह सलाह खासतौर पर वैसी महिलाओं के लिए है जिनका वजन तो ज्यादा है लेकिन बावजूद इसके वह डायटिंग नहीं कर रहीं।
अधेड़ उम्र में कदम रख चुकी ओवरवेट महिलाओं को अपनी पूरी डाइट तो लेने की सलाह दी गई है लेकिन इसके साथ-साथ उन्हें ज्यादा कसरत करने की भी नसीहत इस अध्ययन के नतीजे से मिली है। ताजा अध्ययन की समीक्षा करने वाले जॉन फोरिट ने कहा कि हम सब को इस पर काम करना होगा।
अध्ययन में कसरत के जिन तरीकों के सुझाव दिए गए हैं उनमें हलका वॉक करना, साइकिल चलाना और गोल्फ खेलना शामिल है।
मिर्च-मसाला
जल्दी ही सामने आएँगी ऐश्वर्या राय
सिल्वर स्क्रीन से इन दिनों ऐश्वर्या रायAishwarya Rai sensational picture gallery गायब हैं। लगभग दो वर्ष से उनकी कोई फिल्म रिलीज नहीं हुई हैं। अपनी पसंदीदा हीरोइन की फिल्मों का इंतजार करते-करते उनके फैंस थक गए हैं।
अपने फैंस की भावनाओं से ऐश्वर्या भी अनजान नहीं हैं। उनका कहना है फिल्म का रिलीज होना या न होना उनके हाथ में नहीं होता। कई बार ऐसा हो जाता है जब किसी कलाकार की लंबे समय तक कोई फिल्म रिलीज नहीं होती है और कई बार एक ही वर्ष में वह ढेर सारी फिल्मों में वह नजर आता है।
फिल्म ‘रावण’ ने ऐश का लंबा समय लिया। कई दुर्गम स्थानों पर इसे शूट किया गया जिससे काम की रफ्तार धीमी हो गई, लेकिन ऐश को इससे शिकायत नहीं हैं। मणिरत्नम के साथ फिल्म करना उन्हें आनंददायी लगता है।
वैसे ऐश के प्रशंसकों को उनकी फिल्मों का ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ेगा। हो सकता है कि इसी वर्ष उनकी तीन फिल्में रिलीज हो जाए। सबसे पहले ‘रावण’ जुलाई में प्रदर्शित होगी। जिसमें उनके नायक हैं अभिषेक बच्चन।
अक्षय कुमार के साथ की गई फिल्म ‘एक्शन रिप्ले’ भी इसी वर्ष रिलीज होगी, जिसमें ऐश कॉमेडी करते हुए नजर आएँगी। संजय लीला भंसाली की ‘गुजारिश’ में ऐश्वर्या नर्स बनी हैं जो मरीज बने रितिक रोशन की देखभाल करती हैं।
ऐश का कहना है कि उनकी आने वाली फिल्मों में कोई समानताएँ नहीं हैं। न कहानी में और न ही रोल में। निश्चित रूप से यह बात उनके प्रशंसकों को अच्छी लगेगी।
आमिर पेश करेंगे ‘केबीसी’!
कौन बनेगा करोड़पति भारतीय टीवी इतिहास के सफलतम कार्यक्रमों में से एक रहा है। अमिताभ बच्चन और शाहरुख जैसे सुपरस्टार्स ने इसे पेश किया है। लोगों ने लाखों रुपए इस कार्यक्रम के जरिये जीते।
अमिताभ केबीसी प्रथम और द्वितीय तथा शाहरुख खान ने इस कार्यक्रम का तीसरा भाग प्रस्तुत किया। अब केबीसी के चौथे भाग की बारी है। इसे कौन पेश करेगा? अमिताभ अपने स्वास्थ्य को देखते हुए पहले ही इस शो के लिए मना कर चुके हैं। इस कार्यक्रम की लगातार शूटिंग की जाती है, जो अमिताभ के लिए अब संभव नहीं है। शाहरुख खान अपना शौक पूरा कर चुके हैं।
इस शो को होस्ट करने के लिए अमिताभ और शाहरुख जैसी हस्ती के नाम पर विचार किया गया और आमिर खान का नाम सबसे पहले सामने आया। आमिर खान ठहरे परफेक्शनिस्ट। बहुत सोच-विचारकर ही वे हाँ बोलते हैं और हाँ बोलने के बाद डूबकर काम करते हैं।
सूत्रों का कहना है कि आमिर से बात चल रही है और आमिर ने अब तक कोई जवाब नहीं दिया है। वैसे ज्यादातर लोग चाहते हैं कि आमिर ही इस कार्यक्रम को पेश करें।
गिटार बजाना सीख रहे हैं रणबीर
रणबीर कपूर मानते हैं कि सफलता ने प्रशंसकों के प्रति उनकी जिम्मेदारी को और बढ़ा दिया है। फैंस की अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए रणबीर अब और मेहनत करने लगे हैं।
इम्तियाज अली की फिल्म ‘रॉकस्टार’ की शूटिंग अभी तो शुरू नहीं हुई है, लेकिन रणबीर ने अभी से मेहनत शुरू कर दी है। वे गिटार बजाना सीख रहे हैं ताकि सचमुच में रॉकस्टार नजर आएँ। अपने लुक पर भी उन्होंने ध्यान देना शुरू कर दिया है।
रणबीर का कहना है अब जमाना बदल गया है। दर्शक ज्यादा बारीकी से फिल्म देखने लगे हैं। विश्वसनीयता पैदा करने के लिए अब बहुत सारी चीजें सीखना पड़ती हैं।
सिल्वर स्क्रीन से इन दिनों ऐश्वर्या रायAishwarya Rai sensational picture gallery गायब हैं। लगभग दो वर्ष से उनकी कोई फिल्म रिलीज नहीं हुई हैं। अपनी पसंदीदा हीरोइन की फिल्मों का इंतजार करते-करते उनके फैंस थक गए हैं।
अपने फैंस की भावनाओं से ऐश्वर्या भी अनजान नहीं हैं। उनका कहना है फिल्म का रिलीज होना या न होना उनके हाथ में नहीं होता। कई बार ऐसा हो जाता है जब किसी कलाकार की लंबे समय तक कोई फिल्म रिलीज नहीं होती है और कई बार एक ही वर्ष में वह ढेर सारी फिल्मों में वह नजर आता है।
फिल्म ‘रावण’ ने ऐश का लंबा समय लिया। कई दुर्गम स्थानों पर इसे शूट किया गया जिससे काम की रफ्तार धीमी हो गई, लेकिन ऐश को इससे शिकायत नहीं हैं। मणिरत्नम के साथ फिल्म करना उन्हें आनंददायी लगता है।
वैसे ऐश के प्रशंसकों को उनकी फिल्मों का ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ेगा। हो सकता है कि इसी वर्ष उनकी तीन फिल्में रिलीज हो जाए। सबसे पहले ‘रावण’ जुलाई में प्रदर्शित होगी। जिसमें उनके नायक हैं अभिषेक बच्चन।
अक्षय कुमार के साथ की गई फिल्म ‘एक्शन रिप्ले’ भी इसी वर्ष रिलीज होगी, जिसमें ऐश कॉमेडी करते हुए नजर आएँगी। संजय लीला भंसाली की ‘गुजारिश’ में ऐश्वर्या नर्स बनी हैं जो मरीज बने रितिक रोशन की देखभाल करती हैं।
ऐश का कहना है कि उनकी आने वाली फिल्मों में कोई समानताएँ नहीं हैं। न कहानी में और न ही रोल में। निश्चित रूप से यह बात उनके प्रशंसकों को अच्छी लगेगी।
आमिर पेश करेंगे ‘केबीसी’!
कौन बनेगा करोड़पति भारतीय टीवी इतिहास के सफलतम कार्यक्रमों में से एक रहा है। अमिताभ बच्चन और शाहरुख जैसे सुपरस्टार्स ने इसे पेश किया है। लोगों ने लाखों रुपए इस कार्यक्रम के जरिये जीते।
अमिताभ केबीसी प्रथम और द्वितीय तथा शाहरुख खान ने इस कार्यक्रम का तीसरा भाग प्रस्तुत किया। अब केबीसी के चौथे भाग की बारी है। इसे कौन पेश करेगा? अमिताभ अपने स्वास्थ्य को देखते हुए पहले ही इस शो के लिए मना कर चुके हैं। इस कार्यक्रम की लगातार शूटिंग की जाती है, जो अमिताभ के लिए अब संभव नहीं है। शाहरुख खान अपना शौक पूरा कर चुके हैं।
इस शो को होस्ट करने के लिए अमिताभ और शाहरुख जैसी हस्ती के नाम पर विचार किया गया और आमिर खान का नाम सबसे पहले सामने आया। आमिर खान ठहरे परफेक्शनिस्ट। बहुत सोच-विचारकर ही वे हाँ बोलते हैं और हाँ बोलने के बाद डूबकर काम करते हैं।
सूत्रों का कहना है कि आमिर से बात चल रही है और आमिर ने अब तक कोई जवाब नहीं दिया है। वैसे ज्यादातर लोग चाहते हैं कि आमिर ही इस कार्यक्रम को पेश करें।
गिटार बजाना सीख रहे हैं रणबीर
रणबीर कपूर मानते हैं कि सफलता ने प्रशंसकों के प्रति उनकी जिम्मेदारी को और बढ़ा दिया है। फैंस की अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए रणबीर अब और मेहनत करने लगे हैं।
इम्तियाज अली की फिल्म ‘रॉकस्टार’ की शूटिंग अभी तो शुरू नहीं हुई है, लेकिन रणबीर ने अभी से मेहनत शुरू कर दी है। वे गिटार बजाना सीख रहे हैं ताकि सचमुच में रॉकस्टार नजर आएँ। अपने लुक पर भी उन्होंने ध्यान देना शुरू कर दिया है।
रणबीर का कहना है अब जमाना बदल गया है। दर्शक ज्यादा बारीकी से फिल्म देखने लगे हैं। विश्वसनीयता पैदा करने के लिए अब बहुत सारी चीजें सीखना पड़ती हैं।
क्रिकेट की आत्मा
खेल के दिल-दिमाग पर मुनाफे का भूत
आत्मा ही परमात्मा है और आत्मा के बिना शरीर का कोई महत्व नहीं हो सकता लेकिन धंधे, मुनाफे और मनोरंजन के चक्कर में क्रिकेट की आत्मा को पीट-पीट कर खत्म किया जा रहा है।
वास्तव में भूत का कोई अस्तित्व नहीं होता। बस, दिल-दिमाग को भ्रमित कर भटकाने की प्रक्रिया को भूत समझा-कहा जा सकता है। भटकाने वाला ऐसा ही भूत भारत में क्रिकेट के मठाधीशों के दिल-दिमाग पर चढ़ गया है और वे खेल को ही नहीं, पूरे देश को मायावी जाल में भटका रहे हैं।
भारत के खेल मंत्री मनोहरसिंह गिल कोई गँवार राजनेता नहीं हैं। वे जिंदगी भर प्रशासनिक अनुभव पाने के साथ निष्पक्ष निर्वाचन आयोग के कर्ता-धर्ता रहे हैं। केंद्र सरकार में उद्योग सचिव रहने के कारण वे धंधे का खेल भी अच्छी तरह समझते हैं।
सबसे बड़ी बात यह है कि वे स्वयं क्रिकेट के अच्छे खिलाड़ी रहे हैं और इस खेल के प्रति उनका कोई दुराग्रह नहीं हो सकता। इसलिए इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के संबंध में खुलकर की गई उनकी टिप्पणियों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए।
गिल साहब ने हाल ही में देश को समझाने की कोशिश की है कि आईपीएल तो बस धंधा है और भारत के लिए गौरवशाली खेल माने जाने वाले क्रिकेट की असली गरिमा और परंपरा से इसका कोई लेना-देना नहीं है। यह तमाशा क्रिकेट की आत्मा को नुकसान पहुँचा रहा है।
क्रिकेट को केवल मनोरंजन और धंधे की तरह इस्तेमाल किए जाने ने गेंदबाजों और बल्लेबाजों का संतुलन ही बिगाड़ दिया है। धंधा करने वाले डेढ़ घंटे के 20 ओवरों को कभी 5 या कभी 1 ओवर तक सीमित कर क्रिकेट का सत्यानाश ही कर देंगे।
निश्चित रूप से भारत में क्रिकेट का गौरवशाली इतिहास रहा है। श्रेष्ठतम खिलाड़ियों के बल पर भारत ने दुनिया के दिग्गज ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, दक्षिण अफ्रीका के छक्के छुड़ा दिए हैं। महानगरों से सुदूर गाँवों तक क्रिकेट खेल के रूप में बेहद लोकप्रिय हुआ है।
पिछले 40 वर्षों की प्रिंट पत्रकारिता के इतिहास में भी क्रिकेट विशेषांक सबसे अधिक बिके और पढ़े गए। पत्र-पत्रिकाओं ने क्रिकेट को प्रतिष्ठित किया। इलेक्ट्रॉनिक संचार माध्यमों की क्रांति के बाद पिछले वर्षों के दौरान टीवी के समाचार चैनलों ने इसकी लोकप्रियता बढ़ाई।
फिर टीवी के खेल चैनलों की चमक में बढ़ोतरी हुई। उदार अर्थव्यवस्था ने विदेशी कंपनियों को भी क्रिकेट से लाभ कमाने के अच्छे अवसर दे दिए। दूसरी तरफ भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड का कारोबार बढ़ने के साथ चालाक राजनीतिज्ञों और धंधेबाजों ने क्रिकेट में जमकर घोटाले किए। घोटाले करने वालों के बीच घमासान जारी रहा और कुछ चतुर धंधेबाजों ने आईपीएल का नया जाल बिछा दिया। उन्हें खेल से नहीं, मनोरंजन के धंधे से अरबों रुपयों के मुनाफे की चिंता है।
देश के भोले-भाले लोगों को संभवतः पता ही नहीं होगा कि आईपीएल उद्योग का कारोबार लगभग 1800 अरब रुपयों का है। अकेले सोनी टीवी ने एक सीजन में आईपीएल मैचों के साथ विज्ञापन के जरिए करीब 700 करोड़ रुपए कमाए।
मैदान में गेंद उछलने या बल्ला उठाने के 10 सेकंड के दृश्य पर 5 लाख रुपए की कमाई। दुनिया का कोई उद्योगपति किसी भी उद्योग-धंधे से कुछ सेकंड और मिनटों में इस गति से कमाई नहीं कर सकता है।
मैदान में आईपीएल का एक मैच देखने आने वाले दर्शकों से आयोजक अभी 15 से 20 करोड़ रुपए कमा लेते हैं और उम्मीद है कि यह राशि जल्द ही 40 करोड़ रुपए हो जाएगी। मैच के प्रायोजक 17 से 20 करोड़ रुपए लगा देते हैं। सिनेमा हॉल में मैच दिखाने से आईपीएल का आयोजक 330 करोड़ रुपए कमाएगा। इंटरनेट पर खेल की प्रस्तुति पर लगभग 315 करोड़ रुपए की आमदनी करेगा।
सिने अवॉर्ड की तरह आईपीएल अवॉर्ड, रॉक स्टार जैसे प्रदर्शनों से 100 करोड़ रुपए की कमाई होगी। यही कारण है कि उद्योगपति, व्यापारी, फिल्मी सितारे आईपीएल के कारोबार में अग्रणी हो गए हैं।
यह ग्लैमर का बड़ा तड़का है। फिल्मी अभिनेता-अभिनेत्री महीनों अभिनय करके एक फिल्म से पूरे साल में 10 से 15 करोड़ रुपए कमा सकते हैं, लेकिन आईपीएल मैच से तो साल में दो-तीन सौ करोड़ रुपए कमाने की गुंजाइश बन गई है।
खुद को न नाचना है, न गाना है और न ही पसीना बहाना है। किराए पर लिए गए क्रिकेट खिलाड़ियों से मैदान में बस शो करवाते हुए तालियाँ बजाकर पार्टियाँ करना है।
क्रिकेट के अंतरराष्ट्रीय नियम-कानून और खेल के अपने मानदंड रहे हैं। लेकिन भारतीय ठेकेदारों ने सबको ताक पर रखकर तोड़े-मरोड़े अपने नियम तय कर दिए हैं। मैदान की बाउंड्री लाइन तक छोटी कर दी है। मंगूस बल्ले का प्रचलन चला दिया है।
आत्मा ही परमात्मा है और आत्मा के बिना शरीर का कोई महत्व नहीं हो सकता लेकिन धंधे, मुनाफे और मनोरंजन के चक्कर में क्रिकेट की आत्मा को पीट-पीट कर खत्म किया जा रहा है।
वास्तव में भूत का कोई अस्तित्व नहीं होता। बस, दिल-दिमाग को भ्रमित कर भटकाने की प्रक्रिया को भूत समझा-कहा जा सकता है। भटकाने वाला ऐसा ही भूत भारत में क्रिकेट के मठाधीशों के दिल-दिमाग पर चढ़ गया है और वे खेल को ही नहीं, पूरे देश को मायावी जाल में भटका रहे हैं।
भारत के खेल मंत्री मनोहरसिंह गिल कोई गँवार राजनेता नहीं हैं। वे जिंदगी भर प्रशासनिक अनुभव पाने के साथ निष्पक्ष निर्वाचन आयोग के कर्ता-धर्ता रहे हैं। केंद्र सरकार में उद्योग सचिव रहने के कारण वे धंधे का खेल भी अच्छी तरह समझते हैं।
सबसे बड़ी बात यह है कि वे स्वयं क्रिकेट के अच्छे खिलाड़ी रहे हैं और इस खेल के प्रति उनका कोई दुराग्रह नहीं हो सकता। इसलिए इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के संबंध में खुलकर की गई उनकी टिप्पणियों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए।
गिल साहब ने हाल ही में देश को समझाने की कोशिश की है कि आईपीएल तो बस धंधा है और भारत के लिए गौरवशाली खेल माने जाने वाले क्रिकेट की असली गरिमा और परंपरा से इसका कोई लेना-देना नहीं है। यह तमाशा क्रिकेट की आत्मा को नुकसान पहुँचा रहा है।
क्रिकेट को केवल मनोरंजन और धंधे की तरह इस्तेमाल किए जाने ने गेंदबाजों और बल्लेबाजों का संतुलन ही बिगाड़ दिया है। धंधा करने वाले डेढ़ घंटे के 20 ओवरों को कभी 5 या कभी 1 ओवर तक सीमित कर क्रिकेट का सत्यानाश ही कर देंगे।
निश्चित रूप से भारत में क्रिकेट का गौरवशाली इतिहास रहा है। श्रेष्ठतम खिलाड़ियों के बल पर भारत ने दुनिया के दिग्गज ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, दक्षिण अफ्रीका के छक्के छुड़ा दिए हैं। महानगरों से सुदूर गाँवों तक क्रिकेट खेल के रूप में बेहद लोकप्रिय हुआ है।
पिछले 40 वर्षों की प्रिंट पत्रकारिता के इतिहास में भी क्रिकेट विशेषांक सबसे अधिक बिके और पढ़े गए। पत्र-पत्रिकाओं ने क्रिकेट को प्रतिष्ठित किया। इलेक्ट्रॉनिक संचार माध्यमों की क्रांति के बाद पिछले वर्षों के दौरान टीवी के समाचार चैनलों ने इसकी लोकप्रियता बढ़ाई।
फिर टीवी के खेल चैनलों की चमक में बढ़ोतरी हुई। उदार अर्थव्यवस्था ने विदेशी कंपनियों को भी क्रिकेट से लाभ कमाने के अच्छे अवसर दे दिए। दूसरी तरफ भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड का कारोबार बढ़ने के साथ चालाक राजनीतिज्ञों और धंधेबाजों ने क्रिकेट में जमकर घोटाले किए। घोटाले करने वालों के बीच घमासान जारी रहा और कुछ चतुर धंधेबाजों ने आईपीएल का नया जाल बिछा दिया। उन्हें खेल से नहीं, मनोरंजन के धंधे से अरबों रुपयों के मुनाफे की चिंता है।
देश के भोले-भाले लोगों को संभवतः पता ही नहीं होगा कि आईपीएल उद्योग का कारोबार लगभग 1800 अरब रुपयों का है। अकेले सोनी टीवी ने एक सीजन में आईपीएल मैचों के साथ विज्ञापन के जरिए करीब 700 करोड़ रुपए कमाए।
मैदान में गेंद उछलने या बल्ला उठाने के 10 सेकंड के दृश्य पर 5 लाख रुपए की कमाई। दुनिया का कोई उद्योगपति किसी भी उद्योग-धंधे से कुछ सेकंड और मिनटों में इस गति से कमाई नहीं कर सकता है।
मैदान में आईपीएल का एक मैच देखने आने वाले दर्शकों से आयोजक अभी 15 से 20 करोड़ रुपए कमा लेते हैं और उम्मीद है कि यह राशि जल्द ही 40 करोड़ रुपए हो जाएगी। मैच के प्रायोजक 17 से 20 करोड़ रुपए लगा देते हैं। सिनेमा हॉल में मैच दिखाने से आईपीएल का आयोजक 330 करोड़ रुपए कमाएगा। इंटरनेट पर खेल की प्रस्तुति पर लगभग 315 करोड़ रुपए की आमदनी करेगा।
सिने अवॉर्ड की तरह आईपीएल अवॉर्ड, रॉक स्टार जैसे प्रदर्शनों से 100 करोड़ रुपए की कमाई होगी। यही कारण है कि उद्योगपति, व्यापारी, फिल्मी सितारे आईपीएल के कारोबार में अग्रणी हो गए हैं।
यह ग्लैमर का बड़ा तड़का है। फिल्मी अभिनेता-अभिनेत्री महीनों अभिनय करके एक फिल्म से पूरे साल में 10 से 15 करोड़ रुपए कमा सकते हैं, लेकिन आईपीएल मैच से तो साल में दो-तीन सौ करोड़ रुपए कमाने की गुंजाइश बन गई है।
खुद को न नाचना है, न गाना है और न ही पसीना बहाना है। किराए पर लिए गए क्रिकेट खिलाड़ियों से मैदान में बस शो करवाते हुए तालियाँ बजाकर पार्टियाँ करना है।
क्रिकेट के अंतरराष्ट्रीय नियम-कानून और खेल के अपने मानदंड रहे हैं। लेकिन भारतीय ठेकेदारों ने सबको ताक पर रखकर तोड़े-मरोड़े अपने नियम तय कर दिए हैं। मैदान की बाउंड्री लाइन तक छोटी कर दी है। मंगूस बल्ले का प्रचलन चला दिया है।
शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010
गीत-गंगा
न जाने कौन ये आवाज देता है...
देखा जाए तो सी. अर्जुन मात्र इस एक गीत के कारण कालजयी माने जा सकते हैं, जिसका मुखड़ा हमने इस आलेख के शीर्षक के रूप में दिया है। ऐसा बहुत कम होता है कि किसी गीत में काव्यात्मक गुणवत्ता, धुन की मिठास और विलक्षणता, संगीत की उदात्त योजना और गायन की खपसूरती सभी कुछ अव्वल दर्जे का हो। इस गीत में इंदीवर की कलम जो चमत्कार करती है। वैसा ही चमत्कार अर्जुन की धुन और आशा का गायन भी करते हैं। सब तरफ से पुष्ट, परिपूर्ण और अनोखेपन की हद को छूता गीत है यह!
नैनों में प्यार डोले दिल का करार डोले.....
पानी से बहते कोमल फ्लो में जब लता 'पिया' शब्द को उठाती हैं तो मन एक साथ बीजगुप्त और देवदास हो जाता है। समझ नहीं आता, लता को प्यार किया जाए या उस पात्र को जिसे लता गढ़ती हैं। इस गीत ने परदे पर नलिनी जयवंत के सौंदर्य को भी सात्विक बना दिया था और हमारी कामुकता पर गंगाजल से गीली दस्ती फेर दी थी। लता की यही देन है देश को, कि उन्होंने अपने गायन द्वारा पावनता का माहौल गढ़ा। यह दिव्य शुचिता न आशा में आई, न गीता में और न लता की सीनियर नूरजहाँ में! लता के गीत नारीदेह बन जाते!
चाँद आहें भरेगा फूल दिल थाम लेंगे...
मुकेश की गंभीर, दानेदार और निर्मल आवाज वीराने में, झुलसे फूलों की लड़ी, खड़ी करती जाती है, जबकि गीत का अर्थ और धुन हर्ष की माँग करते हैं। यानी इस 'अदरवाइज रोमांटिक' गीत में मुकेश की टीसभरी गायिकी प्रफुल्लता के बजाय उदासी का माहौल गढ़ती है। ...और ऐसा इसलिए कि अलभ्य और अनुपम सौंदर्य (किसी नारी का) तटस्थीभूत प्रेमी में खुशी के बजाय सहर्ष स्वीकारी हुई वेदना को ही सघन करता है।
होऽऽऽ धन्नो की आँखों में, हाँ, रात का सुरमा...
'धन्नो की आँखों में' गीत फिल्म 'किताब' का है। 'किताब' सन् 78 की फिल्म है। इस गीत की धुन और वाद्य संगीत इतना अनोखा, कल्पनाप्रधान और दिल को छू जाने वाला है कि... आप इस अहसास से गुजरते हैं... कि न ऐसी धुन पहले कभी सुनी और न ऐसा विचित्र गीत पहले कभी पढ़ा। 'विलक्षण'- बस एक यही शब्द कहा जा सकता है इस गीत के सभी पहलुओं के बारे में। ...गीत को स्वयं इसके संगीतकार आर.डी. बर्मन ने गाया है। धुन और गायन दोनों में फेंटसी का टच है। एक अजीब ढंग से गाया गया यह गीत... किसी अन्य लोक में खड़े ऐसे बूढ़े का अहसास कराता है... जो, पहाड़ की चोटी पर खड़ा होकर, चर्खी (मेले वगैरह में खिलौने वालों के पास मिलने वाला बच्चों का एक खिलौना, जिसे गोल-गोल घुमाने पर मिट्ठू के चीखने जैसी आवाज आती है) घुमाते हुए, रहस्य पुरुष की तरह, यह गीत गा रहा है और अदृश्य बालक उसकी गोद में है।
देखा जाए तो सी. अर्जुन मात्र इस एक गीत के कारण कालजयी माने जा सकते हैं, जिसका मुखड़ा हमने इस आलेख के शीर्षक के रूप में दिया है। ऐसा बहुत कम होता है कि किसी गीत में काव्यात्मक गुणवत्ता, धुन की मिठास और विलक्षणता, संगीत की उदात्त योजना और गायन की खपसूरती सभी कुछ अव्वल दर्जे का हो। इस गीत में इंदीवर की कलम जो चमत्कार करती है। वैसा ही चमत्कार अर्जुन की धुन और आशा का गायन भी करते हैं। सब तरफ से पुष्ट, परिपूर्ण और अनोखेपन की हद को छूता गीत है यह!
नैनों में प्यार डोले दिल का करार डोले.....
पानी से बहते कोमल फ्लो में जब लता 'पिया' शब्द को उठाती हैं तो मन एक साथ बीजगुप्त और देवदास हो जाता है। समझ नहीं आता, लता को प्यार किया जाए या उस पात्र को जिसे लता गढ़ती हैं। इस गीत ने परदे पर नलिनी जयवंत के सौंदर्य को भी सात्विक बना दिया था और हमारी कामुकता पर गंगाजल से गीली दस्ती फेर दी थी। लता की यही देन है देश को, कि उन्होंने अपने गायन द्वारा पावनता का माहौल गढ़ा। यह दिव्य शुचिता न आशा में आई, न गीता में और न लता की सीनियर नूरजहाँ में! लता के गीत नारीदेह बन जाते!
चाँद आहें भरेगा फूल दिल थाम लेंगे...
मुकेश की गंभीर, दानेदार और निर्मल आवाज वीराने में, झुलसे फूलों की लड़ी, खड़ी करती जाती है, जबकि गीत का अर्थ और धुन हर्ष की माँग करते हैं। यानी इस 'अदरवाइज रोमांटिक' गीत में मुकेश की टीसभरी गायिकी प्रफुल्लता के बजाय उदासी का माहौल गढ़ती है। ...और ऐसा इसलिए कि अलभ्य और अनुपम सौंदर्य (किसी नारी का) तटस्थीभूत प्रेमी में खुशी के बजाय सहर्ष स्वीकारी हुई वेदना को ही सघन करता है।
होऽऽऽ धन्नो की आँखों में, हाँ, रात का सुरमा...
'धन्नो की आँखों में' गीत फिल्म 'किताब' का है। 'किताब' सन् 78 की फिल्म है। इस गीत की धुन और वाद्य संगीत इतना अनोखा, कल्पनाप्रधान और दिल को छू जाने वाला है कि... आप इस अहसास से गुजरते हैं... कि न ऐसी धुन पहले कभी सुनी और न ऐसा विचित्र गीत पहले कभी पढ़ा। 'विलक्षण'- बस एक यही शब्द कहा जा सकता है इस गीत के सभी पहलुओं के बारे में। ...गीत को स्वयं इसके संगीतकार आर.डी. बर्मन ने गाया है। धुन और गायन दोनों में फेंटसी का टच है। एक अजीब ढंग से गाया गया यह गीत... किसी अन्य लोक में खड़े ऐसे बूढ़े का अहसास कराता है... जो, पहाड़ की चोटी पर खड़ा होकर, चर्खी (मेले वगैरह में खिलौने वालों के पास मिलने वाला बच्चों का एक खिलौना, जिसे गोल-गोल घुमाने पर मिट्ठू के चीखने जैसी आवाज आती है) घुमाते हुए, रहस्य पुरुष की तरह, यह गीत गा रहा है और अदृश्य बालक उसकी गोद में है।
मिर्च-मसाला
राखी-इश्क ने सेंसर के खिलाफ लड़ाई जीती
आखिरकार राखी सावंत और इश्क बैक्टर सेंसर के खिलाफ लड़ाई जीतने में सफल रहे। यह झगड़ा उस समय खत्म हुआ जब सेंसर की रिवाइजिंग कमेटी ने उनके म्यूजिक वीडियो ‘भूत’ में आए ‘कमीने’ शब्द पर से बैन हटा लिया। यह ‘झगड़े’ नामक एलबम का गाना है।
गौरतलब है कि बोर्ड ने ‘कमीने’ शब्द को इस म्यूजिक वीडियो में से हटाने के लिए कहा था और इसके खिलाफ इश्क और राखी ने लड़ाई लड़ी।
बैन हटने के बावजूद इश्क का गुस्सा ठंडा नहीं हुआ। उबलते हुए वे कहते हैं ‘सेंसर बोर्ड में सनकी और पुरानी सोच वाले लोग बैठे हुए हैं। वे ‘कमीने’ नामक पूरी फिल्म पास कर सकते हैं। ऐसे लाखों संवाद पास कर देते हैं जिनमें ‘कमीने’ शब्द आया है, लेकिन मेरे गीत में आए 'कमीने' शब्द पर उन्होंने पाबंदी लगा दी थी।
शाहिद से लंबी सोनम
कई नामों पर विचार करने के बाद पंकज कपूर ने अपनी फिल्म ‘मौसम’ के लिए सोनम कपूर को चुना। वे उनके बेटे शाहिद की हीरोइन बनेंगी। लेकिन पिछले दिनों एक ऐसी बात सामने आई, जिसके बारे में किसी ने सोचा भी नहीं था।
‘मौसम’ की यूनिट इस बात पर हैरान रह गई कि सोनम कपूर की ऊँचाई शाहिद कपूर से ज्यादा है। लेकिन इससे फिल्म पर कोई असर नहीं पड़ेगा। शूटिंग इस तरह से की जाएगी कि फिल्म में यह बात दर्शक पकड़ नहीं पाएँगे। लेकिन यूनिट के लोगों को शाहिद को चिढ़ाने का एक कारण मिल गया है।
‘मौसम’ एक रोमांटिक फिल्म है और इसमें सोनम कश्मीरी लड़की का रोल निभाएँगी। इस फिल्म की शूटिंग जल्दी ही आरंभ होने वाली है।
जब चौंक पड़ी नीतू
’अपार्टमेंट’ के एक सीन में नीतू को बेडरुम की लाइट चालू कर चौंकना था। निर्देशक जगमोहन मूँदड़ा ने नीतू को सच में चौंकाने का फैसला किया। नीतू ने स्विच दबाया और सचमुच में चौंक पड़ीं क्योंकि सामने उनकी माँ खड़ी थीं। नीतू की माँ मुंबई में नहीं रहती हैं और उन्हें पता भी नहीं था कि कब वे हाँ आ गईं। यह मूँदड़ा का प्लान था और उन्हें नीतू का स्वाभाविक शॉट मिल गया।
ट्रैफिक सिग्नल, 13 बी और रण जैसी फिल्म कर चुकीं नीतू फिल्म ‘अपार्टमेंट’ को लेकर काफी आशान्वित हैं। इस फिल्म में वे ऐसी लड़की की भूमिका निभा रही हैं जो मानसिक रूप से परेशान है। वह मुंबई जैसे बड़े शहर से तालमेल बैठाने की कोशिश करती है।
नीतू का कहना है कि उन्होंने इस रोल के लिए काफी मेहनत की है और आवश्यक तैयारी कैमरे के सामने आने के पहले की। उन्हें यह कैरेक्टर अपने जैसे लगता है क्योंकि वे भी पटना से मुंबई आईं और इस शहर को उन्होंने नजदीक से जाना।
आखिरकार राखी सावंत और इश्क बैक्टर सेंसर के खिलाफ लड़ाई जीतने में सफल रहे। यह झगड़ा उस समय खत्म हुआ जब सेंसर की रिवाइजिंग कमेटी ने उनके म्यूजिक वीडियो ‘भूत’ में आए ‘कमीने’ शब्द पर से बैन हटा लिया। यह ‘झगड़े’ नामक एलबम का गाना है।
गौरतलब है कि बोर्ड ने ‘कमीने’ शब्द को इस म्यूजिक वीडियो में से हटाने के लिए कहा था और इसके खिलाफ इश्क और राखी ने लड़ाई लड़ी।
बैन हटने के बावजूद इश्क का गुस्सा ठंडा नहीं हुआ। उबलते हुए वे कहते हैं ‘सेंसर बोर्ड में सनकी और पुरानी सोच वाले लोग बैठे हुए हैं। वे ‘कमीने’ नामक पूरी फिल्म पास कर सकते हैं। ऐसे लाखों संवाद पास कर देते हैं जिनमें ‘कमीने’ शब्द आया है, लेकिन मेरे गीत में आए 'कमीने' शब्द पर उन्होंने पाबंदी लगा दी थी।
शाहिद से लंबी सोनम
कई नामों पर विचार करने के बाद पंकज कपूर ने अपनी फिल्म ‘मौसम’ के लिए सोनम कपूर को चुना। वे उनके बेटे शाहिद की हीरोइन बनेंगी। लेकिन पिछले दिनों एक ऐसी बात सामने आई, जिसके बारे में किसी ने सोचा भी नहीं था।
‘मौसम’ की यूनिट इस बात पर हैरान रह गई कि सोनम कपूर की ऊँचाई शाहिद कपूर से ज्यादा है। लेकिन इससे फिल्म पर कोई असर नहीं पड़ेगा। शूटिंग इस तरह से की जाएगी कि फिल्म में यह बात दर्शक पकड़ नहीं पाएँगे। लेकिन यूनिट के लोगों को शाहिद को चिढ़ाने का एक कारण मिल गया है।
‘मौसम’ एक रोमांटिक फिल्म है और इसमें सोनम कश्मीरी लड़की का रोल निभाएँगी। इस फिल्म की शूटिंग जल्दी ही आरंभ होने वाली है।
जब चौंक पड़ी नीतू
’अपार्टमेंट’ के एक सीन में नीतू को बेडरुम की लाइट चालू कर चौंकना था। निर्देशक जगमोहन मूँदड़ा ने नीतू को सच में चौंकाने का फैसला किया। नीतू ने स्विच दबाया और सचमुच में चौंक पड़ीं क्योंकि सामने उनकी माँ खड़ी थीं। नीतू की माँ मुंबई में नहीं रहती हैं और उन्हें पता भी नहीं था कि कब वे हाँ आ गईं। यह मूँदड़ा का प्लान था और उन्हें नीतू का स्वाभाविक शॉट मिल गया।
ट्रैफिक सिग्नल, 13 बी और रण जैसी फिल्म कर चुकीं नीतू फिल्म ‘अपार्टमेंट’ को लेकर काफी आशान्वित हैं। इस फिल्म में वे ऐसी लड़की की भूमिका निभा रही हैं जो मानसिक रूप से परेशान है। वह मुंबई जैसे बड़े शहर से तालमेल बैठाने की कोशिश करती है।
नीतू का कहना है कि उन्होंने इस रोल के लिए काफी मेहनत की है और आवश्यक तैयारी कैमरे के सामने आने के पहले की। उन्हें यह कैरेक्टर अपने जैसे लगता है क्योंकि वे भी पटना से मुंबई आईं और इस शहर को उन्होंने नजदीक से जाना।
अप्रैल माह के त्योहार
1 अप्रैल मूर्ख दि. प्रथम वैशाख कृष्ण तृतीया (3)
2 अप्रैल संकष्टी गणेश चतुर्थी (चंद्रो.रा. 9.53) गुड फ्रायडे प्रथम वैशाख कृष्ण चतुर्थी (4)
3 अप्रैल प्रथम वैशाख कृष्ण पंचमी (5)
4 अप्रैल ईस्टर संडे प्रथम वैशाख कृष्ण षष्ठी (6)
5 अप्रैल प्रथम वैशाख कृष्ण सप्तमी (7)
6 अप्रैल प्रथम वैशाख कृष्ण अष्टमी (8)
7 अप्रैल विश्व स्वास्थ्य दि. प्रथम वैशाख कृष्ण नवमी (9)
8 अप्रैल प्रथम वैशाख कृष्ण नवमी (9)
9 अप्रैल पंचक प्रारंभ (शाम 07.09) प्रथम वैशाख कृष्ण दशमी (10)
10 अप्रैल वरुथिनी एकादशी वल्लभाचार्य ज. प्रथम वैशाख कृष्ण एकादशी (11)
11 अप्रैल प्रदोष व्रत संत सेन ज. प्रथम वैशाख कृष्ण द्वादशी (12)
12 अप्रैल शिव चतुर्दशी प्रथम वैशाख कृष्ण त्रयोदशी (13)
13 अप्रैल जलियाँवाला बाग दि. प्रथम वैशाख कृष्ण चतुर्दशी (14)
14 अप्रैल वैशाखी पर्व, अमावस्या, पंचक, खरमास समाप्त (दिन 4.53) आम्बेडकर ज., अग्नि शामक दि. प्रथम वैशाख कृष्ण अमावस्या (15)
15 अप्रैल चंद्रदर्शन, सौर मास वैशाख प्रा. पुरुषोत्तम मास प्रा. प्रथम वैशाख शुक्ल एकम (1)
16 अप्रैल प्रथम वैशाख शुक्ल द्वितीया (2)
17 अप्रैल डॉ. राधाकृष्णन दि. प्रथम वैशाख शुक्ल तृतीया (3)
18 अप्रैल विनायकी चतुर्थी (चं.अ.रा.11.22) तात्या टोपे दि. प्रथम वैशाख शुक्ल चतुर्थी (4)
19 अप्रैल प्रथम वैशाख शुक्ल पंचमी (5)
20 अप्रैल प्रथम वैशाख शुक्ल षष्ठी (6)
21 अप्रैल प्रथम वैशाख शुक्ल सप्तमी (7)
22 अप्रैल पुष्य नक्षत्र प्रथम वैशाख शुक्ल अष्टमी (8)
23 अप्रैल प्रथम वैशाख शुक्ल नवमी-दशमी (9-10)
24 अप्रैल पुरुषोत्तमी एकादशी प्रथम वैशाख शुक्ल एकादशी (11)
25 अप्रैल पुरुषोत्तमी एकादशी प्रथम वैशाख शुक्ल द्वादशी (12)
26 अप्रैल प्रदोष व्रत प्रथम वैशाख शुक्ल त्रयोदशी (13)
27 अप्रैल प्रथम वैशाख शुक्ल चतुर्दशी (14)
28 अप्रैल पूर्णिमा व्रत प्रथम वैशाख शुक्ल पूर्णिमा (15)
29 अप्रैल द्वितीय वैशाख कृष्ण एकम (1)
30 अप्रैल द्वितीय वैशाख कृष्ण द्वितीया (2)
2 अप्रैल संकष्टी गणेश चतुर्थी (चंद्रो.रा. 9.53) गुड फ्रायडे प्रथम वैशाख कृष्ण चतुर्थी (4)
3 अप्रैल प्रथम वैशाख कृष्ण पंचमी (5)
4 अप्रैल ईस्टर संडे प्रथम वैशाख कृष्ण षष्ठी (6)
5 अप्रैल प्रथम वैशाख कृष्ण सप्तमी (7)
6 अप्रैल प्रथम वैशाख कृष्ण अष्टमी (8)
7 अप्रैल विश्व स्वास्थ्य दि. प्रथम वैशाख कृष्ण नवमी (9)
8 अप्रैल प्रथम वैशाख कृष्ण नवमी (9)
9 अप्रैल पंचक प्रारंभ (शाम 07.09) प्रथम वैशाख कृष्ण दशमी (10)
10 अप्रैल वरुथिनी एकादशी वल्लभाचार्य ज. प्रथम वैशाख कृष्ण एकादशी (11)
11 अप्रैल प्रदोष व्रत संत सेन ज. प्रथम वैशाख कृष्ण द्वादशी (12)
12 अप्रैल शिव चतुर्दशी प्रथम वैशाख कृष्ण त्रयोदशी (13)
13 अप्रैल जलियाँवाला बाग दि. प्रथम वैशाख कृष्ण चतुर्दशी (14)
14 अप्रैल वैशाखी पर्व, अमावस्या, पंचक, खरमास समाप्त (दिन 4.53) आम्बेडकर ज., अग्नि शामक दि. प्रथम वैशाख कृष्ण अमावस्या (15)
15 अप्रैल चंद्रदर्शन, सौर मास वैशाख प्रा. पुरुषोत्तम मास प्रा. प्रथम वैशाख शुक्ल एकम (1)
16 अप्रैल प्रथम वैशाख शुक्ल द्वितीया (2)
17 अप्रैल डॉ. राधाकृष्णन दि. प्रथम वैशाख शुक्ल तृतीया (3)
18 अप्रैल विनायकी चतुर्थी (चं.अ.रा.11.22) तात्या टोपे दि. प्रथम वैशाख शुक्ल चतुर्थी (4)
19 अप्रैल प्रथम वैशाख शुक्ल पंचमी (5)
20 अप्रैल प्रथम वैशाख शुक्ल षष्ठी (6)
21 अप्रैल प्रथम वैशाख शुक्ल सप्तमी (7)
22 अप्रैल पुष्य नक्षत्र प्रथम वैशाख शुक्ल अष्टमी (8)
23 अप्रैल प्रथम वैशाख शुक्ल नवमी-दशमी (9-10)
24 अप्रैल पुरुषोत्तमी एकादशी प्रथम वैशाख शुक्ल एकादशी (11)
25 अप्रैल पुरुषोत्तमी एकादशी प्रथम वैशाख शुक्ल द्वादशी (12)
26 अप्रैल प्रदोष व्रत प्रथम वैशाख शुक्ल त्रयोदशी (13)
27 अप्रैल प्रथम वैशाख शुक्ल चतुर्दशी (14)
28 अप्रैल पूर्णिमा व्रत प्रथम वैशाख शुक्ल पूर्णिमा (15)
29 अप्रैल द्वितीय वैशाख कृष्ण एकम (1)
30 अप्रैल द्वितीय वैशाख कृष्ण द्वितीया (2)
लता मंगेशकर
भारत को दुनिया ने देर से पहचाना-लता
‘भारत रत्न’ स्वर सम्राज्ञी लता मंगेशकर मानती हैं कि अच्छे काम की तुलना पुरस्कारों से नहीं की जा सकती, लेकिन उनका कहना है कि एआर रहमान ने ऑस्कर के बाद ग्रैमी पुरस्कार हासिल कर भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफलता दिलाई है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय संगीत को मिल रही सफलता के बारे में लता ने मुंबई से कहा रहमान ने निश्चित तौर पर भारत को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुँचाया है। बहुत खुशी होती है, जब कोई भारतीय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाता है। वे मानती हैं कि देश में प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय संगीत को सफलता काफी देर से मिली।
रहमान को 52वें ग्रेमी अवॉर्ड में ‘स्लमडॉग’ के संगीत से ‘बेस्ट कंपाइलेशन साउंड ट्रैक फॉर मोशन पिक्चर’ और ‘बेस्ट मोशन पिक्चर सॉन्ग’..‘जय हो’ के लिए दो ट्रॉफियों से नवाजा गया है। पिछले साल रहमान ने बाफ्टा में ‘गोल्डन ग्लोब’ और ऑस्कर में दो पुरस्कार हासिल किए थे।
पुरस्कार से ज्यादा मन की संतुष्टि जरूरी : लता ने कहा भारतीय संगीत को पहले ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा जाना चाहिए था। भारतीय संगीत की व्यापकता को देखते हुए इसे काफी देर से पुरस्कार से नवाजा गया। हालाँकि वे पुरस्कारों के बजाय काम के प्रति संतुष्टि और अच्छा काम करने को तवज्जो देती हैं।
यह पूछे जाने पर कि भारत की स्वर सम्राज्ञी के तौर पर अंतरराष्ट्रीय अवॉर्ड ‘आस्कर’ और ‘ग्रैमी’ को वे कितनी अहमियत देती हैं, उन्होंने कहा मैं बढ़िया काम करने और अपनी खुशी के लिए काम करने में विश्वास रखती हूँ। अगर खुद को काम में मजा आ रहा है और संतुष्टि हो रही है तो इससे बढ़िया उपलब्धि या अवॉर्ड कुछ नहीं हो सकता। इससे आत्मा को शांति मिलती है।
वे मानती हैं कि भारत में कई बेहतरीन पुरस्कार हैं, जो काफी प्रतिष्ठित हैं इसलिए अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय पुरस्कार की अहमियत में कोई फर्क नहीं है।
उन्होंने कहा अगर अच्छा काम करते रहोगे तो पुरस्कार भी अपने आप मिलेंगे। लेकिन पुरस्कार से अच्छे काम की काबिलियत को नहीं तोला जा सकता। भारत में भी काफी प्रतिष्ठित पुरस्कार मौजूद हैं।
गानों में आया पीढ़ियों का फर्क : आधुनिक और पुराने दौर के गानों में लता हालाँकि काफी अंतर मानती हैं, लेकिन उन्हें लगता है कि पीढ़ियों के फर्क को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने हँसते हुए कहा हमारे जमाने में गाने का अर्थ हुआ करता था, लेकिन आजकल के गानों में यह बात आना जरूरी नहीं है।
मुझे हालाँकि आजकल का संगीत भी पसंद आता है, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि पुराने या फिर आप कहें हमारे जमाने का संगीत अब भी इतने समय बाद भी वैसी ही मिठास लिए हुए है।
लता ने 20 से ज्यादा भाषाओं में फिल्मी और गैरफिल्मी गीत गाए हैं। वे 30,000 से ज्यादा गाने गा चुकी हैं और अब भी उनके अंदर गाने को लेकर वैसा ही उत्साह भरा हुआ है लेकिन अब उन्होंने गाना पहले की बजाय कम कर दिया है।
संगीत ही जीवन है : उन्होंने कहा मैं मानती हूँ कि काम ही जीवन है, लेकिन मेरे लिए संगीत ही जीवन है। मैंने हालाँकि गाने गाना कम कर दिया है, पहले की तरह व्यस्त नहीं रहती, लेकिन मैं कभी भी संगीत से दूर नहीं रह सकती और मैं काम को ही जीवन मानती हूँ।
‘भारत रत्न’ स्वर सम्राज्ञी लता मंगेशकर मानती हैं कि अच्छे काम की तुलना पुरस्कारों से नहीं की जा सकती, लेकिन उनका कहना है कि एआर रहमान ने ऑस्कर के बाद ग्रैमी पुरस्कार हासिल कर भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफलता दिलाई है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय संगीत को मिल रही सफलता के बारे में लता ने मुंबई से कहा रहमान ने निश्चित तौर पर भारत को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुँचाया है। बहुत खुशी होती है, जब कोई भारतीय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाता है। वे मानती हैं कि देश में प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय संगीत को सफलता काफी देर से मिली।
रहमान को 52वें ग्रेमी अवॉर्ड में ‘स्लमडॉग’ के संगीत से ‘बेस्ट कंपाइलेशन साउंड ट्रैक फॉर मोशन पिक्चर’ और ‘बेस्ट मोशन पिक्चर सॉन्ग’..‘जय हो’ के लिए दो ट्रॉफियों से नवाजा गया है। पिछले साल रहमान ने बाफ्टा में ‘गोल्डन ग्लोब’ और ऑस्कर में दो पुरस्कार हासिल किए थे।
पुरस्कार से ज्यादा मन की संतुष्टि जरूरी : लता ने कहा भारतीय संगीत को पहले ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा जाना चाहिए था। भारतीय संगीत की व्यापकता को देखते हुए इसे काफी देर से पुरस्कार से नवाजा गया। हालाँकि वे पुरस्कारों के बजाय काम के प्रति संतुष्टि और अच्छा काम करने को तवज्जो देती हैं।
यह पूछे जाने पर कि भारत की स्वर सम्राज्ञी के तौर पर अंतरराष्ट्रीय अवॉर्ड ‘आस्कर’ और ‘ग्रैमी’ को वे कितनी अहमियत देती हैं, उन्होंने कहा मैं बढ़िया काम करने और अपनी खुशी के लिए काम करने में विश्वास रखती हूँ। अगर खुद को काम में मजा आ रहा है और संतुष्टि हो रही है तो इससे बढ़िया उपलब्धि या अवॉर्ड कुछ नहीं हो सकता। इससे आत्मा को शांति मिलती है।
वे मानती हैं कि भारत में कई बेहतरीन पुरस्कार हैं, जो काफी प्रतिष्ठित हैं इसलिए अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय पुरस्कार की अहमियत में कोई फर्क नहीं है।
उन्होंने कहा अगर अच्छा काम करते रहोगे तो पुरस्कार भी अपने आप मिलेंगे। लेकिन पुरस्कार से अच्छे काम की काबिलियत को नहीं तोला जा सकता। भारत में भी काफी प्रतिष्ठित पुरस्कार मौजूद हैं।
गानों में आया पीढ़ियों का फर्क : आधुनिक और पुराने दौर के गानों में लता हालाँकि काफी अंतर मानती हैं, लेकिन उन्हें लगता है कि पीढ़ियों के फर्क को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने हँसते हुए कहा हमारे जमाने में गाने का अर्थ हुआ करता था, लेकिन आजकल के गानों में यह बात आना जरूरी नहीं है।
मुझे हालाँकि आजकल का संगीत भी पसंद आता है, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि पुराने या फिर आप कहें हमारे जमाने का संगीत अब भी इतने समय बाद भी वैसी ही मिठास लिए हुए है।
लता ने 20 से ज्यादा भाषाओं में फिल्मी और गैरफिल्मी गीत गाए हैं। वे 30,000 से ज्यादा गाने गा चुकी हैं और अब भी उनके अंदर गाने को लेकर वैसा ही उत्साह भरा हुआ है लेकिन अब उन्होंने गाना पहले की बजाय कम कर दिया है।
संगीत ही जीवन है : उन्होंने कहा मैं मानती हूँ कि काम ही जीवन है, लेकिन मेरे लिए संगीत ही जीवन है। मैंने हालाँकि गाने गाना कम कर दिया है, पहले की तरह व्यस्त नहीं रहती, लेकिन मैं कभी भी संगीत से दूर नहीं रह सकती और मैं काम को ही जीवन मानती हूँ।
वामा
सुख-दुख दोनों है खास
बादशाह अकबर के दरबार के नवरत्नों में बीरबल का अलग स्थान था। बादशाह कैसा भी प्रश्न पूछते, बीरबल सही व सटीक उत्तर देकर उनकी जिज्ञासा शांत कर देते। एक बार उन्होंने कहा, कुछ ऐसा लिखो जिससे खुशी के वक्त पढ़ें तो गम याद आ जाए और गम के वक्त पढ़ें तो खुशी के पल याद आएँ। बीरबल ने कुछ देर सोचा, फिर कागज पर यह वाक्य लिखकर बादशाह को दिया- यह वक्त गुजर जाएगा। सच! इन चार शब्दों के वाक्य में जीवन की कितनी बड़ी सच्चाई छुपी है।
सभी जानते हैं कि सुख-दुख जीवन के दो पहलू हैं जिनका क्रमानुसार आना-जाना लगा ही रहता है। किंतु हम सब कुछ जानते-समझते हुए भी दोनों ही वक्त अपनी भावनाओं-संवेदनाओं पर नियंत्रण नहीं रख पाते। जब खुशियों के पल हमारी झोली में होते हैं तो उस समय हम स्वयं में ही इतने मग्न हो जाते हैं कि क्या अच्छा क्या बुरा, इस पर कभी विचार नहीं करते हैं।
अपनी किस्मत व भाग्य पर इठलाते हुए अन्य की तुलना में श्रेष्ठ समझते हैं और अहंकारवश कुछ ऐसे कार्य तक कर देते हैं जिनसे स्वयं का हित और दूसरे का अहित हो सकता है। इस क्षणिक सुख को स्थायी मानते हुए ही जीने लगते हैं और वास्तव में यही सोच अपना लेते हैं कि अब हमें क्या चाहिए, सब कुछ तो मिल गया। बस! एक इसी भ्रांति के कारण स्वयं को उतने योग्य व सफल साबित नहीं कर पाते जितना कि कर सकते थे।
इसी तरह दुःखद घड़ी में भी अपना आपा खो बेसुध होकर सब भूल जाते हैं। छोटे-से छोटे दुःख तक में धैर्य-संयम नहीं रख पाते। बुद्धि-विवेक व आत्मबल होने के बावजूद स्वयं को इतना दयनीय, असहाय व बेचारा महसूस करते हैं कि आत्मसम्मान, स्वाभिमान तक से समझौता कर लेते हैं। यही कारण है कि सब कुछ होते हुए भी उम्रभर अयोग्य-असफल होने लगते हैं।
कहने का सार यह है कि जो भी छोटी-सी जिंदगी हमें मिली है उसमें सुख व दुख दोनों ही से हमारा वास्ता होगा, यही शाश्वत सत्य है। इस सच को हम जितनी जल्दी स्वीकार कर लेंगे उतना ही हमारे लिए अच्छा रहेगा, क्योंकि फिर ऐसा समय आने पर हम अपने संवेगों पर काबू कर उन्हें स्थिर रख सकेंगे।
ये हैं ...अघोषित सेलिब्रिटीज
यह आलेख समर्पित हैं उन महिलाओं को जो कोई सेलेब्रिटी या सार्वजनिक क्षेत्रों की नामी महिला नहीं हैं। न ही अपने क्षेत्र-विशेष से बाहर उन्हें कोई जानता है। किंतु अपने जैसे परिवेश में रहने वाली महिलाओं के लिए वे किसी रोल मॉडल से कम भी नहीं, जिन सितारा महिलाओं के फोटो और उपलब्धियों से सामान्यतः अखबार के पन्नो भरे रहते हैं, टीवी चैनल पर जो जगमगाती हैं उनसे उन्नीस नहीं हैं ये ग्रामीण 'रोल मॉडल'।
गरीबी और पुरातनवादी, मानसिकता में गले-गले तक धँसी महिलाओं के लिए ये 'रोल मॉडल' यथार्थ के अधिक निकट हैं, क्योंकि इनका निजी जीवन भी संघर्षों, काँटों से भरा हुआ रहा है। बड़े आश्चर्य की बात है कि अभावों एवं विपरीत परिस्थितियों से जूझकर आगे बढ़ने वाली इन महिलाओं की व्यक्तिगत उपलब्धियाँ, जो समाज के लिए अनुकरणीय हैं व क्रांतिकारी हैं, किसी महिला संगठन, मंच या स्त्री-जगत के पैरोकारों को नजर नहीं आती?
महिला दिवस पर इस बार भी जगह-जगह सम्मान समारोह हुए, कार्यशालाएँ आयोजित हुईं। इन कार्यक्रमों में लगभग वे ही महिलाएँ सहभागिता करतीं व सम्मानित होती नजर आईं जो उच्च शिक्षित तबके से होने के साथ ही ठोस आर्थिक पृष्ठभूमि से संबंधित थीं। किसी एक-आध कार्यक्रम में ही ऐसी महिलाएँ दिखाई दीं, जो कठोर परिस्थितियों, आर्थिक अभावों व कुरीतियों की जंजीरें तोड़कर आगे बढ़ी हों।
बाकी तो सम्मान देने वाली व सम्मानित होने वाली ज्यादातर महिलाएँ या तो क्षेत्रीय नेताओं की पत्नियाँ या रिश्तेदार थीं या किसी उच्चाधिकारी की या फिर प्रतिष्ठित व्यापारी की पत्नी या रिश्तेदार। आश्चर्य की बात तो यह है कि सम्मान देने या लेने वाली उक्त कई महिलाएँ स्वयं भी अनेक कुरीतियों, रूढ़ियों व अंधविश्वासों से घिरी होने व घरेलू हिंसा की कम जानकारी रखने के बावजूद महिला-संगठनों की अग्रणी मानी जाती हैं। तो क्या ये सब ही आम महिलाओं के उत्थान व सशक्तीकरण के प्रयोजन हेतु वास्तविक प्रयास हैं?
यदि उक्त संगठन, मंच वाकई महिला हितैषी हैं तो वे महिलाएँ अभी तक उपेक्षा की शिकार क्यों हैं जिन्होंने व्यक्तिगत स्तर पर आधारभूत समस्याओं से जूझते हुए अपने परिवार, जाति-समाज की ठेठ परंपराओं की बेड़ियों को लाँघकर सफलता प्राप्त की और समाज की दबी-कुचली महिलाओं के लिए उदाहरण बनीं?
एक और नजारा हमारे देश में आम है। पंचायतीराज व्यवस्था में आरक्षण के कारण पंचायतों व स्थानीय निकायों में महिलाओं की संख्या में भले ही वृद्धि हो गई हो लेकिन अपने अधिकारों की न तो उन्हें जानकारी होती है और न स्वरुचि से वे कुछ कर पाती हैं। अधिकांश मामलों में वे स्वयं निर्णय नहीं ले पातीं और अपने पति के हाथों रबर-स्टैम्प बनी रहती हैं।
कद्दावर पुरुष नेताओं को स्थानीय व क्षेत्रीय राजनीति में जब अपने लिए कोई स्थान नजर नहीं आता तो वे अपनी पत्नी को ढाल बनाकर अपना हित साधते रहते हैं।
आर्थिक रूप से सुदृढ़ कई महिलाएँ जिन्हें पारिवारिक व सामाजिक मामलों की भले ही अधिक समझ-बूझ न हो, उन्हें महिला परामर्श केंद्रों में सलाहकार बना दिया जाता है। इन परिस्थितियों में जो महिलाएँ ग्रामीण व अर्द्धशहरी क्षेत्रों से बहुत निम्न स्तर से उठकर अपने संघर्ष व साहस के दम पर चुनौतियों का मुकाबला करते हुए आगे बढ़ती हैं उनका हौसला अक्सर दरकिनार कर दिया जाता है।
खेती-बाड़ी और मजदूरी कर अपने बच्चों को पढ़ाने वाली महिलाएँ, दूसरों के घरों में कामकाज कर स्वयं को शिक्षित करने वाली, अपने शराबी-जुआरी पति से मार खाने की बजाय स्वयं के दम पर आगे बढ़ने वाली, अस्वस्थ परंपराओं, कुरीतियों और सड़े-गले रीति-रिवाजों से विद्रोह कर स्वयं की एक अलग पहचान स्थापित करने वाली और अभावग्रस्तता के बावजूद अपने कदमों को पीछे नहीं हटाने वाली, सामान्य ग्रामीण या निचले वर्ग की महिला समाचार-पत्रों की सुर्खी कम क्यों बनती है?
आम महिलाओं को अपनी लड़ाई खुद लड़नी होती है अभावों से, स्वयं के परिवार से यहाँ तक कि स्वयं के पति से भी। उनकी छोटी-मोटी उपलब्धियाँ क्या सिर्फ इसलिए मूल्यांकन या सम्मान के योग्य नहीं क्योंकि वे 'सेलिब्रिटी' नहीं हैं और एक क्षेत्र विशेष तक सीमित हैं? ऐसी महिलाओं के साहस व हौसलों को नमन है जो जूझकर आगे बढ़ी हों। क्या वे सम्मान की हकदार नहीं हैं?
बादशाह अकबर के दरबार के नवरत्नों में बीरबल का अलग स्थान था। बादशाह कैसा भी प्रश्न पूछते, बीरबल सही व सटीक उत्तर देकर उनकी जिज्ञासा शांत कर देते। एक बार उन्होंने कहा, कुछ ऐसा लिखो जिससे खुशी के वक्त पढ़ें तो गम याद आ जाए और गम के वक्त पढ़ें तो खुशी के पल याद आएँ। बीरबल ने कुछ देर सोचा, फिर कागज पर यह वाक्य लिखकर बादशाह को दिया- यह वक्त गुजर जाएगा। सच! इन चार शब्दों के वाक्य में जीवन की कितनी बड़ी सच्चाई छुपी है।
सभी जानते हैं कि सुख-दुख जीवन के दो पहलू हैं जिनका क्रमानुसार आना-जाना लगा ही रहता है। किंतु हम सब कुछ जानते-समझते हुए भी दोनों ही वक्त अपनी भावनाओं-संवेदनाओं पर नियंत्रण नहीं रख पाते। जब खुशियों के पल हमारी झोली में होते हैं तो उस समय हम स्वयं में ही इतने मग्न हो जाते हैं कि क्या अच्छा क्या बुरा, इस पर कभी विचार नहीं करते हैं।
अपनी किस्मत व भाग्य पर इठलाते हुए अन्य की तुलना में श्रेष्ठ समझते हैं और अहंकारवश कुछ ऐसे कार्य तक कर देते हैं जिनसे स्वयं का हित और दूसरे का अहित हो सकता है। इस क्षणिक सुख को स्थायी मानते हुए ही जीने लगते हैं और वास्तव में यही सोच अपना लेते हैं कि अब हमें क्या चाहिए, सब कुछ तो मिल गया। बस! एक इसी भ्रांति के कारण स्वयं को उतने योग्य व सफल साबित नहीं कर पाते जितना कि कर सकते थे।
इसी तरह दुःखद घड़ी में भी अपना आपा खो बेसुध होकर सब भूल जाते हैं। छोटे-से छोटे दुःख तक में धैर्य-संयम नहीं रख पाते। बुद्धि-विवेक व आत्मबल होने के बावजूद स्वयं को इतना दयनीय, असहाय व बेचारा महसूस करते हैं कि आत्मसम्मान, स्वाभिमान तक से समझौता कर लेते हैं। यही कारण है कि सब कुछ होते हुए भी उम्रभर अयोग्य-असफल होने लगते हैं।
कहने का सार यह है कि जो भी छोटी-सी जिंदगी हमें मिली है उसमें सुख व दुख दोनों ही से हमारा वास्ता होगा, यही शाश्वत सत्य है। इस सच को हम जितनी जल्दी स्वीकार कर लेंगे उतना ही हमारे लिए अच्छा रहेगा, क्योंकि फिर ऐसा समय आने पर हम अपने संवेगों पर काबू कर उन्हें स्थिर रख सकेंगे।
ये हैं ...अघोषित सेलिब्रिटीज
यह आलेख समर्पित हैं उन महिलाओं को जो कोई सेलेब्रिटी या सार्वजनिक क्षेत्रों की नामी महिला नहीं हैं। न ही अपने क्षेत्र-विशेष से बाहर उन्हें कोई जानता है। किंतु अपने जैसे परिवेश में रहने वाली महिलाओं के लिए वे किसी रोल मॉडल से कम भी नहीं, जिन सितारा महिलाओं के फोटो और उपलब्धियों से सामान्यतः अखबार के पन्नो भरे रहते हैं, टीवी चैनल पर जो जगमगाती हैं उनसे उन्नीस नहीं हैं ये ग्रामीण 'रोल मॉडल'।
गरीबी और पुरातनवादी, मानसिकता में गले-गले तक धँसी महिलाओं के लिए ये 'रोल मॉडल' यथार्थ के अधिक निकट हैं, क्योंकि इनका निजी जीवन भी संघर्षों, काँटों से भरा हुआ रहा है। बड़े आश्चर्य की बात है कि अभावों एवं विपरीत परिस्थितियों से जूझकर आगे बढ़ने वाली इन महिलाओं की व्यक्तिगत उपलब्धियाँ, जो समाज के लिए अनुकरणीय हैं व क्रांतिकारी हैं, किसी महिला संगठन, मंच या स्त्री-जगत के पैरोकारों को नजर नहीं आती?
महिला दिवस पर इस बार भी जगह-जगह सम्मान समारोह हुए, कार्यशालाएँ आयोजित हुईं। इन कार्यक्रमों में लगभग वे ही महिलाएँ सहभागिता करतीं व सम्मानित होती नजर आईं जो उच्च शिक्षित तबके से होने के साथ ही ठोस आर्थिक पृष्ठभूमि से संबंधित थीं। किसी एक-आध कार्यक्रम में ही ऐसी महिलाएँ दिखाई दीं, जो कठोर परिस्थितियों, आर्थिक अभावों व कुरीतियों की जंजीरें तोड़कर आगे बढ़ी हों।
बाकी तो सम्मान देने वाली व सम्मानित होने वाली ज्यादातर महिलाएँ या तो क्षेत्रीय नेताओं की पत्नियाँ या रिश्तेदार थीं या किसी उच्चाधिकारी की या फिर प्रतिष्ठित व्यापारी की पत्नी या रिश्तेदार। आश्चर्य की बात तो यह है कि सम्मान देने या लेने वाली उक्त कई महिलाएँ स्वयं भी अनेक कुरीतियों, रूढ़ियों व अंधविश्वासों से घिरी होने व घरेलू हिंसा की कम जानकारी रखने के बावजूद महिला-संगठनों की अग्रणी मानी जाती हैं। तो क्या ये सब ही आम महिलाओं के उत्थान व सशक्तीकरण के प्रयोजन हेतु वास्तविक प्रयास हैं?
यदि उक्त संगठन, मंच वाकई महिला हितैषी हैं तो वे महिलाएँ अभी तक उपेक्षा की शिकार क्यों हैं जिन्होंने व्यक्तिगत स्तर पर आधारभूत समस्याओं से जूझते हुए अपने परिवार, जाति-समाज की ठेठ परंपराओं की बेड़ियों को लाँघकर सफलता प्राप्त की और समाज की दबी-कुचली महिलाओं के लिए उदाहरण बनीं?
एक और नजारा हमारे देश में आम है। पंचायतीराज व्यवस्था में आरक्षण के कारण पंचायतों व स्थानीय निकायों में महिलाओं की संख्या में भले ही वृद्धि हो गई हो लेकिन अपने अधिकारों की न तो उन्हें जानकारी होती है और न स्वरुचि से वे कुछ कर पाती हैं। अधिकांश मामलों में वे स्वयं निर्णय नहीं ले पातीं और अपने पति के हाथों रबर-स्टैम्प बनी रहती हैं।
कद्दावर पुरुष नेताओं को स्थानीय व क्षेत्रीय राजनीति में जब अपने लिए कोई स्थान नजर नहीं आता तो वे अपनी पत्नी को ढाल बनाकर अपना हित साधते रहते हैं।
आर्थिक रूप से सुदृढ़ कई महिलाएँ जिन्हें पारिवारिक व सामाजिक मामलों की भले ही अधिक समझ-बूझ न हो, उन्हें महिला परामर्श केंद्रों में सलाहकार बना दिया जाता है। इन परिस्थितियों में जो महिलाएँ ग्रामीण व अर्द्धशहरी क्षेत्रों से बहुत निम्न स्तर से उठकर अपने संघर्ष व साहस के दम पर चुनौतियों का मुकाबला करते हुए आगे बढ़ती हैं उनका हौसला अक्सर दरकिनार कर दिया जाता है।
खेती-बाड़ी और मजदूरी कर अपने बच्चों को पढ़ाने वाली महिलाएँ, दूसरों के घरों में कामकाज कर स्वयं को शिक्षित करने वाली, अपने शराबी-जुआरी पति से मार खाने की बजाय स्वयं के दम पर आगे बढ़ने वाली, अस्वस्थ परंपराओं, कुरीतियों और सड़े-गले रीति-रिवाजों से विद्रोह कर स्वयं की एक अलग पहचान स्थापित करने वाली और अभावग्रस्तता के बावजूद अपने कदमों को पीछे नहीं हटाने वाली, सामान्य ग्रामीण या निचले वर्ग की महिला समाचार-पत्रों की सुर्खी कम क्यों बनती है?
आम महिलाओं को अपनी लड़ाई खुद लड़नी होती है अभावों से, स्वयं के परिवार से यहाँ तक कि स्वयं के पति से भी। उनकी छोटी-मोटी उपलब्धियाँ क्या सिर्फ इसलिए मूल्यांकन या सम्मान के योग्य नहीं क्योंकि वे 'सेलिब्रिटी' नहीं हैं और एक क्षेत्र विशेष तक सीमित हैं? ऐसी महिलाओं के साहस व हौसलों को नमन है जो जूझकर आगे बढ़ी हों। क्या वे सम्मान की हकदार नहीं हैं?
गुरुवार, 1 अप्रैल 2010
बच्चा अशिक्षित नहीं रहेगा
सरकारी वादे और व्यावहारिक सच्चाई
प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में गुरुवार को कहा है कि अब से देश में कोई भी बच्चा अशिक्षित नहीं रहेगा। उनका कहना है कि इस कानून के तहत 6 वर्ष से 14 वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा बच्चों का बुनियादी अधिकार बन जाएगा। राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करना होगा कि समूचे देश में उन 1 करोड़ बच्चों को भी शिक्षा मिले, जिन्हें अभी तक ऐसी कोई सुविधा नसीब नहीं हुई है।
सरकार राइट टू इन्फॉरमेशन और मनरेगा की तरह शिक्षा के मौलिक अधिकार को अपने एजेंडे के तौर पर पेश कर रही है और अगले पाँच वर्ष के लिए केन्द्र सरकार ने इस मिशन को पूरा करने के लिए करीब डेढ़ लाख करोड़ रुपए का प्रावधान किया है।
सरकार का कहना है कि गरीब बच्चों को बेहतर स्कूलों में शिक्षा दिलाने के लिए 2011 से निजी स्कूलों में भी पहली कक्षा से 25 फीसदी कोटा लागू होगा और अगले 12 वर्षों में इसे पूरी तरह से लागू करा लिया जाएगा। इस पहल से सरकार यह भी साबित करना चाहती है कि उसकी प्राथमिकता और सरोकारों में आम आदमी का वर्तमान और भविष्य भी है।
बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार कानून, 2009 को पारित कर सरकार ने बहुत ही अहम और दूरगामी पहल की है लेकिन इस कानून के साथ कुछ खूबियाँ जुड़ी होंगी तो कुछ खामियाँ भी समय-समय पर आम जनता और सरकार के सामने आएँगी, जिनका निराकरण करना होगा। सरकार ने अपने वादों और मंशा को तो स्पष्ट कर दिया है लेकिन यह मंशा कैसे यथार्थ में बदलेगी, इसे देखना होगा।
इस कानून के तहत सरकार के लिए उन सभी बच्चों को शिक्षित करना जरूरी हो जाएगा, जो 6 से 14 आयु वर्ग में आते हैं। लेकिन सरकार उन बच्चों को कैसे अनिवार्य शिक्षा दिला पाएगी, जो अपने परिवार का भरण पोषण करने के लिए दिनभर काम करते हैं।
छोटे-छोटे बच्चे प्लास्टिक की पन्नियाँ बीनने का काम करते हैं और ऐसे ही बहुत सारे कामों में लगे होते हैं जिनसे उनके परिवारों को बहुत थोड़ी आर्थिक मदद मिलती है। ऐसे बच्चों को स्कूलों में दाखिला दिलाना और उन्हें पढ़ाने के काम में लगाना सबसे मुश्किल काम होगा।
नए कानून के तहत शिक्षा की गुणवत्ता में भी सुधार की बात कही जा रही है। यह स्कूलों में शिक्षक और छात्रों के बीच अनुपात को कम करने का दावा करता है। कानून कहता है कि एक शिक्षक पर 40 बच्चों से अधिक नहीं होंगे, लेकिन इसके लिए बड़ी संख्या में शिक्षक, स्कूल तथा अन्य बुनियादी जरूरतों की व्यवस्था कैसे होगी? सरकार को यह व्यवस्था सुचारु रूप से चलाने में कितना समय लग जाएगा?
नए कानून के मुताबिक राज्य सरकारों को बच्चों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए पुस्तकालय, कक्षाएँ, खेल का मैदान और अन्य जरूरी चीजें उपलब्ध कराना होंगी, पर क्या राज्य सरकारें और उनके अधिकारी पूरी ईमानदारी से यह सब काम करेंगे?
सरकार को 15 लाख नए अध्यापकों की भी भर्ती करना होगी और इन्हें अक्टूबर तक प्रशिक्षित भी करना होगा, पर क्या यह आसानी से संभव हो पाएगा?
यह कानून कहता है कि स्कूल के प्रबंधन, जन्म प्रमाण-पत्र और स्थानान्तरण प्रमाण पत्र के आधार पर प्रवेश देने से मना नहीं कर सकेंगे और सत्र के दौरान किसी भी समय पर बच्चे का प्रवेश संभव होगा। पर क्या यह सब व्यवहारिकता में संभव हो पाएगा?
निजी स्कूलों में भी 25 फीसदी सीटें गरीब बच्चों के लिए आरक्षित होंगी, लेकिन इस बात को सुनिश्चित कराना आसान नहीं होगा।
देश के अन्य कानूनों की तरह से यह नया कानून भी खामियों से अछूता नहीं है। इसमें 6 वर्ष से 14 वर्ष तक के बच्चों की बात कही गई है, लेकिन प्रारंभ से 6 वर्ष तक के बच्चों के लिए क्या व्यवस्था होगी? जो बच्चे 14 वर्ष से अधिक आयु के और 18 वर्ष तक के होंगे, उनके लिए क्या प्रावधान होंगे?
हमारे देश के संविधान के अनुच्छेद 45 में यह बात कही गई है कि संविधान के लागू होने के दस वर्ष के अंदर सरकार 0 से 14 वर्ष आयु तक के बच्चों को अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा देगी, लेकिन क्या यह अब तक संभव हो पाया है?
अंतरराष्ट्रीय बाल अधिकार समझौते के अनुसार देश में 18 वर्ष तक की आयु के किशोरों को बच्चा ही माना जाता है। भारत ने दुनिया के उन 142 देशों के साथ यह समझौता किया है, लेकिन इस कानून में 14 से 18 वर्ष के बच्चों के लिए अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा की कोई बात नहीं की गई है।
जहाँ तक उच्च शिक्षा की बात है तो सरकार हर साल इसके बजट में कमी करती जा रही है। यह दिनोंदिन महँगी होती जा रही है और उच्च शिक्षा संस्थान होशियार छात्रों के लिए अच्छी नौकरियाँ पाने का जरिया भर बनकर रह गए हैं।
मौलिक काम करके दुनिया में नाम कमाने के लिए ऐसे संस्थानों के छात्रों को विदेश ही जाना पड़ता है और वहीं रहकर ही वे कुछ ऐसा काम करपाते हैं जिसके बल पर उनका दुनिया में नाम होता है।
प्राथमिक शिक्षा में भी उच्च शिक्षा की तरह निजीकरण के चलते यह हालत हो गई है कि शहरी क्षेत्रों में केवल वे पालक ही अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ने को भेजते हैं, जिनके पास पैसा नहीं होता है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो प्राथमिक और उच्च शिक्षा की हालत में फर्क करना ही मुश्किल है।
शिक्षा के साथ मुश्किल यह है कि सरकार ने निजीकरण के नाम पर शिक्षा को व्यवसायियों के हवाले कर दिया है और सरकार यह सुनिश्चित नहीं कर पाई है कि शिक्षा देना उसका काम है भी या नहीं?
सरकार की तरफ से कह दिया जाता है कि तेल बेचना, बिजली बनाना या कल कारखाने चलाना उसका काम नहीं है, लेकिन शिक्षा के मामले में सरकार ऐसा नहीं कह सकती है कि यह उसका काम नहीं है। वरना एक लोकताँत्रिक समाजवादी देश में (जो ना तो पूरी तरह से ही लोकताँत्रिक है और न ही पूरी तरह से समाजवादी ही) शिक्षा को सड़क पर पड़े जानवर की तरह नहीं समझा जाता कि जिसे जब जिसकी इच्छा हो, इसे लतियाता चला जाता है।
सरकार यह नहीं कह सकती है कि शिक्षा घाटे का सौदा है अगर ऐसा होता तो देश में पूर्व प्राथमिक से लेकर विश्वविद्यालयीन स्तर पर शिक्षा की इतनी बड़ी-बड़ी दुकानें नहीं होतीं और ज्यादातर राजनेताओं को अपने नाम पर ये दुकानें चलाने की जरूरत ही नहीं होती।
...इसलिए कहा जा सकता है कि शिक्षा जैसे मामले पर अगर सरकार कुछ सार्थक और अहम पहल करना चाहती है तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि इस बात की गारंटी नहीं ली जा सकती है कि दिल्ली के नर्सरी स्कूलों में भी सरकार इस कानून का पालन करवा पाने में सफल होगी?
इस कानून के साथ भी सबसे बड़ा प्रश्न भी यही है कि केन्द्र और राज्य सरकारें अपने ही बनाए कानून को इतनी पारदर्शी ईमानदारी और सक्षमता के साथ लागू करा सकती हैं। इसी तथ्य से इस कानून की उपयोगिता और औचित्य का निर्धारण किया जा सकेगा।
प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में गुरुवार को कहा है कि अब से देश में कोई भी बच्चा अशिक्षित नहीं रहेगा। उनका कहना है कि इस कानून के तहत 6 वर्ष से 14 वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा बच्चों का बुनियादी अधिकार बन जाएगा। राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करना होगा कि समूचे देश में उन 1 करोड़ बच्चों को भी शिक्षा मिले, जिन्हें अभी तक ऐसी कोई सुविधा नसीब नहीं हुई है।
सरकार राइट टू इन्फॉरमेशन और मनरेगा की तरह शिक्षा के मौलिक अधिकार को अपने एजेंडे के तौर पर पेश कर रही है और अगले पाँच वर्ष के लिए केन्द्र सरकार ने इस मिशन को पूरा करने के लिए करीब डेढ़ लाख करोड़ रुपए का प्रावधान किया है।
सरकार का कहना है कि गरीब बच्चों को बेहतर स्कूलों में शिक्षा दिलाने के लिए 2011 से निजी स्कूलों में भी पहली कक्षा से 25 फीसदी कोटा लागू होगा और अगले 12 वर्षों में इसे पूरी तरह से लागू करा लिया जाएगा। इस पहल से सरकार यह भी साबित करना चाहती है कि उसकी प्राथमिकता और सरोकारों में आम आदमी का वर्तमान और भविष्य भी है।
बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार कानून, 2009 को पारित कर सरकार ने बहुत ही अहम और दूरगामी पहल की है लेकिन इस कानून के साथ कुछ खूबियाँ जुड़ी होंगी तो कुछ खामियाँ भी समय-समय पर आम जनता और सरकार के सामने आएँगी, जिनका निराकरण करना होगा। सरकार ने अपने वादों और मंशा को तो स्पष्ट कर दिया है लेकिन यह मंशा कैसे यथार्थ में बदलेगी, इसे देखना होगा।
इस कानून के तहत सरकार के लिए उन सभी बच्चों को शिक्षित करना जरूरी हो जाएगा, जो 6 से 14 आयु वर्ग में आते हैं। लेकिन सरकार उन बच्चों को कैसे अनिवार्य शिक्षा दिला पाएगी, जो अपने परिवार का भरण पोषण करने के लिए दिनभर काम करते हैं।
छोटे-छोटे बच्चे प्लास्टिक की पन्नियाँ बीनने का काम करते हैं और ऐसे ही बहुत सारे कामों में लगे होते हैं जिनसे उनके परिवारों को बहुत थोड़ी आर्थिक मदद मिलती है। ऐसे बच्चों को स्कूलों में दाखिला दिलाना और उन्हें पढ़ाने के काम में लगाना सबसे मुश्किल काम होगा।
नए कानून के तहत शिक्षा की गुणवत्ता में भी सुधार की बात कही जा रही है। यह स्कूलों में शिक्षक और छात्रों के बीच अनुपात को कम करने का दावा करता है। कानून कहता है कि एक शिक्षक पर 40 बच्चों से अधिक नहीं होंगे, लेकिन इसके लिए बड़ी संख्या में शिक्षक, स्कूल तथा अन्य बुनियादी जरूरतों की व्यवस्था कैसे होगी? सरकार को यह व्यवस्था सुचारु रूप से चलाने में कितना समय लग जाएगा?
नए कानून के मुताबिक राज्य सरकारों को बच्चों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए पुस्तकालय, कक्षाएँ, खेल का मैदान और अन्य जरूरी चीजें उपलब्ध कराना होंगी, पर क्या राज्य सरकारें और उनके अधिकारी पूरी ईमानदारी से यह सब काम करेंगे?
सरकार को 15 लाख नए अध्यापकों की भी भर्ती करना होगी और इन्हें अक्टूबर तक प्रशिक्षित भी करना होगा, पर क्या यह आसानी से संभव हो पाएगा?
यह कानून कहता है कि स्कूल के प्रबंधन, जन्म प्रमाण-पत्र और स्थानान्तरण प्रमाण पत्र के आधार पर प्रवेश देने से मना नहीं कर सकेंगे और सत्र के दौरान किसी भी समय पर बच्चे का प्रवेश संभव होगा। पर क्या यह सब व्यवहारिकता में संभव हो पाएगा?
निजी स्कूलों में भी 25 फीसदी सीटें गरीब बच्चों के लिए आरक्षित होंगी, लेकिन इस बात को सुनिश्चित कराना आसान नहीं होगा।
देश के अन्य कानूनों की तरह से यह नया कानून भी खामियों से अछूता नहीं है। इसमें 6 वर्ष से 14 वर्ष तक के बच्चों की बात कही गई है, लेकिन प्रारंभ से 6 वर्ष तक के बच्चों के लिए क्या व्यवस्था होगी? जो बच्चे 14 वर्ष से अधिक आयु के और 18 वर्ष तक के होंगे, उनके लिए क्या प्रावधान होंगे?
हमारे देश के संविधान के अनुच्छेद 45 में यह बात कही गई है कि संविधान के लागू होने के दस वर्ष के अंदर सरकार 0 से 14 वर्ष आयु तक के बच्चों को अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा देगी, लेकिन क्या यह अब तक संभव हो पाया है?
अंतरराष्ट्रीय बाल अधिकार समझौते के अनुसार देश में 18 वर्ष तक की आयु के किशोरों को बच्चा ही माना जाता है। भारत ने दुनिया के उन 142 देशों के साथ यह समझौता किया है, लेकिन इस कानून में 14 से 18 वर्ष के बच्चों के लिए अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा की कोई बात नहीं की गई है।
जहाँ तक उच्च शिक्षा की बात है तो सरकार हर साल इसके बजट में कमी करती जा रही है। यह दिनोंदिन महँगी होती जा रही है और उच्च शिक्षा संस्थान होशियार छात्रों के लिए अच्छी नौकरियाँ पाने का जरिया भर बनकर रह गए हैं।
मौलिक काम करके दुनिया में नाम कमाने के लिए ऐसे संस्थानों के छात्रों को विदेश ही जाना पड़ता है और वहीं रहकर ही वे कुछ ऐसा काम करपाते हैं जिसके बल पर उनका दुनिया में नाम होता है।
प्राथमिक शिक्षा में भी उच्च शिक्षा की तरह निजीकरण के चलते यह हालत हो गई है कि शहरी क्षेत्रों में केवल वे पालक ही अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ने को भेजते हैं, जिनके पास पैसा नहीं होता है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो प्राथमिक और उच्च शिक्षा की हालत में फर्क करना ही मुश्किल है।
शिक्षा के साथ मुश्किल यह है कि सरकार ने निजीकरण के नाम पर शिक्षा को व्यवसायियों के हवाले कर दिया है और सरकार यह सुनिश्चित नहीं कर पाई है कि शिक्षा देना उसका काम है भी या नहीं?
सरकार की तरफ से कह दिया जाता है कि तेल बेचना, बिजली बनाना या कल कारखाने चलाना उसका काम नहीं है, लेकिन शिक्षा के मामले में सरकार ऐसा नहीं कह सकती है कि यह उसका काम नहीं है। वरना एक लोकताँत्रिक समाजवादी देश में (जो ना तो पूरी तरह से ही लोकताँत्रिक है और न ही पूरी तरह से समाजवादी ही) शिक्षा को सड़क पर पड़े जानवर की तरह नहीं समझा जाता कि जिसे जब जिसकी इच्छा हो, इसे लतियाता चला जाता है।
सरकार यह नहीं कह सकती है कि शिक्षा घाटे का सौदा है अगर ऐसा होता तो देश में पूर्व प्राथमिक से लेकर विश्वविद्यालयीन स्तर पर शिक्षा की इतनी बड़ी-बड़ी दुकानें नहीं होतीं और ज्यादातर राजनेताओं को अपने नाम पर ये दुकानें चलाने की जरूरत ही नहीं होती।
...इसलिए कहा जा सकता है कि शिक्षा जैसे मामले पर अगर सरकार कुछ सार्थक और अहम पहल करना चाहती है तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि इस बात की गारंटी नहीं ली जा सकती है कि दिल्ली के नर्सरी स्कूलों में भी सरकार इस कानून का पालन करवा पाने में सफल होगी?
इस कानून के साथ भी सबसे बड़ा प्रश्न भी यही है कि केन्द्र और राज्य सरकारें अपने ही बनाए कानून को इतनी पारदर्शी ईमानदारी और सक्षमता के साथ लागू करा सकती हैं। इसी तथ्य से इस कानून की उपयोगिता और औचित्य का निर्धारण किया जा सकेगा।
पर्यटन » मध्यप्रदेश
चलें महेश्वर : माँ नर्मदा के तीर
इतिहास प्रसिद्ध सम्राट कार्तवीर्य अर्जुन की प्राचीन राजधानी महिष्मति ही आधुनिक महेश्वर है। इसका उल्लेख रामायण तथा महाभारत में भी मिलता है। इंदौर की रानी अहिल्याबाई होलकर ने यहाँ की महिमा को चार चाँद लगाए। महेश्वर के मंदिर तथा दुर्ग परिसर के सौंदर्य में अपार आकर्षण विद्यमान है। महेश्वर की महेश्वरी साड़ियाँ अति प्रसिद्ध हैं।
यहाँ के पेशवा घाट, फणसे घाट और अहिल्या घाट प्रसिद्ध हैं जहाँ तीर्थयात्री शांति से बैठकर ध्यान में डूब सकते हैं। नर्मदा नदी के बालुई किनारे पर बैठकर आप यहाँ ठेठ ग्राम्य जीवन के दर्शन कर सकते हैं। पीतल के बर्तनों में पानी ले जाती महिलाएँ, एक किनारे से दूसरे किनारे तक सामान ले जाते पुरुष और किल्लोल करता बचपन..!
राजगद्दी और राजवाड़ा-
नर्मदा के तीर पर बने किले में स्थित राजगद्दी पर देवी अहिल्याबाई की प्रतिमा रखी गई है। आज भी यह स्थान सजीव दरबार की तरह लगता है। किले के ऊपर से शांत नीली नर्मदा के जल को निहारने का अपना ही सुख है। किले के अन्य कमरों में करघे लगे हैं जिन पर साड़ी बनते हुए कोई भी देख सकता है। किले में स्थित छोटे से मंदिर से आज भी दशहरे के उत्सव की शुरुआत की जाती है जैसे राजा-महाराजा के समय में की जाती थी। किले से ढलवाँ रास्ते से नीचे जाते ही शहर बसा हुआ है।
मंदिर
महेश्वर के मंदिर दर्शनीय हैं। हर मंदिर के छज्जे, अहाते में खूबसूरत नक्काशी की गई है। कालेश्वर, राजराजेश्वर, विट्ठलेश्वर और अहिल्येश्वर मंदिर विशेष रूप से दर्शनीय हैं।
कैसे पहुँचें
वायु सेवा- महेश्वर के लिए निकटतम हवाई अड्डा इंदौर क्रमशः 77 तथा 91 किमी है जो मुंबई, दिल्ली, भोपाल तथा ग्वालियर से सीधी विमान सेवा से जुड़ा है।
रेल सेवा- महेश्वर के लिए बड़वाह (39 किमी) निकटतम रेलवे स्टेशन हैं। पश्चिमी रेलवे के बड़वाह, खंडवा, इंदौर से भी यहाँ पहुँच सकते हैं।
सड़क मार्ग- बड़वाह, खंडवा, इंदौर, धार और धामनोद से महेश्वर के लिए बस सेवा उपलब्ध है।
कब जाएँ-
जुलाई से लेकर मार्च तक का समय यहाँ जाने के लिए उपयुक्त है।
ठहरने के लिए- गेस्ट हाउस, रेस्ट हाउस, तथा धर्मशालाएँ उपलब्ध हैं।
धुँआ-धुँआ सारा समां - भेड़ाघाट
चमकती संगमरमर की लगभग सौ फीट ऊँची दीवारें... बीच में कल-कल बहती नर्मदा नदी पूरा माहौल बेहद पवित्र, बेहद शांत..पानी में चमकती सूर्य की किरणें... यह दिलकश नजारा है भेड़ाघाट का। पूर्णिमा की चाँदनी रात में यहाँ के सौंदर्य का वर्णन करना शब्दों में संभव नहीं है। ऐसे में आप नर्मदा में नौका-विहार करें तो रहस्यमय सौंदर्य का अनुभव करेंगे।
कई हिंदी फिल्मकारों ने यहाँ शूटिंग की है। जिसका रोचक वर्णन गाइड अनोखे अंदाज में सुनाते हैं। ये नाव चालक कम गाइड लगातार बोलते रहते हैं। यदि आप खामोशी से इस जगह की खूबसूरती निहारना चाहें तो बस इन्हें एक बार चुप होने का इशारा करना होगा।
दो ऊँचे-ऊँचे संगमरमरी आईनों के बीच बहती नीली शांत नर्मदा आगे चलकर बेहद खूबसूरत धुआँधार जलप्रपात के रूप में गिरती है। चाँदनी रात में इस जैसा खूबसूरत स्थान शायद ही विश्व में कहीं हो। चाँदनी रात में सरकार की ओर से हर साल यहाँ उत्सव का आयोजन करवाया जाता है। जिसके तहत नौकाओँ की राजसी सज्जा की जाती है। साथ ही सारंगी, तबला जैसे पारंपरिक वाद्य-यंत्रों को कुछ नावों में खास तौर पर बजवाया जाता है।
मुख्य आकर्षणः-
संगमरमरी चट्टानें- इस जलप्रपात क दोनों ओर खूबसूरत संगमरमर की चट्टाने हैं। इन उज्जवल-धवल चट्टानों के बीच नौका विहार की सुविधा नवंबर से मई तक उपलब्ध रहती है। चाँदनी रात में इसकी खूबसूरती और नौकाविहार का आनंद दुगना हो जाता है।
धुआँधार जलप्रपात-
शांत नर्मदा चट्टानों के बीच से बहती है और धुँआधार जलप्रपात के रूप में गरजकर गिरती है। इसकी आवाज दूर से ही सुनाई देती है। पानी की तेजी गहरे धुएँ के रूप में दिखाई देती है। प्रकृति की खूबसूरती का एक और रूप!
सेलखड़ी की कलाकृतियाँ-
यहाँ नर्मदा में पाए जाने वाले सेलखड़ी पत्थरों (संगमरमर) पर उकेरी गई कलाकृतियाँ बनाने और बेचने का व्यवसाय यहाँ होता है। यहाँ आपको बच्चे हो, बूढ़े हो या जवान सभी इसी काम में लगे दिखाई देंगे। आप यहाँ से संगमरमर के खूबसूरत सामान ही नहीं खरीद सकते, बल्कि इन्हें कितनी खूबसूरती से बनाया जाता है यह भी निहार सकते हैं।
चौंसठ योगिनी मंदिर-
ऊँची पहाड़ी पर स्थित मंदिर में कई सीढ़ियाँ चढ़कर आप जब ऊपर पहुँचते हैं तो नीचे संगमरमर की चट्टानों के बीच बहती नर्मदा की लहरों का सौंदर्य आपकी सारी थकान हर लेता है। दुर्गा माँ का यह मंदिर दसवीं शताब्दी का है यहाँ कलचुरी काल की अन्य प्रतिमाएँ भी मौजूद हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार यह मंदिर भूमिगत सुरंग के माध्यम से दुर्गावती महल से जुड़ा हुआ है।
कैसे जाएँ-
हवाई मार्ग से- जबलपुर सबसे निकट का हवाई अड्डा है जो यहाँ से 23 किमी. दूर है। भोपाल और दिल्ली के लिए यहाँ से नियमित हवाई सेवा है।
रेल मार्ग से- मुंबई-हावड़ा मुख्य लाइन इलाहबाद से होते हुए जबलपुर रेल मुख्यालय है। सभी एक्सप्रेस और पैसेंजर ट्रेन यहाँ रुकती हैं।
सड़क मार्ग से जबलपुर से बस, टैम्पो और टैक्सियाँ भेड़ाघाट के लिए चलती हैं।
कब जाएँ- अक्टूबर से जून तक का समय यहाँ जाने के लिए श्रेष्ठ है। मानसून सीजन में आप धुँआधार जलप्रपात का धुँआ-धुँआ रूप नहीं देख पाएँगे।
बजट- यहाँ जाने के लिए किसी प्रकार का कोई शुल्क नहीं लगता है। आप यूँ ही बिना टिकट लिए यहाँ की खूबसूरती निहार सकते हैं। हाँ, नौकायान के लिए आपको शुल्क चुकाना होगा...कितना यह आपकी पसंद पर निर्भर करता है। यदि आप दूसरे लोगों के साथ मिलकर नाव किराए पर लेते हैं तो यह आपको 100 से 150 रूपए के बीच मिल जाएगी।
यदि अपने परिवार के लिए पूरी नाव बुक करना चाहते हैं तो नाव के आकार और रूप-रंग के अनुसार कीमत 350 से लेकर 500 रूपए हो सकती है। चाँदनी रात में विहार करने पर टिकिट शुल्क कुछ बढ़ा दिया जाता है। इसके अलावा जबलपुर में ठहरने के लिए सस्ते और मँहगें दोनो ही होटल आराम से मिल जाते हैं।
टिप्सः-
धुँआधार जलप्रपात देखते समय काफी सावधानी रखें। जोश में आकर रेलिंग पर चढ़ना और रेलिंग क्रास करना काफी खतरनाक साबित हो सकता है।
यहाँ नौकाविहार करते समय नाव का संतुलन न बिगाड़े। यहाँ कई जगह पानी काफी गहरा है।
अपने साथ सनक्रीम लोशन, कैप और चश्मा जरूर रखें। बात यदि चाँदनी रात की हो तो इनकी क्या जरूरत।
यहाँ कुछ सालों पहले मगरमच्छ पाए जाते थे। इसलिए अभी भी सावधानी रखना जरूरी है बच्चों को नौका विहार करते समय पानी में बार-बार हाथ डालने से रोकें।
पहाड़ियों पर नाम कुरेदकर इनकी प्राकृतिक सुंदरता खराब न करें। न ही यहाँ वहाँ कूड़ा खासकर पॉलिथिन फेंके।
चित्रकूट
प्राचीन काल में तपस्या और शांति का स्थल चित्रकूट ब्रह्मा, विष्णु, महेश के बाल अवतार का स्थान माना जाता है। वनवास के समय भगवान राम, सीता, लक्ष्मण, यहीं के घने जंगलों में रहे थे और ब्रह्मा, विष्णु और महेश महर्षि अत्रि तथा सती अनुसूया के अतिथि बनकर यहाँ रहे थे। इस स्थल का वरदान माना जाता है। भगवान प्राकृतिक सुषमा के बीच चित्रकूट में पर्यटक मानसिक शांति प्राप्त करते हैं।
रामघाट
रामघाट में मंदाकिनी नदी के तट पर स्थित घाट पर विभिन्न धार्मिक क्रियाएँ चलती रहती हैं। कहते हैं यहाँ घाटों पर भीड़ कभी भी कम नहीं होती। पवित्र मंत्रोच्चार और खुशबू के बीच साधुओं को यहाँ तपस्या में लीन बैठे देखा जा सकता है या तीर्थयात्री उनसे उपदेश प्राप्त करते रहते हैं। मंदाकिनी के नीले-हरे पानी में नौकायन का मजा ही कुछ और है।
कामदगिरी
कामदगिरी चित्रकूट का मुख्य धार्मिक स्थल है। यह एक खड़ी पहाड़ी पर स्थित है जिसके आधार पर मंदिरों और पूजा स्थलों की कतारें हैं। यहीं पर भरत मिलाप मंदिर है। यहीं पर भरत ने राम से वापिस लौटने की विनती की थी। लोग यहाँ मनोकामना पूर्ति के लिए पहाड़ी की परिक्रमा भी करते हैं।
सती अनुसूया
यह स्थल कुछ ऊपर जाकर है घने जंगलों के बीच शांत वातावरण में पक्षियों की चहचहाहट गूँजती रहती है। कहते हैं कि यहीं पर अत्रि ऋषि, उनकी पत्नी अनुसूया और तीनों पुत्रों ने तपस्या की थी जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश के अवतार रूप में थे। मंदाकिनी की धारा को अनुसूया द्वारा अपनी ध्यान-साधना के लिए लाया गया था ऐसा माना जाता है। यह स्थल शहर से 16 किमी. दूर है और घने जंगलों से होकर सड़क मार्ग से यहाँ पहुँचा जा सकता है।
स्फटिक शिला
मंदाकिनी के किनारे पर जानकी कुंड के कुछ किलोमीटर पीछे यह घने वनों से आच्छादित क्षेत्र है। यहाँ पर भगवान राम के पैरों के निशान हैं और यहीं पर सीता माता को जयंत नामक कौवे ने चोंच मारी थी। यहाँ नदी के स्वच्छ पानी में मछलियाँ आसानी से देखी जा सकती हैं।
जानकी कुंड
रामघाट से ऊपर जाने पर मंदाकिनी का मनमोहक नजारा दिखाई देता है। नदी के नीले पानी और हरे-भरे पेड़ों से यह स्थान बहुत ही सुरम्य लगता है। जानकी कुंड तक जाने के दो रास्ते हैं एक तो आप यहाँ नाव के जरिए पहुँच सकते हैं और दूसरे आप हरियाली देखते हुए सड़क मार्ग से भी जा सकते हैं।
हनुमान धारा
यह सैंकड़ों फीट ऊँची जगह पर स्थित धारा है, जिसे राम ने हनुमान के लंका दहन के बाद लौटने पर हनुमान के लिए बनाया था। यहाँ कई मंदिर हैं और साथ ही यहाँ से चित्रकूट का विहगम दृश्य भी देखा जा सकता है। ऊपर पहुँचने पर खुला सा क्षेत्र है जहाँ पीपल के वृक्ष लगे हैं। ऊपर चढ़ने की सारी थकान यहाँ आते ही मिट जाती है।
भरत कूप
यहाँ भरत ने पूरे भारत के तीर्थों से जल एकत्र करके डाला था। यह कस्बे से दूर छोटा सी अलग-थलग जगह है।
गुप्त गोदावरी
कस्बे से 18 किमी. दूर पहाड़ी पर यह प्राकृतिक चमत्कार के रूप में है। यहाँ एक जोड़ा गुफाएँ हैं जिनमें बड़ी मुश्किल से ही प्रवेश किया जा सकता है। दूसरी गुफा और भी सँकरी है जिसमें पतली सी नदी बहती है। कहा जाता है कि यहाँ राम-लक्ष्मण अपना दरबार लगाते थे, यहाँ दो प्राकृतिक सिंहासन बने हुए हैं।
कैसे पहुँचे :-
वायु सेवा- सबसे नजदीकी हवाई अड्डा खजुराहो (175 किमी) है। दिल्ली, आगरा और वाराणसी से यहाँ के लिए विमान सेवा उपलब्ध है।
रेल सेवा- सबसे निकटवर्ती रेलवे स्टेशन चित्रकूट धाम या कर्वी (11 किमी) है। यह झाँसी-माणिकपुर मुख्य रेल लाइन पर स्थित है।
सड़क मार्ग- झाँसी, महोबा, चित्रकूट धाम, हरपारपुर, सतना और छतरपुर से चित्रकूट के लिए नियमित बस सेवा उपलब्ध हैं।
कैसे जाएँ
अक्टूबर से मार्च तक का समय यहाँ जाने के लिए उपयुक्त है।
ठहरने के लिए- मध्यप्रदेश निगम का बंगला तथा उत्तरप्रदेश पर्यटन निगम का बंगला, साडा के होटल तथा लॉज उपलब्ध हैं।
इतिहास प्रसिद्ध सम्राट कार्तवीर्य अर्जुन की प्राचीन राजधानी महिष्मति ही आधुनिक महेश्वर है। इसका उल्लेख रामायण तथा महाभारत में भी मिलता है। इंदौर की रानी अहिल्याबाई होलकर ने यहाँ की महिमा को चार चाँद लगाए। महेश्वर के मंदिर तथा दुर्ग परिसर के सौंदर्य में अपार आकर्षण विद्यमान है। महेश्वर की महेश्वरी साड़ियाँ अति प्रसिद्ध हैं।
यहाँ के पेशवा घाट, फणसे घाट और अहिल्या घाट प्रसिद्ध हैं जहाँ तीर्थयात्री शांति से बैठकर ध्यान में डूब सकते हैं। नर्मदा नदी के बालुई किनारे पर बैठकर आप यहाँ ठेठ ग्राम्य जीवन के दर्शन कर सकते हैं। पीतल के बर्तनों में पानी ले जाती महिलाएँ, एक किनारे से दूसरे किनारे तक सामान ले जाते पुरुष और किल्लोल करता बचपन..!
राजगद्दी और राजवाड़ा-
नर्मदा के तीर पर बने किले में स्थित राजगद्दी पर देवी अहिल्याबाई की प्रतिमा रखी गई है। आज भी यह स्थान सजीव दरबार की तरह लगता है। किले के ऊपर से शांत नीली नर्मदा के जल को निहारने का अपना ही सुख है। किले के अन्य कमरों में करघे लगे हैं जिन पर साड़ी बनते हुए कोई भी देख सकता है। किले में स्थित छोटे से मंदिर से आज भी दशहरे के उत्सव की शुरुआत की जाती है जैसे राजा-महाराजा के समय में की जाती थी। किले से ढलवाँ रास्ते से नीचे जाते ही शहर बसा हुआ है।
मंदिर
महेश्वर के मंदिर दर्शनीय हैं। हर मंदिर के छज्जे, अहाते में खूबसूरत नक्काशी की गई है। कालेश्वर, राजराजेश्वर, विट्ठलेश्वर और अहिल्येश्वर मंदिर विशेष रूप से दर्शनीय हैं।
कैसे पहुँचें
वायु सेवा- महेश्वर के लिए निकटतम हवाई अड्डा इंदौर क्रमशः 77 तथा 91 किमी है जो मुंबई, दिल्ली, भोपाल तथा ग्वालियर से सीधी विमान सेवा से जुड़ा है।
रेल सेवा- महेश्वर के लिए बड़वाह (39 किमी) निकटतम रेलवे स्टेशन हैं। पश्चिमी रेलवे के बड़वाह, खंडवा, इंदौर से भी यहाँ पहुँच सकते हैं।
सड़क मार्ग- बड़वाह, खंडवा, इंदौर, धार और धामनोद से महेश्वर के लिए बस सेवा उपलब्ध है।
कब जाएँ-
जुलाई से लेकर मार्च तक का समय यहाँ जाने के लिए उपयुक्त है।
ठहरने के लिए- गेस्ट हाउस, रेस्ट हाउस, तथा धर्मशालाएँ उपलब्ध हैं।
धुँआ-धुँआ सारा समां - भेड़ाघाट
चमकती संगमरमर की लगभग सौ फीट ऊँची दीवारें... बीच में कल-कल बहती नर्मदा नदी पूरा माहौल बेहद पवित्र, बेहद शांत..पानी में चमकती सूर्य की किरणें... यह दिलकश नजारा है भेड़ाघाट का। पूर्णिमा की चाँदनी रात में यहाँ के सौंदर्य का वर्णन करना शब्दों में संभव नहीं है। ऐसे में आप नर्मदा में नौका-विहार करें तो रहस्यमय सौंदर्य का अनुभव करेंगे।
कई हिंदी फिल्मकारों ने यहाँ शूटिंग की है। जिसका रोचक वर्णन गाइड अनोखे अंदाज में सुनाते हैं। ये नाव चालक कम गाइड लगातार बोलते रहते हैं। यदि आप खामोशी से इस जगह की खूबसूरती निहारना चाहें तो बस इन्हें एक बार चुप होने का इशारा करना होगा।
दो ऊँचे-ऊँचे संगमरमरी आईनों के बीच बहती नीली शांत नर्मदा आगे चलकर बेहद खूबसूरत धुआँधार जलप्रपात के रूप में गिरती है। चाँदनी रात में इस जैसा खूबसूरत स्थान शायद ही विश्व में कहीं हो। चाँदनी रात में सरकार की ओर से हर साल यहाँ उत्सव का आयोजन करवाया जाता है। जिसके तहत नौकाओँ की राजसी सज्जा की जाती है। साथ ही सारंगी, तबला जैसे पारंपरिक वाद्य-यंत्रों को कुछ नावों में खास तौर पर बजवाया जाता है।
मुख्य आकर्षणः-
संगमरमरी चट्टानें- इस जलप्रपात क दोनों ओर खूबसूरत संगमरमर की चट्टाने हैं। इन उज्जवल-धवल चट्टानों के बीच नौका विहार की सुविधा नवंबर से मई तक उपलब्ध रहती है। चाँदनी रात में इसकी खूबसूरती और नौकाविहार का आनंद दुगना हो जाता है।
धुआँधार जलप्रपात-
शांत नर्मदा चट्टानों के बीच से बहती है और धुँआधार जलप्रपात के रूप में गरजकर गिरती है। इसकी आवाज दूर से ही सुनाई देती है। पानी की तेजी गहरे धुएँ के रूप में दिखाई देती है। प्रकृति की खूबसूरती का एक और रूप!
सेलखड़ी की कलाकृतियाँ-
यहाँ नर्मदा में पाए जाने वाले सेलखड़ी पत्थरों (संगमरमर) पर उकेरी गई कलाकृतियाँ बनाने और बेचने का व्यवसाय यहाँ होता है। यहाँ आपको बच्चे हो, बूढ़े हो या जवान सभी इसी काम में लगे दिखाई देंगे। आप यहाँ से संगमरमर के खूबसूरत सामान ही नहीं खरीद सकते, बल्कि इन्हें कितनी खूबसूरती से बनाया जाता है यह भी निहार सकते हैं।
चौंसठ योगिनी मंदिर-
ऊँची पहाड़ी पर स्थित मंदिर में कई सीढ़ियाँ चढ़कर आप जब ऊपर पहुँचते हैं तो नीचे संगमरमर की चट्टानों के बीच बहती नर्मदा की लहरों का सौंदर्य आपकी सारी थकान हर लेता है। दुर्गा माँ का यह मंदिर दसवीं शताब्दी का है यहाँ कलचुरी काल की अन्य प्रतिमाएँ भी मौजूद हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार यह मंदिर भूमिगत सुरंग के माध्यम से दुर्गावती महल से जुड़ा हुआ है।
कैसे जाएँ-
हवाई मार्ग से- जबलपुर सबसे निकट का हवाई अड्डा है जो यहाँ से 23 किमी. दूर है। भोपाल और दिल्ली के लिए यहाँ से नियमित हवाई सेवा है।
रेल मार्ग से- मुंबई-हावड़ा मुख्य लाइन इलाहबाद से होते हुए जबलपुर रेल मुख्यालय है। सभी एक्सप्रेस और पैसेंजर ट्रेन यहाँ रुकती हैं।
सड़क मार्ग से जबलपुर से बस, टैम्पो और टैक्सियाँ भेड़ाघाट के लिए चलती हैं।
कब जाएँ- अक्टूबर से जून तक का समय यहाँ जाने के लिए श्रेष्ठ है। मानसून सीजन में आप धुँआधार जलप्रपात का धुँआ-धुँआ रूप नहीं देख पाएँगे।
बजट- यहाँ जाने के लिए किसी प्रकार का कोई शुल्क नहीं लगता है। आप यूँ ही बिना टिकट लिए यहाँ की खूबसूरती निहार सकते हैं। हाँ, नौकायान के लिए आपको शुल्क चुकाना होगा...कितना यह आपकी पसंद पर निर्भर करता है। यदि आप दूसरे लोगों के साथ मिलकर नाव किराए पर लेते हैं तो यह आपको 100 से 150 रूपए के बीच मिल जाएगी।
यदि अपने परिवार के लिए पूरी नाव बुक करना चाहते हैं तो नाव के आकार और रूप-रंग के अनुसार कीमत 350 से लेकर 500 रूपए हो सकती है। चाँदनी रात में विहार करने पर टिकिट शुल्क कुछ बढ़ा दिया जाता है। इसके अलावा जबलपुर में ठहरने के लिए सस्ते और मँहगें दोनो ही होटल आराम से मिल जाते हैं।
टिप्सः-
धुँआधार जलप्रपात देखते समय काफी सावधानी रखें। जोश में आकर रेलिंग पर चढ़ना और रेलिंग क्रास करना काफी खतरनाक साबित हो सकता है।
यहाँ नौकाविहार करते समय नाव का संतुलन न बिगाड़े। यहाँ कई जगह पानी काफी गहरा है।
अपने साथ सनक्रीम लोशन, कैप और चश्मा जरूर रखें। बात यदि चाँदनी रात की हो तो इनकी क्या जरूरत।
यहाँ कुछ सालों पहले मगरमच्छ पाए जाते थे। इसलिए अभी भी सावधानी रखना जरूरी है बच्चों को नौका विहार करते समय पानी में बार-बार हाथ डालने से रोकें।
पहाड़ियों पर नाम कुरेदकर इनकी प्राकृतिक सुंदरता खराब न करें। न ही यहाँ वहाँ कूड़ा खासकर पॉलिथिन फेंके।
चित्रकूट
प्राचीन काल में तपस्या और शांति का स्थल चित्रकूट ब्रह्मा, विष्णु, महेश के बाल अवतार का स्थान माना जाता है। वनवास के समय भगवान राम, सीता, लक्ष्मण, यहीं के घने जंगलों में रहे थे और ब्रह्मा, विष्णु और महेश महर्षि अत्रि तथा सती अनुसूया के अतिथि बनकर यहाँ रहे थे। इस स्थल का वरदान माना जाता है। भगवान प्राकृतिक सुषमा के बीच चित्रकूट में पर्यटक मानसिक शांति प्राप्त करते हैं।
रामघाट
रामघाट में मंदाकिनी नदी के तट पर स्थित घाट पर विभिन्न धार्मिक क्रियाएँ चलती रहती हैं। कहते हैं यहाँ घाटों पर भीड़ कभी भी कम नहीं होती। पवित्र मंत्रोच्चार और खुशबू के बीच साधुओं को यहाँ तपस्या में लीन बैठे देखा जा सकता है या तीर्थयात्री उनसे उपदेश प्राप्त करते रहते हैं। मंदाकिनी के नीले-हरे पानी में नौकायन का मजा ही कुछ और है।
कामदगिरी
कामदगिरी चित्रकूट का मुख्य धार्मिक स्थल है। यह एक खड़ी पहाड़ी पर स्थित है जिसके आधार पर मंदिरों और पूजा स्थलों की कतारें हैं। यहीं पर भरत मिलाप मंदिर है। यहीं पर भरत ने राम से वापिस लौटने की विनती की थी। लोग यहाँ मनोकामना पूर्ति के लिए पहाड़ी की परिक्रमा भी करते हैं।
सती अनुसूया
यह स्थल कुछ ऊपर जाकर है घने जंगलों के बीच शांत वातावरण में पक्षियों की चहचहाहट गूँजती रहती है। कहते हैं कि यहीं पर अत्रि ऋषि, उनकी पत्नी अनुसूया और तीनों पुत्रों ने तपस्या की थी जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश के अवतार रूप में थे। मंदाकिनी की धारा को अनुसूया द्वारा अपनी ध्यान-साधना के लिए लाया गया था ऐसा माना जाता है। यह स्थल शहर से 16 किमी. दूर है और घने जंगलों से होकर सड़क मार्ग से यहाँ पहुँचा जा सकता है।
स्फटिक शिला
मंदाकिनी के किनारे पर जानकी कुंड के कुछ किलोमीटर पीछे यह घने वनों से आच्छादित क्षेत्र है। यहाँ पर भगवान राम के पैरों के निशान हैं और यहीं पर सीता माता को जयंत नामक कौवे ने चोंच मारी थी। यहाँ नदी के स्वच्छ पानी में मछलियाँ आसानी से देखी जा सकती हैं।
जानकी कुंड
रामघाट से ऊपर जाने पर मंदाकिनी का मनमोहक नजारा दिखाई देता है। नदी के नीले पानी और हरे-भरे पेड़ों से यह स्थान बहुत ही सुरम्य लगता है। जानकी कुंड तक जाने के दो रास्ते हैं एक तो आप यहाँ नाव के जरिए पहुँच सकते हैं और दूसरे आप हरियाली देखते हुए सड़क मार्ग से भी जा सकते हैं।
हनुमान धारा
यह सैंकड़ों फीट ऊँची जगह पर स्थित धारा है, जिसे राम ने हनुमान के लंका दहन के बाद लौटने पर हनुमान के लिए बनाया था। यहाँ कई मंदिर हैं और साथ ही यहाँ से चित्रकूट का विहगम दृश्य भी देखा जा सकता है। ऊपर पहुँचने पर खुला सा क्षेत्र है जहाँ पीपल के वृक्ष लगे हैं। ऊपर चढ़ने की सारी थकान यहाँ आते ही मिट जाती है।
भरत कूप
यहाँ भरत ने पूरे भारत के तीर्थों से जल एकत्र करके डाला था। यह कस्बे से दूर छोटा सी अलग-थलग जगह है।
गुप्त गोदावरी
कस्बे से 18 किमी. दूर पहाड़ी पर यह प्राकृतिक चमत्कार के रूप में है। यहाँ एक जोड़ा गुफाएँ हैं जिनमें बड़ी मुश्किल से ही प्रवेश किया जा सकता है। दूसरी गुफा और भी सँकरी है जिसमें पतली सी नदी बहती है। कहा जाता है कि यहाँ राम-लक्ष्मण अपना दरबार लगाते थे, यहाँ दो प्राकृतिक सिंहासन बने हुए हैं।
कैसे पहुँचे :-
वायु सेवा- सबसे नजदीकी हवाई अड्डा खजुराहो (175 किमी) है। दिल्ली, आगरा और वाराणसी से यहाँ के लिए विमान सेवा उपलब्ध है।
रेल सेवा- सबसे निकटवर्ती रेलवे स्टेशन चित्रकूट धाम या कर्वी (11 किमी) है। यह झाँसी-माणिकपुर मुख्य रेल लाइन पर स्थित है।
सड़क मार्ग- झाँसी, महोबा, चित्रकूट धाम, हरपारपुर, सतना और छतरपुर से चित्रकूट के लिए नियमित बस सेवा उपलब्ध हैं।
कैसे जाएँ
अक्टूबर से मार्च तक का समय यहाँ जाने के लिए उपयुक्त है।
ठहरने के लिए- मध्यप्रदेश निगम का बंगला तथा उत्तरप्रदेश पर्यटन निगम का बंगला, साडा के होटल तथा लॉज उपलब्ध हैं।
पर्यटन मध्यप्रदेश
नर्मदा किनारे बसा ओंकारेश्वर
शिवशंभू का अनूठा धाम
ओंकारेश्वर हिंदू धर्म के पवित्र प्रतीक 'ओम' को प्रतिध्वनित करता है। यह हर उम्र के तीर्थ यात्रियों को अपनी ओर आकर्षित करता है। यहाँ नर्मदा और कावेरी का संगम है जिसमें श्रद्धालु डुबकी लगाने के बाद पवित्र ज्योतिर्लिंग के दर्शन को जाते हैं। ओंकारेश्वर का शिवलिंग देश के बारह पवित्र ज्योतिर्लिंगों में से एक है। मंदिर को ओंकार मांधाता मंदिर के नाम से जाना जाता है।
मध्यप्रदेश के अन्य मंदिरों की तरह ही यह मंदिर भी प्रकृति से मनुष्य के जुड़ाव को प्रदर्शित करता है। यहाँ प्रकृति ने स्वयं दो पर्वतों के बीच एक खाई को जोड़कर ओम का आकार ग्रहण किया है।
मंदिर के उत्तर में विंध्य पर्वत और दक्षिण में सतपुड़ा के बीच नर्मदा नदी मूक वाहक की तरह है। पहले नदी में बहुतायत में घड़ियाल थे। अब भी यहाँ बड़ी संख्या में मछलियाँ हैं जिन्हें हाथों से दाना खिलाने का सुख प्राप्त किया जा सकता है। नदी पर स्थित पुल यहाँ की सुंदरता को द्विगुणित करता है।
ओंकार मांधाता मंदिर
यह मंदिर नर्मदा द्वारा काटे गए एक मील लंबे और आधा मील चौड़े द्वीप पर स्थित है। इसके नर्म पत्थरों को काटकर बारीक नक्काशी उकेरी गई है और विशेष रूप से इसका ऊपर का भाग देखने लायक है। मंदिर की छत भी बहुत सुंदरता से उकेरी गई है। मंदिर को घेरे हुए बरामदे में बने स्तंभों पर वृत्त, बहुकोणीय आकृतियाँ और वर्ग बने हुए हैं।
सिद्धनाथ मंदिर
यह मध्यकाल की ब्राह्मण कला का बेहतरीन नमूना है। इसकी विशेषता बाहरी दीवारों पर हाथियों की खूबसूरत नक्काशी है।
चौबीस अवतार
यहाँ हिंदुओं और जैन मंदिरों का समूह है। हरेक मंदिर स्थापत्य के लिहाज से बेहतरीन कला का नमूना पेश करता है।
सातमातृका मंदिर
ओंकारेश्वर से छ: किलोमीटर दूर यहाँ दसवीं शताब्दी के मंदिरों का समूह है।
काजल रानी की गुफा
ओंकारेश्वर से नौ किलोमीटर दूर यह प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर स्थल है। क्षितिज तक फैले चौड़े हरियाले मैदान धरती से अंबर का मेल खाते से लगते हैं। यहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य अवर्णनीय है।
कैसे जाएँ
हवाई मार्ग
सबसे निकट का हवाई अड्डा इंदौर 77 किमी. दूर है जो मुंबई, भोपाल और दिल्ली से जुड़ा है।
सड़क मार्ग
यह इंदौर, उज्जैन और खंडवा से सड़क मार्ग से जुड़ा है।
रेल मार्ग
सबसे निकट का रेल मुख्यालय ओंकारेश्वर रोड 12 किमी. दूर है। यह पश्चिम रेलवे के रतलाम-खंडवा सेक्शन से जुड़ा है।
कब जाएँ
अक्टूबर से मार्च तक आप कभी भी यहाँ जा सकते हैं। अक्टूबर-नवंबर का महीना आदर्श कहा जा सकता है।
बेजोड़ नमूना : साँची
भारतीय इतिहास की बौद्ध परंपरा के स्वर्ण युग का अमिट दस्तावेज है साँची। प्रदेश की राजधानी भोपाल से 46 किमी पर स्थित साँची के स्मारक भारत में स्थित बौद्ध स्मारकों में सर्वाधिक आकर्षक और अतुलनीय है।
एक खूबसूरत छोटी पहाड़ी पर स्थित इन स्मारकों में विभिन्न स्तूपों के अलावा गुप्तकालीन मंदिर और विहार आदि शामिल है। विश्व धरोहर की सूची में शामिल इन स्मारकों का निर्माण तीसरी सदी ई.पू. से लेकर बारहवीं सदी ई. तक किया गया है।
प्रमुख आकर्षण-
स्तूप -: साँची स्थित इन स्तूपों का निर्माण प्राय: धार्मिक उद्देश्यों को लेकर किया गया था। कहा जाता है कि इन स्तूपों में बुद्ध और उनके शिष्यों के अवशेष रखे गए हैं। सर्वाधिक प्रसिद्ध स्तूप क्रमांक एक का निर्माण महान मौर्य शासक अशोक ने करवाया था। यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि अशोक की पत्नी ‘देवी’ बेसनगर (वर्तमान विदिशा) के एक व्यापारी की बेटी थी। विदिशा साँची से 12 किमी दूर है।
स्तूप क्रमांक एक के चारो और स्थित चार द्वारों पर गौतम बुद्ध के जीवन की प्रमुख घटनाओं को चित्रों के द्वारा प्रदर्शित किया गया है। खास बात यह है कि इन चित्रों में बुद्ध को प्रतीकों के रूप में दिखाया गया है। ये प्रतीक घोड़े-हाथी, तोरण, स्तूप आदि के रूप में है।
स्तूप क्रमांक दो पहाड़ी के शिखर पर स्थित है और यह पत्थर की सुंदर चारदीवारी से घिरा हुआ है। स्तूप क्रमांक तीन, पहले स्तूप के पास स्थित हैं। इस स्तूप के अंदरूनी भाग में बुद्ध के दो शिष्यों सारिपुत्र और महामोगल्लेना के अवशेष पाए गए हैं।
अशोक स्तम्भ - यह स्तम्भ, मुख्य स्तूप के दक्षिणी द्वार के पास स्थित है। वर्तमान में इसका स्तंभ ही वहाँ है। चार सिंहों वाला इसका प्रमुख शीर्ष नीचे संग्रहालय में देखा जा सकता है। एक दूसरे की ओर पीठ किए हुए ये चार सिंह भारत के राष्ट्रीय प्रतीक हैं। यह स्तम्भ वास्तुकला की ग्रीक बौद्ध शैली का उत्कृषट नमूना है।
गुप्तकालीन मंदिर - अब लगभग खंडहर हो चुका यह मंदिर 5वीं शताब्दी में बना था। यह मंदिर भारतीय मंदिरों की प्राचीन शैली की झलक देता है।
बौद्ध विहार - साँची में प्राचीन बौद्ध विहारो के भग्नावशेष देखे जा सकते हैं। जहाँ तत्कालीन बौद्ध भिक्षु निवास करते थे।
बड़ा कटोरा - साँची में एक ही चट्टान को काटकर बनाया गया एक बड़ा कटोरा है। कहा जाता है कि सभी बौद्ध भिक्षु भिक्षा में मिला अन्न इसमें डाल देते थे, जिसे बाद में सभी को बाँट दिया जाता था।
संग्रहालय - पहाड़ी के ठीक नीचे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा संग्रहालय की स्थापना की गई है। इस संग्रहालय में साँची के क्षेत्रों में मिली विभिन्न वस्तुएँ संग्रहित है। संग्रहालय का प्रमुख आकर्षण है, अशोक स्तम्भ का शीर्ष, बुद्द की विभिन्न मूर्तियाँ तथा विहारों में रहने वाले भिक्षुओं के बरतन आदि।
साँची के नजदीक अन्य आकर्षण-
हेलियोडोरस स्तंभ - साँची से 12 किमी दूरी पर प्राचीन नगरी बेसनगर (विदिशा) स्थित है। यहाँ पाँचवी शताब्दी में ग्रीक राजदूत हेलियोडोरस द्वारा बनवाया गया स्तंभ दर्शनीय है।
उदयगिरी - विदिशा से चार किमी और साँची से सोलह किमी की दूरी पर स्थित हैं उदयगिरी की गु्फाएँ। इन गुफाओं में प्राचीन काल में हिंदू एवं जैन साधु-संत रहते थे। ऐतिहासिक महत्व की इन गुफाओं वाले पर्वत के शिखर पर छठी शताब्दी का गुप्तकालीन मंदिर है।
कब जाएँ - यूँ तो वर्षभर में किसी भी समय साँची की यात्रा की जा सकती है। लेकिन फिर भी अक्टूबर से मार्च तक का समय साँची जाने के लिए बेहतर होता है। नवंबर में साँची में चैत्यगिरी विहार का उत्सव मनाया जाता है। उस समय बुद्ध के शिष्यों के अवशेष भी लोगों के दर्शन के लिए रखे जाते हैं।
कैसे जाएँ - साँची, झाँसी- इटारसी रेलमार्ग पर स्थित है। यहाँ एक छोटा सा रेलवे स्टेशन भी है, परंतु नजदीकी बड़ा स्टेशन विदिशा 12 किमी दूर है। भोपाल से साँची की दूरी मात्र 46 किमी है। सड़क मार्ग द्वारा एक से डेढ़ घंटे में आसानी से पहुँचा जा सकता है। भोपाल से टैक्सियाँ और बसें उपलब्ध है। भोपाल हवाई मार्ग से भी देश के सभी बड़े शहरों से जुड़ा़ हुआ है।
कहाँ ठहरें - साँची में ठहरने के लिए अनेक सुविधाएँ हैं। मप्र पर्यटन की ओर से लॉज एवं टूरिस्ट कैफेटेरिया में रूकने और भोजन की व्यवस्था है। इसके अतिरिक्त अनेक रेस्ट हाउस और लॉज हैं, जहाँ आराम से रूका जा सकता है।
बजट - छोटी जगह होने के कारण साँची बहुत महंगी जगह नहीं है। यहाँ आराम से ठहर कर घूमने के लिए लगभग 5000 रूपए पर्याप्त है।
टिप्स - 1. एक ऐतिहासिक स्थल होने के कारण साँची में पर्यटन का पूरा आनंद लेने के लिए गाइड अवश्य कर लें।
2. नकली गाइडों और दलालों से सावधान रहें।
3. साँची का धार्मिक महत्व होने के कारण वहाँ मर्यादित आचरण करें।
सौंदर्य से परिपूर्ण हैं नर्मदा की संगमरमरी चट्टानें
नर्मदा के घाटों का अलौकिक सौंदर्य
-उद्गम से लेकर सागर समागम तक नर्मदा का जो तेज, जो सौंदर्य, जो अठखेलियाँ और जो अदाएँ दिखाई देती हैं वे जबलपुर के अलावा अन्यत्र दुर्लभ हैं। प्रकृति ने तो इस क्षेत्र में नर्मदा को अतुलित सौंदर्य प्रदान किया ही, स्वयं नर्मदा ने भी अपने हठ और तप से अपने सौंदर्य में वृद्धि इसी क्षेत्र में की है।
यहाँ नर्मदा ने हठ और तप से रास्ता भी बदला है। पहले कभी वह धुआँधार से उत्तर की ओर मुड़कर सपाट चौड़े मैदान की ओर बहती थी। उसकी धार के ठीक सामने का सौंदर्य संभवतः नर्मदा को भी आकर्षित करता होगा।
तभी तो लगातार जोर मारती लहरों से चट्टानों का सीना चीरकर हजारों वर्ष के कठोर संघर्ष के बाद नर्मदा ने यह सौंदर्य पाया है जिसे निहारने देश ही नहीं, विदेशी पर्यावरण प्रेमी भी खिंचे चले आते हैं। संगमरमरी चट्टानों के बीच बिखरा नर्मदा का अनूठा सौंदर्य देखते न तो मन अघाता है और न आँखें ही थकती हैं। भेड़ाघाट, तिलवाराघाट के आस-पास के क्षेत्र का इतिहास 150 से 180 करोड़ वर्ष पहले प्रारंभ होता है। कुछ वैज्ञानिक इसे 180 से 250 करोड़ वर्ष पुरानी भी मानते हैं।
भेड़ाघाट के नाम को लेकर अनेक किंवदंतियाँ प्रचलित हैं। प्राचीन काल में भृगु ऋषि का आश्रम इसी क्षेत्र में था। इस कारण भी इस स्थान को भेड़ाघाट कहा जाता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार इसी स्थल पर नर्मदा का बावनगंगा के साथ संगम होता है।
लोक भाषा में भेड़ा का अर्थ भिड़ना या मिलना है। इस मत को मानने वालों के अनुसार इसी संगम के कारण इस स्थान का नाम भेड़ाघाट हुआ।
एक अन्य मत के अनुसार यह स्थान 1,700 वर्ष पूर्व शक्ति का केंद्र था। शैव मत वालों के अलावा शक्ति के उपासक भी यहाँ आते थे इसलिए निश्चय ही यह स्थान कभी भैरवीघाट रहा होगा और बाद में अपभ्रंश होकर भेड़ाघाट हो गया। गुप्तोत्तर काल में संभवतः इस मंदिर का विस्तार किया गया और इसमें सप्त मातृकाओं की प्रतिमाएँ स्थापित की गईं थीं।
748 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला यह क्षेत्र आज शैव, वैष्णव, जैन तथा अन्य मत-मतांतर मानने वालों के लिए आस्था का केंद्र है। पर्यटन और सौंदर्य की दृष्टि से तो यह महत्वपूर्ण है ही। इस क्षेत्र में नौका विहार द्वारा भ्रमण करते समय नर्मदा के अलौकिक सौंदर्य के दर्शन होते हैं। बंदरकूदनी तक पहुँचते-पहुँचते पर्यटक संगमरमरी आभा से अभिभूत होता है और रंग-बिरंगे पत्थर उसे मुग्ध कर देते हैं।
जबलपुर के भेड़ाघाट में जहाँ से नौका विहार शुरू होता है वहाँ स्थित है पचमढ़ा का प्रसिद्ध मंदिर। यहाँ एक ही प्रांगण में चार मंदिर हैं। दो सौ साल पुराने इन मंदिरों का सौंदर्य अद्वितीय है। ये सभी मंदिर शिव को समर्पित हैं। जबलपुर में इसके अलावा भी अनेक ऐसे स्थान हैं जो नर्मदा क्षेत्र के पर्यटन में चार चाँद लगाते हैं। इनमें ग्वारीघाट, तिलवाराघाट, लम्हेटाघाट, गोपालपुर, घुघुआ फॉल, चौंसठ योगिनी मंदिर और पंचवटीघाट जैसे सौंदर्य से परिपूर्ण स्थल हैं।
इन क्षेत्रों में भी सौंदर्य की अपनी छटा है पर भेड़ाघाट के सौंदर्य के आगे सब फीके नजर आते हैं। जबलपुर में नर्मदा की आस्था का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र है ग्वारीघाट। शाम होते ही यहाँ का सौंदर्य अद्भुत होता है। घाट पर खड़े होकर नर्मदा की जलराशि में तैरते असंख्य दीप ऐसे लगते हैं मानो पूरा आकाश ही धरती पर उतर आया हो। नर्मदा की मद्धिम लहरों में झिलमिलाते दीपों का प्रकाश मन को प्रसन्न कर देता है।
रोज शाम को दीपदान करने वालों का रेला यहाँ पहुँचता है। नदी के बीच में देवी नर्मदा का मंदिर श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण है। नाव से वहाँ तक पहुँचकर पूजा करना रोमांचक अनुभव है। इसके अलावा घाट पर अनेक मंदिर हैं, जिनमें कुछ प्राचीन हैं तो कुछ हाल के वर्षों में बने हैं। घाट से दूर जाने पर माँ काली का प्राचीन और सिद्ध मंदिर है।
विभिन्न संतों के आश्रम भी आस-पास होने के कारण यहाँ श्रद्धालुओं का ताँता लगा रहता है। कहते हैं नर्मदा के दर्शन से ही सारे पाप नष्ट होते हैं। इसलिए यहाँ दर्शनार्थियों का भी ताँता लगता है। ग्वारीघाट में नौका विहार की भी सुविधा है।
नर्मदा का दूसरा महत्वपूर्ण घाट है तिलवाराघाट। यहाँ लगने वाला मकर संक्रांति का मेला बड़ा प्रसिद्ध है। इस मेले का इतिहास भी प्राचीन है। यहाँ स्थित मंदिर भी बहुत प्राचीन है। पुराने समय से गोपालपुर स्थित मंदिर की बाहरी छटा अत्यंत सुंदर है।
अपने में इतिहास समेटे बाग की गुफाएँ
प्राकृतिक सौन्दर्य के साथ इतिहासबोध
'शब-ए-मालवा' से 150 किलोमीटर दूर एक ऐसी एतेहासिक और प्राकृतिक धरोहर स्थित है जिसका ज्यादातर लोगों ने नाम तो सुना है लेकिन देखा कम ही है। दुर्गम स्थल पर स्थित होने के कारण सैर-सपाटा पसंद करने वाले लोग उस तरफ आसानी से रुख नहीं करते लेकिन दूर देश से आने वाले विदेशी पर्यटकों के लिए यह धरोहर एक जिज्ञासा का विषय हमेशा से बनी रहती है।
खासतौर से बौद्ध धर्म से जुड़े लोगों के लिए यह किसी तीर्थ से कम नहीं है। यह धार जिले में स्थित विश्व प्रसिद्ध बाग की गुफाएँ हैं जो अपने भित्ति चित्रों की वजह से अजंता के समकक्ष मानी जाती हैं। इन्हें भारत सरकार ने राष्ट्रीय महत्व का सुरक्षित पुरा स्मारक घोषित कर रखा है।
क्या है बाग में :
बाग नदी और बाग कस्बे के नाम की वजह से इन गुफाओं को 'बाग की गुफाओं' के नाम से जाना जाता है। गुफाओं के बनाने के लिए खूबसूरत जगह का चुनना यह बताता है कि बाग गुफा मंडप के निर्माता प्राकृतिक सौन्दर्य के उपासक थे। वर्ष 1953 में भारत सरकार द्वारा बाग गुफाओं को 'राष्ट्रीय स्मारक' घोषित किया गया। इसके संरक्षण का जिम्मा पुरातत्व विभाग को सौंपा गया। विंध्याचल पर्वत श्रृंखला के एक रेतीले पत्थर के पर्वत पर निर्मित इन गुफाओं की संख्या 9 है।
पहली गुफा 'गृह गुफा' कहलाती है। दूसरी गुफा 'पांडव गुफा' के नाम से प्रख्यात है। यह बाकी सब गुफाओं से अधिक बड़ी और अधिक सुरक्षित प्रतीत होती है। तीसरी गुफा का नाम 'हाथीखाना' है। इसमें बौद्ध भिक्षुओं के रहने के लिए कोठरियाँ बनी हुई हैं। चौथी गुफा को 'रंगमहल' कहा जाता है। पाँचवी गुफा बौद्ध भिक्षुओं के एक स्थान पर बैठकर प्रवचन सुनने के लिए बनाई गई थी। पाँचवी और छठी गुफा आपस में मिली हुई हैं तथा इनके बीच का सभा मंडप 46 फुट वर्गाकार है।
सातवीं, आठवीं और नौवीं गुफाओं की हालत ठीक नहीं है और वे अवशेष मात्र ही नजर आती हैं। इन गुफाओं की एक विशेषता यह भी है कि इनके अंदर जाकर इतनी ठंडक का अहसास होता है जैसे आप किसी एयरकंडीशन कक्ष में आ गए हों। गुफाओं के अंदर कई जगह से पहाड़ों से प्राकृतिक तरीके से पानी भी रिसकर आता रहता है। ये गुफाएँ कई शताब्दी पुरानी हैं।
लेकिन इनका काल निर्धारण आज भी नहीं हो पाया है। इतिहासविद इन्हें अजंता से पुराना तो नहीं मानते लेकिन यह जरूर मानते हैं कि यहाँ के भित्ति चित्रों में अंकित मनुष्यों की वेश-भूषा व अलंकार आदि से इनका समय वही निश्चित होता है जो अजंता की पहली और दूसरी गुफाओं का है। विख्यात इतिहासविद और पुराविद श्री कुमार स्वामी ने इन्हें पाँचवी शताब्दी का माना है।
भित्ति चित्र अब संग्रहालय में :
बाग की गुफाओं के भित्ति चित्र कई शताब्दियों तक प्रकृति ने सहेजकर रखे थे। बाद में जंगलों की कटाई और गुफाओं में बाबाओं-महात्माओं द्वारा आग जलाने और धुँआ करने के बाद इन भित्ति चित्रों पर संकट मंडराने लगा। गुफाओं के अंदर चमगादड़ों ने भी अपने डेरे बना लिए थे। नमी और आर्द्रता की वजह से भी भित्ति चित्र प्रभावित हो रहे थे। तब इन्हें गुफा से हटाने का निर्णय लिया गया।
1982 से इन चित्रों को दीवारों व छतों से निकालने का कार्य शुरू हुआ। नमी से प्रभावित इन चित्रों को तेज धार वाले औजारों से काटकर दीवारों से अलग किया गया। निकाले गए चित्रों को मजबूती देने के उद्देश्य से फाइबर ग्लास एवं अन्य पदार्थों से माउंटिंग की गई। चित्रों को वापस मूल स्वरूप में लाने के लिए उनकी रासायनिक पदार्थों से फैंसिंग की गई।
बाद में इन चित्रों को गुफाओं के सामने निर्मित संग्रहालय में रखा गया। इन चित्रों को अब संग्रहालय में ही देखा जा सकता है। गुफाओं के भीतर अब सिर्फ मूर्तियाँ ही बची हैं जिनमें से अधिकांश बुद्ध की हैं या फिर बुद्ध के जीवनकाल से जुड़ी घटनाओं को बयान करती हैं।
कैसे जाएँ, कब जाएँ :
बाग की गुफाएँ बहुत सुंदर स्थान पर स्थित हैं। सामने बाग नदी बहती है और चारों ओर हरियाली तथा जंगल हैं। धार जिले में विंध्य श्रेणी के दक्षिणी ढाल पर, नर्मदा नदी की एक सहायक नदी बागवती के किनारे उसकी सतह से 150 फुट की ऊँचाई पर यह विश्व प्रसिद्ध गुफाएँ हैं। अगर आप स्वंय के वाहन से बाग जाना चाहते हैं तो उसमें काफी सहूलियत रहेगी। इंदौर से 65 किलोमीटर दूर है धार।
धार से 71 किलोमीटर की दूरी पर आदिवासी क्षेत्र टांडा है। यहाँ पहुँचने के बाद बाग कस्बा सिर्फ 20 किमी दूर रह जाता है। बाग पहुँचने के बाद 7 किमी का रास्ता तय करके इन गुफाओं तक पहुँचा जा सकता है। यहाँ जाने का सबसे अच्छा मौसम बारिश का है क्योंकि गुफाओं के सामने बहने वाली बाग नदी उस समय बहती है। यह मौसमी नदी है और गर्मियाँ आने तक सूख जाती है। नदी के सूखने से वहाँ का दृश्य थोड़ा अधूरा-अधूरा सा लगने लगता है।
इन्दौर का प्राणी संग्रहालय
केंद्रीय संग्रहालय, इंदौर एक राज्य स्तरीय संग्रहालय है, जहाँ मालवा से प्राप्त पुरावशेषों को एकत्रित कर शोधाथिर्यों एवं पर्यटकों एवं जनसामान्य को जानकारी उपलब्ध कराई जाती है। केंद्रीय संग्रहालय भवन में मूर्तियाँ, जो अधिकांश परमार कालीन विशेषता लिए हुए हैं, के अतिरिक्त अभिलेख, मुद्राएँ, इटैलियन कलाकृतियाँ प्रदर्शित की गई हैं।
केंद्रीय संग्रहालय इंदौर की स्थापना 29 नवंबर, 1923 में हुई थी। यह तत्कालीन आयुक्त डॉ. अरुण्डले के निर्देशन में नररत्न मंदिर से प्रारम्भ हुआ। इसमें सबसे पहले 60 छायाचित्र तथा इस्लामी पुस्तक तथा 100 ग्रंथ रखे गए। एक अक्टूबर 1929 को इस संस्था को संग्रहालय में परिवर्तित कर दिया गया और कृष्णपुरा स्थित भवन, जहाँ वर्तमान में देवलालीकर कला वीथिका है, में दर्शकों के लिए प्रारंभ किया गया।
सन् 1930 में दसवीं शती की प्रतिमाएँ और प्रस्तर अभिलेख, उनके छापे, कुछ ताम्रपत्र संग्रहीत किए गए। सन् 1931 में यह संग्रहालय, जो शिक्षा विभाग के अधीन था, पुरातत्व विभाग को सौंप दिया गया। स्थानीय लोगों के रुझान को देखते हुए आगरा-बाम्बे मार्ग पर नवीन संग्रहालय भवन की स्थापना कर यहाँ पर संग्रहालय विधा के अनुरूप पुरावशेषों को प्रदर्शित किया गया। इस संग्रहालय का कुल क्षेत्रफल 10804 वर्गफुट है तथा यह दोमंजिला है।
इस संग्रहालय में पुरावशेषों के प्रदर्शन के लिए छः वीथिकाएँ बनाई गई हैं। स्थानीय संग्रहों के साथ-साथ मध्यप्रदेश में हुए उत्खननों से प्राप्त पुरावशेष, सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेषों के प्रदर्शन के साथ-साथ हिंगलाजगढ़ की परमारकालीन विशिष्ट प्रतिमाओं का संग्रह इस संग्रहालय के लिए महत्वपू्र्ण माना जाता है। प्रस्तर अभिलेखों व उनके छापों के साथ-साथ ताम्र पत्रों को भी प्रदर्शित किया गया है। प्राचीन मुद्रा प्रणाली को जानने के लिए मुद्रा प्रचलन से लेकर मुगलकालीन सिक्कों तक को प्रदर्शित किया गया है।
पुरावस्तु वीथी
यहाँ से संग्रहालय का वास्तविक प्रदर्शन प्रारंभ होता है। सबसे पहले पुरावस्तु वीथिका है, जिसमें मानव का विकास तथा उसकी संस्कृतियों के विस्तार को क्रमबद्ध रूप में प्रदर्शित किया गया है। इनमें प्रदेश के विभिन्न स्थानों से प्राप्त मानव एवं पशुओं के जीवाश्म तथा पाषाण कालीन उपकरण प्रदर्शित हैं। बताया गया है कि इसी दीर्घा में सिंधु-घाटी की सभ्यता से संबंधित मोहन-जोदड़ो के उत्खनन में प्राप्त अश्मोपकरण, ताम्र उपकरण आदि प्रदर्शित हैं। इनकी तिथि 2350 ईसा पूर्व के लगभग मानी जाती है।
मध्य प्रदेश के संग्रहालय
जीवन में एक बहुत ही अहम भूमिका है इतिहास की। ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़ा हुआ है मनुष्य। आइए मध्यप्रदेश के कुछ संग्रहालयों में हम इतिहास को करीब से देखें।
भोपाल के प्रसिद्ध बिड़ला संग्रहालय में विभिन्न प्रकार की सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक प्रतिमाएँ रखी गई हैं। आदिकाल में जब मनुष्य पत्थर इस्तेमाल करते थे उनके भी अंग यहाँ पर देखे जा सकते हैं।
सातवीं सदी से लेकर तेरहवीं सदी तक की ऐतिहासिक जगहों के चित्र प्रदर्शित किए गए हैं। पुराने सिक्के, पत्तों पर लिखे गए शब्द चित्र भी प्रदर्शित किए गए हैं। टेराकोटा से बनाई गई प्रतिमाएँ यहाँ पर प्रयोग की जाती हैं।
भोपाल में राष्ट्रीय (सेंट्रल) संग्रहालय 1949 में स्थापित किया गया था। चित्रकला, पौराणिक सिक्के जिन पर राजा महाराजाओं एवं अँग्रेज शासकों के चित्र बनाए गए। ऐसे सिक्के यहाँ पर पाए जाते हैं। ताँबे या पीतल से बनाई गई वस्तुएँ मिलती हैं। लकड़ी से बनाई गई वस्तुएँ प्रदर्शित की जाती हैं। हाथ से बनाए गए भिन्न प्रकार की प्रतिमाएँ, कढ़ाई की गई वस्तुएँ देखी जा सकती हैं।
भोपाल में भारत भवन एक अलग प्रकार का संग्रहालय है। रंग महल, अन्हद, शास्त्रीय संगीत के भवन वागर्थ पुस्कालय जहाँ पर कविताओं की पुस्तकें रखी गई हैं। बहारि रंगमंच जहाँ पर नाटक, खेल, हास्य रंग आयोजित किए जाते हैं। मुख्य रूप से रूपांकर चित्रालय में असंख्य प्रकार के चित्र प्रदर्शित करते हैं। रूपांकर में दो प्रकार की चित्रकला देखी जा सकती है।
एक स्थान है जहाँ पर वर्तमान के चित्र एवं नक्काशी की प्रतिमाएँ प्रदर्शित की गई हैं। परंतु कुछ विभागों में लोक गीत प्रस्तुत किए जाते हैं। 4000 के करीब वस्तुएँ मध्यप्रदेश से संग्रहित की गई हैं। विभिन्न जाति की संस्कृति एवं कला से चित्र के माध्यम से परिचित किए गए हैं। इस राज्य में विभिन्न प्रकार के चित्र नजर आते हैं। भिन्न क्षेत्रों से वस्तुएँ संग्रहालय में सुरक्षित रूप से प्रदर्शित कर दिए गए हैं। जीव, पक्षी एवं खिलौने के रूप में वस्तुएँ प्रदर्शित किए गए हैं।
ग्वालियर के पुरात्तात्त्विक संग्रहालय
वर्ष 1922 में इस संग्रहालय को स्थापित किया गया था। ताँबे की वस्तुओं पर सुंदर चित्र अंकित किए गए हैं। पत्थरों के स्तम्भ स्थापित किए गए हैं। टैराकौटा की प्रतिमाएँ वहाँ पर सजाई गई थीं। पद्मावती, बेसावनगर, उज्जयिनी एवं महेश्वर से पौराणिक वस्तुएँ मिली हैं।
साँची के पुरात्तात्त्विक संग्रहालय
राजा अशोक ने यहाँ पर स्तम्भ स्थापित किया था जिस पर शेर की मूर्ति लगाई गई थी। भगवान बुद्ध की प्रतिमाएँ श्रद्धापूवर्क स्थापित की गई थीं। भगवान गणेश की मूर्ति भी वहाँ पर है। साँची में सबसे प्रसिद्ध हैं सम्राट अशोक के बनाए गए स्तूप। मंदिर, मठ एवं स्तूप यहाँ पर स्थापित किए गए हैं।
केंद्रीय संग्रहालय
सन् 1929 में स्थापित संग्रहालय सबसे पुराना संग्रहालय है। मध्यप्रदेश के मालवा जिले में इस केंद्रीय संग्रहालय को स्थापित किया गया था। वहाँ पर विभिन्न प्रकार के चित्र, प्रतिमाएँ भी देखी जा सकती हैं।
ऐतिहासिक स्थलों की नगरी शिवपुरी
हल्की-हल्की बूँदों की वर्षा हो रही थी। प्रभात ने घने काले बादल की चुनरी ओढ़ रखी थी। सखियों के साथ मैं टाटा सफारी में सवार होकर आगरा-मुंबई राष्ट्रीय राजमार्ग पर जा रही थी कि हमें एक ढाबा खुला दिखाई दिया। प्रातः पाँच बजे थे, मन कर रहा था कि हमें गरमागरम चाय मिल जाए तो सफर तय करना और भी आसान हो जाएगा।
गाड़ी ढाबे के पास रुकी, हमारी नज़र कोयले की आँच पर बन रही चाय से निकलते धुएँ पर पड़ी एवं उसके साथ-साथ नाश्ते के लिए बाजरे की रोटी तथा सब्जी मिली। ढाबे के चारों ओर हरियाली नज़र आ रही थी, रंग-बिरंगे महुए एवं पलास के फूल खिले हुए थे जिन पर वर्षा की बूँदें मोती की तरह चमक रही थीं।
इंदौर से शिवपुरी तक का सफर हम लगभग तय कर चुके थे। गुना क्षेत्र से हम गुजरते हुए शिवपुरी ज़िले में पहुँचे। हमारी नज़र यहाँ के पहा़डों पर पड़ी, जिन पर हरियाली थी एवं घने जंगल स्थित थे। वादियों के मध्य प्रकृति की गोद से झरने बह रहे थे एवं उठती सूर्य की किरणों के प्रकाश में वे झिलमिलाते, बलखाते हुए नदियों की ओर बह रहे थे।
गुना जिले से हम जब शिवपुरी नगर की ओर गाड़ी में सफर कर रहे थे तब हमने देखा कि सिंध नदी गुना से उत्तर दिशा से बहती हुई भिड़ से चंबल नदी से जा मिलती है। शिवपुरी की चार मुख्य नदियाँ हैं सिंध, कूनो, बेतवा एवं पार्वती।
कहते हैं कि शिवपुरी का माधव नेशनल पार्क, विभिन्न प्रकार के वन्यजीवों के लिए बहुत ही प्रसिद्ध है। मुख्य रूप से नहार बाघ, तेंदुआ, लक्कड़ बग्घा, तरक्षु, भालू, सांभर आदि जानवर यहाँ पर पाए जाते हैं। वर्षा के आने से मोर अपने रंग-बिरंगे पंख को फैला देते हैं। उपस्थित जनता खूबसूरत दृश्य की प्रशंसा करने लगी तथा कैमरे से छायाचित्र लेने लगी।
नेशनल पार्क में पक्षी एवं जानवरों का हमने जीवंत रूप देखा। माधव विलास महल में सिंधिया राजवंश ग्रीष्म काल के समय निवास करते थे। वन वाटिका के मध्य स्थित यह महल गुलाब के फूल के समान प्रतीत हो रहा था। महल के भीतर कला की सुंदर मूर्तियाँ प्रदर्शित थीं। सुंदर आकृतियों वाले महल की छत से शिवपुरी नगर एवं माधव नेशनल पार्क नजर आते हैं। खूबसूरत चित्रकला से महल के विभिन्न कक्षों को सजाया गया था। अब यह महल भारत सरकार के अधीन है।
शिवपुरी में पर्यटक महाराजा एवं राजकुमारों द्वारा बनाई गई छतरियों को देखने आते हैं। इस ऐतिहासिक स्थल पर विभिन्न गाथाएँ एवं प्राचीन कहानियाँ सुन सकते हैं। ये छतरियाँ संगमरमर की हैं एवं इन पर सुंदर आकृतियाँ उकेरी गई हैं। सिंधिया राजकुमारों ने इन्हें मुगल वाटिका में स्थापित किया था। इस स्थान पर माधवराव सिंधिया की छतरी स्थित है उसी तरह महारानी सँख्याराजे सिंधिया की सुंदर छतरी भी है। हिंदू एवं इस्लामी के वास्तुशिल्पीय मिश्रित रूप नजर आते हैं। राजपूत एवं मुगल परम्पराओं के वास्तुशिल्पीय को रूपांतर करती कला दर्शकों को अपनी ओर आकृष्ट करती है।
ऐतिहासिक स्थलों के दर्शन करने में काफी देर हो गई थी। सूरज ढलने वाला था कि हमारी दृष्टि जॉर्ज किले की ओर आकर्षित हुई। सँख्या सागर के तट पर स्थित इस किले को जीवाजीराव सिंधिया ने निर्मित किया था। परंतु इस किले की एक विशेषता है जो अक्सर आम किलों के स्थान पर देखी नहीं जाती, वह यह है कि यह महल माधव नेशनल पार्क के अंदर स्थित है। इसलिए महल की सुंदरता और निखर उठती है जब किले के चारों ओर घने जंगल स्थित हैं।
प्राचीन महलों एवं प्रसिद्ध पर्यटक स्थलों के दर्शन कर जब हम वापस लौट रहे थे तब हमने वहाँ के स्थानीय रंगमंच एवं लोकगीत सुने जो आदिवासी लोगों ने पात्रों के माध्यम से दर्शाए थे। कार्यक्रम के अंत में हम होटल वापस लौट आए।
शिवशंभू का अनूठा धाम
ओंकारेश्वर हिंदू धर्म के पवित्र प्रतीक 'ओम' को प्रतिध्वनित करता है। यह हर उम्र के तीर्थ यात्रियों को अपनी ओर आकर्षित करता है। यहाँ नर्मदा और कावेरी का संगम है जिसमें श्रद्धालु डुबकी लगाने के बाद पवित्र ज्योतिर्लिंग के दर्शन को जाते हैं। ओंकारेश्वर का शिवलिंग देश के बारह पवित्र ज्योतिर्लिंगों में से एक है। मंदिर को ओंकार मांधाता मंदिर के नाम से जाना जाता है।
मध्यप्रदेश के अन्य मंदिरों की तरह ही यह मंदिर भी प्रकृति से मनुष्य के जुड़ाव को प्रदर्शित करता है। यहाँ प्रकृति ने स्वयं दो पर्वतों के बीच एक खाई को जोड़कर ओम का आकार ग्रहण किया है।
मंदिर के उत्तर में विंध्य पर्वत और दक्षिण में सतपुड़ा के बीच नर्मदा नदी मूक वाहक की तरह है। पहले नदी में बहुतायत में घड़ियाल थे। अब भी यहाँ बड़ी संख्या में मछलियाँ हैं जिन्हें हाथों से दाना खिलाने का सुख प्राप्त किया जा सकता है। नदी पर स्थित पुल यहाँ की सुंदरता को द्विगुणित करता है।
ओंकार मांधाता मंदिर
यह मंदिर नर्मदा द्वारा काटे गए एक मील लंबे और आधा मील चौड़े द्वीप पर स्थित है। इसके नर्म पत्थरों को काटकर बारीक नक्काशी उकेरी गई है और विशेष रूप से इसका ऊपर का भाग देखने लायक है। मंदिर की छत भी बहुत सुंदरता से उकेरी गई है। मंदिर को घेरे हुए बरामदे में बने स्तंभों पर वृत्त, बहुकोणीय आकृतियाँ और वर्ग बने हुए हैं।
सिद्धनाथ मंदिर
यह मध्यकाल की ब्राह्मण कला का बेहतरीन नमूना है। इसकी विशेषता बाहरी दीवारों पर हाथियों की खूबसूरत नक्काशी है।
चौबीस अवतार
यहाँ हिंदुओं और जैन मंदिरों का समूह है। हरेक मंदिर स्थापत्य के लिहाज से बेहतरीन कला का नमूना पेश करता है।
सातमातृका मंदिर
ओंकारेश्वर से छ: किलोमीटर दूर यहाँ दसवीं शताब्दी के मंदिरों का समूह है।
काजल रानी की गुफा
ओंकारेश्वर से नौ किलोमीटर दूर यह प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर स्थल है। क्षितिज तक फैले चौड़े हरियाले मैदान धरती से अंबर का मेल खाते से लगते हैं। यहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य अवर्णनीय है।
कैसे जाएँ
हवाई मार्ग
सबसे निकट का हवाई अड्डा इंदौर 77 किमी. दूर है जो मुंबई, भोपाल और दिल्ली से जुड़ा है।
सड़क मार्ग
यह इंदौर, उज्जैन और खंडवा से सड़क मार्ग से जुड़ा है।
रेल मार्ग
सबसे निकट का रेल मुख्यालय ओंकारेश्वर रोड 12 किमी. दूर है। यह पश्चिम रेलवे के रतलाम-खंडवा सेक्शन से जुड़ा है।
कब जाएँ
अक्टूबर से मार्च तक आप कभी भी यहाँ जा सकते हैं। अक्टूबर-नवंबर का महीना आदर्श कहा जा सकता है।
बेजोड़ नमूना : साँची
भारतीय इतिहास की बौद्ध परंपरा के स्वर्ण युग का अमिट दस्तावेज है साँची। प्रदेश की राजधानी भोपाल से 46 किमी पर स्थित साँची के स्मारक भारत में स्थित बौद्ध स्मारकों में सर्वाधिक आकर्षक और अतुलनीय है।
एक खूबसूरत छोटी पहाड़ी पर स्थित इन स्मारकों में विभिन्न स्तूपों के अलावा गुप्तकालीन मंदिर और विहार आदि शामिल है। विश्व धरोहर की सूची में शामिल इन स्मारकों का निर्माण तीसरी सदी ई.पू. से लेकर बारहवीं सदी ई. तक किया गया है।
प्रमुख आकर्षण-
स्तूप -: साँची स्थित इन स्तूपों का निर्माण प्राय: धार्मिक उद्देश्यों को लेकर किया गया था। कहा जाता है कि इन स्तूपों में बुद्ध और उनके शिष्यों के अवशेष रखे गए हैं। सर्वाधिक प्रसिद्ध स्तूप क्रमांक एक का निर्माण महान मौर्य शासक अशोक ने करवाया था। यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि अशोक की पत्नी ‘देवी’ बेसनगर (वर्तमान विदिशा) के एक व्यापारी की बेटी थी। विदिशा साँची से 12 किमी दूर है।
स्तूप क्रमांक एक के चारो और स्थित चार द्वारों पर गौतम बुद्ध के जीवन की प्रमुख घटनाओं को चित्रों के द्वारा प्रदर्शित किया गया है। खास बात यह है कि इन चित्रों में बुद्ध को प्रतीकों के रूप में दिखाया गया है। ये प्रतीक घोड़े-हाथी, तोरण, स्तूप आदि के रूप में है।
स्तूप क्रमांक दो पहाड़ी के शिखर पर स्थित है और यह पत्थर की सुंदर चारदीवारी से घिरा हुआ है। स्तूप क्रमांक तीन, पहले स्तूप के पास स्थित हैं। इस स्तूप के अंदरूनी भाग में बुद्ध के दो शिष्यों सारिपुत्र और महामोगल्लेना के अवशेष पाए गए हैं।
अशोक स्तम्भ - यह स्तम्भ, मुख्य स्तूप के दक्षिणी द्वार के पास स्थित है। वर्तमान में इसका स्तंभ ही वहाँ है। चार सिंहों वाला इसका प्रमुख शीर्ष नीचे संग्रहालय में देखा जा सकता है। एक दूसरे की ओर पीठ किए हुए ये चार सिंह भारत के राष्ट्रीय प्रतीक हैं। यह स्तम्भ वास्तुकला की ग्रीक बौद्ध शैली का उत्कृषट नमूना है।
गुप्तकालीन मंदिर - अब लगभग खंडहर हो चुका यह मंदिर 5वीं शताब्दी में बना था। यह मंदिर भारतीय मंदिरों की प्राचीन शैली की झलक देता है।
बौद्ध विहार - साँची में प्राचीन बौद्ध विहारो के भग्नावशेष देखे जा सकते हैं। जहाँ तत्कालीन बौद्ध भिक्षु निवास करते थे।
बड़ा कटोरा - साँची में एक ही चट्टान को काटकर बनाया गया एक बड़ा कटोरा है। कहा जाता है कि सभी बौद्ध भिक्षु भिक्षा में मिला अन्न इसमें डाल देते थे, जिसे बाद में सभी को बाँट दिया जाता था।
संग्रहालय - पहाड़ी के ठीक नीचे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा संग्रहालय की स्थापना की गई है। इस संग्रहालय में साँची के क्षेत्रों में मिली विभिन्न वस्तुएँ संग्रहित है। संग्रहालय का प्रमुख आकर्षण है, अशोक स्तम्भ का शीर्ष, बुद्द की विभिन्न मूर्तियाँ तथा विहारों में रहने वाले भिक्षुओं के बरतन आदि।
साँची के नजदीक अन्य आकर्षण-
हेलियोडोरस स्तंभ - साँची से 12 किमी दूरी पर प्राचीन नगरी बेसनगर (विदिशा) स्थित है। यहाँ पाँचवी शताब्दी में ग्रीक राजदूत हेलियोडोरस द्वारा बनवाया गया स्तंभ दर्शनीय है।
उदयगिरी - विदिशा से चार किमी और साँची से सोलह किमी की दूरी पर स्थित हैं उदयगिरी की गु्फाएँ। इन गुफाओं में प्राचीन काल में हिंदू एवं जैन साधु-संत रहते थे। ऐतिहासिक महत्व की इन गुफाओं वाले पर्वत के शिखर पर छठी शताब्दी का गुप्तकालीन मंदिर है।
कब जाएँ - यूँ तो वर्षभर में किसी भी समय साँची की यात्रा की जा सकती है। लेकिन फिर भी अक्टूबर से मार्च तक का समय साँची जाने के लिए बेहतर होता है। नवंबर में साँची में चैत्यगिरी विहार का उत्सव मनाया जाता है। उस समय बुद्ध के शिष्यों के अवशेष भी लोगों के दर्शन के लिए रखे जाते हैं।
कैसे जाएँ - साँची, झाँसी- इटारसी रेलमार्ग पर स्थित है। यहाँ एक छोटा सा रेलवे स्टेशन भी है, परंतु नजदीकी बड़ा स्टेशन विदिशा 12 किमी दूर है। भोपाल से साँची की दूरी मात्र 46 किमी है। सड़क मार्ग द्वारा एक से डेढ़ घंटे में आसानी से पहुँचा जा सकता है। भोपाल से टैक्सियाँ और बसें उपलब्ध है। भोपाल हवाई मार्ग से भी देश के सभी बड़े शहरों से जुड़ा़ हुआ है।
कहाँ ठहरें - साँची में ठहरने के लिए अनेक सुविधाएँ हैं। मप्र पर्यटन की ओर से लॉज एवं टूरिस्ट कैफेटेरिया में रूकने और भोजन की व्यवस्था है। इसके अतिरिक्त अनेक रेस्ट हाउस और लॉज हैं, जहाँ आराम से रूका जा सकता है।
बजट - छोटी जगह होने के कारण साँची बहुत महंगी जगह नहीं है। यहाँ आराम से ठहर कर घूमने के लिए लगभग 5000 रूपए पर्याप्त है।
टिप्स - 1. एक ऐतिहासिक स्थल होने के कारण साँची में पर्यटन का पूरा आनंद लेने के लिए गाइड अवश्य कर लें।
2. नकली गाइडों और दलालों से सावधान रहें।
3. साँची का धार्मिक महत्व होने के कारण वहाँ मर्यादित आचरण करें।
सौंदर्य से परिपूर्ण हैं नर्मदा की संगमरमरी चट्टानें
नर्मदा के घाटों का अलौकिक सौंदर्य
-उद्गम से लेकर सागर समागम तक नर्मदा का जो तेज, जो सौंदर्य, जो अठखेलियाँ और जो अदाएँ दिखाई देती हैं वे जबलपुर के अलावा अन्यत्र दुर्लभ हैं। प्रकृति ने तो इस क्षेत्र में नर्मदा को अतुलित सौंदर्य प्रदान किया ही, स्वयं नर्मदा ने भी अपने हठ और तप से अपने सौंदर्य में वृद्धि इसी क्षेत्र में की है।
यहाँ नर्मदा ने हठ और तप से रास्ता भी बदला है। पहले कभी वह धुआँधार से उत्तर की ओर मुड़कर सपाट चौड़े मैदान की ओर बहती थी। उसकी धार के ठीक सामने का सौंदर्य संभवतः नर्मदा को भी आकर्षित करता होगा।
तभी तो लगातार जोर मारती लहरों से चट्टानों का सीना चीरकर हजारों वर्ष के कठोर संघर्ष के बाद नर्मदा ने यह सौंदर्य पाया है जिसे निहारने देश ही नहीं, विदेशी पर्यावरण प्रेमी भी खिंचे चले आते हैं। संगमरमरी चट्टानों के बीच बिखरा नर्मदा का अनूठा सौंदर्य देखते न तो मन अघाता है और न आँखें ही थकती हैं। भेड़ाघाट, तिलवाराघाट के आस-पास के क्षेत्र का इतिहास 150 से 180 करोड़ वर्ष पहले प्रारंभ होता है। कुछ वैज्ञानिक इसे 180 से 250 करोड़ वर्ष पुरानी भी मानते हैं।
भेड़ाघाट के नाम को लेकर अनेक किंवदंतियाँ प्रचलित हैं। प्राचीन काल में भृगु ऋषि का आश्रम इसी क्षेत्र में था। इस कारण भी इस स्थान को भेड़ाघाट कहा जाता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार इसी स्थल पर नर्मदा का बावनगंगा के साथ संगम होता है।
लोक भाषा में भेड़ा का अर्थ भिड़ना या मिलना है। इस मत को मानने वालों के अनुसार इसी संगम के कारण इस स्थान का नाम भेड़ाघाट हुआ।
एक अन्य मत के अनुसार यह स्थान 1,700 वर्ष पूर्व शक्ति का केंद्र था। शैव मत वालों के अलावा शक्ति के उपासक भी यहाँ आते थे इसलिए निश्चय ही यह स्थान कभी भैरवीघाट रहा होगा और बाद में अपभ्रंश होकर भेड़ाघाट हो गया। गुप्तोत्तर काल में संभवतः इस मंदिर का विस्तार किया गया और इसमें सप्त मातृकाओं की प्रतिमाएँ स्थापित की गईं थीं।
748 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला यह क्षेत्र आज शैव, वैष्णव, जैन तथा अन्य मत-मतांतर मानने वालों के लिए आस्था का केंद्र है। पर्यटन और सौंदर्य की दृष्टि से तो यह महत्वपूर्ण है ही। इस क्षेत्र में नौका विहार द्वारा भ्रमण करते समय नर्मदा के अलौकिक सौंदर्य के दर्शन होते हैं। बंदरकूदनी तक पहुँचते-पहुँचते पर्यटक संगमरमरी आभा से अभिभूत होता है और रंग-बिरंगे पत्थर उसे मुग्ध कर देते हैं।
जबलपुर के भेड़ाघाट में जहाँ से नौका विहार शुरू होता है वहाँ स्थित है पचमढ़ा का प्रसिद्ध मंदिर। यहाँ एक ही प्रांगण में चार मंदिर हैं। दो सौ साल पुराने इन मंदिरों का सौंदर्य अद्वितीय है। ये सभी मंदिर शिव को समर्पित हैं। जबलपुर में इसके अलावा भी अनेक ऐसे स्थान हैं जो नर्मदा क्षेत्र के पर्यटन में चार चाँद लगाते हैं। इनमें ग्वारीघाट, तिलवाराघाट, लम्हेटाघाट, गोपालपुर, घुघुआ फॉल, चौंसठ योगिनी मंदिर और पंचवटीघाट जैसे सौंदर्य से परिपूर्ण स्थल हैं।
इन क्षेत्रों में भी सौंदर्य की अपनी छटा है पर भेड़ाघाट के सौंदर्य के आगे सब फीके नजर आते हैं। जबलपुर में नर्मदा की आस्था का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र है ग्वारीघाट। शाम होते ही यहाँ का सौंदर्य अद्भुत होता है। घाट पर खड़े होकर नर्मदा की जलराशि में तैरते असंख्य दीप ऐसे लगते हैं मानो पूरा आकाश ही धरती पर उतर आया हो। नर्मदा की मद्धिम लहरों में झिलमिलाते दीपों का प्रकाश मन को प्रसन्न कर देता है।
रोज शाम को दीपदान करने वालों का रेला यहाँ पहुँचता है। नदी के बीच में देवी नर्मदा का मंदिर श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण है। नाव से वहाँ तक पहुँचकर पूजा करना रोमांचक अनुभव है। इसके अलावा घाट पर अनेक मंदिर हैं, जिनमें कुछ प्राचीन हैं तो कुछ हाल के वर्षों में बने हैं। घाट से दूर जाने पर माँ काली का प्राचीन और सिद्ध मंदिर है।
विभिन्न संतों के आश्रम भी आस-पास होने के कारण यहाँ श्रद्धालुओं का ताँता लगा रहता है। कहते हैं नर्मदा के दर्शन से ही सारे पाप नष्ट होते हैं। इसलिए यहाँ दर्शनार्थियों का भी ताँता लगता है। ग्वारीघाट में नौका विहार की भी सुविधा है।
नर्मदा का दूसरा महत्वपूर्ण घाट है तिलवाराघाट। यहाँ लगने वाला मकर संक्रांति का मेला बड़ा प्रसिद्ध है। इस मेले का इतिहास भी प्राचीन है। यहाँ स्थित मंदिर भी बहुत प्राचीन है। पुराने समय से गोपालपुर स्थित मंदिर की बाहरी छटा अत्यंत सुंदर है।
अपने में इतिहास समेटे बाग की गुफाएँ
प्राकृतिक सौन्दर्य के साथ इतिहासबोध
'शब-ए-मालवा' से 150 किलोमीटर दूर एक ऐसी एतेहासिक और प्राकृतिक धरोहर स्थित है जिसका ज्यादातर लोगों ने नाम तो सुना है लेकिन देखा कम ही है। दुर्गम स्थल पर स्थित होने के कारण सैर-सपाटा पसंद करने वाले लोग उस तरफ आसानी से रुख नहीं करते लेकिन दूर देश से आने वाले विदेशी पर्यटकों के लिए यह धरोहर एक जिज्ञासा का विषय हमेशा से बनी रहती है।
खासतौर से बौद्ध धर्म से जुड़े लोगों के लिए यह किसी तीर्थ से कम नहीं है। यह धार जिले में स्थित विश्व प्रसिद्ध बाग की गुफाएँ हैं जो अपने भित्ति चित्रों की वजह से अजंता के समकक्ष मानी जाती हैं। इन्हें भारत सरकार ने राष्ट्रीय महत्व का सुरक्षित पुरा स्मारक घोषित कर रखा है।
क्या है बाग में :
बाग नदी और बाग कस्बे के नाम की वजह से इन गुफाओं को 'बाग की गुफाओं' के नाम से जाना जाता है। गुफाओं के बनाने के लिए खूबसूरत जगह का चुनना यह बताता है कि बाग गुफा मंडप के निर्माता प्राकृतिक सौन्दर्य के उपासक थे। वर्ष 1953 में भारत सरकार द्वारा बाग गुफाओं को 'राष्ट्रीय स्मारक' घोषित किया गया। इसके संरक्षण का जिम्मा पुरातत्व विभाग को सौंपा गया। विंध्याचल पर्वत श्रृंखला के एक रेतीले पत्थर के पर्वत पर निर्मित इन गुफाओं की संख्या 9 है।
पहली गुफा 'गृह गुफा' कहलाती है। दूसरी गुफा 'पांडव गुफा' के नाम से प्रख्यात है। यह बाकी सब गुफाओं से अधिक बड़ी और अधिक सुरक्षित प्रतीत होती है। तीसरी गुफा का नाम 'हाथीखाना' है। इसमें बौद्ध भिक्षुओं के रहने के लिए कोठरियाँ बनी हुई हैं। चौथी गुफा को 'रंगमहल' कहा जाता है। पाँचवी गुफा बौद्ध भिक्षुओं के एक स्थान पर बैठकर प्रवचन सुनने के लिए बनाई गई थी। पाँचवी और छठी गुफा आपस में मिली हुई हैं तथा इनके बीच का सभा मंडप 46 फुट वर्गाकार है।
सातवीं, आठवीं और नौवीं गुफाओं की हालत ठीक नहीं है और वे अवशेष मात्र ही नजर आती हैं। इन गुफाओं की एक विशेषता यह भी है कि इनके अंदर जाकर इतनी ठंडक का अहसास होता है जैसे आप किसी एयरकंडीशन कक्ष में आ गए हों। गुफाओं के अंदर कई जगह से पहाड़ों से प्राकृतिक तरीके से पानी भी रिसकर आता रहता है। ये गुफाएँ कई शताब्दी पुरानी हैं।
लेकिन इनका काल निर्धारण आज भी नहीं हो पाया है। इतिहासविद इन्हें अजंता से पुराना तो नहीं मानते लेकिन यह जरूर मानते हैं कि यहाँ के भित्ति चित्रों में अंकित मनुष्यों की वेश-भूषा व अलंकार आदि से इनका समय वही निश्चित होता है जो अजंता की पहली और दूसरी गुफाओं का है। विख्यात इतिहासविद और पुराविद श्री कुमार स्वामी ने इन्हें पाँचवी शताब्दी का माना है।
भित्ति चित्र अब संग्रहालय में :
बाग की गुफाओं के भित्ति चित्र कई शताब्दियों तक प्रकृति ने सहेजकर रखे थे। बाद में जंगलों की कटाई और गुफाओं में बाबाओं-महात्माओं द्वारा आग जलाने और धुँआ करने के बाद इन भित्ति चित्रों पर संकट मंडराने लगा। गुफाओं के अंदर चमगादड़ों ने भी अपने डेरे बना लिए थे। नमी और आर्द्रता की वजह से भी भित्ति चित्र प्रभावित हो रहे थे। तब इन्हें गुफा से हटाने का निर्णय लिया गया।
1982 से इन चित्रों को दीवारों व छतों से निकालने का कार्य शुरू हुआ। नमी से प्रभावित इन चित्रों को तेज धार वाले औजारों से काटकर दीवारों से अलग किया गया। निकाले गए चित्रों को मजबूती देने के उद्देश्य से फाइबर ग्लास एवं अन्य पदार्थों से माउंटिंग की गई। चित्रों को वापस मूल स्वरूप में लाने के लिए उनकी रासायनिक पदार्थों से फैंसिंग की गई।
बाद में इन चित्रों को गुफाओं के सामने निर्मित संग्रहालय में रखा गया। इन चित्रों को अब संग्रहालय में ही देखा जा सकता है। गुफाओं के भीतर अब सिर्फ मूर्तियाँ ही बची हैं जिनमें से अधिकांश बुद्ध की हैं या फिर बुद्ध के जीवनकाल से जुड़ी घटनाओं को बयान करती हैं।
कैसे जाएँ, कब जाएँ :
बाग की गुफाएँ बहुत सुंदर स्थान पर स्थित हैं। सामने बाग नदी बहती है और चारों ओर हरियाली तथा जंगल हैं। धार जिले में विंध्य श्रेणी के दक्षिणी ढाल पर, नर्मदा नदी की एक सहायक नदी बागवती के किनारे उसकी सतह से 150 फुट की ऊँचाई पर यह विश्व प्रसिद्ध गुफाएँ हैं। अगर आप स्वंय के वाहन से बाग जाना चाहते हैं तो उसमें काफी सहूलियत रहेगी। इंदौर से 65 किलोमीटर दूर है धार।
धार से 71 किलोमीटर की दूरी पर आदिवासी क्षेत्र टांडा है। यहाँ पहुँचने के बाद बाग कस्बा सिर्फ 20 किमी दूर रह जाता है। बाग पहुँचने के बाद 7 किमी का रास्ता तय करके इन गुफाओं तक पहुँचा जा सकता है। यहाँ जाने का सबसे अच्छा मौसम बारिश का है क्योंकि गुफाओं के सामने बहने वाली बाग नदी उस समय बहती है। यह मौसमी नदी है और गर्मियाँ आने तक सूख जाती है। नदी के सूखने से वहाँ का दृश्य थोड़ा अधूरा-अधूरा सा लगने लगता है।
इन्दौर का प्राणी संग्रहालय
केंद्रीय संग्रहालय, इंदौर एक राज्य स्तरीय संग्रहालय है, जहाँ मालवा से प्राप्त पुरावशेषों को एकत्रित कर शोधाथिर्यों एवं पर्यटकों एवं जनसामान्य को जानकारी उपलब्ध कराई जाती है। केंद्रीय संग्रहालय भवन में मूर्तियाँ, जो अधिकांश परमार कालीन विशेषता लिए हुए हैं, के अतिरिक्त अभिलेख, मुद्राएँ, इटैलियन कलाकृतियाँ प्रदर्शित की गई हैं।
केंद्रीय संग्रहालय इंदौर की स्थापना 29 नवंबर, 1923 में हुई थी। यह तत्कालीन आयुक्त डॉ. अरुण्डले के निर्देशन में नररत्न मंदिर से प्रारम्भ हुआ। इसमें सबसे पहले 60 छायाचित्र तथा इस्लामी पुस्तक तथा 100 ग्रंथ रखे गए। एक अक्टूबर 1929 को इस संस्था को संग्रहालय में परिवर्तित कर दिया गया और कृष्णपुरा स्थित भवन, जहाँ वर्तमान में देवलालीकर कला वीथिका है, में दर्शकों के लिए प्रारंभ किया गया।
सन् 1930 में दसवीं शती की प्रतिमाएँ और प्रस्तर अभिलेख, उनके छापे, कुछ ताम्रपत्र संग्रहीत किए गए। सन् 1931 में यह संग्रहालय, जो शिक्षा विभाग के अधीन था, पुरातत्व विभाग को सौंप दिया गया। स्थानीय लोगों के रुझान को देखते हुए आगरा-बाम्बे मार्ग पर नवीन संग्रहालय भवन की स्थापना कर यहाँ पर संग्रहालय विधा के अनुरूप पुरावशेषों को प्रदर्शित किया गया। इस संग्रहालय का कुल क्षेत्रफल 10804 वर्गफुट है तथा यह दोमंजिला है।
इस संग्रहालय में पुरावशेषों के प्रदर्शन के लिए छः वीथिकाएँ बनाई गई हैं। स्थानीय संग्रहों के साथ-साथ मध्यप्रदेश में हुए उत्खननों से प्राप्त पुरावशेष, सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेषों के प्रदर्शन के साथ-साथ हिंगलाजगढ़ की परमारकालीन विशिष्ट प्रतिमाओं का संग्रह इस संग्रहालय के लिए महत्वपू्र्ण माना जाता है। प्रस्तर अभिलेखों व उनके छापों के साथ-साथ ताम्र पत्रों को भी प्रदर्शित किया गया है। प्राचीन मुद्रा प्रणाली को जानने के लिए मुद्रा प्रचलन से लेकर मुगलकालीन सिक्कों तक को प्रदर्शित किया गया है।
पुरावस्तु वीथी
यहाँ से संग्रहालय का वास्तविक प्रदर्शन प्रारंभ होता है। सबसे पहले पुरावस्तु वीथिका है, जिसमें मानव का विकास तथा उसकी संस्कृतियों के विस्तार को क्रमबद्ध रूप में प्रदर्शित किया गया है। इनमें प्रदेश के विभिन्न स्थानों से प्राप्त मानव एवं पशुओं के जीवाश्म तथा पाषाण कालीन उपकरण प्रदर्शित हैं। बताया गया है कि इसी दीर्घा में सिंधु-घाटी की सभ्यता से संबंधित मोहन-जोदड़ो के उत्खनन में प्राप्त अश्मोपकरण, ताम्र उपकरण आदि प्रदर्शित हैं। इनकी तिथि 2350 ईसा पूर्व के लगभग मानी जाती है।
मध्य प्रदेश के संग्रहालय
जीवन में एक बहुत ही अहम भूमिका है इतिहास की। ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़ा हुआ है मनुष्य। आइए मध्यप्रदेश के कुछ संग्रहालयों में हम इतिहास को करीब से देखें।
भोपाल के प्रसिद्ध बिड़ला संग्रहालय में विभिन्न प्रकार की सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक प्रतिमाएँ रखी गई हैं। आदिकाल में जब मनुष्य पत्थर इस्तेमाल करते थे उनके भी अंग यहाँ पर देखे जा सकते हैं।
सातवीं सदी से लेकर तेरहवीं सदी तक की ऐतिहासिक जगहों के चित्र प्रदर्शित किए गए हैं। पुराने सिक्के, पत्तों पर लिखे गए शब्द चित्र भी प्रदर्शित किए गए हैं। टेराकोटा से बनाई गई प्रतिमाएँ यहाँ पर प्रयोग की जाती हैं।
भोपाल में राष्ट्रीय (सेंट्रल) संग्रहालय 1949 में स्थापित किया गया था। चित्रकला, पौराणिक सिक्के जिन पर राजा महाराजाओं एवं अँग्रेज शासकों के चित्र बनाए गए। ऐसे सिक्के यहाँ पर पाए जाते हैं। ताँबे या पीतल से बनाई गई वस्तुएँ मिलती हैं। लकड़ी से बनाई गई वस्तुएँ प्रदर्शित की जाती हैं। हाथ से बनाए गए भिन्न प्रकार की प्रतिमाएँ, कढ़ाई की गई वस्तुएँ देखी जा सकती हैं।
भोपाल में भारत भवन एक अलग प्रकार का संग्रहालय है। रंग महल, अन्हद, शास्त्रीय संगीत के भवन वागर्थ पुस्कालय जहाँ पर कविताओं की पुस्तकें रखी गई हैं। बहारि रंगमंच जहाँ पर नाटक, खेल, हास्य रंग आयोजित किए जाते हैं। मुख्य रूप से रूपांकर चित्रालय में असंख्य प्रकार के चित्र प्रदर्शित करते हैं। रूपांकर में दो प्रकार की चित्रकला देखी जा सकती है।
एक स्थान है जहाँ पर वर्तमान के चित्र एवं नक्काशी की प्रतिमाएँ प्रदर्शित की गई हैं। परंतु कुछ विभागों में लोक गीत प्रस्तुत किए जाते हैं। 4000 के करीब वस्तुएँ मध्यप्रदेश से संग्रहित की गई हैं। विभिन्न जाति की संस्कृति एवं कला से चित्र के माध्यम से परिचित किए गए हैं। इस राज्य में विभिन्न प्रकार के चित्र नजर आते हैं। भिन्न क्षेत्रों से वस्तुएँ संग्रहालय में सुरक्षित रूप से प्रदर्शित कर दिए गए हैं। जीव, पक्षी एवं खिलौने के रूप में वस्तुएँ प्रदर्शित किए गए हैं।
ग्वालियर के पुरात्तात्त्विक संग्रहालय
वर्ष 1922 में इस संग्रहालय को स्थापित किया गया था। ताँबे की वस्तुओं पर सुंदर चित्र अंकित किए गए हैं। पत्थरों के स्तम्भ स्थापित किए गए हैं। टैराकौटा की प्रतिमाएँ वहाँ पर सजाई गई थीं। पद्मावती, बेसावनगर, उज्जयिनी एवं महेश्वर से पौराणिक वस्तुएँ मिली हैं।
साँची के पुरात्तात्त्विक संग्रहालय
राजा अशोक ने यहाँ पर स्तम्भ स्थापित किया था जिस पर शेर की मूर्ति लगाई गई थी। भगवान बुद्ध की प्रतिमाएँ श्रद्धापूवर्क स्थापित की गई थीं। भगवान गणेश की मूर्ति भी वहाँ पर है। साँची में सबसे प्रसिद्ध हैं सम्राट अशोक के बनाए गए स्तूप। मंदिर, मठ एवं स्तूप यहाँ पर स्थापित किए गए हैं।
केंद्रीय संग्रहालय
सन् 1929 में स्थापित संग्रहालय सबसे पुराना संग्रहालय है। मध्यप्रदेश के मालवा जिले में इस केंद्रीय संग्रहालय को स्थापित किया गया था। वहाँ पर विभिन्न प्रकार के चित्र, प्रतिमाएँ भी देखी जा सकती हैं।
ऐतिहासिक स्थलों की नगरी शिवपुरी
हल्की-हल्की बूँदों की वर्षा हो रही थी। प्रभात ने घने काले बादल की चुनरी ओढ़ रखी थी। सखियों के साथ मैं टाटा सफारी में सवार होकर आगरा-मुंबई राष्ट्रीय राजमार्ग पर जा रही थी कि हमें एक ढाबा खुला दिखाई दिया। प्रातः पाँच बजे थे, मन कर रहा था कि हमें गरमागरम चाय मिल जाए तो सफर तय करना और भी आसान हो जाएगा।
गाड़ी ढाबे के पास रुकी, हमारी नज़र कोयले की आँच पर बन रही चाय से निकलते धुएँ पर पड़ी एवं उसके साथ-साथ नाश्ते के लिए बाजरे की रोटी तथा सब्जी मिली। ढाबे के चारों ओर हरियाली नज़र आ रही थी, रंग-बिरंगे महुए एवं पलास के फूल खिले हुए थे जिन पर वर्षा की बूँदें मोती की तरह चमक रही थीं।
इंदौर से शिवपुरी तक का सफर हम लगभग तय कर चुके थे। गुना क्षेत्र से हम गुजरते हुए शिवपुरी ज़िले में पहुँचे। हमारी नज़र यहाँ के पहा़डों पर पड़ी, जिन पर हरियाली थी एवं घने जंगल स्थित थे। वादियों के मध्य प्रकृति की गोद से झरने बह रहे थे एवं उठती सूर्य की किरणों के प्रकाश में वे झिलमिलाते, बलखाते हुए नदियों की ओर बह रहे थे।
गुना जिले से हम जब शिवपुरी नगर की ओर गाड़ी में सफर कर रहे थे तब हमने देखा कि सिंध नदी गुना से उत्तर दिशा से बहती हुई भिड़ से चंबल नदी से जा मिलती है। शिवपुरी की चार मुख्य नदियाँ हैं सिंध, कूनो, बेतवा एवं पार्वती।
कहते हैं कि शिवपुरी का माधव नेशनल पार्क, विभिन्न प्रकार के वन्यजीवों के लिए बहुत ही प्रसिद्ध है। मुख्य रूप से नहार बाघ, तेंदुआ, लक्कड़ बग्घा, तरक्षु, भालू, सांभर आदि जानवर यहाँ पर पाए जाते हैं। वर्षा के आने से मोर अपने रंग-बिरंगे पंख को फैला देते हैं। उपस्थित जनता खूबसूरत दृश्य की प्रशंसा करने लगी तथा कैमरे से छायाचित्र लेने लगी।
नेशनल पार्क में पक्षी एवं जानवरों का हमने जीवंत रूप देखा। माधव विलास महल में सिंधिया राजवंश ग्रीष्म काल के समय निवास करते थे। वन वाटिका के मध्य स्थित यह महल गुलाब के फूल के समान प्रतीत हो रहा था। महल के भीतर कला की सुंदर मूर्तियाँ प्रदर्शित थीं। सुंदर आकृतियों वाले महल की छत से शिवपुरी नगर एवं माधव नेशनल पार्क नजर आते हैं। खूबसूरत चित्रकला से महल के विभिन्न कक्षों को सजाया गया था। अब यह महल भारत सरकार के अधीन है।
शिवपुरी में पर्यटक महाराजा एवं राजकुमारों द्वारा बनाई गई छतरियों को देखने आते हैं। इस ऐतिहासिक स्थल पर विभिन्न गाथाएँ एवं प्राचीन कहानियाँ सुन सकते हैं। ये छतरियाँ संगमरमर की हैं एवं इन पर सुंदर आकृतियाँ उकेरी गई हैं। सिंधिया राजकुमारों ने इन्हें मुगल वाटिका में स्थापित किया था। इस स्थान पर माधवराव सिंधिया की छतरी स्थित है उसी तरह महारानी सँख्याराजे सिंधिया की सुंदर छतरी भी है। हिंदू एवं इस्लामी के वास्तुशिल्पीय मिश्रित रूप नजर आते हैं। राजपूत एवं मुगल परम्पराओं के वास्तुशिल्पीय को रूपांतर करती कला दर्शकों को अपनी ओर आकृष्ट करती है।
ऐतिहासिक स्थलों के दर्शन करने में काफी देर हो गई थी। सूरज ढलने वाला था कि हमारी दृष्टि जॉर्ज किले की ओर आकर्षित हुई। सँख्या सागर के तट पर स्थित इस किले को जीवाजीराव सिंधिया ने निर्मित किया था। परंतु इस किले की एक विशेषता है जो अक्सर आम किलों के स्थान पर देखी नहीं जाती, वह यह है कि यह महल माधव नेशनल पार्क के अंदर स्थित है। इसलिए महल की सुंदरता और निखर उठती है जब किले के चारों ओर घने जंगल स्थित हैं।
प्राचीन महलों एवं प्रसिद्ध पर्यटक स्थलों के दर्शन कर जब हम वापस लौट रहे थे तब हमने वहाँ के स्थानीय रंगमंच एवं लोकगीत सुने जो आदिवासी लोगों ने पात्रों के माध्यम से दर्शाए थे। कार्यक्रम के अंत में हम होटल वापस लौट आए।
मिर्च-मसाला
कैटरीना ने छोड़ी अनुराग की फिल्म!
खबर है कि कैटरीना कैफ ने अनुराग बसु की फिल्म से अपने आपको अलग कर लिया हैं। इस फिल्म के नायक रणबीर कपूर हैं। गौरतलब है कि इस फिल्म को लेकर कैटरीना कैफ बेहद उत्साहित थी। फिल्म में उनका रोल भी चैलेंजिंग बताया जा रहा था। अचानक वे अलग क्यों हो गईं?
सूत्रों के मुताबिक कैटरीना के फिल्म से अलग होने का कारण हैं प्रियंका चोपड़ा। प्रियंका को अचानक फिल्म में शामिल कर लिया गया। हालाँकि उनका रोल छोटा है और वे इंटरवल के बाद नजर आएँगी, लेकिन कैटरीना चाहती हैं कि फिल्म में उनके अलावा और कोई नामी एक्ट्रेस ना हो।
साथ ही वे अनुराग से इस बात से भी नाराज हैं कि उन्होंने पहले नहीं बताया कि फिल्म में प्रियंका को भी शामिल किया जा सकता है। प्रियंका और कैटरीना में किसी तरह का विवाद नहीं है, लेकिन दोनों में प्रतिद्वंद्विता है।
उधर फिल्म से अलग होने के बारे में कैटरीना से जुड़े लोगों का कहना है कि कैटरीना अपने बैनर तले फिल्म शुरू करना चाहती हैं, इसलिए वे फिल्म से अलग हो गईं।
खबर है कि कैटरीना कैफ ने अनुराग बसु की फिल्म से अपने आपको अलग कर लिया हैं। इस फिल्म के नायक रणबीर कपूर हैं। गौरतलब है कि इस फिल्म को लेकर कैटरीना कैफ बेहद उत्साहित थी। फिल्म में उनका रोल भी चैलेंजिंग बताया जा रहा था। अचानक वे अलग क्यों हो गईं?
सूत्रों के मुताबिक कैटरीना के फिल्म से अलग होने का कारण हैं प्रियंका चोपड़ा। प्रियंका को अचानक फिल्म में शामिल कर लिया गया। हालाँकि उनका रोल छोटा है और वे इंटरवल के बाद नजर आएँगी, लेकिन कैटरीना चाहती हैं कि फिल्म में उनके अलावा और कोई नामी एक्ट्रेस ना हो।
साथ ही वे अनुराग से इस बात से भी नाराज हैं कि उन्होंने पहले नहीं बताया कि फिल्म में प्रियंका को भी शामिल किया जा सकता है। प्रियंका और कैटरीना में किसी तरह का विवाद नहीं है, लेकिन दोनों में प्रतिद्वंद्विता है।
उधर फिल्म से अलग होने के बारे में कैटरीना से जुड़े लोगों का कहना है कि कैटरीना अपने बैनर तले फिल्म शुरू करना चाहती हैं, इसलिए वे फिल्म से अलग हो गईं।
बुधवार, 31 मार्च 2010
महाप्रयोग
महाप्रयोग से बदलेगी विज्ञान की दुनिया
अपने रिसर्च प्रोजेक्ट के सिलसिले में मैं कुछ दिन पहले सेर्न से भारत आई थी, अब बुधवार शाम की फ्लाइट से वापस सर्न लौट रही हूँ, लेकिन इस बीच दुनिया बदल चुकी है।
सर्न में मौजूद दुनिया के सबसे बड़े पार्टिकल कोलाइडर एलएचसी में पहले विपरीत दिशा में दो अलग-अलग प्रोटॉन बीम छोड़ी गई, फिर आहिस्ता-आहिस्ता उनकी ऊर्जा का स्तर बढ़ाया गया और मंगलवार शाम करीब चार बजे इन दोनों शक्तिशाली बीम्स को एक-दूसरे के करीब लाकर, एलएचसी की 27 किलोमीटर लंबी गोलाकार सुरंगनुमा ट्यूब में लगभग रोशनी की रफ्तार से चक्कर काट रहे प्रोटॉन्स की आपस में टक्कर करवा दी गई।
जरा सोचिए ये सब कितना अद्भुत है। एक-एक सेकंड की निगरानी और शून्य से 271 डिग्री नीचे के तापमान में एलएचसी की बेहद संवेदनशील ट्यूब में दो अलग-अलग स्तर पर प्रोटॉन बीम्स चक्कर काट रही हैं।
कुदरत ने इन्हें जिस तरह रचा है, उस नियम के तहत दो प्रोटॉन्स एक-दूसरे के करीब नहीं आ सकते, क्योंकि प्रोटॉन्स के साथ धनावेश यानी पॉजीटिव चार्ज बँधा होता है और इसलिए करीब लाए जाने पर दो प्रोटॉन्स एक-दूसरे को दूर धकेलते हैं, क्योंकि समान आवेश हमेशा एक-दूसरे को दूर धकेलता है।
ठीक वैसे ही जैसे एक ऑफिस में एक ही पद पर दो बॉस नहीं हो सकते या फिर एक म्यान में दो तलवारें नहीं हो सकतीं। लेकिन हमारी तकनीक अब कुदरत के नियमों को तोड़कर काफी आगे निकल गई और यह ऐतिहासिक घटना ठीक उस पल घटी जब एलएचसी में जबरदस्त ऊर्जा से भरी दो प्रोटॉन बीम्स एक-दूसरे से जा टकराईं।
भारत समेत दुनियाभर के 80 से ज्यादा देशों के 8000 से ज्यादा वैज्ञानिकों की 14 साल की मेहनत मंगलवार को सफल रही। प्रयोग से कहीं कोई ब्लैक होल पैदा नहीं हुआ और धरती उसमें समा नहीं गई। मंगलवार को एलएचसी में प्रोटॉन्स की शानदार टक्कर के बाद अब हमने अज्ञान के ब्लैकहोल से बाहर निकलकर विज्ञान के उजाले की ओर कदम बढ़ा दिए हैं।
अपने रिसर्च प्रोजेक्ट के सिलसिले में मैं कुछ दिन पहले सेर्न से भारत आई थी, अब बुधवार शाम की फ्लाइट से वापस सर्न लौट रही हूँ, लेकिन इस बीच दुनिया बदल चुकी है।
सर्न में मौजूद दुनिया के सबसे बड़े पार्टिकल कोलाइडर एलएचसी में पहले विपरीत दिशा में दो अलग-अलग प्रोटॉन बीम छोड़ी गई, फिर आहिस्ता-आहिस्ता उनकी ऊर्जा का स्तर बढ़ाया गया और मंगलवार शाम करीब चार बजे इन दोनों शक्तिशाली बीम्स को एक-दूसरे के करीब लाकर, एलएचसी की 27 किलोमीटर लंबी गोलाकार सुरंगनुमा ट्यूब में लगभग रोशनी की रफ्तार से चक्कर काट रहे प्रोटॉन्स की आपस में टक्कर करवा दी गई।
जरा सोचिए ये सब कितना अद्भुत है। एक-एक सेकंड की निगरानी और शून्य से 271 डिग्री नीचे के तापमान में एलएचसी की बेहद संवेदनशील ट्यूब में दो अलग-अलग स्तर पर प्रोटॉन बीम्स चक्कर काट रही हैं।
कुदरत ने इन्हें जिस तरह रचा है, उस नियम के तहत दो प्रोटॉन्स एक-दूसरे के करीब नहीं आ सकते, क्योंकि प्रोटॉन्स के साथ धनावेश यानी पॉजीटिव चार्ज बँधा होता है और इसलिए करीब लाए जाने पर दो प्रोटॉन्स एक-दूसरे को दूर धकेलते हैं, क्योंकि समान आवेश हमेशा एक-दूसरे को दूर धकेलता है।
ठीक वैसे ही जैसे एक ऑफिस में एक ही पद पर दो बॉस नहीं हो सकते या फिर एक म्यान में दो तलवारें नहीं हो सकतीं। लेकिन हमारी तकनीक अब कुदरत के नियमों को तोड़कर काफी आगे निकल गई और यह ऐतिहासिक घटना ठीक उस पल घटी जब एलएचसी में जबरदस्त ऊर्जा से भरी दो प्रोटॉन बीम्स एक-दूसरे से जा टकराईं।
भारत समेत दुनियाभर के 80 से ज्यादा देशों के 8000 से ज्यादा वैज्ञानिकों की 14 साल की मेहनत मंगलवार को सफल रही। प्रयोग से कहीं कोई ब्लैक होल पैदा नहीं हुआ और धरती उसमें समा नहीं गई। मंगलवार को एलएचसी में प्रोटॉन्स की शानदार टक्कर के बाद अब हमने अज्ञान के ब्लैकहोल से बाहर निकलकर विज्ञान के उजाले की ओर कदम बढ़ा दिए हैं।
रोमांस
अनाम रिश्ता बेनाम उलझनें
हेलो दोस्तो! आपसे जुड़े ज्यादातर रिश्ते ऐसे होते हैं जिनको आप किसी न किसी नाम से पुकारते हैं। उन रिश्तों के बारे में सोचने की आपको जरूरत ही नहीं पड़ती है। उनके प्रति आपका फर्ज एवं अधिकार मानो जन्म से ही समझा दिया गया होता है इसीलिए बिना किसी विचार-विमर्श के सहजता से आप उसे निभाते चले जाते हैं। करीबी रिश्तेदार, दूर के रिश्तेदार इन सबकी भी एक श्रेणी बन जाती है। आप अपनी सुविधा और पसंद के अनुसार उनके साथ भी तालमेल बिठा लेते हैं।
इसी प्रकार दोस्तों की भी कई श्रेणियाँ होती हैं, वर्ग होते हैं। कुछ ऐसे होते हैं जिनसे आप हमेशा मिलते हैं पर उनसे आपका अपनापन नहीं होता है। कुछ ऐसे होते हैं जो आपका दुख-दर्द सुन तो लेते हैं पर उससे ज्यादा वे और कुछ नहीं करते। एक या दो दोस्त ऐसे होते हैं जिनसे आपकी महीनों बात नहीं होती पर मुसीबत में आप उन्हें फोन करते हैं और आपकी बातों और आवाज से उन्हें लगता है कि आपको उनकी हमदर्दी की जरूरत है। वह आपसे परेशानी पूछते हैं, आपको दिलासा देते हैं और उनसे कुछ बन पड़ता है तो वे आपके लिए करते भी हैं।
पर, कई बार आप एक विचित्र से रिश्ते में पड़ जाते हैं। न तो उसका कोई नाम होता है और न ही आपको यह पता होता है कि आपका उस व्यक्ति पर कितना अधिकार है। इतना ही नहीं, आपका उस व्यक्ति के प्रति क्या कर्तव्य होना चाहिए यह भी आप नहीं समझ पाते हैं। कभी आप उससे हफ्तों नहीं मिलते और जब मिलते हैं तो खूब अधिकार से झगड़ा करते हैं। आपकी यही ख्वाहिश होती है कि आपको वह मनाए, आपकी सारी शिकायतों पर माफी माँगे, कान पकड़े और सारी गलतियों को सर आँखों पर ले।
उनसे फूलों का उपहार लेना और घंटों बैठकर गप्पें लगाना आदि आपको दिल व जान से प्यारा होता है। इन सबके बावजूद आप उस रिश्ते को वहीं तक ठहरा देते हैं, उसे कोई नाम नहीं देते और उसके स्थायित्व पर भी प्रश्नचिह्न लगा रहता है पर ऐसे रिश्ते में मुश्किल यह होती है कि दूसरा पक्ष अपने बारे में कोई निर्णय नहीं कर पाता है और वह अपने भविष्य के बारे में कोई फैसला नहीं ले पाता है। यह दुविधा उसकी परेशानी का सबब बनती है।
इसी कशमकश में आज घिर गए हैं अरुण आहूजा (बदला हुआ नाम)। अरुण की एक दोस्त हैं। दोनों बातचीत में बेहद करीबी महसूस करते हैं पर अरुण की दोस्त अपनी ओर से पहल नहीं करतीं। यदि अरुण एक या दो सप्ताह तक बात न करें तो वह खोज-खबर नहीं लेतीं लेकिन अरुण द्वारा संपर्क करने पर उनसे खूब लड़ती-झगड़ती हैं, शिकायतों की झड़ी लगा देती हैं।
यह कहते हुए कि तोहफों पर पैसे क्यों खर्च करते हो, फूल और अन्य उपहार से खुश भी हो जाती हैं। पर यह पूछने पर कि इस रिश्ते का भविष्य क्या है ? क्या हमेशा साथ रहने के बारे में सोचा जा सकता है? तो अरुण की दोस्त का जवाब होता है, 'अभी इस रिश्ते में प्यार शामिल नहीं हुआ है। हम केवल दोस्त हैं।' अरुण की परेशानी यह है कि वह इस रिश्ते को समझ नहीं पा रहे हैं। इस रिश्ते पर अपना कितना समय लगाएँ या समय देना उचित है या नहीं यह उन्हें समझ में नहीं आ रहा है।
अरुण जी, आपकी दोस्त ने यूँ तो साफ लफ्जों में आपको कह दिया है कि वह केवल दोस्त हैं। प्यार उन्हें नहीं है इसलिए भविष्य के बारे में उनकी कोई योजना नहीं दिखती है फिर भी आप रिश्ते में जटिलता महसूस करते हैं। आप इसलिए परेशान हैं कि आप जो उनसे सुनना चाहते थे वह आप नहीं सुन पा रहे हैं। शायद आप अपनी दोस्त को प्यार करते हैं इसलिए उसको खुश करने का जतन करते हैं। यह बात तो साफ है कि आप दोस्त से ज्यादा उन्हें अपने जीवन में जगह देते हैं तभी उनका व्यवहार आपको विचलित किए रहता है।
आपकी दोस्त आपको प्यार नहीं करती बल्कि केवल दोस्त समझती है। यदि कहीं उनके भीतर प्यार की भावना है भी तो वह उसे अभी महसूस नहीं कर पा रही हैं। सच्चाई यह है कि उनकी नजर में आपके प्यार की कोई अहमियत नहीं है। आपको इस रिश्ते को केवल दोस्ती की श्रेणी में रखकर आगे बढ़ जाना चाहिए। साथ समय बिताना अच्छा लगता है तो समय बिताएँ पर उससे ज्यादा अपेक्षा न करें।
आप कुछ कदम ऐसा उठा सकते हैं जिससे आपकी दोस्त को इस रिश्ते को समझने में सहायता मिल सकती है। आपके प्रति उनके मन के भीतर क्या है वह समझ सकती है। आप उसे साफ तौर पर कह दें कि आप अपनी जीवनसाथी तलाश कर रहे हैं। यह बात आपकी ओर से गंभीरता से सामने आनी चाहिए। आप कोई तोहफा उन्हें अब नहीं दें। उन्हें संपर्क करने दें। एक माह तक संपर्क न करें।
यदि वह संपर्क नहीं करती हैं तो आप एक माह बाद यह बताएँ कि आप लंबे रिश्ते की तलाश में हैं इसीलिए समय नहीं मिला। जब उन्हें आपको खो देने का डर होगा तब वह गंभीरता से आपके बारे में विचार कर पाएँगी। रिश्ते को लेकर यह चिंतन व मंथन बेजा नहीं जाएगा। आप दोनों बेहतर तौर पर अपने भविष्य की योजना बना पाएँगे। इन सारी प्रक्रिया से गुजर कर आपकी दोस्ती भी अच्छी मजबूत हो जाएगी और भावनाओं के पैमाने का भी पता चल जाएगा।
मुझे जीने दो अपना मौसम
मेरी कोमल उड़ान को
नजर मत लगाओ।
ठंडी नशीली बयारों में
अपना आँचल लहराने दो मुझे।
भर लेने दो मेहँदी की खुशबू मुझे
अपनी सघन रेशमी जुल्फों में।
चूमने दो नाजुक एड़ियाँ
चमकीली पायल को।
मुझे अपना मौसम जीने दो।
कौन चाहती है भटकना, बहकना?
मुझे मिल जाए अगर
सच्चा प्यार।
सिर्फ मेरा प्यार।
तो क्या देंगे मुझे 'ब्रेकफास्ट' में
आजादी की 'ब्रेड' पर
विश्वास का 'बटर'
प्यार तो बस हो जाता है
प्यार करने वाले से पूछा गया कि प्यार क्या होता है? कैसा लगता है? तो उसका जवाब था कि प्यार गेहूँ की तरह बंद है, अगर पीस दें तो उजला हो जाएगा, पानी के साथ गूँथ लो तो लचीला हो जाएगा... बस यह लचीलापन ही प्यार है, लचीलापन पूरी तरह समर्पण से आता है, जहाँ न कोई सीमा है न शर्त। प्यार एक एहसास है, भावना है। प्रेम परंपराएँ तोड़ता है। प्यार त्याग व समरसता का नाम है।
प्रेम की अभिव्यक्ति सबसे पहले आंखों से होती है और फिर होंठ हाले दिल बयाँ करते हैं। और सबसे मज़ेदार बात यह होती है कि आपको प्यार कब, कैसे और कहाँ हो जाएगा आप खुद भी नहीं जान पाते। वो पहली नजर में भी हो सकता है और हो सकता है कि कई मुलाकातें भी आपके दिल में किसी के प्रति प्यार न जगा सकें।
प्रेम तीन स्तरों में प्रेमी के जीवन में आता है। चाहत, वासना और आसक्ति के रूप में। इन तीनों को पा लेना प्रेम को पूरी तरह से पा लेना है। इसके अलावा प्रेम से जुड़ी कुछ और बातें भी हैं -
प्रेम का दार्शनिक पक्ष-
प्रेम पनपता है तो अहंकार टूटता है। अहंकार टूटने से सत्य का जन्म होता है। यह स्थिति तो बहुत ऊपर की है, यदि हम प्रेम में श्रद्धा मिला लें तो प्रेम भक्ति बन जाता है, जो लोक-परलोक दोनों के लिए ही कल्याणकारी है। इसलिए गृहस्थ आश्रम श्रेष्ठ है, क्योंकि हमारे पास भक्ति का कवच है। जहाँ तक मीरा, सूफी संतों की बात है, उनका प्रेम अमृत है।
साथ ही अन्य तमाम रिश्तों की तरह ही प्रेम का भी वास्तविक पहलू ये है कि इसमें भी सामंजस्य बेहद जरूरी है। आप यदि बेतरतीबी से हारमोनियम के स्वर दबाएं तो कर्कश शोर ही सुनाई देगा, वहीं यदि क्रमबद्ध दबाएं तो मधुर संगीत गूंजेगा। यही समरसता प्यार है, जिसके लिए सामंजस्य बेहद ज़रूरी है।
प्रेम का पौराणिक पक्ष-
प्रेम के पौराणिक पक्ष को लेकर पहला सवाल यही दिमाग में आता है कि प्रेम किस धरातल पर उपजा-वासना या फिर चाहत....? माना प्रेम में काम का महत्वपूर्ण स्थान है, लेकिन महज वासना के दम पर उपजे प्रेम का अंत तलाक ही होता है। जबकि चाहत के रंगों में रंगा प्यार जिंदगीभर बहार बन दिलों में खिलता है, जिसकी महक उम्रभर आपके साथ होती है।
प्रेम का वर्जित क्षेत्र-
सामान्यतः समाज में विवाह के बाद प्रेम संबंध की अनुमति है। दूध के रिश्ते का निर्वाह तो सभी करते हैं, इसके अलावा निकट के सभी रक्त संबंध भी वर्जित क्षेत्र माने जाते हैं, जैसे- चचेरे, ममेरे, मौसेरे, फुफेरे भाई-बहन या मित्र की बहन या पत्नी आदि। किसी बुजुर्ग का किसी किशोरी से प्रेम संबंध भी व्याभिचार की श्रेणी में आता है। ऐसा इसलिए भी है कि एक सामाजिक प्राणी होने के नाते नियमों की रक्षा करना हमारा कर्त्तव्य भी है।
आई लव यू, स्वीट हार्ट
आपसे कुछ कदमों की दूरी पर वह लड़की खड़ी है, जिसे आप प्यार करते हैं, लेकिन परेशानी यह है कि आप अब तक उसे अपने दिल की बात नहीं बता सकते। वह दूर खड़ी अपने सर्कल में बातें कर रही है, लेकिन वह जानती नहीं कि आप उसे देख रहे हैं और आपकी दिल की धड़कन तेज हो रही है।
यह समस्या लगभग हर दूसरे प्रेमी की है, कि वह किसी लड़की से मन ही मन प्यार तो कर लेता है, लेकिन इजहार-ए-मुहब्बत की हिम्मत नहीं जुटा पाता। आइए हम आपको बता रहे हैं कि किसी लड़की के दिल में जगह किस तरह बनाई जाए, उसे अपनी मुहब्बत में कैसे गिरफ्तार किया जाए।
सबसे पहले आप अपने मन में सोच लीजिए कि आप दस लड़कियों को प्रेम प्रस्ताव देने जा रहे हैं और उन दस लड़कियों मे से केवल दो ही आप के प्रस्ताव को स्वीकार करेंगी, शेष आठ लड़कियाँ प्रस्ताव ठुकरा देंगी। इस तरह सोचने से आप मानसिक रूप से खुद को तैयार कर पाएँगे और हौसला भी बढ़ेगा।
खुद में इतना विश्वास पैदा कीजिए कि आपको किसी और सहारे कि जरूरत न पड़े। याद रखिए अगर आप अपनी मदद नहीं कर सकते तो दुनिया में कौन है जो आप कि मदद कर सकता है। अधिक से अधिक यही होगा कि वह मना कर देगी, लेकिन आपको इस बात का संतोष तो रहेगा कि कम से कम आपने कोशिश तो की।
जाइए और लड़की से स्वयं बात कीजिए, अगर आप पहल नहीं करेंगे तो कोई और बाजी मार ले जाएगा, वक्त किसी के लिए नहीं रुकता। आप के बात करने के दो परिणाम होंगे पहला यह कि वह लड़की आपका प्रस्ताव ठुकरा दे, लेकिन इससे कम से कम ये तो पता चल जाएगा कि वह चाहती क्या है? और आप उस लड़की के दिल में हलचल भी मचा देंगे।
दूसरा परिणाम यह कि वह कोई जवाब ही न दे, इसका मतलब यह है कि वह सोचने के लिए वक्त चाहती है और ये आपकी जीत की निशानी है। तो देर किस बात की, जाइए और कह दीजिए दिल की बात और डूब जाइए रोमांस में।
प्रेम में बंधन नहीं है
प्रेम में बंधन नहीं है
तुम उसे अहसास के,
नन्हें सजीले
पंख देकर मुक्त कर दो।
वह उड़ेगा,
क्षण भर उड़ेगा
और फिर से लौटकर
स्नेह के बंधन तुम्हारे,
चूम लेगा।
देह के लघु खंड तो,
क्षण की शिला हैं,
छू नहीं सकते, स्थिर हैं,
वे तुम्हारे प्रेम की नवसर्जना में
गदगद करेंगे,
मूक अभिनंदन करेंगे।
हेलो दोस्तो! आपसे जुड़े ज्यादातर रिश्ते ऐसे होते हैं जिनको आप किसी न किसी नाम से पुकारते हैं। उन रिश्तों के बारे में सोचने की आपको जरूरत ही नहीं पड़ती है। उनके प्रति आपका फर्ज एवं अधिकार मानो जन्म से ही समझा दिया गया होता है इसीलिए बिना किसी विचार-विमर्श के सहजता से आप उसे निभाते चले जाते हैं। करीबी रिश्तेदार, दूर के रिश्तेदार इन सबकी भी एक श्रेणी बन जाती है। आप अपनी सुविधा और पसंद के अनुसार उनके साथ भी तालमेल बिठा लेते हैं।
इसी प्रकार दोस्तों की भी कई श्रेणियाँ होती हैं, वर्ग होते हैं। कुछ ऐसे होते हैं जिनसे आप हमेशा मिलते हैं पर उनसे आपका अपनापन नहीं होता है। कुछ ऐसे होते हैं जो आपका दुख-दर्द सुन तो लेते हैं पर उससे ज्यादा वे और कुछ नहीं करते। एक या दो दोस्त ऐसे होते हैं जिनसे आपकी महीनों बात नहीं होती पर मुसीबत में आप उन्हें फोन करते हैं और आपकी बातों और आवाज से उन्हें लगता है कि आपको उनकी हमदर्दी की जरूरत है। वह आपसे परेशानी पूछते हैं, आपको दिलासा देते हैं और उनसे कुछ बन पड़ता है तो वे आपके लिए करते भी हैं।
पर, कई बार आप एक विचित्र से रिश्ते में पड़ जाते हैं। न तो उसका कोई नाम होता है और न ही आपको यह पता होता है कि आपका उस व्यक्ति पर कितना अधिकार है। इतना ही नहीं, आपका उस व्यक्ति के प्रति क्या कर्तव्य होना चाहिए यह भी आप नहीं समझ पाते हैं। कभी आप उससे हफ्तों नहीं मिलते और जब मिलते हैं तो खूब अधिकार से झगड़ा करते हैं। आपकी यही ख्वाहिश होती है कि आपको वह मनाए, आपकी सारी शिकायतों पर माफी माँगे, कान पकड़े और सारी गलतियों को सर आँखों पर ले।
उनसे फूलों का उपहार लेना और घंटों बैठकर गप्पें लगाना आदि आपको दिल व जान से प्यारा होता है। इन सबके बावजूद आप उस रिश्ते को वहीं तक ठहरा देते हैं, उसे कोई नाम नहीं देते और उसके स्थायित्व पर भी प्रश्नचिह्न लगा रहता है पर ऐसे रिश्ते में मुश्किल यह होती है कि दूसरा पक्ष अपने बारे में कोई निर्णय नहीं कर पाता है और वह अपने भविष्य के बारे में कोई फैसला नहीं ले पाता है। यह दुविधा उसकी परेशानी का सबब बनती है।
इसी कशमकश में आज घिर गए हैं अरुण आहूजा (बदला हुआ नाम)। अरुण की एक दोस्त हैं। दोनों बातचीत में बेहद करीबी महसूस करते हैं पर अरुण की दोस्त अपनी ओर से पहल नहीं करतीं। यदि अरुण एक या दो सप्ताह तक बात न करें तो वह खोज-खबर नहीं लेतीं लेकिन अरुण द्वारा संपर्क करने पर उनसे खूब लड़ती-झगड़ती हैं, शिकायतों की झड़ी लगा देती हैं।
यह कहते हुए कि तोहफों पर पैसे क्यों खर्च करते हो, फूल और अन्य उपहार से खुश भी हो जाती हैं। पर यह पूछने पर कि इस रिश्ते का भविष्य क्या है ? क्या हमेशा साथ रहने के बारे में सोचा जा सकता है? तो अरुण की दोस्त का जवाब होता है, 'अभी इस रिश्ते में प्यार शामिल नहीं हुआ है। हम केवल दोस्त हैं।' अरुण की परेशानी यह है कि वह इस रिश्ते को समझ नहीं पा रहे हैं। इस रिश्ते पर अपना कितना समय लगाएँ या समय देना उचित है या नहीं यह उन्हें समझ में नहीं आ रहा है।
अरुण जी, आपकी दोस्त ने यूँ तो साफ लफ्जों में आपको कह दिया है कि वह केवल दोस्त हैं। प्यार उन्हें नहीं है इसलिए भविष्य के बारे में उनकी कोई योजना नहीं दिखती है फिर भी आप रिश्ते में जटिलता महसूस करते हैं। आप इसलिए परेशान हैं कि आप जो उनसे सुनना चाहते थे वह आप नहीं सुन पा रहे हैं। शायद आप अपनी दोस्त को प्यार करते हैं इसलिए उसको खुश करने का जतन करते हैं। यह बात तो साफ है कि आप दोस्त से ज्यादा उन्हें अपने जीवन में जगह देते हैं तभी उनका व्यवहार आपको विचलित किए रहता है।
आपकी दोस्त आपको प्यार नहीं करती बल्कि केवल दोस्त समझती है। यदि कहीं उनके भीतर प्यार की भावना है भी तो वह उसे अभी महसूस नहीं कर पा रही हैं। सच्चाई यह है कि उनकी नजर में आपके प्यार की कोई अहमियत नहीं है। आपको इस रिश्ते को केवल दोस्ती की श्रेणी में रखकर आगे बढ़ जाना चाहिए। साथ समय बिताना अच्छा लगता है तो समय बिताएँ पर उससे ज्यादा अपेक्षा न करें।
आप कुछ कदम ऐसा उठा सकते हैं जिससे आपकी दोस्त को इस रिश्ते को समझने में सहायता मिल सकती है। आपके प्रति उनके मन के भीतर क्या है वह समझ सकती है। आप उसे साफ तौर पर कह दें कि आप अपनी जीवनसाथी तलाश कर रहे हैं। यह बात आपकी ओर से गंभीरता से सामने आनी चाहिए। आप कोई तोहफा उन्हें अब नहीं दें। उन्हें संपर्क करने दें। एक माह तक संपर्क न करें।
यदि वह संपर्क नहीं करती हैं तो आप एक माह बाद यह बताएँ कि आप लंबे रिश्ते की तलाश में हैं इसीलिए समय नहीं मिला। जब उन्हें आपको खो देने का डर होगा तब वह गंभीरता से आपके बारे में विचार कर पाएँगी। रिश्ते को लेकर यह चिंतन व मंथन बेजा नहीं जाएगा। आप दोनों बेहतर तौर पर अपने भविष्य की योजना बना पाएँगे। इन सारी प्रक्रिया से गुजर कर आपकी दोस्ती भी अच्छी मजबूत हो जाएगी और भावनाओं के पैमाने का भी पता चल जाएगा।
मुझे जीने दो अपना मौसम
मेरी कोमल उड़ान को
नजर मत लगाओ।
ठंडी नशीली बयारों में
अपना आँचल लहराने दो मुझे।
भर लेने दो मेहँदी की खुशबू मुझे
अपनी सघन रेशमी जुल्फों में।
चूमने दो नाजुक एड़ियाँ
चमकीली पायल को।
मुझे अपना मौसम जीने दो।
कौन चाहती है भटकना, बहकना?
मुझे मिल जाए अगर
सच्चा प्यार।
सिर्फ मेरा प्यार।
तो क्या देंगे मुझे 'ब्रेकफास्ट' में
आजादी की 'ब्रेड' पर
विश्वास का 'बटर'
प्यार तो बस हो जाता है
प्यार करने वाले से पूछा गया कि प्यार क्या होता है? कैसा लगता है? तो उसका जवाब था कि प्यार गेहूँ की तरह बंद है, अगर पीस दें तो उजला हो जाएगा, पानी के साथ गूँथ लो तो लचीला हो जाएगा... बस यह लचीलापन ही प्यार है, लचीलापन पूरी तरह समर्पण से आता है, जहाँ न कोई सीमा है न शर्त। प्यार एक एहसास है, भावना है। प्रेम परंपराएँ तोड़ता है। प्यार त्याग व समरसता का नाम है।
प्रेम की अभिव्यक्ति सबसे पहले आंखों से होती है और फिर होंठ हाले दिल बयाँ करते हैं। और सबसे मज़ेदार बात यह होती है कि आपको प्यार कब, कैसे और कहाँ हो जाएगा आप खुद भी नहीं जान पाते। वो पहली नजर में भी हो सकता है और हो सकता है कि कई मुलाकातें भी आपके दिल में किसी के प्रति प्यार न जगा सकें।
प्रेम तीन स्तरों में प्रेमी के जीवन में आता है। चाहत, वासना और आसक्ति के रूप में। इन तीनों को पा लेना प्रेम को पूरी तरह से पा लेना है। इसके अलावा प्रेम से जुड़ी कुछ और बातें भी हैं -
प्रेम का दार्शनिक पक्ष-
प्रेम पनपता है तो अहंकार टूटता है। अहंकार टूटने से सत्य का जन्म होता है। यह स्थिति तो बहुत ऊपर की है, यदि हम प्रेम में श्रद्धा मिला लें तो प्रेम भक्ति बन जाता है, जो लोक-परलोक दोनों के लिए ही कल्याणकारी है। इसलिए गृहस्थ आश्रम श्रेष्ठ है, क्योंकि हमारे पास भक्ति का कवच है। जहाँ तक मीरा, सूफी संतों की बात है, उनका प्रेम अमृत है।
साथ ही अन्य तमाम रिश्तों की तरह ही प्रेम का भी वास्तविक पहलू ये है कि इसमें भी सामंजस्य बेहद जरूरी है। आप यदि बेतरतीबी से हारमोनियम के स्वर दबाएं तो कर्कश शोर ही सुनाई देगा, वहीं यदि क्रमबद्ध दबाएं तो मधुर संगीत गूंजेगा। यही समरसता प्यार है, जिसके लिए सामंजस्य बेहद ज़रूरी है।
प्रेम का पौराणिक पक्ष-
प्रेम के पौराणिक पक्ष को लेकर पहला सवाल यही दिमाग में आता है कि प्रेम किस धरातल पर उपजा-वासना या फिर चाहत....? माना प्रेम में काम का महत्वपूर्ण स्थान है, लेकिन महज वासना के दम पर उपजे प्रेम का अंत तलाक ही होता है। जबकि चाहत के रंगों में रंगा प्यार जिंदगीभर बहार बन दिलों में खिलता है, जिसकी महक उम्रभर आपके साथ होती है।
प्रेम का वर्जित क्षेत्र-
सामान्यतः समाज में विवाह के बाद प्रेम संबंध की अनुमति है। दूध के रिश्ते का निर्वाह तो सभी करते हैं, इसके अलावा निकट के सभी रक्त संबंध भी वर्जित क्षेत्र माने जाते हैं, जैसे- चचेरे, ममेरे, मौसेरे, फुफेरे भाई-बहन या मित्र की बहन या पत्नी आदि। किसी बुजुर्ग का किसी किशोरी से प्रेम संबंध भी व्याभिचार की श्रेणी में आता है। ऐसा इसलिए भी है कि एक सामाजिक प्राणी होने के नाते नियमों की रक्षा करना हमारा कर्त्तव्य भी है।
आई लव यू, स्वीट हार्ट
आपसे कुछ कदमों की दूरी पर वह लड़की खड़ी है, जिसे आप प्यार करते हैं, लेकिन परेशानी यह है कि आप अब तक उसे अपने दिल की बात नहीं बता सकते। वह दूर खड़ी अपने सर्कल में बातें कर रही है, लेकिन वह जानती नहीं कि आप उसे देख रहे हैं और आपकी दिल की धड़कन तेज हो रही है।
यह समस्या लगभग हर दूसरे प्रेमी की है, कि वह किसी लड़की से मन ही मन प्यार तो कर लेता है, लेकिन इजहार-ए-मुहब्बत की हिम्मत नहीं जुटा पाता। आइए हम आपको बता रहे हैं कि किसी लड़की के दिल में जगह किस तरह बनाई जाए, उसे अपनी मुहब्बत में कैसे गिरफ्तार किया जाए।
सबसे पहले आप अपने मन में सोच लीजिए कि आप दस लड़कियों को प्रेम प्रस्ताव देने जा रहे हैं और उन दस लड़कियों मे से केवल दो ही आप के प्रस्ताव को स्वीकार करेंगी, शेष आठ लड़कियाँ प्रस्ताव ठुकरा देंगी। इस तरह सोचने से आप मानसिक रूप से खुद को तैयार कर पाएँगे और हौसला भी बढ़ेगा।
खुद में इतना विश्वास पैदा कीजिए कि आपको किसी और सहारे कि जरूरत न पड़े। याद रखिए अगर आप अपनी मदद नहीं कर सकते तो दुनिया में कौन है जो आप कि मदद कर सकता है। अधिक से अधिक यही होगा कि वह मना कर देगी, लेकिन आपको इस बात का संतोष तो रहेगा कि कम से कम आपने कोशिश तो की।
जाइए और लड़की से स्वयं बात कीजिए, अगर आप पहल नहीं करेंगे तो कोई और बाजी मार ले जाएगा, वक्त किसी के लिए नहीं रुकता। आप के बात करने के दो परिणाम होंगे पहला यह कि वह लड़की आपका प्रस्ताव ठुकरा दे, लेकिन इससे कम से कम ये तो पता चल जाएगा कि वह चाहती क्या है? और आप उस लड़की के दिल में हलचल भी मचा देंगे।
दूसरा परिणाम यह कि वह कोई जवाब ही न दे, इसका मतलब यह है कि वह सोचने के लिए वक्त चाहती है और ये आपकी जीत की निशानी है। तो देर किस बात की, जाइए और कह दीजिए दिल की बात और डूब जाइए रोमांस में।
प्रेम में बंधन नहीं है
प्रेम में बंधन नहीं है
तुम उसे अहसास के,
नन्हें सजीले
पंख देकर मुक्त कर दो।
वह उड़ेगा,
क्षण भर उड़ेगा
और फिर से लौटकर
स्नेह के बंधन तुम्हारे,
चूम लेगा।
देह के लघु खंड तो,
क्षण की शिला हैं,
छू नहीं सकते, स्थिर हैं,
वे तुम्हारे प्रेम की नवसर्जना में
गदगद करेंगे,
मूक अभिनंदन करेंगे।
मंगलवार, 30 मार्च 2010
धर्मयात्रा
चमत्कारी उलटे हनुमान
कवन सो काज कठिन जगमाहीं,
जो नहिं होइ, तात तुम पाहीं।
धर्मयात्रा में इस बार हम आपको ले चलते हैं भगवान हनुमान के एक विशेष मंदिर तक जो साँवेर नामक स्थान पर स्थित है। इस मंदिर की खासियत यह है कि इसमें हनुमानजी की उलटी मूर्ति स्थापित है। और इसी वजह से यह मंदिर उलटे हनुमान के नाम से मालवा क्षेत्र में प्रसिद्ध है।
ऐतिहासिक धार्मिक नगरी उज्जैन से मात्र 30 किमी की दूरी पर स्थित इस मंदिर को यहाँ के निवासी रामायणकालीन बताते हैं। मंदिर में हनुमानजी की उलटे चेहरे वाली सिंदूर लगी मूर्ति है।
यहाँ के लोग एक पौराणिक कथा का जिक्र करते हुए कहते हैं कि जब अहिरावण भगवान श्रीराम व लक्ष्मण का अपहरण कर पाताल लोक ले गया था, तब हनुमान ने पाताल लोक जाकर अहिरावण का वध कर श्रीराम और लक्ष्मण के प्राणों की रक्षा की थी। ऐसी मान्यता है कि यही वह स्थान है, जहाँ से हनुमानजी ने पाताल लोक जाने हेतु पृथ्वी में प्रवेश किया था।
साँवेर के उलटे हनुमान मंदिर में श्रीराम, सीता, लक्ष्मणजी, शिव-पार्वती की मूर्तियाँ हैं। मंगलवार को हनुमानजी को चौला भी चढ़ाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि तीन मंगलवार, पाँच मंगलवार यहाँ दर्शन करने से जीवन में आई कठिन से कठिन विपदा दूर हो जाती है।
कहते हैं भक्ति में तर्क के बजाय आस्था का महत्व अधिक होता है। यहाँ प्रतिष्ठित मूर्ति अत्यंत चमत्कारी मानी जाती है। यहाँ कई संतों की समाधियाँ हैं। सन् 1200 तक का इतिहास यहाँ मिलता है।
उलटे हनुमान मंदिर परिसर में पीपल, नीम, पारिजात, तुलसी, बरगद के पेड़ हैं। यहाँ वर्षों पुराने दो पारिजात के वृक्ष हैं। पुराणों के अनुसार पारिजात वृक्ष में हनुमानजी का भी वास रहता है। मंदिर के आसपास के वृक्षों पर तोतों के कई झुंड हैं। इस बारे में एक दंतकथा भी प्रचलित है। तोता ब्राह्मण का अवतार माना जाता है। हनुमानजी ने भी तुलसीदासजी के लिए तोते का रूप धारण कर उन्हें भी श्रीराम के दर्शन कराए थे।
साँवेर के उलटे हनुमान मंदिर में श्रीराम, सीता, लक्ष्मणजी, शिव-पार्वती की मूर्तियाँ हैं। मंगलवार को हनुमानजी को चौला भी चढ़ाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि तीन मंगलवार, पाँच मंगलवार यहाँ दर्शन करने से जीवन में आई कठिन से कठिन विपदा दूर हो जाती है। यही आस्था श्रद्धालुओं को यहाँ तक खींच कर ले आती है।
कैसे पहुँचें:-
हवाई मार्ग:- निकटतम एयरपोर्ट इंदौर 30 किमी दूरी पर स्थित है।
रेल मार्ग:- यहाँ पहुँचने के लिए सबमें निकटतम इंदौर का रेलवे स्टेशन है।
सड़क मार्ग:- उज्जैन (30 किमी), इंदौर (30 किमी) से यहाँ आने-जाने के लिए बस तथा टैक्सी उपलब्ध है।
कवन सो काज कठिन जगमाहीं,
जो नहिं होइ, तात तुम पाहीं।
धर्मयात्रा में इस बार हम आपको ले चलते हैं भगवान हनुमान के एक विशेष मंदिर तक जो साँवेर नामक स्थान पर स्थित है। इस मंदिर की खासियत यह है कि इसमें हनुमानजी की उलटी मूर्ति स्थापित है। और इसी वजह से यह मंदिर उलटे हनुमान के नाम से मालवा क्षेत्र में प्रसिद्ध है।
ऐतिहासिक धार्मिक नगरी उज्जैन से मात्र 30 किमी की दूरी पर स्थित इस मंदिर को यहाँ के निवासी रामायणकालीन बताते हैं। मंदिर में हनुमानजी की उलटे चेहरे वाली सिंदूर लगी मूर्ति है।
यहाँ के लोग एक पौराणिक कथा का जिक्र करते हुए कहते हैं कि जब अहिरावण भगवान श्रीराम व लक्ष्मण का अपहरण कर पाताल लोक ले गया था, तब हनुमान ने पाताल लोक जाकर अहिरावण का वध कर श्रीराम और लक्ष्मण के प्राणों की रक्षा की थी। ऐसी मान्यता है कि यही वह स्थान है, जहाँ से हनुमानजी ने पाताल लोक जाने हेतु पृथ्वी में प्रवेश किया था।
साँवेर के उलटे हनुमान मंदिर में श्रीराम, सीता, लक्ष्मणजी, शिव-पार्वती की मूर्तियाँ हैं। मंगलवार को हनुमानजी को चौला भी चढ़ाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि तीन मंगलवार, पाँच मंगलवार यहाँ दर्शन करने से जीवन में आई कठिन से कठिन विपदा दूर हो जाती है।
कहते हैं भक्ति में तर्क के बजाय आस्था का महत्व अधिक होता है। यहाँ प्रतिष्ठित मूर्ति अत्यंत चमत्कारी मानी जाती है। यहाँ कई संतों की समाधियाँ हैं। सन् 1200 तक का इतिहास यहाँ मिलता है।
उलटे हनुमान मंदिर परिसर में पीपल, नीम, पारिजात, तुलसी, बरगद के पेड़ हैं। यहाँ वर्षों पुराने दो पारिजात के वृक्ष हैं। पुराणों के अनुसार पारिजात वृक्ष में हनुमानजी का भी वास रहता है। मंदिर के आसपास के वृक्षों पर तोतों के कई झुंड हैं। इस बारे में एक दंतकथा भी प्रचलित है। तोता ब्राह्मण का अवतार माना जाता है। हनुमानजी ने भी तुलसीदासजी के लिए तोते का रूप धारण कर उन्हें भी श्रीराम के दर्शन कराए थे।
साँवेर के उलटे हनुमान मंदिर में श्रीराम, सीता, लक्ष्मणजी, शिव-पार्वती की मूर्तियाँ हैं। मंगलवार को हनुमानजी को चौला भी चढ़ाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि तीन मंगलवार, पाँच मंगलवार यहाँ दर्शन करने से जीवन में आई कठिन से कठिन विपदा दूर हो जाती है। यही आस्था श्रद्धालुओं को यहाँ तक खींच कर ले आती है।
कैसे पहुँचें:-
हवाई मार्ग:- निकटतम एयरपोर्ट इंदौर 30 किमी दूरी पर स्थित है।
रेल मार्ग:- यहाँ पहुँचने के लिए सबमें निकटतम इंदौर का रेलवे स्टेशन है।
सड़क मार्ग:- उज्जैन (30 किमी), इंदौर (30 किमी) से यहाँ आने-जाने के लिए बस तथा टैक्सी उपलब्ध है।
सोमवार, 29 मार्च 2010
चूडियां
रंगीन चूडि़यों का सच
मेरे सामने चित्रा आ जाती है। .. यूकलिप्टस के पेड की तरह चिकनी कलाइयां.. रंग, जैसे दूध में किसी ने सिंदूर घोल दिया हो।
मुझे चूडियां पहना दो।
आज तो संडे है चित्रा। तुम्हें पता है न कि यहां रविवार को दुकानें बंद रहती हैं।
प्लीज रवि.., हमारी बात मत ठुकराओ। ..
हमने जब कहानी की फरमाइश की, तुमने लिखी। हमने जब भी..। शर्म से सिर झुकाकर मेरे करीब आ जाती है वह। मुझे लगता है, भीनी-भीनी खुशबू वाली अगरबत्ती जल रही है.. सुगंध की बांहें मुझे घेर रही हैं। मैं कमजोर पडता जा रहा हूं। ऐसा क्यों होता है? मैं उसकी बात टाल नहीं पाता।
प्लीज रवि। वह आंखों से मुसकराती है। मैं सोचते हुए कहता हूं, चूडीघर वाला मेरा दोस्त है। मकान ऊपर, दुकान नीचे। अब उठो। चूडी क्या, किसी दिन ताजमहल बनवा दूंगा।
लेखक जी, जब शहंशाह हो, प्यार के साथ ही ब्लैक-मनी भी हो तो ताजमहल भले न बने, पैलेसनुमा घर जैसा कुछ बन जाता है।
बहुत बातें करती हो, अब चलो भी।
हम चूडियां यहीं पहनेंगे-तुमसे। दैट्स ऑल।
पागल हो गई हो? मैं चूडीवाला दिखता हूं? एक लंबी-सी मुस्क ान उसके चेहरे पर फैल जाती है, जैसे मासूम-सी बच्ची, स्लेट पर लंबी-सी लकीर खींच दे-यहां से वहां तक। हां, तुम्हारे प्यार में सचमुच पागल हो गए हैं, इसीलिए आग्रह कर रहे हैं।
मुझसे चूडियां टूट जाएंगी। हाथ में खरोंच पड सकती है।
पडने दो। खून निकल आए तो और अच्छा।
प्यार में बहा खून रंग लाता है।
मैं उसका चेहरा देखता हूं।
हमें देखने में टाइम वेस्ट मत करो। जाओ, चूडियां ले आओ। एक भी सलामत गई, तो हम समझेंगे।
क्या समझोगी?
यही कि तुम लेखन के साथ ही चूडियों की दुकान भी खोल सकते हो। दाल-रोटी मजे से चल जाएगी। वह भागती लहरों की तरह चंचल हंसी हंसती है।
मैं उठता हूं, तुम?
हम यहीं गंगा के किनारे तुम्हारा इंतजार करेंगे।
अरे, कहां चल दिए?
चूडियां लाने।
सचमुच, आदमी प्यार में पागल हो जाता है। लेखक जी, आपको साइज मालूम है मेरा? सवा दो इंच। और हां, साबुन भी लेकर आना। नहाने वाला-कपडा धोने वाला नहीं। वह फिर हंसती है। लंबी-सी हंसी। यहां से वहां तक फैली हुई हंसी।
मैं ढेर-सारी चूडियां लेकर आता हूं।
वह सीढी के करीब जाकर पानी में कलाइयां डुबो देती है। मुझे लगता है, यूकलिप्टस के पेड के इर्द-गिर्द बाढ आ गई है।
साबुन लगाकर वह कलाइयां मेरे सामने बढा देती है, अब पहना दो।
मैं एक पहनाता हूं। वह दूसरा हाथ बढा देती है।
फिर एक पहना देता हूं।
अब बस, एक भी टूट गई तो।
और आ जाएंगी।
नहीं रवि।
वह गंभीर आवाज में कहती है, तुम पुरुष हो न, इसलिए इसके टूटने का दर्द तुम्हें मालूम नहीं। चूडियां कलाइयों में आकर इतिहास बन जाती हैं, टूटकर महा-इतिहास। तब औरत को लगता है, कांच का इंद्रधनुष बिखर गया। कबूतर के उडने वाले पंखों में कीलें ठोंक दी गई। जैसे ईसा मसीह के हाथों में..।
एक लंबे अरसे के बाद चित्रा का खत आया है। इस शहर के बडे से कॉलेज में आकर, हम बहुत छोटे से हो गए हैं। यहां ढेरों पत्रिकाएं आती हैं। हर लेखक चुनाव को लेकर लिख रहा है। तुम्हारी खामोश कलम हमें रोज छोटा बना रही है। प्लीज अलमारी खोलकर हमें याद करना। विश्वास है, कहानी बन जाएगी।
मुझे खयाल आता है अपनी किताबों का। वह अलमारी के पास आई थी, तुम्हारी किताब मेरे तकिये के नीचे रहेगी तो उस बडे से कॉलेज-हॉस्टल में हम अकेले नहीं रहेंगे। उसने अलमारी खोली थी। चौंककर कहा, तुम तो चर्च जाते नहीं, बाइबिल पढते हो?
हां, सुबह उठने के बाद। रात, सोने से पहले। वह कुछ सोचती रही।
फिर उसने दोनों चूडियां उतारकर बाइबिल पर रख दीं, अब तुम रोज दो बार हमें याद करोगे। चूडियां हटाकर बाइबिल पढोगे। बाइबिल रख कर, उस पर चूडियां रखोगे। सॉरी यार, मैथ कमजोर है। तुम तो सुबह और रात, दो टाइम पढते हो। यानी तब चार बार याद करोगे।
मैं उठकर अलमारी के पास जाता हूं। धीरे से खोलता हूं। बाइबिल पर चित्रा की चूडियां रखी हैं। तभी बाहर से एक आवाज गूंजती है, हरी-पीली-लाल चूडियां।
मैं अलमारी बंद कर बरामदे में आता हूं। चूडी वाली, भाभी और छोटी भतीजी हैं। भैया शतरंज खेल रहे हैं, शह बचो प्रोफेसर सहाय।
प्रोफेसर नई चाल चलते हैं, तुम फंस गए। भाभी चूडी वाली से कहती हैं, उन्हें क्या देख रही है, मेरी बेटी को चूडियां पहना। लाल नहीं, काली पहना, नजर न लगे।
तभी भैया ठहाका लगाते हैं, अब तो तुम घिर गए प्रोफेसर सहाय।
चूडी वाली पूछती है, कौन हैं?
भाभी गर्व से कहती हैं, मुन्नी के बाबू। कारगिल-युद्ध में लडे थे। कई मेडल मिले हैं। बायां हाथ काटा गया। गोली लगी थी।
मैं भाभी को देखता हूं। वह आंचल से आंसू पोंछती है, चल, बच्ची को चूडी पहना।
चित्रा की चिट्ठियां आती रहीं। हर बार कलम उठाकर भी मैं कहानी नहीं लिख सका। चित्रा की फरमाइश बासी रोटी की तरह सूखकर कडी हो गई थी। इस घटना पर मैंने कहानी बुननी शुरू की। हमेशा की तरह अगरबत्ती जलाई, पानी रखा।
लिखते-लिखते पानी पीने की आदत है। एक बार चित्रा ने कहा था, आज मैं तुम्हारे पानी पीने का रहस्य जान गई। तुम काग्ाज की जमीन पर, कलम की कुदाली चलाते हो। ईमानदारी के शब्द बोते हो, फिर गिलास के पानी से सींचते हो, इसीलिए तुम्हारी कहानियों से मुहब्बत की फसल पैदा होती है।
प्लीज, डिस्टर्ब मत करो। तुम तो जानती हो, लिखते वक्त मैं एकांत चाहता हूं।
वह चली गई थी।
बाद में उसका पत्र आया कि पापा के साथ वह शिमला में गर्मी की छुट्टियां बिताकर आएगी। लिखा था, मैं यहां के रोमांटिक माहौल का मजा लूंगी। तुम मेरी चूडियों को याद कर, एक प्यारी लव-स्टोरी लिख कर रखना।
अचानक मुझे लगा, चित्रा करीब खडी है। पलटकर देखा, कोई नहीं है। हंसी आई। वह तो पराये शहर में है। उसकी फरमाइश बंद लिफ ाफेकी तरह जस की तस पडी है। मैं कलम उठाता हूं किवे यानी नेताजी आ जाते हैं, ये क्या हो रहा है?
कहानी लिखने जा रहा था..।
यह लिखने का नहीं, जीवन-मरण का प्रश्न है-युद्ध क्षेत्र में उतरना है। उन्होंने कहा।
मगर युद्ध तो कबका समाप्त हो गया।
भाई मेरे, लडाई में गोली चलती है। चौकियों पर कब्जे किए जाते हैं। तिरंगा लहराया जाता है। लाशें गिरती हैं और चुनाव में भी गोलियां चलती हैं, बूथ कैप्चर होते हैं, लाशें गिरती हैं। जीतने पर, अपने दल के झंडों के साथ जुलूस निकाले जाते हैं। उस युद्ध और इस लडाई में बस जरा-सा फर्क है। वह युद्ध बाहर वालों से लडते हैं, यह लडाई अपने लोगों से लडते हैं।
जैसे झूठ और सच में जरा-सा फर्क होता है। झूठ की जेब भरी होती है, सच की खाली। लेकिन यह जरा-सा फर्क तब बडा बन जाता है, जब भरी जेब से बंगला बन जाता है।
वाह! इन्हीं बातों से हाईकमान आपको इतना मानते हैं। साफ कह दिया कि उन्हें कैसे भी लेकर आएं। सारे मैटर रवि जी से लिखवाएं। चुनाव जीतते ही आपको एमएलसी बना देंगे-साहित्यकार कोटे पर। चलिए अब चेहरा क्या देख रहे हैं। सीरियस प्रॉब्लम है। हाईकमान आपसे डिस्कस करना चाहते हैं।
कैसी प्रॉब्लम।
वे चिंतित हो गए। फिर बोले, अपोजीशन पार्टी ने एक लेडी को मैदान में उतारा है। लेडी के खिलाफ लेडी कैंडिडेट को उतारना होगा। नहीं तो टांय-टांय फिस।
मैं कागज समेटता हूं। लिखने का मूड खत्म हो गया। भाभी की चीख सुनकर मैं बाहर आया। देखा, आज फिर चूडी वाली बैठी है। भाभी कह रही हैं, जा, रंगीन चूडियां लेकर। किसके लिए खरीदूं? तुझे मालूम है मेरे पति को किसी ने गुप्त सूचना दी थी कि आतंकवादी राघव के घर में छिपे हैं। उसे व उसकी पत्नी को बंदी बना रखा है। डर से राघव कुछ कहता नहीं। वह सामान लाता है, उसकी पत्नी बनाती है। लगता है, हादसा करने की योजना है।
फिर? आश्चर्य से चूडी वाली ने पूछा।
फिर क्या! यह सुनकर मेरे पति का फौजी खून खौल उठा। अलमारी खोली और मेडल्स मुझे देकर अपने सलामत हाथ से जेब में रिवाल्वर रखकर मुझे देखा। तेजी से बाहर निकल गए। बाद में पता चला, राघव व उसकी पत्नी को वहां से निकालने में तो वे सफल हुए, लेकिन अपने प्राण गंवा बैठे। भाभी रोने लगीं..।
चूडी वाली उन्हें चुपचाप, एकटक देखती रही। भाभी ने धीरे से कहा, ये चूडियां नहीं, मेरे लिए कांच की सलीबें हैं। तू सुहागिन है, बेच सुहाग की निशानी कहीं और जाकर।
चूडी वाली बोली, यह सब मुझे पता था। मैं तो गर्व से उठा तुम्हारा सिर देखने आई थी। मैं निर्धन परिवार की हूं, लेकिन गर्व से सिर पर सुहाग की निशानी उठाकर बेचती हूं। जो कुछ कमाती हूं, उसका कुछ हिस्सा जवानों के लिए भेजती हूं। चूडियां मुझे सलीबें नहीं लगतीं।
भाभी ने चौंककर पूछा, तुम विधवा हो? हां। मैं अपने पति से प्यार करती हूं और करती रहूंगी। मैं परमवीर चक्र विजेता शहीद की पत्नी हूं।
चूडी वाली की बात सुनकर नेताजी को मानो मुंहमांगी मुराद मिल गई। खुशी से उछलकर बोले, अब विपक्षी दल छाती पीट-पीट कर रोएंगे। कहां से यह हीरा खोजकर ले आए। उनकी सीट तो गई रवि बाबू।
फिर चूडी वाली से मुखातिब होकर कहते हैं, बहन, हम तुम्हें चुनाव में खडा करेंगे। सुनो भैया, चूडी वाली धीरे से मुसकराती है, तुम्हारे जैसे लोग देशभक्त नहीं, मौकापरस्त नेता हैं, जो कुर्सी के लिए लडते-लडवाते हैं। अपने गांव-देहात में, अपने ही लोगों से मुझे लडाने की बात करते हो। सीमा पर नहीं तो कम से कम देश के भीतर घुसे आतंकवादियों से लडो। फिर वहां से लौटकर, किसी शहीद की पत्नी को लडवाने की बात सोचना।
वह टोकरी सिर पर रखकर उठने लगती है। भाभी उसका हाथ पकडकर बिठा लेती हैं। फिर बडे प्यार से, अपने दोनों हाथों से उसकी कलाइयां सहलाने लगती हैं। मेरे सामने चार नंगी कलाइयां उसी तरह चमकने लगती हैं, जैसे सीमा पर जमी बर्फ, सूरज की किरणों के पडने से जगमगा उठती हैं, ढेर सारी रंगीन चूडियों की तरह..।
मेरे सामने चित्रा आ जाती है। .. यूकलिप्टस के पेड की तरह चिकनी कलाइयां.. रंग, जैसे दूध में किसी ने सिंदूर घोल दिया हो।
मुझे चूडियां पहना दो।
आज तो संडे है चित्रा। तुम्हें पता है न कि यहां रविवार को दुकानें बंद रहती हैं।
प्लीज रवि.., हमारी बात मत ठुकराओ। ..
हमने जब कहानी की फरमाइश की, तुमने लिखी। हमने जब भी..। शर्म से सिर झुकाकर मेरे करीब आ जाती है वह। मुझे लगता है, भीनी-भीनी खुशबू वाली अगरबत्ती जल रही है.. सुगंध की बांहें मुझे घेर रही हैं। मैं कमजोर पडता जा रहा हूं। ऐसा क्यों होता है? मैं उसकी बात टाल नहीं पाता।
प्लीज रवि। वह आंखों से मुसकराती है। मैं सोचते हुए कहता हूं, चूडीघर वाला मेरा दोस्त है। मकान ऊपर, दुकान नीचे। अब उठो। चूडी क्या, किसी दिन ताजमहल बनवा दूंगा।
लेखक जी, जब शहंशाह हो, प्यार के साथ ही ब्लैक-मनी भी हो तो ताजमहल भले न बने, पैलेसनुमा घर जैसा कुछ बन जाता है।
बहुत बातें करती हो, अब चलो भी।
हम चूडियां यहीं पहनेंगे-तुमसे। दैट्स ऑल।
पागल हो गई हो? मैं चूडीवाला दिखता हूं? एक लंबी-सी मुस्क ान उसके चेहरे पर फैल जाती है, जैसे मासूम-सी बच्ची, स्लेट पर लंबी-सी लकीर खींच दे-यहां से वहां तक। हां, तुम्हारे प्यार में सचमुच पागल हो गए हैं, इसीलिए आग्रह कर रहे हैं।
मुझसे चूडियां टूट जाएंगी। हाथ में खरोंच पड सकती है।
पडने दो। खून निकल आए तो और अच्छा।
प्यार में बहा खून रंग लाता है।
मैं उसका चेहरा देखता हूं।
हमें देखने में टाइम वेस्ट मत करो। जाओ, चूडियां ले आओ। एक भी सलामत गई, तो हम समझेंगे।
क्या समझोगी?
यही कि तुम लेखन के साथ ही चूडियों की दुकान भी खोल सकते हो। दाल-रोटी मजे से चल जाएगी। वह भागती लहरों की तरह चंचल हंसी हंसती है।
मैं उठता हूं, तुम?
हम यहीं गंगा के किनारे तुम्हारा इंतजार करेंगे।
अरे, कहां चल दिए?
चूडियां लाने।
सचमुच, आदमी प्यार में पागल हो जाता है। लेखक जी, आपको साइज मालूम है मेरा? सवा दो इंच। और हां, साबुन भी लेकर आना। नहाने वाला-कपडा धोने वाला नहीं। वह फिर हंसती है। लंबी-सी हंसी। यहां से वहां तक फैली हुई हंसी।
मैं ढेर-सारी चूडियां लेकर आता हूं।
वह सीढी के करीब जाकर पानी में कलाइयां डुबो देती है। मुझे लगता है, यूकलिप्टस के पेड के इर्द-गिर्द बाढ आ गई है।
साबुन लगाकर वह कलाइयां मेरे सामने बढा देती है, अब पहना दो।
मैं एक पहनाता हूं। वह दूसरा हाथ बढा देती है।
फिर एक पहना देता हूं।
अब बस, एक भी टूट गई तो।
और आ जाएंगी।
नहीं रवि।
वह गंभीर आवाज में कहती है, तुम पुरुष हो न, इसलिए इसके टूटने का दर्द तुम्हें मालूम नहीं। चूडियां कलाइयों में आकर इतिहास बन जाती हैं, टूटकर महा-इतिहास। तब औरत को लगता है, कांच का इंद्रधनुष बिखर गया। कबूतर के उडने वाले पंखों में कीलें ठोंक दी गई। जैसे ईसा मसीह के हाथों में..।
एक लंबे अरसे के बाद चित्रा का खत आया है। इस शहर के बडे से कॉलेज में आकर, हम बहुत छोटे से हो गए हैं। यहां ढेरों पत्रिकाएं आती हैं। हर लेखक चुनाव को लेकर लिख रहा है। तुम्हारी खामोश कलम हमें रोज छोटा बना रही है। प्लीज अलमारी खोलकर हमें याद करना। विश्वास है, कहानी बन जाएगी।
मुझे खयाल आता है अपनी किताबों का। वह अलमारी के पास आई थी, तुम्हारी किताब मेरे तकिये के नीचे रहेगी तो उस बडे से कॉलेज-हॉस्टल में हम अकेले नहीं रहेंगे। उसने अलमारी खोली थी। चौंककर कहा, तुम तो चर्च जाते नहीं, बाइबिल पढते हो?
हां, सुबह उठने के बाद। रात, सोने से पहले। वह कुछ सोचती रही।
फिर उसने दोनों चूडियां उतारकर बाइबिल पर रख दीं, अब तुम रोज दो बार हमें याद करोगे। चूडियां हटाकर बाइबिल पढोगे। बाइबिल रख कर, उस पर चूडियां रखोगे। सॉरी यार, मैथ कमजोर है। तुम तो सुबह और रात, दो टाइम पढते हो। यानी तब चार बार याद करोगे।
मैं उठकर अलमारी के पास जाता हूं। धीरे से खोलता हूं। बाइबिल पर चित्रा की चूडियां रखी हैं। तभी बाहर से एक आवाज गूंजती है, हरी-पीली-लाल चूडियां।
मैं अलमारी बंद कर बरामदे में आता हूं। चूडी वाली, भाभी और छोटी भतीजी हैं। भैया शतरंज खेल रहे हैं, शह बचो प्रोफेसर सहाय।
प्रोफेसर नई चाल चलते हैं, तुम फंस गए। भाभी चूडी वाली से कहती हैं, उन्हें क्या देख रही है, मेरी बेटी को चूडियां पहना। लाल नहीं, काली पहना, नजर न लगे।
तभी भैया ठहाका लगाते हैं, अब तो तुम घिर गए प्रोफेसर सहाय।
चूडी वाली पूछती है, कौन हैं?
भाभी गर्व से कहती हैं, मुन्नी के बाबू। कारगिल-युद्ध में लडे थे। कई मेडल मिले हैं। बायां हाथ काटा गया। गोली लगी थी।
मैं भाभी को देखता हूं। वह आंचल से आंसू पोंछती है, चल, बच्ची को चूडी पहना।
चित्रा की चिट्ठियां आती रहीं। हर बार कलम उठाकर भी मैं कहानी नहीं लिख सका। चित्रा की फरमाइश बासी रोटी की तरह सूखकर कडी हो गई थी। इस घटना पर मैंने कहानी बुननी शुरू की। हमेशा की तरह अगरबत्ती जलाई, पानी रखा।
लिखते-लिखते पानी पीने की आदत है। एक बार चित्रा ने कहा था, आज मैं तुम्हारे पानी पीने का रहस्य जान गई। तुम काग्ाज की जमीन पर, कलम की कुदाली चलाते हो। ईमानदारी के शब्द बोते हो, फिर गिलास के पानी से सींचते हो, इसीलिए तुम्हारी कहानियों से मुहब्बत की फसल पैदा होती है।
प्लीज, डिस्टर्ब मत करो। तुम तो जानती हो, लिखते वक्त मैं एकांत चाहता हूं।
वह चली गई थी।
बाद में उसका पत्र आया कि पापा के साथ वह शिमला में गर्मी की छुट्टियां बिताकर आएगी। लिखा था, मैं यहां के रोमांटिक माहौल का मजा लूंगी। तुम मेरी चूडियों को याद कर, एक प्यारी लव-स्टोरी लिख कर रखना।
अचानक मुझे लगा, चित्रा करीब खडी है। पलटकर देखा, कोई नहीं है। हंसी आई। वह तो पराये शहर में है। उसकी फरमाइश बंद लिफ ाफेकी तरह जस की तस पडी है। मैं कलम उठाता हूं किवे यानी नेताजी आ जाते हैं, ये क्या हो रहा है?
कहानी लिखने जा रहा था..।
यह लिखने का नहीं, जीवन-मरण का प्रश्न है-युद्ध क्षेत्र में उतरना है। उन्होंने कहा।
मगर युद्ध तो कबका समाप्त हो गया।
भाई मेरे, लडाई में गोली चलती है। चौकियों पर कब्जे किए जाते हैं। तिरंगा लहराया जाता है। लाशें गिरती हैं और चुनाव में भी गोलियां चलती हैं, बूथ कैप्चर होते हैं, लाशें गिरती हैं। जीतने पर, अपने दल के झंडों के साथ जुलूस निकाले जाते हैं। उस युद्ध और इस लडाई में बस जरा-सा फर्क है। वह युद्ध बाहर वालों से लडते हैं, यह लडाई अपने लोगों से लडते हैं।
जैसे झूठ और सच में जरा-सा फर्क होता है। झूठ की जेब भरी होती है, सच की खाली। लेकिन यह जरा-सा फर्क तब बडा बन जाता है, जब भरी जेब से बंगला बन जाता है।
वाह! इन्हीं बातों से हाईकमान आपको इतना मानते हैं। साफ कह दिया कि उन्हें कैसे भी लेकर आएं। सारे मैटर रवि जी से लिखवाएं। चुनाव जीतते ही आपको एमएलसी बना देंगे-साहित्यकार कोटे पर। चलिए अब चेहरा क्या देख रहे हैं। सीरियस प्रॉब्लम है। हाईकमान आपसे डिस्कस करना चाहते हैं।
कैसी प्रॉब्लम।
वे चिंतित हो गए। फिर बोले, अपोजीशन पार्टी ने एक लेडी को मैदान में उतारा है। लेडी के खिलाफ लेडी कैंडिडेट को उतारना होगा। नहीं तो टांय-टांय फिस।
मैं कागज समेटता हूं। लिखने का मूड खत्म हो गया। भाभी की चीख सुनकर मैं बाहर आया। देखा, आज फिर चूडी वाली बैठी है। भाभी कह रही हैं, जा, रंगीन चूडियां लेकर। किसके लिए खरीदूं? तुझे मालूम है मेरे पति को किसी ने गुप्त सूचना दी थी कि आतंकवादी राघव के घर में छिपे हैं। उसे व उसकी पत्नी को बंदी बना रखा है। डर से राघव कुछ कहता नहीं। वह सामान लाता है, उसकी पत्नी बनाती है। लगता है, हादसा करने की योजना है।
फिर? आश्चर्य से चूडी वाली ने पूछा।
फिर क्या! यह सुनकर मेरे पति का फौजी खून खौल उठा। अलमारी खोली और मेडल्स मुझे देकर अपने सलामत हाथ से जेब में रिवाल्वर रखकर मुझे देखा। तेजी से बाहर निकल गए। बाद में पता चला, राघव व उसकी पत्नी को वहां से निकालने में तो वे सफल हुए, लेकिन अपने प्राण गंवा बैठे। भाभी रोने लगीं..।
चूडी वाली उन्हें चुपचाप, एकटक देखती रही। भाभी ने धीरे से कहा, ये चूडियां नहीं, मेरे लिए कांच की सलीबें हैं। तू सुहागिन है, बेच सुहाग की निशानी कहीं और जाकर।
चूडी वाली बोली, यह सब मुझे पता था। मैं तो गर्व से उठा तुम्हारा सिर देखने आई थी। मैं निर्धन परिवार की हूं, लेकिन गर्व से सिर पर सुहाग की निशानी उठाकर बेचती हूं। जो कुछ कमाती हूं, उसका कुछ हिस्सा जवानों के लिए भेजती हूं। चूडियां मुझे सलीबें नहीं लगतीं।
भाभी ने चौंककर पूछा, तुम विधवा हो? हां। मैं अपने पति से प्यार करती हूं और करती रहूंगी। मैं परमवीर चक्र विजेता शहीद की पत्नी हूं।
चूडी वाली की बात सुनकर नेताजी को मानो मुंहमांगी मुराद मिल गई। खुशी से उछलकर बोले, अब विपक्षी दल छाती पीट-पीट कर रोएंगे। कहां से यह हीरा खोजकर ले आए। उनकी सीट तो गई रवि बाबू।
फिर चूडी वाली से मुखातिब होकर कहते हैं, बहन, हम तुम्हें चुनाव में खडा करेंगे। सुनो भैया, चूडी वाली धीरे से मुसकराती है, तुम्हारे जैसे लोग देशभक्त नहीं, मौकापरस्त नेता हैं, जो कुर्सी के लिए लडते-लडवाते हैं। अपने गांव-देहात में, अपने ही लोगों से मुझे लडाने की बात करते हो। सीमा पर नहीं तो कम से कम देश के भीतर घुसे आतंकवादियों से लडो। फिर वहां से लौटकर, किसी शहीद की पत्नी को लडवाने की बात सोचना।
वह टोकरी सिर पर रखकर उठने लगती है। भाभी उसका हाथ पकडकर बिठा लेती हैं। फिर बडे प्यार से, अपने दोनों हाथों से उसकी कलाइयां सहलाने लगती हैं। मेरे सामने चार नंगी कलाइयां उसी तरह चमकने लगती हैं, जैसे सीमा पर जमी बर्फ, सूरज की किरणों के पडने से जगमगा उठती हैं, ढेर सारी रंगीन चूडियों की तरह..।
ईसा मसीह
क्या ईसा मसीह का कश्मीर में मकबरा है?
एक परंपरा ये कहती है कि ईसा मसीह ने सूली से बचकर अपने बाकी दिन कश्मीर में गुजारे और इसी आस्था के कारण श्रीनगर में उनका एक मजार बना दिया गया जोकि विदेशी यात्रियों के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान बन चुका है। श्रीनगर के पुराने शहर की एक इमारत को रौजाबल के नाम से जाना जाता है।
यह शहर के उस इलाके में स्थित है जहाँ भारतीय सुरक्षा बल की गश्त बराबर जारी रहती है या फिर वह अपने ठिकानों से सर निकाले चौकसी करते हुए नजर आते हैं।
इसके बावजूद वहाँ सुरक्षाकर्मियों को कभी-कभी चरमपंथियों से मुठभेड़ का सामना करना पड़ता है तो कभी पत्थर फेंकते बच्चों का। फिर भी सुरक्षा स्थिति में बेहतरी आई है और पर्यटक यहाँ लौट रहे हैं।
पिछली बार जब एक साल पहले हमने रौजाबल की तलाश की थी तो हमारे टैक्सी वाले को एक मस्जिद और दरगाह के कई चक्कर लगाने पड़े थे और काफी पूछने के बाद ही हमें वह जगह मिली थी।
यह रौजा एक गली के नुक्कड़ पर है और पत्थर की बनी एक साधारण इमारत है। एक दरबान मुझे अंदर ले गया और उसने मुझे लकड़ी के बने कमरे को खास तौर से देखने के लिए कहा जो कि जालीनुमा जाफरी की तरह था।
इन्हीं जालियों के बीच से मैंने एक कब्र देखी जोकि हरे रंग की चादर से ढकी हुई थी।
'वो प्रोफेसर'
इस बार जब में फिर से यहाँ आया तो यह बंद था। इसके दरवाजे पर ताला लगा था क्योंकि यहाँ काफी पर्यटक आने लगे थे। इसका कारण क्या हो सकता था। नए जमाने के ईसाइयों, उदारवादी मुसलमानों और दाविंची कोड के समर्थकों के मुताबिक भारत में आने वाले सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति का यहाँ शव रखा है।
आधिकारिक तौर पर यह मजार एक मध्यकालीन मुस्लिम उपदेशक यूजा आसफ का मकबरा है, लेकिन बड़ी संख्या में लोग यह मानते हैं कि यह नजारेथ के येशु यानी ईसा का मजार है।
उनका मानना है कि सूली से बचकर ईसा मसीह 2000 साल पहले अपनी जिंदगी के बाकी दिन गुजारने कश्मीर चले आए थे। रियाज के परिवार वाले इस रौजे की देख-भाल करते हैं और वह नहीं मानते कि ईसा यहाँ दफन हैं।
उसने कहा, 'ये कहानी स्थानीय दुकानदारों की फैलाई हुई है क्योंकि किसी प्रोफेसर ने कह दिया था कि यह कब्र ईसा मसीह की है। उन्होंने सोचा की यह उनके कारोबार के लिए काफी अच्छा होगा। पर्यटक आएँगे। आखिर इतने सालों की हिंसा के बाद।'
उसने ये भी कहा, 'और फिर ये हुआ कि लोनली प्लैनेट में इसके बारे में खबर प्रकाशित हुई और फिर ये हुआ कि बहुत सारे लोग यहाँ आने लगे।'
उसने मेरी ओर खेद भरी नजरों से देखते हुए कहा, 'एक बार एक विदेशी यहाँ आया और मकबरे से एक टुकड़ा तोड़ कर अपने साथ ले गया।'
कहानी सुनाते हुए उसने कहा, 'एक बार एक थका-हारा और मैला ऑस्ट्रेलियाई जोड़ा अपने हाथ में लोनली प्लेनेट का भारत के लिए नया ट्रैवेल गाइड लिए पहुँचा जिसमें ईशनिंदा पर कुछ आपत्तियों के साथ ईसा की मजार के बारे में लिखा गया था।'
'उन्होंने मुझे मजार के बाहर उनकी तस्वीर लेने के लिए कहा क्योंकि मजार बंद था। वे इस बात से ज्यादा परेशान नहीं हुए।'
उनका कहना था कि उनके लिए ईसा का मजार भारत में उनकी यात्रा के दौरान उन स्थानों की सूची में शामिल था जिन्हें खना उन्होंने अनिवार्य कर रखा था यानी अपनी मस्ट-विजिट लिस्ट में शामिल कर रखा था।
बौद्ध सम्मेलन : श्रीनगर के उत्तर में पहाड़ों पर एक बौद्ध विहार के खंडहर हैं जिसका जिक्र अभी लोनली प्लेनेट में नहीं हो सका है। यह वह जगह है जहाँ हम पहले नहीं जा सके थे क्योंकि एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया था कि वह इलाका चरमपंथियों से भरा हुआ है।
लेकिन अब ऐसा लगता है कि वहाँ के चौकीदार बहुत सारे पर्यटकों के आने के लिए तैयार हैं क्योंकि उन्होंने अंग्रेजी के 50 शब्द सीख लिए हैं और वे अपने छुपे हुए पुराने टेराकोटा टाइलों को बेचने का इरादा रखते हैं।
उन्होंने मुझे बताया कि सन 80 में हुए महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध बौद्ध सम्मेलन में ईसा मसीह ने भाग लिया था। यहाँ तक कि उन्होंने वह जगह भी बताई कि ईसा मसीह उस सम्मेलन में कहाँ बैठे थे।
ईसा मसीह के संदर्भ में ये कहानियाँ भारत में 19वीं शताब्दी से प्रचलित हैं। ये उन कोशिशों का नतीजा थीं जिसमें बुद्धिजीवियों में 19वीं सदी के दौरान बौद्ध और ईसाई धर्मों के बीच समानता को उजागर क की कोशिश की गई थी। ऐसी ही इच्छा कुछ ईसाइयों की थी कि वे ईसा मसीह की कोई कहानी भारत से जोड़ सकें।
ईसा मसीह के कुछ वर्षों के बारे में कुछ पता नहीं है कि वह 12 साल की आयु से लेकर 30 वर्ष की आयु तक कहाँ थे। कुछ लोगों का मानना है कि वह भारत में बौद्ध धर्म का ज्ञान प्राप्त कर रहे थे, लेकिन आम तौर पर इसे सही नहीं माना जाता है।
एक परंपरा ये कहती है कि ईसा मसीह ने सूली से बचकर अपने बाकी दिन कश्मीर में गुजारे और इसी आस्था के कारण श्रीनगर में उनका एक मजार बना दिया गया जोकि विदेशी यात्रियों के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान बन चुका है। श्रीनगर के पुराने शहर की एक इमारत को रौजाबल के नाम से जाना जाता है।
यह शहर के उस इलाके में स्थित है जहाँ भारतीय सुरक्षा बल की गश्त बराबर जारी रहती है या फिर वह अपने ठिकानों से सर निकाले चौकसी करते हुए नजर आते हैं।
इसके बावजूद वहाँ सुरक्षाकर्मियों को कभी-कभी चरमपंथियों से मुठभेड़ का सामना करना पड़ता है तो कभी पत्थर फेंकते बच्चों का। फिर भी सुरक्षा स्थिति में बेहतरी आई है और पर्यटक यहाँ लौट रहे हैं।
पिछली बार जब एक साल पहले हमने रौजाबल की तलाश की थी तो हमारे टैक्सी वाले को एक मस्जिद और दरगाह के कई चक्कर लगाने पड़े थे और काफी पूछने के बाद ही हमें वह जगह मिली थी।
यह रौजा एक गली के नुक्कड़ पर है और पत्थर की बनी एक साधारण इमारत है। एक दरबान मुझे अंदर ले गया और उसने मुझे लकड़ी के बने कमरे को खास तौर से देखने के लिए कहा जो कि जालीनुमा जाफरी की तरह था।
इन्हीं जालियों के बीच से मैंने एक कब्र देखी जोकि हरे रंग की चादर से ढकी हुई थी।
'वो प्रोफेसर'
इस बार जब में फिर से यहाँ आया तो यह बंद था। इसके दरवाजे पर ताला लगा था क्योंकि यहाँ काफी पर्यटक आने लगे थे। इसका कारण क्या हो सकता था। नए जमाने के ईसाइयों, उदारवादी मुसलमानों और दाविंची कोड के समर्थकों के मुताबिक भारत में आने वाले सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति का यहाँ शव रखा है।
आधिकारिक तौर पर यह मजार एक मध्यकालीन मुस्लिम उपदेशक यूजा आसफ का मकबरा है, लेकिन बड़ी संख्या में लोग यह मानते हैं कि यह नजारेथ के येशु यानी ईसा का मजार है।
उनका मानना है कि सूली से बचकर ईसा मसीह 2000 साल पहले अपनी जिंदगी के बाकी दिन गुजारने कश्मीर चले आए थे। रियाज के परिवार वाले इस रौजे की देख-भाल करते हैं और वह नहीं मानते कि ईसा यहाँ दफन हैं।
उसने कहा, 'ये कहानी स्थानीय दुकानदारों की फैलाई हुई है क्योंकि किसी प्रोफेसर ने कह दिया था कि यह कब्र ईसा मसीह की है। उन्होंने सोचा की यह उनके कारोबार के लिए काफी अच्छा होगा। पर्यटक आएँगे। आखिर इतने सालों की हिंसा के बाद।'
उसने ये भी कहा, 'और फिर ये हुआ कि लोनली प्लैनेट में इसके बारे में खबर प्रकाशित हुई और फिर ये हुआ कि बहुत सारे लोग यहाँ आने लगे।'
उसने मेरी ओर खेद भरी नजरों से देखते हुए कहा, 'एक बार एक विदेशी यहाँ आया और मकबरे से एक टुकड़ा तोड़ कर अपने साथ ले गया।'
कहानी सुनाते हुए उसने कहा, 'एक बार एक थका-हारा और मैला ऑस्ट्रेलियाई जोड़ा अपने हाथ में लोनली प्लेनेट का भारत के लिए नया ट्रैवेल गाइड लिए पहुँचा जिसमें ईशनिंदा पर कुछ आपत्तियों के साथ ईसा की मजार के बारे में लिखा गया था।'
'उन्होंने मुझे मजार के बाहर उनकी तस्वीर लेने के लिए कहा क्योंकि मजार बंद था। वे इस बात से ज्यादा परेशान नहीं हुए।'
उनका कहना था कि उनके लिए ईसा का मजार भारत में उनकी यात्रा के दौरान उन स्थानों की सूची में शामिल था जिन्हें खना उन्होंने अनिवार्य कर रखा था यानी अपनी मस्ट-विजिट लिस्ट में शामिल कर रखा था।
बौद्ध सम्मेलन : श्रीनगर के उत्तर में पहाड़ों पर एक बौद्ध विहार के खंडहर हैं जिसका जिक्र अभी लोनली प्लेनेट में नहीं हो सका है। यह वह जगह है जहाँ हम पहले नहीं जा सके थे क्योंकि एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया था कि वह इलाका चरमपंथियों से भरा हुआ है।
लेकिन अब ऐसा लगता है कि वहाँ के चौकीदार बहुत सारे पर्यटकों के आने के लिए तैयार हैं क्योंकि उन्होंने अंग्रेजी के 50 शब्द सीख लिए हैं और वे अपने छुपे हुए पुराने टेराकोटा टाइलों को बेचने का इरादा रखते हैं।
उन्होंने मुझे बताया कि सन 80 में हुए महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध बौद्ध सम्मेलन में ईसा मसीह ने भाग लिया था। यहाँ तक कि उन्होंने वह जगह भी बताई कि ईसा मसीह उस सम्मेलन में कहाँ बैठे थे।
ईसा मसीह के संदर्भ में ये कहानियाँ भारत में 19वीं शताब्दी से प्रचलित हैं। ये उन कोशिशों का नतीजा थीं जिसमें बुद्धिजीवियों में 19वीं सदी के दौरान बौद्ध और ईसाई धर्मों के बीच समानता को उजागर क की कोशिश की गई थी। ऐसी ही इच्छा कुछ ईसाइयों की थी कि वे ईसा मसीह की कोई कहानी भारत से जोड़ सकें।
ईसा मसीह के कुछ वर्षों के बारे में कुछ पता नहीं है कि वह 12 साल की आयु से लेकर 30 वर्ष की आयु तक कहाँ थे। कुछ लोगों का मानना है कि वह भारत में बौद्ध धर्म का ज्ञान प्राप्त कर रहे थे, लेकिन आम तौर पर इसे सही नहीं माना जाता है।
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